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यशवंत सिन्हा का भाजपा सांसदों को खुला ख़त, कृपया साहस करें, बोलें और देश एवं लोकतंत्र को बचाएं

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भाजपा के पूर्व वित्त मंत्री और बागी सांसद यशवंत सिन्हा पिछले कुछ दिनों से अपने पार्टी के मुखिया नरेन्द्र मोदी और भाजपा के शीर्ष नेताओं पर तीखे सवाल के लिए जाने जा रहे है, पिछले कुछ दिनों में इन्होने कई बार प्रधानमंत्री मोदी सहित अमित सह और अरुण जेटली के नीतियों पर गंभीर सवाल खड़ा कर चुके है

देश में हो रहे लगातार बलात्कार के मामलों के बाद एक बार फिर यशवंत सिन्हा ने तीखा रुख इख़्तियार करते हुए भाजपा के सांसदों और शीर्ष नेताओं के नाम एक पत्र लिखा है जो इस प्रकार हैं:

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की जीत के लिए हम सभी ने बहुत कठिन परिश्रम की है। हम में से कुछ लोगों ने साल 2004 से 2014 तक केंद्रीय सत्ता पर काबिज यूपीए सरकार के शासन के खिलाफ हर मोर्चे पर संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष किया है जबकि कुछ लोग राज्य मुख्यालयों में सत्ता का आनंद उठा रहे थे। जब 2014 में अप्रत्याशित चुनावी नतीजे आए, तब लगा कि यह देश के इतिहास में नया स्वर्णिम अध्याय लिखेगा। तब हम सभी लोगों ने प्रधानमंत्री और उनकी टीम में पूरा भरोसा जताया और उन्हें पूरा समर्थन और सहयोग दिया। अब इस सरकार ने करीब चार साल पूरे कर लिए हैं और इस दौरान पांच बजट पेश कर लिए हैं। इसके अलावा सरकार ने उपलब्ध सभी अवसरों का इस्तेमाल कर लिया है पर परिणाम निराशाजनक रहे हैं। अंतत: यही लगता है कि हम अपने रास्ते से भटक चुके हैं, मतदाताओं का विश्वास खो चुके हैं।

देश की आर्थिक स्थिति डगमग है, जबकि मौजूदा सरकार लंबे-लंबे दावे कर रही है कि हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं। किसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के बैंकों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) इस तरह जमा नहीं होती हैं, जैसा कि पिछले चार वर्षों में हुआ है। किसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में किसान तनावपूर्ण, युवा बेरोजगार, छोटे कारोबारी बर्बादी के कगार पर और बचत व निवेश निराशाजनक तरीके से नहीं गिरा करते हैं, जैसा पिछले चार वर्षों में होता आ रहा है। अब इससे बदतर स्थिति क्या होगी? भ्रष्टाचार ने फिर से अपना बदसूरत सिर उठा लिया है और बैंकों में एक के बाद एक घोटाले उजागर हो रहे हैं। इतना ही नहीं घोटालेबाज बड़ी आसानी से देश से भागने में सफल भी हो रहे हैं और सरकार असहाय होकर निहारती रह जाती है।

महिलाएं पहले से भी ज्यादा असुरक्षित हो गई हैं। रेप आज हर दिन का कहानी बन गई है और बलात्कारियों के खिलाफ सख्ती से कदम उठाने के बजाय हम उसके समर्थक बन गए हैं। कई मामलों में हमारे अपने लोग ऐसे घृणित कार्य में शामिल रहे हैं। अल्पसंख्यक सहमे हुए हैं। सबसे खराब बात यह है कि अनुसूचित जाति-जनजाति और समाज के कमजोर वर्ग के लोगों के खिलाफ अत्याचार और भेदभाव बढ़ने के मामले बढ़ गए हैं, जो पहले कभी नहीं हुआ था। संविधान प्रदत्त सुरक्षा की गारंटी भी खतरे में पड़ गई है।

हमारी विदेश नीति का कुल योग प्रधानमंत्री द्वारा लगातार विदेशी यात्राओं और उनके समकक्ष विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को गले लगाने तक सीमित हो गया है, भले ही इसे वो पसंद करते हों या ना। हम अपने पड़ोसी देशों के साथ भी मधुर संबंध बनाए रखने में विफल रहे हैं। चीन अक्सर हमारे हितों को काटता दिख रहा है। बड़ी सूझ-बूझ और जोखिम उठाकर भारतीय जवानों द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक भी बेअसर साबित हुई है, पाकिस्तान लगातार आतंक की खेप निर्यात कर रहा है और हम असहाय होकर सिर्फ देख रहे हैं। जम्मू-कश्मीर फिर से जलने लगा है। हर आम आदमी पीड़ित है जैसा कि पहले कभी नहीं था।

पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र पूर्णत: ध्वस्त हो चुका है। पार्टी के मित्र व सहयोगी बताते हैं कि संसदीय दल की बैठक में सांसदों को बोलने का मौका तक नहीं दिया जाता है, जैसा कि पहले होता रहा है, लोग अपनी बात बैठक में रखते रहे हैं। अन्य दलों में भी संवाद अमूमन एकतरफा ही होता है। वे बोलेंगे और आपको सुनना होगा। प्रधानमंत्री के पास भी आपके लिए समय नहीं है। पार्टी मुख्यालय भी कॉपोरेट दफ्तर बन गया है, जहां सीईओ से मुलाकात असंभव है।

पिछले चार वर्षों में जो सबसे बड़ा खतरा उभरा है वो हमारे लोकतंत्र के लिए है। लोकतांत्रिक संस्थाओं की मर्यादा को कमतर और बदनाम किया गया है। संसद एक मजाक बनकर रह गया है। बजट सत्र में संसद में जारी गतिरोध को खत्म करने और संसद चलाने के लिए उपाय पर प्रधानमंत्री ने विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के साथ एक बार भी बैठना उचित नहीं समझा बल्कि उन्होंने इसके लिए विपक्ष पर आरोप मढ़ना उचित समझा। बजट सत्र के पहले पार्ट को सबसे छोटा रखा गया था। जब इसकी तुलना अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के शासन से करता हूं तो पाता हूं कि उन दिनों वाजपेयी जी का हमलोगों को सख्त निर्देश होता था कि विपक्ष के साथ हर हाल में सद्भाव बनाकर रखा जाय ताकि संसद सुचारू रूप से चल सके। इसलिए हमारे सामने संसदीय नियमों के तहत विपक्ष ने अक्सर स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव और अन्य चर्चाएं सदन में पेश की थीं।

सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे सीनियर जजों द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेन्स करना देश के न्यायिक इतिहास में अप्रत्याशित घटना रही है। इससे हमारे देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था में टकराव की बात स्पष्ट तरीके से उजागर हुई। इन जजों ने बार-बार कहा कि हमारे देश में लोकतंत्र खतरे में है।

आज, ऐसा प्रतीत होता है कि संचार के साधनों, विशेष रूप से मीडिया और सोशल मीडिया पर नियंत्रण करके चुनाव जीतना हमारी पार्टी का एकमात्र उद्देश्य रह गया है। यह गंभीर खतरा है। मुझे नहीं पता कि आप में से कितने लोगों को अगले लोकसभा चुनाव में दोबारा टिकट मिलेगा लेकिन पिछले अनुभवों से कह सकता हूं कि आप में से आधे लोगों की तो निश्चित तौर पर छुट्टी होगी। अगर आपने चुनावी टिकट पा भी लिया तो भी आपकी जीत की संभावनाएं बहुत दूर हैं। पिछले चुनावों में बीजेपी को कुल 31 फीसदी वोट मिले थे, 69 फीसदी वोट बीजेपी के खिलाफ था। ऐसे में अगर विपक्ष एकजुट हुआ तो आप कहीं के भी नहीं रहेंगे।

मौजूदा परिस्थितियों की मांग है कि राष्ट्रीय हित में आप बोलें। मैं कम से कम उन पांच अनुसूचित जाति के सांसदों का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने समुदाय की नाराजगी की बारे में और सरकार द्वारा किए गए वादाखिलाफी के बारे में आवाज तो उठाई। मैं आप सभी से अनुरोध करता हूं कि आप भी निर्भीक होकर हर मुद्दे पर अपनी बात बॉस के सामने रखें। अगर आप अब भी चुप रहते हैं तो आप देश को बड़ी हानि पहुंचा रहे हैं। भविष्य की पीढ़ियां आपको माफ नहीं करेगी। यह आपका अधिकार है कि आप उन लोगों से जवाब मांगें जो आज सरकार में हैं और देश को नीचे ले जा रहे हैं। देशहित में पार्टी का हित छोड़ना पड़ता है, वैसे ही जैसे पार्टी हित में व्यक्तिगत हितों को तिलांजलि देनी पड़ती है। मैं विशेष रूप से और व्यक्तिगत तौर पर आडवाणी जी और जोशी जी से अपील करना चाहता हूं कि देशहित में खड़े हों और उन द्वारा किए गए अद्वितीय बलिदानों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित बनाए रखने के लिए सही समय पर सुधारात्मक कदम उठाएं।

इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ मामूली सफलताएं भी हमें हासिल हुई हैं लेकिन बड़ी असफलताओं ने उसे ढंक लिया है। मुझे उम्मीद है कि आप लोग इस पत्र में उठाए गए मुद्दों पर गंभीरता से विचार करेंगे। कृपया साहस करें, बोलें और देश एवं लोकतंत्र को बचाएं।

(यह पत्र अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ ये उसका हिंदी अनुवाद है)

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भाजपा बनी देश की सबसे अमीर पार्टी, पूरा विपक्ष मिलकर भी भाजपा के पैसों के बराबर नही

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मार्च में ख़त्म ही तिमाही की रिपोर्ट बताती है कि निफ्टी से जुड़ी चोटी की पचास कंपनियों की आमदनी में 10 प्रतिशत तक की ही वृद्धि हुई है जो पिछसे साल से कम है। एक रिपोर्ट यह भी बताती है कि कोरपोरेट सेक्टर में काम करने वालों की सैलरी में 10 प्रतिशत से कम की ही वृद्धि होगी। जब आपकी हमारी वृद्धि 10 प्रतिशत पर रूक जा रही है तो फिर बीजेपी की आमदनी 80 प्रतिशत से अधिक कैसे हो गई?

भारतीय जनता पार्टी की आमदनी में 80 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2015-16 में बीजेपी की आय 570.86 करोड़ थी। 2016-17 में बीजेपी की आय 1,034.27 करोड़ हो गई है। इसी दौरान कांग्रेस की आमदनी 14 प्रतिशत घट गई है। 2015-16 में कांग्रेस की आय 261.56 करोड़ थी, 2016-17 में 225.36 करोड़ हो गई है। 2016-17 में तृणमूल कांग्रेस की आय 81.52 प्रतिशत से घट गई है।

प्रतिशत के हिसाब से सबसे अधिक बढ़त बसपा ने हासिल की है। बसपा की आमदनी 47.48 करोड़ से बढ़कर 173 करोड़ हो गई है। यह भी एक दिलचस्प बदलाव है। बसपा को कोरपोरेट तो चंदा नहीं देता है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म ने सात राष्ट्रीय दलों के आयकर रिटर्न का अध्ययन किया है। यह साफ नहीं है कि इसमें प्रदेश इकाइयों की भी आमदनी शामिल होती है या नहीं।

पैसे के हिसाब से देखें तो सारा विपक्ष मिलकर भी बीजेपी का मुक़ाबला नहीं कर सकता है। विचारधारा के तहत कई और संगठन होते हैं जिनकी स्वतंत्र आय भी गिनी जानी चाहिए। हाल ही में बीजेपी ने दिल्ली में फाइव स्टार मुख्यालय बनाया है। कुछ फ्लोर पर तो पार्टी के प्रदेश पदाधिकारी भी बिना इजाज़त के नहीं जा सकते हैं।मुख्यालय के पिछले हिस्से में प्रेस के लोग के लिए एक हॉल बना है जिससे जुड़े छोटे कमरों में प्रवक्ता बैठते हैं। प्रेस के लोग भी बिना अनुमति के उन मंज़िलों पर नहीं जा सकते जहां पर अध्यक्ष या महासचिव का कमरा है। वैसे वहां कोई न कोई गया ही होगा, मगर आज तक किसी ने भी वहां की तस्वीर पोस्ट नहीं की है। तस्वीर नहीं लेने दी गई होगी। नए दफ्तर को देखने की जिज्ञासा आम कार्यकर्ताओं में भी होती है मगर लिफ्टमैन ऊपर जाने से रोक देता है।

बीजेपी का फाइव स्टार मुख्यालय कितने का बना, उसका पैसा कहां से आया,इसका हिसाब आयकर रिटर्न से नहीं मिला है। क्या बीजेपी के पास दो प्रकार की आमदनी है। बीजेपी ने हर राज्य में, हर ज़िले में दफ्तर बनाने का फैसला किया है। बहुत सी जगहों पर ज़मीनें ख़रीदी गईं हैं। नोटबंदी से ठीक पहले के महीने में। क्या उन ज़मीनों का विवरण भी आयकर रिटर्न में है? उन सब जगहों पर भी निर्माण कार्य चल रहा है। उसका ख़र्चा और बजट क्या है, आप नहीं जानते हैं। शायद आप जान भी नहीं सकते हैं। क्योंकि बीजेपी पारदर्शिता में विश्वास रखती है।

अगुस्ता वेस्टलैंड हेलिकाप्टर का मामला आप भूल गए होंगे। 2013-14 के साल में यह खूब छाया रहता था। सीबीआई पिछले दिनों इटली की अदालत में सबूत पेश नहीं कर पाई और मुख्य आरोपी बरी हो गए। इस केस के संबंध में पूर्व एयर मार्शल एस पी त्यागी गिरफ्तार किए गए। बड़ा हंगामा मचा। मीडिया ने उन्हें अपराधी की तरह देखा। आज तक सीबीआई आरोप साबित नहीं कर पाई है। विपक्षी नेताओं के घर सीबीआई और ईडी के अधिकारियों को जाने से फुर्सत नहीं है।

एक्सप्रेस में ख़बर छपी है कि सीबीआई एस पी त्यागी की ज़मानत का विरोध नहीं करेगी। 9 दिसंबर 2016 को त्यागी गिरफ्तार किए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने कुछ दिनों बाद ज़मानत दे दी कि सीबीआई यह बताने में असफल रही है कि रिश्वत के रूप में कितने पैसे दिए गए और कब दिए गए। दिसंबर 2016 में सीबीआई इसके विरोध में हाईकोर्ट चली गई थी। अब सीबीआई ज़मानत का विरोध नहीं करेगी। जिस केस को हम कभी हेडलाइन के रूप में देखा करते थे, वो दो साल बाद कहीं कोने में छपी है। 2 जी मामले में अब घोटाले से भी बड़ी ख़बर यह है कि अगर घोटाला हुआ था तो फिर चार साल में सीबीआई घोटाला साबित क्यों नहीं कर पाई। यही सबसे बड़ा घोटाला है।

3 अप्रैल को दि वायर की रोहिणी सिंह और 6 अप्रैल को दि क्विंट की पूनम अग्रवाल ने रेल मंत्री पीयूष गोयल से संबंधित एक मामले पर रिपोर्ट छापी है। रोहिणी की कहानी को पूनम आगे ले गई हैं। उन्होंने उन कागज़ात को सामने लाया है जिससे पता चलता है कि पीयूष गोयल की पत्नी सीमा गोयल की कंपनी इंटरकॉन एडवाइज़र्स को बिना गारंटी के लोन दिए गए। वायर ने बताया था कि शिर्डी इंडस्ट्री 650 करोड़ के लोन का डिफाल्टर हो गई है। जुलाई 2010 तक पीयूष गोयल इसी कंपनी के चेयरमैन थे। क्विंट की पूनम अग्रवाल बताती हैं कि जिस कंपनी ने सीमा गोयल की कंपनी को लोन दिया है वो अपने खाते में बताती है कि 12 प्रतिशत ब्याज़ पर दिया है लेकिन लोन लेने वाली इंटरकॉन एडवाइज़र्स अपने खाते में बताती है कि 7.85 प्रतिशत ब्याज़ पर लोन मिला है। ऐसा क्यों ? इंटरकॉन कंपनी 2016-17 के बहिखाते में यह भी नहीं बताती है कि उसे 3 करोड़ का बिना गारंटी वाला लोन कहां से मिला है। पूनम अग्रवाल ने सवाल पूछा है मगर जवाब नहीं आया है।

कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि सीमा गोयल की कंपनी ने पिछले दस साल में जितनी पूंजी लगाई है उस पर 3000 गुना ज़्यादा मुनाफा कमाया है। बीजेपी ने इंकार किया है और पीयूष गोयल ने भी। यही आरोप विपक्ष के किसी नेता पर लगता तो ईडी और सीबीआई के अधिकारी मीडिया के साथ पहुंच गए होते। पीयूष गोयल पर आरोप लगा तो सिर्फ खंडन से काम चल गया। न इस्तीफा न जांच। दूसरी बात यह भी याद रखने लायक है कि किसी भी मामले में मामला अंजाम तक तो पहुंचता ही नहीं है। आप देखिए कि कैसे कैसे खेल अभी तक चल रहे हैं।

(यह पोस्ट मुख्यतः वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल से प्रकाशित हुआ है)

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समाज

शिक्षा के व्यापारीकरण में फसी मासूमों की जान, नशीले खाने से 50 बच्चे अस्पताल में भर्ती ।।

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नोएडा सेक्टर 132 के बड़े और बेहद नामी प्राइवेट स्कूल ‘ स्टेप बाय स्टेप ‘ में जहरीले खाने से करीब 50 से भी ज्यादा बच्चों के बीमार होने की खबर सामने आई है । यह खबर बीते 3 दिन पहले (बृहस्पतिवार) की है जहां विषाक्त भोजन से होने वाले मासूम बच्चों की बिगड़ती हालत देखते हुए भी स्कूल प्रशासन ने अपने स्कूल का नाम बदनाम होने के डर से बीमार बच्चों को अस्पताल ले जाने की बजाए कुछ डॉक्टर्स की टीम को ही स्कूल में बुला लिया ।

बीमार बच्चों में से 20 बच्चों की हालत गंभीर बताई जा रही है जिनमें से कुछ को जेपी अस्पताल , मैक्स अस्पताल तथा दिल्ली के अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया ।
नशीले खाने के कारण बच्चों की गंभीर हालत के बावजूद स्कूल प्रशासन पर मामले से जुड़ी जांच में सहयोग न करने का भी आरोप है । पुलिस का कहना है कि मीडिया से उन्हें इस बात की खबर मिली कि स्कूल के कैंटीन में आलू के पराठे खाने से इतने बच्चों की जान पर बन आई ।
इसके बाद भी पुलिस को स्कूल के अंदर घुसने से प्रशासन द्वारा मनाही रही । शाम तक क्षेत्र के अधिकारी पीयूष कुमार सिंह के साथ मजिस्ट्रेट महेंद्र कुमार और खाद्य विभाग अधिकारी संजय शर्मा पहुंचे । रात के 9:00 बजे तक भी स्कूल प्रशासन ने जांच प्रबंधकों को स्कूल के अंदर घुसने नहीं दिया केवल खाद विभाग को अंदर जाने की अनुमति मिली ।
बीमार बच्चों के माता-पिता की मीडिया से बातचीत के दौरान यह भी पता चला कि स्कूल प्रशासन द्वारा उन्हें चेतावनी भी दी गई है कि वह मीडिया में इस घटना का जिक्र ना करें । स्कूल प्रशासन की इतनी बड़ी लापरवाही और उस पर पर्दा डालने की कोशिश बहुत शर्मनाक है । इस घटना की जानकारी के लिए जब मीडिया ने स्कूल के वित्त अधिकारी सुजीत पांडे से बात करने की कोशिश की तब उन्होंने मीडिया के सवालों को टालने का भरपूर प्रयास किआ ।
और जानकारी करने पर पता चला कि यह इस नामी स्कूल में होने वाली पहली लापरवाही नहीं है , कुछ वर्ष पहले 2016 में भी ऐसी ही एक घटना हो चुकी है जिसमें बच्चों के प्रति लापरवाही बरती गई थी ।
सोचने वाली बात यह है कि हम अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सचेत होते हुए बड़े और नामी स्कूल में फीस भरते हैं मगर ऐसे बड़े और विख्यात स्कूल प्रशासन केवल शिक्षा के नाम पर व्यापार करने का काम करते हैं जहां मासूम बच्चों की जान की कोई कीमत नहीं होती ।

माधवी मनोरम

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Fake News:सरकार के तरफ से फेक न्यूज़ का पर्दाफास करने वाला वेबसाइट ही निकला फर्जी!

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प्रतीकात्मक चित्र

फ़ेक न्यूज़ के मामले में प्रधानमंत्री का ट्रैक रिकार्ड ज़ीरो है

अचानक 13 केंद्रीय मंत्री एक वेबसाइट का लिंक ट्विट करते हैं जिसने चार बड़ी ख़बरों के फ़ेक होने का दावा किया है। इन मंत्रियों में एम जे अकबर भी हैं और स्मृति ईरानी भी हैं। मंत्री लिखते हैं कि फ़ेक न्यूज़ के अपनी आवाज़ उठाएं। इंडियन एक्सप्रेस के कृष्ण कौशिक की नज़र इस वेबसाइट पर पड़ती है जिसका पता www.thetruepicture.in दिया गया है। पता चलता है कि इसके डोमेन का पंजीकरण पिछले ही साल कराया गया है। इसमें एक लैंडलाइन नंबर है जो ब्लूक्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन का भी है। ब्लू क्राफ्ट फाउंडेशन प्रधानमंत्री ने जो किताब लिखी है एग्ज़ाम वॉरियर उसका पार्टनर है। एक्सप्रेस के कौशिक कनॉट प्लेस में स्थित ब्लूक्राफ्ट के दफ़्तर जाते हैं जहां दो लोग उन्हें बताते हैं कि वे लोग THETRUEPICTURE के नाम से कोई वेबसाइट नहीं चलाते हैं। सरकारी रिकार्ड से पता चलता है कि ब्लूक्राफ्ट फाउंडेशन नाम की कंपनी राजेश जैन और हितेश जैन के नाम पर 2016 में दर्ज हुई थी।

राजेश जैन कौन हैं? ये जनाब 2014 में प्रधानमंत्री मोदी का अभियान चला रहे थे। ब्लूक्राफ्ट के संस्थापक सीईओ अखिलेश मिश्रा भी 2014 में मोदी के लिए चुनावी अभियान से जुड़े रहे हैं। ब्लू क्राफ्ट से पहले अखिलेश मिश्र सरकारी वेबसाइट MyGov.IN के कंटेंट डायरेक्टर रहे हैं। इस कंपनी ने मन की बात नाम से किताब छापा है। भाषण प्रधानमंत्री का है मगर किताब प्राइवेट कंपनी छापती है। यही अपने आप में खेल है। आम तौर पर इतने बड़े पद पर बैठे व्यक्ति का सरकारी माध्यम से दिया गए भाषण पर सरकार के प्रकाशन विभाग का अधिकार होना चाहिए मगर इसके लिए एक नई कंपनी बनाई जाती है। काश कोई मन की बात की बिक्री का डिटेल भी पता कर लेता। कोई प्रकाशक इस खेल को आसानी से बता सकता है। पर ख़ैर।

अखिलेश मिश्र ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि ब्लू क्राफ्ट का TRUE PICTURE वेबसाइट से कोई संबंध नहीं है। फिर ब्लू क्राफ्ट का लैंड लाइन नंबर दूसरे की वेबसाइट पर क्या कर रहा है तो कहा जाता है कि कुछ गड़बड़ी रही होगी। इस एंगल पर एन डी टी वी के मानस जांच करते हैं। एक्सप्रेस की रिपोर्ट छपने के कुछ घंटों बाद पता चलता है कि लैंड लाइन की जगह एक मोबाइल नंबर आ गया है। वो मोबाइल नंबर किसी अमित मालवीय के नाम से दर्ज है मगर फोन किया गया तो नंबर काम नहीं कर रहा था।

इस वेबसाइट ने जिन चार खबरों को फेक न्यूज़ बताया है उनमें से दो इंडियन एक्सप्रेस की है। कृष्ण कौशिक ने उन दो ख़बरों के बारे में विस्तार से बताया गया है कि कैसे सभी पक्षों से बात करने के बाद रिपोर्ट लिखी गई है। ख़बर का सोर्स बताया गया है। जिस वेबसाइट को मोदी सरकार के 13 मंत्री यह कह कर ट्विट करते हैं कि इसने फ़ेक न्यूज़ का पर्दाफ़ाश किया है, उसके बारे में एक्सप्रेस में ख़बर छपती है, एन डी टी वी में रिपोर्ट होती है, अरुण शौरी सवाल उठाते हैं इसके बाद भी उस वेबसाइट की तरफ से कोई सामने नहीं आता है। यह उस वेबसाइट का हाल है जो फ़ेक न्यूज़ का पता लगाने का दावा करती है। उम्मीद है आप सरल हिन्दी में यहां तक का खेल समझ गए होंगे।

एक्सप्रेस के रिपोर्टर कृष्ण कौशिक की दूसरे दिन रिपोर्ट छपी है कि ब्लू क्राफ्ट और ट्रू पिक्चर के कर्मचारी एक ही हैं। दो महिला कर्मचारी, जिन्होंने अपने लिंकडेन प्रोफाइल में ब्लू क्राफ्ट के लिए काम करने की बात लिखी है, कई वीडियो में ट्रू पिक्चर की तरफ से सरकार की नीतियों और ताज़ा ख़बरों पर चर्चा करती हुईं देखी जा सकती हैं। रिपोर्टर कौशिक ने ब्लूक्राफ्ट के सीईओ से सवाल किया तो जवाब मिला कि ये दो औरतें निजी तौर पर वेबसाइट के लिए योगदान करती होंगी। अभी मत हंसिएगा। अखिलेश मिश्र कहते हैं कि हम किसी को अपने लिए काम करने से नहीं रोकते हैं। यही नहीं एक्सप्रेस की पूछताछ के बाद दो महिलाएं लिंकडेन प्रोफाइल से अपना विवरण हटा देती हैं कि वे ब्लू क्राफ्ट के लिए काम करती हैं। ब्लू क्राफ्ट के राजेश जैन ने एक्सप्रेस को जवाब दिया है कि उन्होंने ब्लू क्राफ्ट छोड़ दिया है।

केंद्र के 13 मंत्री जिस वेबसाइट का लिंक ट्विट करते हैं, आह्वान करते हैं कि फ़ेक न्यूज़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं, उस वेबाइसट को कौन चलाता है, कहां से चलती है, इसका पता दो दिनों तक मीडिया में चर्चा होने के बाद भी नहीं चलता है। ये तो हाल है फ़ेक न्यूज़ से लड़ाई के प्रति सरकार की गंभीरता का। इस तरह की चुप्पी से संकेत जाता है कि गुप्त तहख़ाने से रणनीतियां बन रही हैं। बनाने वाले इतने डरपोक हैं कि एक वेबसाइट का पता मालूम करने से सब छिप जाते हैं। एक साथ 13 मंत्रियों को ट्विट करने के लिए इस वेबसाइट का लिंक कहां से मिलता है? क्या वेबसाइट वालों के पास इनके ट्विट के पासवर्ड हैं? क्या इन मंत्रियों को ख़ुद से नहीं बताना चाहिए? भाई आप फ़ेक न्यूज़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने जा रहे हैं तो इतना भी मत चुप रहिए कि वेबसाइट ही फेक लगे। या फिर कोई कहानी बनाई जा रही है जिसे लेकर मीडिया में हाज़िर हुआ जाएगा। जल्दी बना लीजिए!

अगर आप जानना चाहते हैं कि 13 मंत्री कौन हैं जो एक वेबसाइट का लिंक ट्विट करते हैं मगर कौन चलाता है पता नहीं चलता है और न ही वेबसाइट ख़ुद से बताती है। इन मंत्रियों के नाम हैं पीयूष गोयल, राधा मोहन सिंह, स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, बीरेंद्र सिंह, किरेण रिजीजू, एम जे अकबर, राज्यवर्धन राठौड़, विजय गोयल, बाबुल सुप्रीयो, पी राधाकृष्णन, अर्जुन राम मेघवाल। ALTNEWS.IN कई महीनों से फ़ेक न्यूज़ का भांडाफोड़ कर रहा है। इसकी चर्चा कुछ अख़बारों में भी होती है। कभी इन मंत्रियों ने फ़ेक न्यूज़ का भांडा फोड़ नहीं किया।

क्या प्रधानमंत्री को इस बात पर गुस्सा आया? नहीं न। फ़ेक न्यूज़ के मामले में प्रधानमंत्री मोदी का रिकार्ड ख़राब ही नहीं, बहुत ज़्यादा ख़राब है। गुजरात चुनावों में मणिशंकर अय्यर के घर की बैठक को लेकर उन्होंने एक फेक न्यूज़ रचा था। जिसे लेकर उनकी तरफ से अरुण जेटली ने राज्य सभा में माफी मांगी थी। यह माफी अरविंद केजरीवाल के माफी दौरे से पहले की हुई थी। प्रधानमंत्री ने कभी फ़ेक न्यूज़ पर कार्रवाई नहीं की जिसमें उनके मंत्री शामिल रहे हों, उनकी पार्टी के नेता शामिल रहे हों।

इसलिए फेक न्यूज़ पर प्रधानमंत्री को संत बनने का कोई अधिकार नहीं है। अगर नाटक के लिए करना है तो उनका पूरा अधिकार बनता है। उन्हें बुरा लगेगा मगर वे जानते हैं कि मैंने बात सही कही है। क्या पता हंसते भी होंगे कि सही लिखता है, फिर भी जनता पर तो जादू मेरा ही चलता है! पर मानते तो होंगे कि यह पत्रकार जादू पर नहीं लिखता है न ही इस पर मेरा जादू चलता है!
मैं सीधा बोलता हूं, प्रधानमंत्री जी फ़ेक न्यूज़ रोकने के मामले में आपका ट्रैक रिकार्ड ज़ीरो है। ये मैं उन दोस्तों के लिए लिखता हूं जो मुझे डराते रहते हैं कि मोदी जी को छोड़ कर लिखो वरना तुम्हारी नौकरी चली जाएगी।

बताइये तो हर साल एक करोड़ रोज़गार देने का वादा कर सत्ता में आए, स्मृति ईरानी दस पांच पत्रकारों की नौकरी खाने का नियम बना रही थीं। मुझे हर दिन प्रधानमंत्री का नाम लेकर मेरी नौकरी जाने का डर दिखाया जाता है। प्रधानमंत्री जी,आपके समर्थक आपके नाम को बदनाम कर रहे हैं। ऐसे लंपट और चाटुकार पत्रकारों से दूर रहिए। जिनकी पत्रकारिता और पाठकों की दुनिया में कोई हैसियत नहीं वो आपके पक्ष में ट्विट कर आपकी हंसी उड़ाते हैं। आप जज लोया पर निकिता सक्सेना की रिपोर्ट पढ़िए। कैरवान वेबसाइट का लिंक आपके 13 मंत्री ट्विट कर न्यायपालिका में पारदर्शिता के चैंपियन बन सकते हैं। हैं न मिस्टर प्राइम मिनिस्टर!

यही नहीं, पोस्टकार्ड न्यूज़ जिसकी कई ख़बरों को ऑल्ट न्यूज़ ने अनेक बार तमाम साक्ष्यों के साथ फ़ेक साबित किया है, उसके संपादक को प्रधानमंत्री ही फॉलो करते हैं। इनका नाम महेश हेगड़े हैं, जिन्हें इसलिए गिरफ़्तार किया गया है क्योंकि इन्होंने समाचार प्रकाशित किया कि एक जैन संत पर मुसलमान ने हमला कर दिया। मकसद आप समझ सकते हैं ताकि भावनाएं भड़क जाएं। पता चला कि जैन संत सड़क दुर्घटना में घायल हुए थे। प्रधानमंत्री के एक मंत्री अनंत हेगड़े इस संपादक के समर्थन में ट्विट करते हैं। एक सांसद महेश गिरी भी समर्थन में ट्विट करते हैं। सांसद परेश रावल ने भी कुछ महीने पहले फेक न्यूज़ ट्विट किया था, जिसे लेकर खूब मज़ाक उड़ा तो डिलिट कर दिया। याद नहीं कि प्रधानमंत्री ने कुछ बोला हो। याद नहीं कि स्मृति ईरानी ने कुछ बोला हो। आप पाठकों को याद है?

एक तरफ़ सरकार फ़ेक न्यूज़ वालों के साथ खड़ी है, दूसरी तरफ फ़ेक न्यूज़ से लड़ने का तानाशाही कानून बनाकर ख़ुद को प्रशासक घोषित करना चाहती है। इस खेल को एक लाइन में बता देता हूं। मंत्री अब अपना काम छोड़ कर जो ख़बरें हैं उन्हें फेक साबित करने में लगाए जाएंगे ताकि इनके पार्टी संसार में जितने भी सोशल मीडिया के योद्धा हैं वो इसे फैला दें कि सही ख़बर फ़ेक है। फ़ेक ख़बर से लड़ने के लिए नहीं, सही ख़बर को फ़ेक बनाने का यह ख़ेल दुनिया भर में होता है। अपने ट्रंप साहब तो सवाल करने वाले मीडिया को रोज़ फ़ेक न्यूज़ कहते हैं। अब सीधे सीधे ट्रंप की कॉपी करेंगे तो ठीक नहीं लगेगा इसलिए मंत्रियों को लगा दिया गया। ऐसा प्रतीत होता है।

हिन्दी में ऐसी पत्रकारिता कम होती है। हिन्दी अख़बारों के ज़्यादतर संपादक  प्रधानमंत्री में असीम संभावनाओं को देखते हुए ऐसी ख़बरों में अपना समय व्यतीत करते हैं, जिसमें समाज को नैतिकता का पाठ पढ़ा सकें मगर ऐसी कोई ख़बर नहीं खोजेंगे जो सरकार को नैतिकता का पाठ पढ़ा सकें। अंग्रेज़ी पत्रिका और वेबसाइट CARVAN की निकिता सक्सेना ने जिस तरह जज लोया की स्टोरी पर डिटेल रिपोर्ट प्रकाशित की है, वैसी रिपोर्ट करने या कराने की औकात आज हिन्दी के किसी अख़बार के संपादक की नहीं है। दि वायर की रोहिणी सिंह ने पीयूष गोयल के बारे में जो रिपोर्ट छापी है उसका ज़िक्र हिन्दी के किसी अख़बार में नहीं होगा।

आपकी तरह हम भी इन अख़बारों के झांसे में 20 साल तक रहे। कभी इस पर सोचिएगा कि क्या ये अख़बार वाक़ई आपको पाठक समझते हैं? आपके साथ रोज़ सुबह धोखा होता है। आप इन अख़बारों को धोखे में मत रखिए। थोड़ा प्रयास कर हर महीने कोई दूसरा अख़बार ले लीजिए। भले वो बेकार हो क्योंकि बेकार तो आप पढ़ ही रहे हैं। ख़बरों के नाम पर तीज त्योहार,तुलसी और कबीर के दोहों का विश्लेषण ही पढ़ना है तो कोई भी अख़बार ले सकते हैं। एक अख़बार जीवन भर न पढ़ें। सड़ा हुआ अख़बार अपने पाठकों को सड़ा देता है। डरपोक संपादक पाठक को और भी डरपोक बना देता है।

(यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल से लिया गया है)

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