Connect with us

देश

मौत का तांडव:- गोरखपुर में क्या हुआ, एक डॉक्टर की नजर से देखिए.

Published

on

अस्पताल में मौत का तांडव : जिम्मेदार कौन? -डॉ. नवमीत

11 अगस्त की खबर है कि गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दिए जाने की वजह से 40 बच्चों की मौत हो गई। ये सभी बच्चे एनएनयू वार्ड और इंसेफेलाइटिस वार्ड में भर्ती थे। जनवरी से लेकर 11 अगस्त तक इंसेफेलाइटिस की वजह से इस मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान 151 मासूमों की मौत हो चुकी है जिनमे से 40 बच्चे 10 और 11 अगस्त को मर गए।

गौरमतलब है कि यह मेडिकल कॉलेज यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पूर्व संसदीय क्षेत्र में आता है। आदित्यनाथ घटना से दो ही दिन पहले इस अस्पताल का दौरा भी करके गया था। खबरों के अनुसार अस्पताल पर ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का 69 लाख का बिल बकाया था। इस वजह से कंपनी ने गुरुवार यानि 10 अगस्त को अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी।

लिक्विड ऑक्सीजन बंद होने के बाद आज सारे ऑक्सीजन सिलेंडर भी खत्म हो गए। इंसेफेलाइटिस वार्ड में दो घंटे तक अम्बू बैग का सहारा लिया गया लेकिन बिना ऑक्सीजन के यह तरीका ज्यादा देर तक कारगर नहीं हो पाया और इस तरह से सरकार की उदासीनता, अस्पताल प्रशासन की लापरवाही और कंपनी की मुनाफाखोरी की गाज अस्पताल में भर्ती बच्चों पर गिरी।

बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दो वर्ष पूर्व लिक्विड ऑक्सीजन का प्लांट लगाया गया। इसके जरिए इंसेफेलाइटिस वार्ड समेत 300 मरीजों को पाइप के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। इसकी सप्लाई करने वाली कंपनी पुष्पा सेल्स है। कालेज पर कंपनी का 68 लाख 58 हजार 596 रुपये का बकाया था और बकाया रकम की अधिकतम तय राशि 10 लाख रुपये है।

बकाया की रकम तय सीमा से अधिक होने के कारण देहरादून के आईनॉक्स कंपनी की एलएमओ गैस प्लांट ने गैस सप्लाई देने से इनकार कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बात की बात में 40 मासूम इस मुनाफाखोर व्यवस्था की भेंट चढ़ गए।

यह भी एकदम से नहीं हुआ, बल्कि गुरुवार की शाम से ही बच्चों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया था। ऑक्सीजन की सप्लाई रुकी पड़ी थी और एक-एक कर बच्चों की मौत हो रही थी।

अस्पताल के डॉक्टरों ने पुष्पा सेल्स के अधिकारियों को फोन कर ऑक्सीजन भेजने की गुहार लगाई तो कंपनी ने पैसे मांगे। तब कॉलेज प्रशासन भी नींद से जागा और 22 लाख रुपये बकाया के भुगतान की कवायद शुरू की। पैसे आने के बाद बाद ही पुष्पा सेल्स ने लिक्विड ऑक्सीजन के टैंकर को भेजने का फैसला किया है।

लेकिन अब तक तो बहुत देर हो चुकी थी और 40 बच्चे भी मर चुके थे। यह खबर आने तक कहा जा रहा था कि यह टैंकर शनिवार की शाम या रविवार तक ही अस्पताल में पहुंच पायेगा। मौत के ऊपर लापरवाही और लालच का यह खेल भी नया नहीं है, पिछले साल अप्रैल में भी इस कंपनी ने 50 लाख बकाया होने के बाद इसी तरह ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी थी।

दूसरी तरफ सरकार और प्रशासन का रुख भी इस मामले में बेहद शर्मनाक रहा। हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार अस्पताल के डॉक्टरों ने प्रशासनिक अधिकारियों को संकट की जानकारी दी और मदद मांगी। मगर जिले के आला अधिकारी बेपरवाह रहे। वार्ड 100 बेड के प्रभारी डॉ. कफील खान के बार बार फोन करने के बाद भी किसी बड़े अधिकारी व गैस सप्लायर ने फोन नहीं उठाया तो डॉ. कफील ने अपने डॉक्टर दोस्तों से मदद मांगी और अपनी गाड़ी से ऑक्सीजन करीब एक दर्जन सिलेंडरों को ढुलवाया। उनकी कोशिशों के बाद एसएसबी व कुछ प्राइवेट अस्पतालों द्वारा कुछ मदद की गई।

सशस्त्र सीमा बल के अस्पताल से बीआरडी को 10 जंबो सिलेंडर दिए गए। लेकिन अभी भी स्थिति भयावह थी और ज्यादा मौतें होने की सम्भावना बनी रही थी।

बीमारी का यह हमला आकस्मिक नहीं था। इंसेफेलाइटिस की वजह से हर साल हमारे देश में हजारों बच्चे मर जाते हैं। यह बीमारी हर इसी मौसम में अपना कहर ढाती है। 1978 से अब तक इंसेफेलाइटिस अकेले पूर्वांचल में 50 हजार से अधिक मासूमों को लील चुकी है। 2005 में इसने महामारी का रूप लिया था। तब अकेले बीआरडी मेडिकल कालेज में 1132 मौतें हो गई थीं।

मई 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए अभियान शुरू किया था। मोदी की तारीफों के पुल बांधते हुए आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि मोदी के आशीर्वाद से पोलियो और फ़ाइलेरिया की तरह इंसेफेलाइटिस को भी खत्म कर दिया जायेगा। लेकिन हुआ ये कि जो बच्चे बच सकते थे उनकी एक तरह से हत्या कर दी गई। अब गोरखपुर के डीएम राजीव रौतेला ने घटना की जांच की बात कही है।

जाहिर है जब तक जाँच होगी तब तक हमेशा की तरह इस मामले को भी फाइलों के नीचे दबाया जा चुका होगा।
और यह सिर्फ गोरखपुर या इस एक अस्पताल की बात नहीं है। पूरे ही देश में स्वास्थ्य सेवाओं का यही हाल है। जनता को हर तरह की स्वास्थ्य सेवा देने की जिम्मेदारी होती है सरकार की। लेकिन अव्वल तो सरकार यह करती नहीं है और कुछ सरकारी अस्पताल जो ठीक ठाक काम करते भी थे उनकी हालत भी अब बद से बदतर होती जा रही है।

पिछले दो दशक में आर्थिक सुधारों और नवउदारवादी नीतियों के चलते यहाँ हर क्षेत्र की तरह जनस्वास्थ्य की हालत भी खस्ता हो चुकी है। सरकार लगातार इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढाती जा रही है। अब पूंजीपति तो कोई भी काम मुनाफे के लिए ही करता है तो साफ है कि स्वास्थ्य सेवाएँ महँगी तो होनी ही हैं। और महँगी होने के बाद भी जान नहीं बचती।

परिणाम हमारे सामने है। किस तरह मुनाफे के लिए पुष्पा सेल्स नाम की इस कंपनी ने 40 बच्चों की जान ले ली है। लेकिन साथ में सरकार और प्रशासन भी बराबर जिम्मेदार है।

बहरहाल अच्छे दिनों, भारत निर्माण, इंडिया शाइनिंग के लोकलुभावने नारे देने वाली और लव जिहाद, गौहत्या जैसे साम्प्रदायिक मुद्दे उछालने वाली सरकारों को आम आदमी की सेहत का कोई ख्याल नहीं रहता है। पहली बात तो ऑक्सीजन या दवाओं या फिर किसी भी जरूरी सामान की उपलब्धता सरकार को ही सुनिश्चित करनी चाहिए और अगर नहीं करती है तो इस उपलब्धता को सुनिश्चित के लिए जरुरी बजट हर हाल में उपलब्ध होना चाहिए। साथ में यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि यह बजट सही समय पर सही जगह लग जाए। लेकिन इनमें से कोई भी चीज नहीं होती और इसी तरह से मरीज मौत का शिकार हो जाते हैं।

बजट की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार किसी भी देश को अपनी जीडीपी का कम से कम 5 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में लगाना चाहिए। भारत की सरकारों ने पिछले दो दशक के दौरान लगातार 1 प्रतिशत के आसपास ही लगाया है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में 2 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया था और केवल 1.09 प्रतिशत ही लगाया गया। 12वीं योजना के पहले सरकार ने उच्च स्तरीय विशेषज्ञों का एक ग्रुप बनाया था जिसने इस योजना में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जीडीपी का 2.5 प्रतिशत निवेश करने की सिफारिश की थी लेकिन सरकार द्वारा लक्ष्य रखा सिर्फ 1.58 प्रतिशत। पिछले बजट में भी यह डेढ़ प्रतिशत के आसपास ही रहा है।

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में निजी क्षेत्र द्वारा किया गया निवेश इस क्षेत्र में किये गए कुल निवेश का 75 प्रतिशत से भी ज्यादा है। पूरी दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत निजी क्षेत्र की होने वाली सबसे बड़ी भागीदारियों में एक नाम भारत का भी है। जाहिर है कि निजी क्षेत्र की ये कंपनियां लोगों के स्वास्थ्य की से खेलते हुए पैसे बना रही हैं। इनकी दिलचस्पी लोगों के स्वास्थ्य में नहीं बल्कि अपने मुनाफे में होती है और जब इनको लगता है कि मुनाफा कम होने लगा है या उसमें कोई अडचन आ गई है तो ये ऐसा ही करती हैं जैसे इन्होने गोरखपुर के इस अस्पताल में किया। और यह सब सरकार की शह पर होता है।
इसके अलावा देश के हर नागरिक हो स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित होनी चाहिए। सही समय पर सही अस्पताल, डॉक्टर और इलाज मुहैया हो यह जिम्मेदारी भी सरकार की ही है।

मानकों के अनुसार हमारे देश में हर 30000 की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, हर एक लाख की आबादी पर 30 बेड वाले एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और हर सब डिविजन पर एक 100 बेड वाला सामान्य अस्पताल होना चाहिए लेकिन यह भी सिर्फ कागजों पर है। और यह कागजों के मानक भी सालों पुराने हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। बदलाव करना तो दूर की बात है इन्हीं मानकों को सही ढंग से लागू नहीं किया जाता जबकि पिछले दो दशक में कुकुरमुत्तों की तरह प्राइवेट और कॉर्पोरेट अस्पताल जरुर उग आये हैं जिनमें जाकर मरीज या तो बीमारी से मर जाता है या फिर इनके भारीभरकम खर्चे की वजह से। अब सरकार एक और शिगूफा लेकर आई है, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप। मतलब सरकार अब प्राइवेट कंपनियों के साथ सहकारिता करेगी और लोगों को अन्य सेवाओं के साथ स्वास्थ्य सेवाएँ भी उपलब्ध करवाएगी। यह शिगूफा और कुछ नहीं बल्कि पुष्पा सेल्स जैसी कंपनियों को मुनाफा देने की कवायद है ताकि ये पैसे बना सकें और समय आने पर इस मामले की तरह लोगों की जान से खेल सकें।

बहरहाल बात ये है कि इन बच्चों सहित इस देश में रोज होने वाली ऐसी मौतों, जिनको रोका जा सकता था, के लिए मुनाफे पर आधारित यह व्यवस्था जिम्मेदार है। साथ में जिम्मेदार है इस देश की सरकारें जो कहने को तो इस देश की हैं लेकिन काम वे करती हैं पूंजीपतियों के लिए। किस तरह से इस मानवद्रोही व्यवस्था को खत्म किया जाये यह आज के समय का सबसे बड़ा सवाल है और इसका जवाब हम सबको ही ढूँढना होगा ताकि इस तरह से मासूमों की बलि न चढ़ सके।

साभार:- मजदूर बिगुल

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

देश

बिहार चुनाव के बीच शाहनवाज़ हुसैन और राजीव प्रताप रूडी कोरोना संक्रमित पाए गए

Published

on

पटना: बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर जहां सभी दलों की तरफ से प्रचार अभियान जारी है. इसी बीच बिहार बीजेपी के दो बड़े नाम राजीव प्रताप रुडी (Rajiv Pratap Rudy) और शाहनवाज़ हुसैन (Shahnawaz Hussain) कोरोना संक्रमित हो गए हैं. साथ ही उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय की तबियत भी ठीक नहीं है . हालांकि सुशील मोदी की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव है लेकिन ये दोनों नेताओं ने भी फ़िलहाल अपने आपको आइसोलेट कर लिया है.

 

बताते चले कि कोरोना संकट के बीच बिहार विधानसभा का चुनाव तीन चरणों में हो रहा है. पहले चरण के लिए  28 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे. वहीं नतीजों का ऐलान 10 नवंबर 2020 को किया जाएगा.  आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जहां पहले चरण में जहां 16 जिलों की 71 सीटों पर मतदान होगा तो वहीं दूसरे चरण में 17 जिलों की 94 सीटों पर मतदान किया जाएगा. इसके अलावा तीसरे और अंतिम चरण में 15 जिलों की 78 सीटों पर मतदाता अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे.

Continue Reading

देश

रिया के बेल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी NCB, बढ़ सकती है मुश्किलें

Published

on

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की अत्महत्या के मामले में ड्रग कनेक्शन को लेकर गिरफ्तार अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को ज़मानत दी। रिया को कोर्ट ने 28 दिन बाद एक लाख रुपये के मुचलके पर सशर्त जमानत दी है। वहीं रिया के भाई शोविक चक्रवर्ती की ज़मानत याचिका खारिज कर दी है।

जमानत मिलने के बाद भी रिया की मुश्किलें अभी खत्म नहीं ही है। जांच एजेंसी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने जमानत का विरोध दिया है। अतिरिक्त महाधिवक्ता अनिल सिंह ने जमानत के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिया के अलावा सुशांत के स्टाफ दीपेश सावंत और सैमुअल मिरांडा को भी जमानत दी है। वहीं अब्दुल बासित की ज़मानत याचिका खारिज कर दी गई है।

न्यायमूर्ति एस.वी. कोतवाल, जिन्होंने पिछले सप्ताह जमानत अर्जी संबंधी सुनवाई पूरी की थी, उन्होंने बुधवार सुबह फैसला सुनाया। एनसीबी द्वारा 9 सितंबर को ड्रग से संबंधित मामले में गिरफ्तार किए जाने के बाद, रिया ने 28 दिन हिरासत में बिताए हैं। उन्हें मंगलवार को एक विशेष एनडीपीएस अदालत ने 20 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।

कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए, मानशिंदे ने कहा, “सच्चाई और न्याय की जीत हुई है।”उन्होंने कहा, रिया की गिरफ्तारी और हिरासत पूरी तरह से अनुचित थी। तीन केंद्रीय एजेंसियों – सीबीआई, ईडी और एनसीबी – रिया के पीछे पड़ गई थी और अब यह सब खत्म होना चाहिए। हम सच्चाई के लिए प्रतिबद्ध हैं। सत्य मेव जयते।

बता दें अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की जांच के दौरान सामने आए ड्रग्स एंगल के मामले में एनसीबी द्वारा रिया, शोविक सहित 19 को अगस्त-सितंबर के दौरान गिरफ्तार किया गया था। उन लोगों में चक्रवर्ती भाई-बहन, सुशांत के कर्मचारी दीपेश सावंत, सैमुएल मिरांडा, कई ड्रग पेडलर, सप्लायर और फिल्म उद्योग से जुड़े व्यक्ति शामिल हैं।

सितंबर के अंत तक गिरफ्तार किए गए अन्य लोग हैं–अब्बास लखानी, करण अरोरा, जैद विलात्रा, अब्दुल बासित परिहार, कैजान इब्राहिम, अनुज केसवानी, अंकुश अरनेजा, कमरजीत सिंह आनंद, संकेत पटेल, संदीप गुप्ता, आफताब अंसारी, दिव्या फर्नांडिस, सूर्यदीप मल्होत्रा, क्रिस कोस्टा, राहिल विश्राम और क्षितिज आर. प्रसाद। अभियुक्तों में से कुछ को जमानत मिल गई है, अन्य अलग-अलग अवधि के लिए हिरासत में हैं क्योंकि एनसीबी की जांच कई अन्य अभिनेत्रियों से पूछताछ के साथ जारी है।

Continue Reading

देश

बिहार: एक पैराग्राफ की कहानी का राज्य:- रवीश कुमार

Published

on

नोट- यह लेख एक पैराग्राफ का है। लंबा है। कृपया इसे अपनी साइट पर छापें तो इसमें पैराग्राफ चेंज न करें। मेरा फिर भी अनुरोध है कि चुनाव आए तो अखबार पढ़ना ही नहीं लेना भी बंद कर दें। चैनलों के कनेक्शन कटवा दें। इस एक महीने के कवरेज से कुछ होता नहीं है। ज़्यादातर कवरेज़ में फिक्सिंग होगी। क्या फायदा। लोगों से बात करें। आपस में बात करें। फिर वोट दें। पांच साल में जो देखा है उस पर भरोसा रखें। न्यूज़ वेबसाइट, चैनल और अखबार के पास कुछ भी नया नहीं है। कुछ भी खोज कर लाई गई सामग्री नहीं है। बस वाक्य को आकर्षक बनाया जाएगा, हेडलाइन कैची होगी और आपके निगाहों को लूट लिया जाएगा। जिसे आई बॉल्स या टी आर पी कहते हैं। पढ़ भी रहे हैं तो ग़ौर से पढ़िए कि इस लेख में है क्या। केवल पंचिंग लाइन का खेला है या कुछ ठोस भी है।
पाठक हैं तो बदल जाइये। दर्शक हैं तो चैनलों को घर से निकाल दीजिए।

बिहार: एक पैराग्राफ की कहानी का राज्य

साधारण कथाओं का यह असाधारण दौर है। बिहार उन्हीं साधारण कथाओं के फ्रेम में फंसा एक जहाज़ है। बिहार की राजनीति में जाति के कई टापू हैं। बिहार की राजनीति में गठबंधनों के सात महासागर हैं। कभी जहाज़ टापू पर होता है। कभी जहाज़ महासागर में तैर रहा होता है। चुनाव दर चुनाव बिहार उन्हीं धारणाओं की दीवारों पर सीलन की तरह नज़र आता है जो दिखता तो है मगर जाता नहीं है। सीलन की परतें उतरती हैं तो नईं परतें आ जाती हैं। बिहार को पुरानी धारणाओं से निकालने के लिए एक महीना कम समय है। सर्वे और समीकरण के नाम पर न्यूज़ चैनलों से बाकी देश ग़ायब हो जाएगा। पर्दे पर दिखेगा बिहार मगर बिहार भी ग़ायब रहेगा। बिहार में कुछ लोग अनैतिकता खोज रहे हैं और कुछ लोग नैतिकता। बिहार में जहां नैतिकता मिलती है वहीं अनैतिकता भी पाई जाती है। जहां अनैतिकता नहीं पाई जाती है वहां नैतिकता नहीं होती है। बिहार में दोनों को अकेले चलने में डर लगता है इसलिए आपस में गठबंधन कर लेती हैं। अनैतिक होना अनिवार्य है। अनैतिकता ही अमृत है। नैतिकता चरणामृत है। पी लेने के बाद सर में पोंछ लेने के लिए होती है। नेता और विश्लेषक पहले चुनाव में जाति खोजते थे। जाति से बोर हो गए तो जाति का समीकरण बनाने लगे। समीकरण से बोर हो गए तो गठबंधन बनाने लगे। गठबंधन से बोर हो गए तो महागठबंधन बनाने लगे। नेता जानता है इसके अलावा हर जात के ठेकेदार को पैसे देने पड़ते हैं। दरवाज़े पर बैठे लोग पैसे मांगते हैं। चीज़ सामान मांगते हैं। यह स्वीकार्य अनैतिकता है। पहले जनता नहीं बताती थी कि किसने दिया है। अब राजनीतिक दल नहीं बताते हैं कि करोड़ों का फंड किसने दिया है। इल्केटोरल फंड पर कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हुई है। बहरहाल, जाति, समीकरण, गठबंधन और महागठबंधन के बाद फैक्टर का चलन आया है। किसमें ज़ेड फैक्टर है और किसमें एक्स फैक्टर है। स्विंग का भी फैक्टर है। सब कुछ खोजेंगे ताकि जीतने वाले की भविष्यवाणी कर सकें। कोशिश होगी कि जल्दी से महीना गुज़र जाए। वास्तविक अनैतिक शक्तियों तक न पहुंचा जाए वर्ना विज्ञापन बंद हो जाएगा और जोखिम बढ़ जाएगा। आम जनता जिसने पांच साल में घटिया अख़बारों और चैनलों के अलावा न कुछ देखा और पढ़ा है उस पर दबाव होगा कि उसके बनाए ढांचे से निकल कर ज़मीनी अनुभव को सुना दे। अब तो वह जनता भी उसी फ्रेम में कैद है। वह ज़मीनी अनुभवों में तड़प रही है मगर आसमानी अनुभवों में ख़ुश है। सूचनाएं जब गईं नहीं तो जनता के मुखमंडल से लौट कर कैसे आएंगी। जनता समझदार है। यह बात जनता के लिए नहीं कही जाती बल्कि राजनीतिक दलों की अनैतिकताओं को सही ठहराने के लिए कही जाती है। जनता की मांग खारिज होगी। नेता जो मांग देंगे वही जनता को अपनी मांग बनानी होगी। नेता जनता को खोजते हैं और जनता नेता को खोजते हैं। चैनल वाले दोनों को मिला देंगे। ज़्यादा मिलन न हो जाए उससे पहले महासंग्राम जैसे कार्यक्रम में खेला-भंडोल हो जाएगा। खोजा-खोजी बिहार के चुनाव का अभिन्न अंग है। आँखों के सामने रखी हुई चीज़ भी खोजी जाती है। कोई नेता गठबंधन के पीछे लुकाया होगा तो कोई नेता उचित गठबंधन पाकर दहाड़ने लगा होगा। बिहार 15 साल आगे जाता है या फिर 15 साल पीछे जाता है। अभी 15 साल पीछे है मगर खुश है कि उसके 15 साल में जितना पीछे था उससे आगे है। उसके बगल से दौड़ कर कितने धावक निकल गए उसकी परवाह नहीं। इसकी होड़ है कि जिससे वह आगे निकला था उसी को देखते हुए बाकियों से पीछे रहे। बिहार की राजधानी पटना भारत का सबसे गंदा शहर है। जिस राज्य की राजधानी भारत का सबसे गंदा शहर हो वह राज्य 15 साल आगे गया है या 15 साल पीछे गया है, बहस का भी विषय नहीं है। सबको पता है किसे कहां वोट देना है। जब पता ही है तो पता क्या करना कि कहां वोट पड़ेगा। नीतीश कहते हैं वो सबके हैं। चिराग़ कहते हैं कि मेरे नहीं हैं। चिराग कहते हैं कि मेरे तो मोदी हैं, दूजा न कोए। मोदी की बीजेपी कहती है मेरे तो नीतीश हैं,दूजा न कोए। गठबंधन से एक बंधन खोल कर विरोधी तैयार किया जाता है ताकि मैच का मैदान कहीं और शिफ्ट हो जाए। मुकाबला महागठबंधन बनाम राजग का न ले। चिराग और नीतीश का लगे। चिराग कहते हैं नीतीश भ्रष्ट हैं। बीजेपी कहती है नीतीश ही विकल्प हैं। नीतीश से नाराज़ मतदाता नोटा में न जाएँ, महागठबंधन में न जाए इसलिए चिराग़ को नोटा बैंक बना कर उतारा गया है। चिराग का काम है महागठबंधन की तरफ आती गेंद को दौड़कर लोक लेना है। राजग को आउट होने से बचाना है। बाद में तीनों कहेंगे कि हम तीनों में एक कॉमन हैं। भले नीतीश मेरे नहीं हैं मगर मोदी तो सबके हैं। मोदी नाम केवलम। हम उनकी खातिर नीतीश को समर्थन देंगे। ज़रूरत नहीं पड़ी तो मस्त रहेंगे। दिल्ली में मंत्री बन जाएंगे। ज़रूरत पड़ गई तो हरियाणा की तरह दुष्यंत चौटाला बन जाएंगे। बस इतनी सी बात है। एक पैराग्राफ की बात है। बिहार की कहानी दूसरे पैराग्राफ तक पहुंच ही नहीं पाती है।

Continue Reading

Trending