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समाज

गौरी लंकेश की हत्या के आरोप में कोई पकड़ा गया है…कौन है?

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नोट- कमेंट में गाली देने वाले आए हैं। आने दीजिए। जब यूनिवर्सिटी. नौकरी और बैंक की सीरीज से सिस्टम की पोल खोल रहा था तब ये भाग गए थे। इनके पास ही नहीं किसी के पास उन सवालों के जवाब नहीं हैं। वे सिर्फ गाली दे सकते हैं। ऐसी आदत हो गई है कि जीत की खुशी में लोग कहां मिठाई खिलाते हैं, उसमें भी ये गाली दे रहे हैं। अब आगे मेरा लेख पढ़िए।

पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाले लोगों को निशाना बनाया गया। पहले अपने संस्कारों को भूल उस हत्या का मज़ाक उड़ाया गया और सही ठहराया गया। ऐसा करने वाले लोग खास धार्मिक और राजनीतिक विचारधारा के थे। उन्हें किसी की हत्या के प्रति संवेदनशीलता प्रकट करना भी गवारा नहीं गुज़रा। एक संपादक ने लेख लिखा। उस लेख की डिज़ाइन दिलचस्प थी। कुतर्क और कुहासे का आवरण लेते हुए वे पहुंचे कि गौरी लंकेश एक खास विचारधारा से थीं इसलिए एक खास किस्म का समूह उनकी हत्या की निंदा में जुट गया मगर छोटे शहरों में आज भी पत्रकारिता का धर्म पूरा करते हुए पत्रकार मारे जा रहे हैं। उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। सरकार भी उनकी सुरक्षा नहीं करती। यह तर्क हर एंगल से सही है मगर इज़ इक्वल टू की थ्योरी के तहत सामने लाया गया ताकि गौरी लंकेश की हत्या के खिलाफ जमा लोगों की नैतिकता को अवैध ठहराया जा सके। आज क्या हुआ। क्या सरकार या संपादक ने दोबारा से कस्बों में मारे जा रहे पत्रकारों की कोई सुध ली?

यही नहीं, गौरी लंकेश की हत्या के बाद सांप्रदायिकता का बेहूदा खेल खेल खेला गया। फेक न्यूज़ गढ़ा गया। मुस्लिम नाम वाले अपराधियों के नाम से आगे बढ़ाया गया कि गौरी लंकेश की हत्या करने वाले ये था, अब निंदा करने वाले चुप हैं। ऐसे मेसेज मुझ तक भी ठेल कर पहुंचाए गए। मुस्लिम नाम के सहारे गौरी लंकेश की हत्या के सवाल को जायज़ ठहराने वाले या निंदा करने वालों को अवैध ठहराने वाले की मंशा क्या हो सकती है आप समझ सकते हैं। वे ऐसा करते हुए उस ज्ञात-अज्ञात हत्यारे के साथ खड़े हो गए थे।

इंडियन एक्सप्रेस गौरी लंकेश की हत्या के संबंध में पकड़े गए एक अपराधी की ख़बर छाप रहा है। मैं इस चरण पर अपराधी को लेकर कोई ठोस राय नहीं रखना चाहता। कई बार पुलिस पकड़ तो लेती है मगर साबित नहीं कर पाती है। इस छूट की गुज़ाइश रखते हुए मेरा सवाल यही है कि आई टी सेल नाम की संस्था और मानसिकता वाले लोग क्यों नहीं उस ख़बर का प्रचार कर रहे हैं। जब वे मुस्लिम नाम वाले अपराधियों के पकड़े जाने की अफवाह का प्रचार प्रसार कर सकते हैं तो माना जाना चाहिए कि उनकी एक मंशा अपराधी को पकड़े जाने में भी रही होगी। अब जब एक अपराधी पकड़ा गया है और वह ख़बर अपराध नहीं है तो उसका प्रचार प्रसार क्यों नहीं हो रहा है। क्यों नहीं लोग अब मुझे या किसी और को गाली दे रहे हैं। चुनौती दे रहे हैं। सवाल गौरी लंकेश का नहीं है, सवाल है ऐसी हर हत्या को जायज़ ठहराने की ख़ौफ़नाक राजनीति का।

इंडियन एक्सप्रेस की ज्योत्सना ने लिखा है कि कर्नाटक पुलिस ने गौरी लंकेश की हत्या के आरोप में कथित रूप से शामिल के टी नवीन को गिरफ्तार किया है। मैं अभी भी कथित लिखने की सतर्कता बरत रहा हूं। यह व्यक्ति हिन्दु युवा सेना का कार्यकर्ता है। दक्षिण कर्नट के मद्दुर का रहने वाला है। हत्या के बाद कई महीनों तक यह मोबाइल नेटवर्क से गायब हो गया था। 18 फरवरी को कुमार की गिरफ्तारी हुई है। गौरी लंकेश पर बनी एस आई टी ने उसे हथियार और कारतूस के साथ गिरफ्तार किया है। कुमार ने पुलिस को बयान दिया है कि इस हत्या में हिन्दु युवा सेना मद्दार यूनिट का नेता भी शामिल है।

कुमार के तीन दोस्तों ने पुलिस को बयान दिया है कि कुमार ने गौरी लंकेश की हत्या की बात उन्हें बताई थी। उसने कारतूस से भरा बक्सा दिखाते हुए कहा था कि गौरी लंकेश की तरह एक और बड़ी हत्या करनी है। सीसीटीवी कैमरा में गौरी लंकेश के घर के बार जिस व्यक्ति को मोटरसाइकिल से देखा गया था, उसका हुलिया कुमार से मिलता है। यह भी जानकारी आ रही है कुमार का ग्रुप किस माड्यूल की तरह काम करता था, कर्नाटक के बाहर भी हत्या को अंजाम दे चुका है। फोन रिकार्ड से पता चलता है कि कुमार के संबंध पश्चिम भारत के कई बड़े दक्षिणपंथी नेताओं से संपर्क रहे हैं।

भारत में कहीं भी जांच एजेंसी निष्पक्ष और तत्पर नहीं है। सीबीआई का हाल आप देख ही रही है। इस जांच एजेंसी का हाल भी गोदी मीडिया के न्यूज़ एंकर जैसा हो गया है। वह विपक्ष के ख़िलाफ़ आक्रामक तो है मगर सरकार से जुड़े लोगों से पूछने में हालत ख़राब हो जाती है। इसलिए साबित होने तक मैं इसे सिर्फ सूचना के रूप में रख रहा हूं। बताने के लिए कि हम हत्याओं को लेकर कितने हत्यारे हो गए हैं। इज़ इक्वल टू के ज़रिए उस हत्या के बाद के सवालों की हत्या कर देते हैं। गौरी लंकेश की हत्या के सिलसिले में पकड़े गए लोगों की अफवाह को फैला दिया गया और जब कोई पकड़ा गया है तब सब चुप्पी है।

हर किसी की हत्या की निंदा कीजिए और हर हत्या के ख़िलाफ़ रहिए। जब लिखें तब भी, जब न लिखें तब भी। एक ऐसे सिस्टम की बात कीजिए जो जांच करें। न कि सरकार की जूती सर पर रख कर चले। इसी में हम सबका भला है। हमारी एजेंसिया वाकई जूती उठाने से ज़्यादा की लायक नहीं है। साबित कुछ कर नहीं पातीं, इनके बहाने हम हैं कि मूर्ख बन रहे हैं। सत्ता के साथ होकर या सत्ता से सवाल करके भी। जिस देश में एक ईमानदार परीक्षा व्यवस्था न हो, उस देश में एक ईमानदार जांच एजेंसी की मांग रेत में गुलाब उगाने के सपने जैसा है। क्या कर सकते हैं। मांग तो करें कम से कम।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल से लिया गया है)

बीट विशेष

मैं अभिनंदन,चमार…आरक्षण छोड़ना चाहता हूं, सीएम को लिखी चिट्ठी वायरल

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“सेवा में, नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार.

मैं अभिनंदन कुमार, मैं चमार जाति से हूं। मैं आरक्षण छोड़ना चाहता हूं, क्योंकि हमसे ‘बड़े-बड़े’ जाति के लोग अब आरक्षण पाने को दलित बनने के लिए तैयार हैं तो मैं सवर्ण बनने के लिए तैयार हूं। क्योंकि मैं सदियों से हरिजन, चमरवा का प्रताड़ना झेलते आ रहा हूं। इन सभी से निजात पाने के लिए मैं सवर्ण बनना चाहता हूं। जब आप किसी भी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने में सक्षम हैं तो मुझे ब्राह्मण जाति बनाइए, ताकि मैं भी ब्राह्मणों की तरह शान से लोगों पर राज कर सकूं।”

ये अभिनंदन कुमार की ओर से जारी पत्र का सारांश है।

अंदाजा लगा सकिए तो लगाइए कि ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलित प्रतिरोध की इमारत की बुनियाद कितनी ठोस बन रही है। दो-चार नेताओं के बिकने का हवाला नहीं दीजिए। अभिनंदन कुमार की चिट्ठी एक प्रतिनिधि उदाहरण है। जमीन पर उतर कर देखिए कि कैसे एक साधारण दिखने वाला दलित भी अब अपनी सामाजिक त्रासदी की सबसे मुख्य वजह को कैसे पहचान रहा है और कैसे उसके खिलाफ एक चुनौती बन कर खड़ा है।

अभिनंदन कुमार की चुनौती केवल नीतीश कुमार या मोदी के लिए नहीं है। यह इस ब्राह्मणवादी समाज और सत्ता-तंत्र के हर पहरुए के लिए है। इस चिट्ठी से जिस शानदार जमीन और ताकत का अहसास होता है, आरएसएस-भाजपा और इस देश की सारी पंडावादी ताकतें उसी से डरी हुई है। इसीलिए सबसे ज्यादा तोड़ने की कोशिश इसी तबके की हो रही है। आर्थिक तौर पर और फिर सामाजिक तौर पर!

(अरविंद शेष की फेसबुक वाल से)

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देश

विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत 100 वें नंबर पर, “ना खाऊंगा , ना खाने दूंगा” का सपना पूरा

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अभी हाल में ही विश्व में सबसे ज्यादा और कम भूखे देशों की सूची जारी की गयी है। जिसमें भारत की रैंकिंग लगातार बिगङती जा रही है। आपको याद होगा की पीएम मोदी ने कहा था कि ना खाऊंग, ना खाने दूँगा । लोग सोशल मीडिया पर इसी बाबत पीएम पर तंज कस रहे हैं।

विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत की रैंकिंग :

2014: Rank 55
2015: Rank 80
2016: Rank 97
2017: Rank 100

मोदी जी सही कहते थे कि, “न खाऊँगा, न खाने दूँगा”।

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देश

अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक की पब्लिक स्क्रूटनी हो – रवीश कुमार

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नोटबंदी के दौरान पूरे देश में अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक में ही सबसे अधिक पैसा जमा होता है। पाँच दिनों में 750 करोड़। जितने भी कैशियर से बात किया सबने कहा कि पाँच दिनों में पुराने नोटों की गिनती मुमकिन नहीं है। नोटबंदी के दौरान किसी के पास सबूत नहीं था मगर जब हल्ला हुआ कि ज़मीन खाते में पैसे जमा हो रहे हैं तब काफ़ी चेतावनी जारी होती थी। जाँच की बात होने लगी जिसका कोई नतीजा आज तक सामने नहीं आया। अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक मामले की भी जाँच हो सकती थी। वैसे जाँच में मिलना ही क्या है, लीपापोती के अलावा। फिर भी रस्म तो निभा सकते थे।

शर्मनाक और चिन्ता की बात है कि इस ख़बर को कई अख़बारों ने नहीं छापा। जिन्होंने छापा उन्होंने छापने के बाद हटा लिया। क्या आप इतना कमज़ोर भारत चाहते हैं और क्या आप सिर्फ अमित शाह के लिए उस भारत को कमज़ोर बना देना चाहते हैं जो इस बैंक के चेयरमैन हैं? अगर अमित शाह के नाम से इतना ही डर लगता है तो वो जहाँ भी रहते हैं उसके आस पास के इलाक़े को साइलेंस ज़ोन घोषित कर देना चाहिए। न कोई हॉर्न बजाएगा न बोलेगा।

ये तो अभी कहीं आया भी नहीं है कि वे पैसे अमित शाह के थे, फिर उनके नाम का डर कैसा। बैंक में तो कोई भी जमा कर सकता है। प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार इसे लेकर रूटीन सवाल नहीं कर पाए। इस देश में हो क्या रहा है? क्या हम दूसरों को और ख़ुद को डराने के लिए किसी नेता के पीछे मदांध हो चुके हैं? जज लोया के केस का हाल देखा। जय शाह के मामले में आपने देखा और अब अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक के मामले में आप देख रहे हैं।

क्या हमने 2014 में बुज़दिल भारत का चुनाव किया था? यह सब चुपचाप देखते हुए भारतीय नागरिकों की नागरिकता मिट रही है। आपकी चुप्पी आपको ही मिटा रही है। इतना भी क्या डरना कि बात बात में जाँच हो जाने वाले इस देश में अमित शाह का नाम आते ही जाँच की बात ज़ुबान पर नहीं आती। यही मामला किसी विरोधी दल के नेता से संबंधित होता तो दिन भर सोशल मीडिया में उत्पात मचा रहता।

नाबार्ड ने भी कैसी लीपापोती की है। बयान जारी किया कि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। एक लाख साठ हज़ार खाता धारक हैं। एक खाते में औसत 46000 से कुछ अधिक जमा हुए। क्या नाबार्ड के लोग देश को उल्लू समझते हैं? अगर किसी ने दस खाते में बीस करोड़ जमा किए तो उसका हिसाब वे सभी एक लाख साठ हज़ार खाते के औसत से देंगे या उन दस खातों की जाँच के बाद देंगे?

क्या पाँच दिनों में सभी एक लाख साठ हज़ार खाताधारकों ने अपने पुराने नोट जमा कर दिए? कमाल है। तब तो पाँच दिनों में सौ फ़ीसदी खाताधारकों के पुराने नोट जमा करने वाला अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक भारत का एकमात्र बैंक होगा। क्या ऐसा ही हुआ ? अगर नहीं हुआ तो नाबार्ड ने किस आधार पर यह हिसाब दिया कि 750 करोड़ कोई बड़ी रक़म नहीं है। क्या एक लाख साठ हज़ार खाताधारकों में 750 करोड़ का समान वितरण इसलिए किया ताकि राशि छोटी लगे? नाबार्ड को अब यह भी बताना चाहिए कि कितने खाताधारक अपने पैसे नहीं लौटा सके ? कितने खातों में पैसे लौटे?

नाबार्ड की सफ़ाई से साफ़ है कि इस संस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। इसलिए इस मामले की जनसमीक्षा होनी चाहिए। जब सरकारी संस्था और मीडिया डर जाए तब लोक को ही तंत्र बचाने के लिए आगे आना होगा। नोटबंदी का क़दम एक राष्ट्रीय अपराध था। भारत की आर्थिक संप्रभुता पर भीतर से किया गया हमला था। इसलिए इसकी सच्चाई पर इतना पर्दा डाला जाता है।

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