Connect with us

समाज

यशवंत सिन्हा का भाजपा सांसदों को खुला ख़त, कृपया साहस करें, बोलें और देश एवं लोकतंत्र को बचाएं

Published

on

भाजपा के पूर्व वित्त मंत्री और बागी सांसद यशवंत सिन्हा पिछले कुछ दिनों से अपने पार्टी के मुखिया नरेन्द्र मोदी और भाजपा के शीर्ष नेताओं पर तीखे सवाल के लिए जाने जा रहे है, पिछले कुछ दिनों में इन्होने कई बार प्रधानमंत्री मोदी सहित अमित सह और अरुण जेटली के नीतियों पर गंभीर सवाल खड़ा कर चुके है

देश में हो रहे लगातार बलात्कार के मामलों के बाद एक बार फिर यशवंत सिन्हा ने तीखा रुख इख़्तियार करते हुए भाजपा के सांसदों और शीर्ष नेताओं के नाम एक पत्र लिखा है जो इस प्रकार हैं:

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की जीत के लिए हम सभी ने बहुत कठिन परिश्रम की है। हम में से कुछ लोगों ने साल 2004 से 2014 तक केंद्रीय सत्ता पर काबिज यूपीए सरकार के शासन के खिलाफ हर मोर्चे पर संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष किया है जबकि कुछ लोग राज्य मुख्यालयों में सत्ता का आनंद उठा रहे थे। जब 2014 में अप्रत्याशित चुनावी नतीजे आए, तब लगा कि यह देश के इतिहास में नया स्वर्णिम अध्याय लिखेगा। तब हम सभी लोगों ने प्रधानमंत्री और उनकी टीम में पूरा भरोसा जताया और उन्हें पूरा समर्थन और सहयोग दिया। अब इस सरकार ने करीब चार साल पूरे कर लिए हैं और इस दौरान पांच बजट पेश कर लिए हैं। इसके अलावा सरकार ने उपलब्ध सभी अवसरों का इस्तेमाल कर लिया है पर परिणाम निराशाजनक रहे हैं। अंतत: यही लगता है कि हम अपने रास्ते से भटक चुके हैं, मतदाताओं का विश्वास खो चुके हैं।

देश की आर्थिक स्थिति डगमग है, जबकि मौजूदा सरकार लंबे-लंबे दावे कर रही है कि हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं। किसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बैंकों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) इस तरह जमा नहीं होती हैं, जैसा कि पिछले चार वर्षों में हुआ है। किसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में किसान तनावपूर्ण, युवा बेरोजगार, छोटे कारोबारी बर्बादी के कगार पर और बचत व निवेश निराशाजनक तरीके से नहीं गिरा करते हैं, जैसा पिछले चार वर्षों में होता आ रहा है। अब इससे बदतर स्थिति क्या होगी? भ्रष्टाचार ने फिर से अपना बदसूरत सिर उठा लिया है और बैंकों में एक के बाद एक घोटाले उजागर हो रहे हैं। इतना ही नहीं घोटालेबाज बड़ी आसानी से देश से भागने में सफल भी हो रहे हैं और सरकार असहाय होकर निहारती रह जाती है।

महिलाएं पहले से भी ज्यादा असुरक्षित हो गई हैं। रेप आज हर दिन का कहानी बन गई है और बलात्कारियों के खिलाफ सख्ती से कदम उठाने के बजाय हम उसके समर्थक बन गए हैं। कई मामलों में हमारे अपने लोग ऐसे घृणित कार्य में शामिल रहे हैं। अल्पसंख्यक सहमे हुए हैं। सबसे खराब बात यह है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और समाज के कमजोर वर्ग के लोगों के खिलाफ अत्याचार और भेदभाव बढ़ने के मामले बढ़ गए हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ था। संविधान प्रदत्त सुरक्षा की गारंटी भी खतरे में पड़ गई है।

हमारी विदेश नीति का कुल योग प्रधानमंत्री द्वारा लगातार विदेशी यात्राओं और उनके समकक्ष विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को गले लगाने तक सीमित हो गया है, भले ही इसे वो पसंद करते हों या ना। हम अपने पड़ोसी देशों के साथ भी मधुर संबंध बनाए रखने में विफल रहे हैं। चीन अक्सर हमारे हितों को काटता दिख रहा है। बड़ी सूझ-बूझ और जोखिम उठाकर भारतीय जवानों द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक भी बेअसर साबित हुई है, पाकिस्तान लगातार आतंक की खेप निर्यात कर रहा है और हम असहाय होकर सिर्फ देख रहे हैं। जम्मू-कश्मीर फिर से जलने लगा है। हर आम आदमी पीड़ित है जैसा कि पहले कभी नहीं था।

पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र पूर्णत: ध्वस्त हो चुका है। पार्टी के मित्र व सहयोगी बताते हैं कि संसदीय दल की बैठक में सांसदों को बोलने का मौका तक नहीं दिया जाता है, जैसा कि पहले होता रहा है, लोग अपनी बात बैठक में रखते रहे हैं। अन्य दलों में भी संवाद अमूमन एकतरफा ही होता है। वे बोलेंगे और आपको सुनना होगा। प्रधानमंत्री के पास भी आपके लिए समय नहीं है। पार्टी मुख्यालय भी कॉपोरेट दफ्तर बन गया है, जहां सीईओ से मुलाकात असंभव है।

पिछले चार वर्षों में जो सबसे बड़ा खतरा उभरा है वो हमारे लोकतंत्र के लिए है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा को कमतर और बदनाम किया गया है। संसद एक मजाक बनकर रह गया है। बजट सत्र में संसद में जारी गतिरोध को खत्म करने और संसद चलाने के लिए उपाय पर प्रधानमंत्री ने विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के साथ एक बार भी बैठना उचित नहीं समझा बल्कि उन्होंने इसके लिए विपक्ष पर आरोप मढ़ना उचित समझा। बजट सत्र के पहले पार्ट को सबसे छोटा रखा गया था। जब इसकी तुलना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के शासन से करता हूं तो पाता हूं कि उन दिनों वाजपेयी जी का हमलोगों को सख्त निर्देश होता था कि विपक्ष के साथ हर हाल में सद्भाव बनाकर रखा जाय ताकि संसद सुचारू रूप से चल सके। इसलिए हमारे सामने संसदीय नियमों के तहत विपक्ष ने अक्सर स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव और अन्य चर्चाएं सदन में पेश की थीं।

सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे सीनियर जजों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेन्स करना देश के न्यायिक इतिहास में अप्रत्याशित घटना रही है। इससे हमारे देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था में टकराव की बात स्पष्ट तरीके से उजागर हुई। इन जजों ने बार-बार कहा कि हमारे देश में लोकतंत्र खतरे में है।

आज, ऐसा प्रतीत होता है कि संचार के साधनों, विशेष रूप से मीडिया और सोशल मीडिया पर नियंत्रण करके चुनाव जीतना हमारी पार्टी का एकमात्र उद्देश्य रह गया है। यह गंभीर खतरा है। मुझे नहीं पता कि आप में से कितने लोगों को अगले लोकसभा चुनाव में दोबारा टिकट मिलेगा लेकिन पिछले अनुभवों से कह सकता हूं कि आप में से आधे लोगों की तो निश्चित तौर पर छुट्टी होगी। अगर आपने चुनावी टिकट पा भी लिया तो भी आपकी जीत की संभावनाएं बहुत दूर हैं। पिछले चुनावों में बीजेपी को कुल 31 फीसदी वोट मिले थे, 69 फीसदी वोट बीजेपी के खिलाफ था। ऐसे में अगर विपक्ष एकजुट हुआ तो आप कहीं के भी नहीं रहेंगे।

मौजूदा परिस्थितियों की मांग है कि राष्ट्रीय हित में आप बोलें। मैं कम से कम उन पांच अनुसूचित जाति के सांसदों का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने समुदाय की नाराजगी की बारे में और सरकार द्वारा किए गए वादाखिलाफी के बारे में आवाज तो उठाई। मैं आप सभी से अनुरोध करता हूं कि आप भी निर्भीक होकर हर मुद्दे पर अपनी बात बॉस के सामने रखें। अगर आप अब भी चुप रहते हैं तो आप देश को बड़ी हानि पहुंचा रहे हैं। भविष्य की पीढ़ियां आपको माफ नहीं करेगी। यह आपका अधिकार है कि आप उन लोगों से जवाब मांगें जो आज सरकार में हैं और देश को नीचे ले जा रहे हैं। देशहित में पार्टी का हित छोड़ना पड़ता है, वैसे ही जैसे पार्टी हित में व्यक्तिगत हितों को तिलांजलि देनी पड़ती है। मैं विशेष रूप से और व्यक्तिगत तौर पर आडवाणी जी और जोशी जी से अपील करना चाहता हूं कि देशहित में खड़े हों और उन द्वारा किए गए अद्वितीय बलिदानों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित बनाए रखने के लिए सही समय पर सुधारात्मक कदम उठाएं।

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ मामूली सफलताएं भी हमें हासिल हुई हैं लेकिन बड़ी असफलताओं ने उसे ढंक लिया है। मुझे उम्मीद है कि आप लोग इस पत्र में उठाए गए मुद्दों पर गंभीरता से विचार करेंगे। कृपया साहस करें, बोलें और देश एवं लोकतंत्र को बचाएं।

(यह पत्र अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ ये उसका हिंदी अनुवाद है)

देश

गांधी शांति प्रतिष्ठान में हत्यारे ब्रहमेश्वर मुखिया पर कार्यक्रम, सोशल मीडिया पर बवाल

Published

on

पिछले दिनों गांधी शांति प्रतिष्ठान में हत्यारे ब्राहमेश्वर मुखिया की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लोग सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ लिख रहे हैं। हालांकि, संस्थान की तरफ से सफाई भी आ गयी है।

मुकेश ने लिखा है –

सरकारी गांधीवादी संस्था-गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली ने गांधी के हत्यारों को महिमामंडित करने वाले संगठन विश्व हिंदू परिषद को अपने परिसर में कार्यक्रम की इजाजत दी। और जितने दिनों तक परिषद का कार्यक्रम चलता रहा, उतने दिनों तक के लिए गांधी समाधि का गेट आमलोगों के लिए बंद कर दिया गया। इसका विरोध हुआ। विरोध जायज था। गांधी समाधि को दो दिनों तक बंद रखा जाना और गांधी के नाम पर बनी संस्था में साम्प्रदायिक नफरत फैलाने व गांधी के हत्यारे को महिमामंडित करने वाले संगठन को कार्यक्रम की अनुमति दिया जाना गांधी का अपमान करने जैसा है।

अभी यह मामला थमा भी न था कि मठाधीश गांधीवादी संस्था-गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा कुख्यात रणवीर सेना के सरगना ब्रह्मेश्वर मुखिया को महिमामंडित करने वालों को कार्यक्रम की अनुमति देने का मामला सामने आ गया। यह वही ब्रह्मेश्वर मुखिया है, जिसके द्वारा बनाये गए संगठन -रणवीर सेना ने बिहार में एक दर्जन से ज्यादा नरसंहार मचाया था। जिसमें दो सौ से अधिक दलितों-वंचितों की निर्मम हत्या की गई थी। इस मामले के सामने आने पर संस्था की ओर से सफाई भी पेश की गई। सरकारी निधि पर चलने वाली संस्था ने फंड की कमी का रोना भी रोया।

सरकारी गांधीवादी और मठाधीश गांधीवादियों के कारनामों पर क्या कहा जाए??
ये संस्थाएं गांधी के कार्यक्रमों-प्रयोगों को आगे बढ़ाने के बजाय ऐसे संगठनों-कार्यक्रमों की आयोजन स्थली में आखिर क्यों तब्दील होती जा रही हैं??
डॉ. लोहिया ने गांधीवादियों को 3 श्रेणियों में विभक्त करते हुए अपने को कुजात गांधीवादी की श्रेणी में रखा था। आज अगर लोहिया जीवित होते तो सरकारी व मठी गांधीवादी संस्थाओं के इन कारनामों पर क्या स्टैंड लेते??

Continue Reading

बीट विशेष

भारत में धर्म का बोझ ओबीसी और दलित अपने कंधे पर ढो रहा है

Published

on

शीर्षक- कांवड़ यात्रा और जनेऊ का अंतर्संबंध: मेरठ के विशेष संदर्भ में

प्रस्तावना: मेरे एक मित्र की मेरठ जिले में ड्यूटी लगी थी कांवड़ रुट पर. मैंने उन्हें एक सोशल एक्सपेरिमेंट करने के लिए रिक्वेस्ट किया. यह शोध 2017 में किया गया.

हाइपोथिसिस : कांवड़ यात्रा में जाना सवर्णों ने छोड़ दिया है.

शोध प्रश्न – मेरठ के कांवड़ा यात्रा रूट से पैदल गुजरने वाले भक्त जनेऊधारी हैं या नहीं?

शोध विधि – 500 कांवड़ यात्रियों के सैंपल साइज में जनेऊधारी और गैरजनेऊधारी देखना था. उन्होंने एक जगह पर सिक्युरिटी चेक के नाम पर बैरियर लगाकर खुद चेकिंग की. इसके लिए उन्हें सिर्फ कंधे पर हाथ रखना था. सारा डाटा प्राइमरी है और इंपीरिकल तरीके से इकट्ठा किया गया.

शोध की सीमाएं- 1. डाटा संग्रह में गलती की संभावना इतनी है कि किसी व्यक्ति ने अगर उस खास दिन जनेऊ नहीं पहना है, तो इसका असर डाटा पर पड़ेगा.
2. यह सिर्फ मेरठ के कांवड़ रूट का आंकड़ा है. बाकी जगह अलग डाटा सामने आ सकता है.

निष्कर्ष – आप जानते हैं क्या पता चला? उस सैंपल में एक भी जनेऊधारी नहीं था. इस डाटा से हमारी हायपोथिसिस की पुष्टि होती है कि जनेऊधारी कांवड़ यात्रा पर नहीं जाते. यह धार्मिक कार्य सिर्फ अद्विज जातियां कर रही हैं.

विमर्शः भारत में धर्म का बोझ ओबीसी और दलित अपने कंधे पर ढो रहा है. उस धर्म को, जो उसे सवर्ण जातियों से नीच बताता है. जो उसकी ज्यादातर तकलीफों का कारण हैं. जिसने उसके साधारण नागरिक होने के मार्ग में बाधाएं खड़ी हो गई हैं.

इसे ग्राम्शी “हेजेमनी बाई कसेंट” यानी सहमति से चल रहा वर्चस्ववाद कहते हैं. यह जबरन या दबाव की वजह से काम नहीं करता. नीचे वाला ऊपर वाले को ऊपर वाला मानता, इसलिए जातिवाद चल रहा है.

एक बार दलितों और ओबीसी रीढ़ की हड्डी सीधी करके खड़ा हो गया, तो जातिवाद का खेल खत्म.

Continue Reading

देश

रामराज्य : सीएम की पत्‍नी 22 साल से देहरादून में तैनात और बुजुर्ग शिक्षिका को कर दिया सस्पैंड

Published

on

टीचर उत्तरा बहुगुणा पंत के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खुद विवादों में फंसते हुए नजर आ रहे हैं। दरअसल उत्तरा बहुगुणा के तबादले के बीच सीएम की पत्नी की तैनाती से जुड़ी एक जानकारी ने राज्य में अब नई चर्चा शुरू कर दी है। शुक्रवार (29 जून, 2019) को आरटीआई के जवाब में मांगी गई जानकारी के मुताबिक शिक्षा विभाग ने अपने जवाब में बताया है कि सीएम रावत की पत्नी सुनीता रावत भी टीचर हैं। नौकरी शुरू करने के चार साल के बाद उन्होंने अपना तबादला दुर्गम इलाके से देहरादून में करवा लिया। एनबीटी के अखबार में छपी जानकारी के मुताबिक इसके बाद से 22 तक उनका तबादला नहीं हुआ है। चौकाने वाली बात यह है कि साल 2008 में प्रमोशन भी हुआ, फिर तबादला नहीं हुआ।

बता दें कि मुख्यमंत्री के ‘जनता मिलन’ कार्यक्रम में टीचर उत्तरा बहुगुणा और मुख्यमंत्री रावत के बीच बहस का एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें टीचर के बात करने के तरीके से नाराज होकर मुख्यमंत्री उन्हें निलंबित करने और हिरासत में लेने का आदेश देते हुए देखे जा सकते हैं। उनके खिलाफ पुलिस ने शांति भंग के तहत चालान कर दिया था। हालांकि, उसी शाम को ही उन्हें सिटी मजिस्टेट की अदालत में पेश किया गया जहां से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। बाद में पूरे मामले में उत्तराखंड राजकीय राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ ने मामले का संज्ञान लेते हुए कहा कि शिक्षिका के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करने का अनुरोध अधिकारियों से किया जाएगा।

57 वर्षीय उत्तरा के पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि वह बहुत दुखी हैं और कल शाम से ही रो रही हैं। वर्ष 2015 में अपने पति की मृत्यु के बाद से ही वह परेशान चल रही थीं और अपने स्थानांतरण को लेकर शिक्षा विभाग के अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक अपनी गुहार लगा चुकी हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने भी यही सवाल उठाया था। उत्तरा उत्तरकाशी जिले के नौगांव में प्राथमिक विद्यालय में तैनात हैं।

उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षा संघ के महासचिव दिग्विजय सिंह चौहान ने कहा कि संघ इस प्रकरण को लेकर अधिकारियों से वार्ता करने का प्रयास करेगा और अनुरोध करेगा कि उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई न की जाये। चौहान ने कहा कि शिक्षिका 25 वर्षों से दुर्गम स्थान पर कार्यरत हैं और विधवा भी हैं, इसलिए उनकी स्थानांतरण की मांग जायज है जिसे सुना जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षिका द्वारा अपनी मांग के लिए मुख्यमंत्री के सामने प्रयोग की गयी ‘अमर्यादित भाषा’ का वह कतई समर्थन नहीं करते।

Continue Reading

Trending