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हाई स्किल परंतु अस्थायी काम ही रोज़गार का नया चेहरा होगा- नरेन्द्र मोदी

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“फोर्थ इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन में पूंजी से ज्यादा महत्व प्रतिभा का होगा। हाई स्किल परंतु अस्थायी वर्क रोज़गार का नया चेहरा होगा। मैन्यूफैक्चरिंग, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन डिजाइन मे मौलिक बदलाव आएगे। डिजिटल प्लेटफार्म, आटोमेशन और डेटा फ्लोस( प्रवाह) से भौगोलिक दूरियों का महत्व कम हो जाएगा। ई कामर्स, डिजिटल प्लेटफार्म मार्केट प्लेसेस जब ऐसी टेक्नालजी से जुड़ेंगे जब एक नए प्रकार के इंडस्ट्रियल और बिजनेस लीडर सामने आएंगे।“

यह भाषण प्रधानमंत्री मोदी का है जो उन्होंने ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में दिया है। यह भाषण आपको बीजेपी की साइट और यू ट्यूब पर हर जगह मिल जाएगा। आप इसे सुनें तो पता चलेगा कि रोज़गार को लेकर प्रधानमंत्री क्या सोच रहे हैं? क्या भारतीय युवाओं को पता है कि रोज़गार को लेकर उनके प्रधानमंत्री क्या राय रखते हैं? परमानेंट रोज़गार की तैयारी में जवानी के पांच पांच साल हवन कर रहे हैं भारतीय युवाओं के बीच यह बात क्यों नहीं कही जा रही है कि रोज़गार का चेहरा बदल गया है। अब अस्थायी काम ही रोज़गार का नया चेहरा होगा।

प्रधानमंत्री को यही बात ब्रिक्स में नहीं, भारत में कहनी चाहिए। वैसे प्रधानमंत्री पकौड़ा वगैरह का उदाहरण देकर यही बात कह रहे हैं मगर उन्हें युवाओं के बीच आकर साफ-साफ कहना चाहिए कि ज़माना बदल गया है। अस्थायी काम ही रोज़गार का चेहरा हो गया है। 2019 में जब वे रोज़गार देने का वादा करें तो साफ साफ कहें कि अगले पांच में हम अस्थायी रोज़गार देंगे। रोज़गार का चेहरा बदल गया है इसलिए आप भी बदल जाओ। क्या युवा अपने प्रिय प्रधानमंत्री से ये बात सुनना चाहेंगे?

29 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड में अजय मोदी की एक ख़बर छपी है। देश के सबसे तेज़ी से बढ़ते हुए ऑटोमोबिल सेक्टर में स्थायी नौकरियां घटती जा रही हैं। इस सेक्टर की जितनी भी बड़ी कंपनियां हैं वे मांग के हिसाब से अस्थायी तौर पर लोगों को काम दे रही हैं। अजय मोदी ने मारुति सुज़ुकी, हीरो मोटोकोर, अशोल लेलैंड और टीवीएस मोटर का विश्वेशण किया है। इन कंपनियों में 2017-18 में 24,350 अतिरिक्त स्टाफ रखे हैं। जिनमें से 4 प्रतिशत से भी कम नौकरी पक्की है। सब की सब नौकरियां ठेके की हैं। अस्थायी प्रकृति की हैं। 23,500 से अधिक नौकरियां ठेके की हैं। यह बदलाव जो आ रहा है।

प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर जवाब देते हुए रोज़गार के कई आंकड़े दिए थे। आप उस भाषण को फिर से सुनिए। वैसे रोज़गार को लेकर शोध करने और लगातार लिखने वाले महेश व्यास ने 24 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड में उनके भाषण की आलोचना पेश की है। प्रधानमंत्री आंकड़े दे रहे हैं कि सितंबर 2017 से मई 2018 के बीच भविष्य निधि कोष से 45 लाख लोग जुड़े हैं। इसी दौरान नेशनल पेंशन स्कीम में करीब साढ़े पांच लाख लोग जुड़े हैं। अब महेश व्यास कहते हैं कि यह संख्या होती है पचास लाख मगर प्रधानमंत्री आसानी से 70 लाख कर देते हैं। राउंड फिगर के चक्कर में बीस लाख बढ़ा देते हैं।

फिर प्रधानमंत्री कहते हैं कि चार्टर्ड अकाउंटेंट, डॉक्टर और वकीलों को भी काम मिला है यह संख्या करीब 6 लाख होती है। 17000 चार्टर्ड अकाउंटेंट सिस्टम में जुड़े हैं। इनमें से 5000 ने अपना कारोबार शुरू किया है। अगर सबने 20 लोगों को भी काम दिया होगा तो उन्होंने एक लाख रोज़गार दिए होंगे। ( नए सीए फर्म में क्या वाकई में 20 लोग होते होंगे ?) हर साल 80,000 डाक्टर, डेंटल सर्जन, आयुष डाक्टर पढ़कर निकलते हैं। इनमें से 60 प्रतिशत अपनी प्रैक्टिस करते हैं। 5 लोगों को कम से कम रोज़गार देते ही हैं। यह संख्या 2 लाख 40,000 हो जाती है। यह सब प्रधानमंत्री बता रहे हैं लोकसभा में।

प्रधानमंत्री कहते हैं कि उसी तरह 80,000 वकील निकलते हैं जो दो लोगों को तो काम देते ही हैं, इस तरह रोज़गार में 2 लाख नौकरियां जुड़ जाती हैं।
अब आप बताइये क्या यह मज़ाक नहीं है। जो कालेज से पढ़कर वकील निकलता है वो अपने लिए काम ढूंढता रहता है या बाहर आकर दो लोगों को नौकरियां दे देता है। प्रधानमंत्री कम से कम अरुण जेटली से ही पूछ लेते। नया वकील तो कई महीनों तक मुफ्त में काम करता है, काम सीखने के लिए। कब खुद के लिए कमाना शुरू करता है वही नहीं जानता। इस तरह से कोई रोज़गार के आंकड़े जोड़ेगा और वो भी प्रधानमंत्री तो फिर कैसे बात होगी।

आप अविश्वास प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री के भाषण निकाल कर सुनिए। वे कहे जा रहे हैं कि परिवहन सेक्टर में 20 लाख ड्राईवर और क्लीनर जुड़े हैं। नई कर्मशियल गाड़ियां जब सड़क पर आती हैं तब 10 लाख लोगों को रोज़गार देती हैं। ढाई लाख नई कारें सड़क पर आती हैं इनमें से पांच लाख ड्राइवर रखे जाते हैं। आटो रिक्शा भी करीब साढ़े तीन लाख लोगों को रोज़गार देता है। प्रधानमंत्री ने ई रिक्शा औऱ साइकिल रिक्शा और रेहड़ी पटरी को क्यों नहीं जोड़ा, समझ नहीं पा रहा हूं। वैसे उन्होंने कुल संख्या भी दी और कहा कि 90 लाख 19 हज़ार (9.19 मिलयन) लोगों को काम मिला है। प्रधानमंत्री इस संख्या को भी गोल गोल करके 1 करोड़ कर दिया।

आप कहेंगे कि क्यों मीन मेख निकाल रहा हूं? प्रधानमंत्री मोदी कोई साधारण मंत्री नहीं हैं। वे देश के सामने रोज़गार के आंकड़े रखते हैं तो देखना चाहिए कि उन आंकड़ों का आधार क्या है। किस डेटा से वे जान गए कि नई कारों ने पांच लाख लोगों को काम दिया है। ड्राइवर के तौर पर रखे गए हैं। किस डेटा से उन्हें ये जानकारी मिली है कि वकीलों ने 2 लाख लोगों को काम दिया है। जो ख़ुद काम खोज रहे होते हैं।

महेश व्यास कहते हैं कि विवाद इस पर नहीं है कि रोज़गार का सृजन हुआ है या नहीं। रोज़गार का सृजन हुआ है। हमेशा की नौकरियां पैदा होती रहती हैं। बहस इस बात को लेकर है कि क्या इन नौकरियों की संख्या इतनी पर्याप्त है जो बेरोज़गारी को संभाल सके? EPS में जो नए नाम जुड़ रहे हैं वो ज़रूरी नहीं है कि नई नौकरियों के नाम हैं। महेश व्यास के तर्क को समझिए। प्रधानमंत्री कहते हैं कि चार्टर्ड अकाउंटेंट ने एक लाख नौकरियां दी हैं। तो क्या ये एक लाख भविष्य निधि वाले डेटा में शामिल नहीं होंगे?कहीं ऐसा तो नहीं कि सबको पहले भविष्य निधि वाले खाते से जोड़ लो और फिर उन्हें अलग अलग जोड़ लो और टोटल करके एक करोड़ बता दो। कमाल का गणित है।

महेश व्यास ने तर्क दिया है कि बड़ी संख्या में कर्मशियल गाड़ियां के ख़रीदार राज्य परिवहन विभाग होते हैं। बड़ी प्राइवेट कंपनियां ख़रीदती हैं। खनन और लाजिस्टिक कंपनियां खरीदती हैं। चूंकि ये बड़ी कंपनियां होती हैं इसलिए अपने कर्मचारियों का भविष्य निधि खाता खोलती हैं। अगर ऐसा हुआ है तो ये संख्या कर्मचारी भविष्य निधि के डेटा में दिखेगी। फिर इन्हें अलग से जोड़ने का मतलब क्या हुआ।

मान लीजिए एक हाथ में 90 रुपया है। एक हाथ में 10 रुपया है। आपने एक बार 90 और 10 को एक साथ पकडा और कहा कि सौ रुपया हो गया। फिर यह दूसरे हाथ के 10 रुपये को एक और बार जोड़ कर 110 रुपये बता दिया। या तो आप एक ही बार जोड़ेंगे या एक ही बार घटाएंगे। महेश व्यास के और भी तर्क हैं, मैं यहां नहीं लिखूंगा, मोदी भक्त आहत हो जाएंगे। उन्हें समझ नहीं आएगा कि मैं ये क्यों कर रहा हूं।

“एक अहम सवाल रोज़गार के प्रकार और अवसर का होगा,जहां तक हम देख सकते हैं ट्रेडिशनल मैन्यूफैक्चरिंग हमारे युवाओं के लिए रोज़गार का एक प्रमुख ज़रिया बनी रहेगी। दूसरी ओर हमारे वर्कर के लिए अति आवश्यक होगा कि वे अपने स्किल में बदलाव ला सके। इसलिए शिक्षा और कौशल समाज के लिए हमारा और हमारे नज़रिया और नीतियों में तेजी से बदलाव लाना होगा। स्कूल और कालेज के पाठ्यक्रम को इस तरह से बनाना होगा जिससे यह हमारे युवाओं को भविष्य के लिए तैयार कर सके। टेक्नालजी में आने वाले तेज बदलाव उसी गति से स्थान पा सकें।“

यह भी प्रधानमंत्री के ही भाषण का हिस्सा है जो उन्होंने ब्रिक्स देशों के नेताओं के बीच दिया था। भारत ने स्किल डेवलपमेंट शब्द ही सीखा है जर्मनी और चीन से। शायद किसी और देश से। जर्मनी का स्किल डेवलपमेंट कोर्स आप देखेंगे तो हैरान रह जाएंगे। जर्मनी ब्रिक्स का हिस्सा नहीं है मगर मैं उदाहरण दे रहा हूं। चीन का स्किल डेवलपमेंट भारत से कहीं आगे हैं।

अब आप ईमानदारी से दो सवाल का जवाब दीजिए। क्या भारत का कौशल विकास कार्यक्रम उच्च दक्षता यानी हाई स्किल का प्रशिक्षण देता है? आप किसी भी कौशल विकास केंद्र में जाकर देख लीजिए। इसका जवाब आप दीजिए। वर्ना मेरे सवालों को आप सहन नहीं कर पाएंगे। कौशल विकास केंद्र वाले रोज़ मेरे पास आते हैं कि किस तरह से कुछ के साथ भेदभाव हो रहा है। उन्होंने मोदी पर भरोसा कर लाखों का लोन लेकर कौशल विकास केंद्र खोला है मगर वे खाली हैं। ज़्यादा कहेंगे तो तस्वीर सहित दिखा दूंगा। वे कैसे बर्बाद हुए हैं, वो भी दिखा दूंगा। फिर प्रधानमंत्री ने क्यों नहीं बताया कि स्किल इंडिया कार्यक्रम के तहत कितनों को प्रशिक्षण दिया गया और कितनों को रोज़गार मिला। क्या अविश्वास प्रस्ताव के समय याद नहीं रहा?

बेहतर है रोज़गार पर बहस हो, ठीक से बात हो। विपक्ष में दम नहीं है तो क्या हुआ। युवाओं की ज़िंदगी का सवाल तो है। क्या उनकी ज़िंदगी से इसलिए खेला जाएगा कि विपक्ष यह सवाल उठाने के लायक नहीं है? क्या युवा अपनी ज़िंदगी से खेलना चाहते हैं?

नोट- इस लेख को लिखने में काफी समय लगा है। हिन्दी के अखबार और चैनल अपने पाठकों को उल्लू बना रहे हैं। उनके यहां इस तरह के विश्लेषण नहीं मिलेंगे। इसलिए यहां वहां से खोजकर आपके लिए हिन्दी में पेश करते हैं।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुआ है)

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आज़ादी के 71 साल बाद भी क्या हैं “आज़ादी के मायने”

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भारत विश्व का एक महान लोकतंत्र हैl इसकी आज़ादी को 71 साल हो गयेl हर साल आज़ादी का यह पर्व आता है और कुछ रश्म-आदायगी जैसे तिरंगा फहराने, कुछ भाषण-भूषण, सांस्कृतिक आयोजन व् संकल्प के साथ समाप्त हो जाता हैl ‘हिंदुस्तान’(मुग़ल काल) से आगे बढ़ता हुआ ‘इंडिया’(ब्रिटिश काल) दैट ईज़ “भारत” हो गया लेकिन युवाओं के मन में बार-बार यही सवाल उभरता है कि :-

“नबाब वही राजे वही कोहराम वही है
पदवी बदल गई किन्तु निज़ाम वही है
थका हुआ मजदूर वही दहकान वही है
कहने को तो भारत पर हिंदुस्तान वही है”

इसलिए महत्वपूर्ण यह जानना भी है कि आज़ादी के इन 71 सालों में इसमें क्या बदलाव आया? हम कितना आगे बढे! क्या हम उन आदर्शों पर चल पायें जिसकी बाट हमारे पूर्वजों ने जोही थी? क्या हमारा देश उस बुलंदी पर पहुँच पाया जो सपना आज़ादी के दीवानों ने देखा था? इन सवालों के जबाब जानना जितना आवश्यक है उतना ही ज़रूरी है यह जानना कि आखिर आज़ादी का मतलब क्या है? इसकी सैधान्तिकी क्या है तथा आधुनिक दौर में इसमें क्या तब्दीली आई? इन 71 सालों में आज़ादी की अवधारणा में क्या बदलाव आया है? क्या असीम आज़ादी की मांग को आज़ादी कहा जा सकता है? क्या किसी व्यक्ति या समाज के लिए बुनियादी ज़रूरतों को पाने की चाहत, आज़ादी की मान्यता के विपरीत है? क्या हमारी आज़ादी अपने मूल उद्देश्य में सफल हो पायी है? कुल मिलाकर यदि कहें तो आज़ादी के मायने क्या हैं तथा युवाओं के लिए आज़ादी का सही आदर्श क्या हो सकता है, यही जानना हमारा मकसद है?

‘आज़ादी’ की एक सर्वसम्मत परिभाषा तय करना काफी मुश्किल है, क्योंकि हर किसी के लिए आज़ादी के मायने अलग-अलग हैंl किसी के लिए विदेशी दासता से राष्ट्र की मुक्ति आज़ादी है तो कोई अपने मनमाफिक विचारों की अबाध अभिव्यक्ति को आज़ादी मानता हैl कोई बेलौस जीवन जीने की चाहत में आज़ादी महसूस करता है तो कोई असामनता, जाति-भेद और छुआछूत से मुक्ति की आकांक्षा को आज़ादी मानता हैl आज़ादी मुक्ति की चाहत का प्रतीक है, आज़ादी खुद को पूर्णतया अभिव्यक्त करने का एक एहसास है और आज़ादी हर प्रकार के गुलामी का प्रतिकार हैl सपाट शब्दों में यदि कहें तो व्यक्ति के बाहरी प्रतिबंधों का अभाव ही आज़ादी हैl हालाँकि प्रतिबंधों का न होना आज़ादी का सिर्फ एक पहलू हो सकता है, सम्पूर्ण अर्थ- विस्तार नहींl फिर भी आज़ादी व्यक्ति की आत्माभिव्यक्ति की योग्यता का विस्तार और उसके आंतरिक संभावनाओं का प्रसार ज़रूर हैl एक स्वतंत्र समाज वह होगा जो अपने सदस्यों को न्यूनतम समाजिक अवरोधों के साथ अपनी संभावनाओं के विकास में समर्थ बनाता हैl स्वतंत्रता, आज़ादी, स्वाधीनता आदि शब्द पर्यायवाची प्रतीत होते हैंl स्वतंत्रता का अर्थ है स्वयं के बनाए हुए तंत्र या system में रहनाl लेकिन यहाँ समझने वाली बात यह है कि स्वतंत्रता और स्वछंदता एक नहीं है बल्कि उसमें कुछ अंतर हैl स्वच्छंदता में तंत्र, सिस्टम या व्यवस्था का अभाव होता है जबकि स्वतंत्रता में सिस्टम या व्यवस्था उपस्थित रहता हैl उदाहरणस्वरुप, घर के बंद कमरे में व्यक्ति स्वछन्दता को धारण करता है क्योंकि वहां व्यवस्था के नाम पर सिर्फ वही है लेकिन लेकिन घर के बाहर वह स्वतंत्रता ही धारण कर सकता है क्योंकि वहां व्यवस्था के नाम पर समाज भी उपस्थित होता हैl बहरहाल ‘मैक्कनी’ के अनुसार ‘दूसरों को परेशान किए बिना स्वयं की इच्छानुसार निर्णय करना स्वतंत्रता हैl’ कहने का अर्थ यह कि जो आशय आज़ादी से है वही स्वतंत्रता से है लेकिन आज़ादी या स्वतंत्रता का मतलब स्वछन्दता नहीं होताl यानि स्वतंत्रता और आज़ादी में अर्थगत-भावगत समानता हैl इस प्रकार आज़ादी का विचार मानवीय चिंतन के समस्त आयामों को छूता हैl

यहाँ एक बात जो समझने वाली है वह यह कि आज़ादी के केंद्र में व्यक्ति है और व्यक्तिवादी अवधारणा का विकास यूरोप में रेनाशा या पुनर्जागरण के दौरान हुआl इसी व्यक्तिवादी सोच के फलस्वरूप लिबर्टी की अवधारणा का आगमन भी हुआl 1789 में फ़्रांस की राज्य क्रांति में स्वतंत्रता, समानता और विश्व बंधुत्व का जो विचार प्रगट हुआ, वही आगे चलकर स्वतंत्रता का आधार बनाl हालाँकि यहाँ यह जानना दिलचस्प है कि फ़्रांस की राज्य क्रांति में जो स्वतंत्रता का लक्ष्य था वह किसी विदेशी शासन के खिलाफ नहीं थाl वह तो खुद अपने ही देश के शासक और सामंत के खिलाफ थाl यानी स्वतंत्रता एक आत्मचेतना हैl इसके लिए विदेशी दुश्मन का होना ज़रूरी नहीं बल्कि सत्ता, सामंत, व्यवस्था या किसी व्यक्ति द्वारा लगाया प्रतिबन्ध ज़रूरी हैl दरअसल स्वतंत्रता बंधन-विरुद्ध भाव हैl एक ऐसा भाव जिसमें इंसान हँसते-हँसते सूली भी चढ़ता है तो उसे दुःख नहीं होताl यदि एक व्यक्ति की आज़ादी का इतना मोल है तो फिर राष्ट्र की आज़ादी कितनी अनमोल होगी समझा जा सकता हैl यह अफ्रीका की आज़ादी का ही भाव था जिस कारण ‘नेल्सन मंडेला’ ने 28 सालों तक जेल की यातनाएं सहीl यह म्यांमार की स्वतंत्रता की ही चाह थी कि ‘आंग-सांग-सू-की’ दशकों तक घर में नज़रबंद रहींl यही वह देश प्रेम का असीम भाव था जिस कारण भारत में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और खुदीराम बोस जैसे हजारों क्रांतिकारियों ने हँसते-हँसते अपनी जान कुर्बान कर दीl यही वह आज़ादी का स्वप्न था जिस कारण सुभाषचन्द्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया और लड़ते-लड़ते खुद को राष्ट्र की बलि बेदी पर होम कर दियाl यही वह देश को बंधनमुक्त देखने का एहसास था जिस कारण ‘महात्मा गाँधी’ जैसे महामानव ने अपना सम्पूर्ण जीवन बलिदान कर दियाl कहने का मतलब यह कि आज़ादी बंधनों का प्रतिकार है और प्रतिबंधों का नकार हैl फिर भी यह सवाल उठता है कि असीम आज़ादी क्या जायज़ कही जा सकती है?

स्वतंत्रता असीमित नही हो सकतीl असीम आज़ादी की चाहत, असीम विध्वंस को भी आमंत्रण देता हैl यह समाज के ढांचें में संभव नहीं हैl अगर धरती पर कोई अकेला मनुष्य होता तब यह संभव था पर जहाँ अरबों की संख्या में इन्सान बसते हैं, वहां एक आदमी का हित दूसरे आदमी से टकराएगा हीl अतः एक व्यक्ति की असीम आज़ादी दूसरे व्यक्ति के लिए बाधा उत्पन्न करती हैl यह एक प्रकार की हिंसा हैl चाहे यह हिंसा विचारों की हो, कार्यों की हो अथवा सोच की होl असीम आज़ादी का इस्तेमाल करते हुए किसी को नुकसान पहुँचाना अपनी आज़ादी में कटौती को भी आमंत्रित करना हैl ‘जॉन स्टुअर्ट मिल’ ने अपनी किताब ‘On Liberty’ में स्वतंत्रता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि “आपको लाठी घुमाने का अधिकार वहीं तक है जहाँ तक वह किसी और से ना टकराएl’’ (Your freedom ends where my nose begins). भारतीय संविधान में भी स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन यानी जायज़ प्रतिबंध लगाये गये हैं जैसे देश की एकता अखंडता, लोकव्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य आदि के आधारों परl समाज में रहने वाला हर व्यक्ति हर किसी की सीमा और प्रतिबंधों की पूर्ण अनुपस्थिति की उम्मीद नहीं कर सकताl हम ऐसी दुनिया में नहीं रह सकते जहाँ कोई दूसरा मनुष्य उपस्थित ही न होl मनुष्य अंततः एक सामाजिक प्राणी हैl इसलिए हम ऐसी दुनिया में भी नहीं रह सकते जहाँ कोई प्रतिबन्ध ही न होl हमें कुछ प्रतिबंधों की ज़रूरत है वरना समाज अव्यवस्था और अराजकता के गर्त में डूब जायेगाl उदहारण के बतौर यदि हर देश कार्बन उत्सर्जन के मामले में मनमानी करने लगे तो वैश्विक जलवायु का क्या हश्र होगा यह समझा जा सकता हैl एक परीक्षार्थी उत्तर लिखने में स्वतंत्र हो जाए और परीक्षक नम्बर देने में स्वतंत्र हो जाये तो क्या होगा? यदि चोर को आज़ादी मिल जाए तब क्या होगा और पुलिस को आज़ादी मिल जाये तब क्या होगा? कहने का भाव यह कि घोड़े और घास को एक जैसी छूट सबकी आज़ादी में बाधक सिद्ध होगाl

देखा जाये तो बेबाक आज़ादी के सन्दर्भ में राजनैतिक चिंतकों ने दो विभाजन किये हैं – सकारात्मक स्वतंत्रता ( positive liberty) और नकारात्मक स्वतंत्रता यानी Negetive liberty l जहाँ बाहरी प्रतिबंधों का पूर्णतया नकार होगा वह नकारात्मक स्वतंत्रता है जबकि जहाँ अवसरों के विस्तार को पाने की चाहत हो वह सकरात्मक स्वतंत्रता हैl नकारात्मक स्वतंत्रता एक तरह से असीम आज़ादी सरीखी है जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता युक्तियुक्त निर्बन्धन के साथ अधिकतम अवसर का लाभ उठा सकने की चाहत हैl नकारात्मक स्वतंत्रता में अपनी आज़ादी को ही सर्वोच्च माना जाता है और हर प्रकार के बंधनों का नकार होता हैl जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता में दूसरों की आज़ादी की भी परवाह का भाव है और युक्तियुक्त बंधनों का स्वीकार हैl सकारात्मक स्वतंत्रता के विमर्श की एक लम्बी परम्परा रही है जिससे रूसो, हेगेल, मार्क्स, गाँधी, अरविंदो और इन विचारकों से प्रेरणा लेने वाले लोगों के रूप में देखा जा सकता हैl इस परम्परा का सरोकार व्यक्ति और समाज के संबंधों की प्रकृति और स्थिति से हैl सकारात्मक स्वतंत्रता के पक्षधरों का मानना है कि व्यक्ति केवल समाज में ही स्वतंत्र रह सकता है समाज से बाहर नहींl इसलिए हमें समाज को ऐसा बनाने का प्रयास करना चाहिये जो व्यक्ति के विकास का रास्ता साफ़ करेl यहाँ समाज का अर्थ समूह, समुदाय अथवा राज्य कोई भी हो सकता हैl

इस आधार पर यदि हम देखें तो हमें जो वाक् और अभिव्यक्ति की आज़ादी दी गई है उसका उपयोग यदि हम भावनाएं भड़काने, अबाध गाली-गलौज करने तथा निरंतर शोर मचाने में करने लगे तो क्या यह सही कहा जा सकता है? शांतिपूर्ण सम्मलेन में यदि आप रास्ता जाम करा दें, परिवहन व्यवस्था ध्वस्त कर दें, कचरा फैलाकर गंध मचा दें तो क्या यह अच्छा कहा जायेगा? हमें संगठन का अधिकार है पर संगठन बनाकर हम नक्सलियों, आतंकवादियों की तरह लोगों के जीवन में दखल देना शुरू कर दें तो क्या यह अराजकता को निमंत्रण देना नहीं होगा? हमें प्राण व् दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार है, पर दूसरों की जान लेकर नहींl हमें देश में कहीं विचरण करने या घूमने की आज़ादी है पर ऐसा करके दूसरों के विचरण या वास में बाधा डालने वाले के रूप में नहींl हमें अपने धर्म के पालन का अधिकार है पर यह दूसरे को धर्मपालन से रोकने या उन्हें धर्मपालन को बाध्य करने की आज़ादी नहीं देताl इसलिए हमारा संविधान हमें जो अधिकार, समानता एवं स्वतंत्रता प्रदान करता है वह असीम व अबाध नहीं हैं क्योंकि आपकी स्वतंत्रता से अनिवार्य रूप से दूसरे की स्वतंत्रता भी जुड़ी हुई हैl हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज़ादी के पंख जिम्मेदारी की जड़ से जुड़ी रहें तो बेहतर है वरना खतरनाकl और यही बात सकारात्मक और नकारात्मक स्वतंत्रता के राजनैतिक सिधांत से भी दृष्टिगोचर होती हैl इसलिए सबको संविधान की सीमा में रहकर ही आज़ादी का उपयोग करना चाहियेl

जिस प्रकार हमें आज़ादी की ज़रूरत है वैसे ही कुछ प्रतिबंधों की भी ज़रूरत हैl यह ऐसी ही कोई उक्ति नहीं है बल्कि लिबर्टी की बात कहने वाले राजनैतिक चिन्तक ‘स्टुअर्ट मिल’ के विचारों से भी ज़ाहिर होता हैl राजनैतिक सिधांत के विमर्श में इसे हानि सिधांत या harm principle कहते हैंl सिधांत यह है कि किसी के कार्य करने की आज़ादी में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से दखल देने का एकलौता लक्ष्य आत्मरक्षा या Self Defence हैl सभ्य समाज के किसी सदस्य की इच्छा के खिलाफ शक्ति के औचित्यपूर्ण प्रयोग का एक मात्र उद्देश्य किसी अन्य को हानि से बचाना हो सकता हैl ‘स्टुअर्ट मिल’ ने इसे यहाँ स्वयंसंबद्ध (Self Regarding Action) और परसंबद्ध यानी Other Regarding Action के द्वारा समझायाl स्वयंसम्बद्ध वे कार्य हैं जिनके प्रभाव केवल इन कार्य को करने वाले व्यक्तियों पर पड़ते हैं जबकि परसम्बद्ध कार्य वे हैं जो कर्ता के अलावा बांकी लोगों पर भी प्रभाव डालते हैंl इसलिए ‘मिल’ का तर्क है कि स्वयंसम्बद्ध कार्य और निर्णयों के मामले में राज्य या किसी बाहरी सत्ता को कोई हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं हैl इसके विपरीत ऐसे कार्यों में जो दूसरों पर असर डालते हैं या जिनसे बाकी लोगों को हानि हो सकती उन पर बाहरी प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैंl

स्वतंत्रता के संबंध में उदारवाद और स्वराज जैसे शब्दों के अर्थ विस्तार को भी समझना ज़रूरी हैl एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में उदारवाद को सहनशीलता के मूल्य के साथ जोड़कर देखा जाता हैl उदारवादी चाहे किसी के विचार से असहमत हों तब भी वे उसके विचार और विश्वास रखने और व्यक्त करने देने का पक्ष लेते हैंl आधुनिक उदारवाद की विशेषता यह है कि इसके केंद्र में व्यक्ति हैl उदारवादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समानता जैसे मूल्य से भी अधिक वरीयता देते हैंl हालाँकि अब वे कल्याणकारी राज्य के महत्व को भी स्वीकार करते हैं और समानता के विचार को भी प्रश्रय देते हैंl इस प्रकार उदारवाद स्वतंत्रता की एक वैचारिक निष्पत्ति हैl जहाँ तक स्वराज की बात है तो भारतीय राजनैतिक विचारों में स्वतंत्रता की सामानधर्मी अवधारणा स्वराज हैl स्वराज का अर्थ स्व का शासन भी हो सकता है और स्व के ऊपर शासन भीl भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में स्वराज राजनैतिक और संवैधानिक स्तर पर स्वतंत्रता की मांग थी और सामाजिक सामूहिक स्तर पर एक मूल्य हैl स्वराज की यही समझ गाँधी जी के ‘हिन्द स्वराज’ नामक पुस्तक में भी प्रकट हुई हैl स्वराज सिर्फ स्वतंत्रता नहीं बल्कि ऐसी संस्थाओं से मुक्ति भी है जो मनुष्यों को उसकी मनुष्यता से वंचित करती हैl जब तक समाज में गरीबी, अशिक्षा, विषमता, बेरोजगारी, जातिवाद, सम्प्रदायवाद आदि है स्वतंत्रता बेमानी हैl पूंजीपति संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और कहते हैं कि व्यापार की स्वतंत्रता हैl अपराधी नेता बन जाते हैं और कहते हैं कि राजनैतिक स्वतंत्रता हैl लोग सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, गंदगी फैलाते हैं, कानून का अनादर करते हैं और तर्क देते हैं कि वह स्वतंत्र हैंl यह स्वतंत्रता और समानता का चिर-परिचित विवाद हैl जहाँ एक ओर स्वतंत्रता अधिक होने से समानता कम हो जाती, विषमता बढ़ जाती है वहीँ दूसरी ओर समानता को आदर्श बनाने से स्वतंत्रता के मूल्यों का भी क्षरण होता हैl इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि सबको बराबर करने लिए किसी से छिनना पड़ेगा और किसी को देना पड़ेगाl इससे एक की स्वतंत्रता का हनन होगा जबकि दूसरे के समानता के अधिकार की रक्षा होगीl इस कारण उनमें संघर्ष बढ़ेगाl यही वजह है आरक्षण के मुद्दों पर अक्सर विवाद उभरता रहता हैl मूलतः यह समानता और स्वतंत्रता का द्वन्द हैl लेकिन यहाँ विवाद के बजाय आवश्यकता इस बात के समझने की है कि न ही एबसैल्यूट लिबर्टी हो सकती है न ही एबसैल्यूट इक्वलिटीl इसलिए दोनों में बैलेंस बनाने की ज़रूरत होती हैl अतः आरक्षण भी 50% से ज्यादा नहीं दिया जाता हैl फिर भी देखा जाए तो स्वतंत्रता को बनाये रखते हुए किया जाने वाला विकास ही बेहतर हैl भले ही यह धीमा हो लेकिन इसमें मानव गरिमा का सम्मान हैl

समस्त चर्चा का सार यही है कि आज़ादी के तर्क को नकारना किसी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है, लेकिन यह असीमित नहीं हो सकतीl यहाँ एक बात और समझने की है कि लिबर्टी का कांसेप्ट व्यक्तिक स्वतंत्रता के रूप में ही विकसित, पल्लवित और पुष्पित हुआ हैl देश की आज़ादी का भाव भी सामूहिक आज़ादी की इच्छा की ही परिणति हैl आज फर्क सिर्फ यह पड़ा है कि पहले देश की आज़ादी में ही व्यक्ति की आज़ादी समाहित थी लेकिन आज जब हम विदेशी दासता से मुक्त हैं तो देश की आज़ादी के साथ-साथ व्यक्ति की आज़ादी भी प्रमुख हो गई हैl नेशन स्टेट की अवधारणा में एक लोकतांत्रिक सरकार के गठन का लक्ष्य जनता की आज़ादी को महफूज़ बनाये रखना हैl लेकिन कई बार ऐसा देखा जाता है कि स्टेट ही लोगों की आज़ादी का अपहरणकर्ता बन जाता है जो कि गलत हैl आज भारत को आज़ाद हुए 71 साल बीत गये हैंl इन 71 सालों में हमने अपने जीडीपी को 30.6 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर कर लिया; अपनी साक्षरता दर को 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 फीसदी कर लिया; देश की औसत आयु को 32 से बढाकर 67 वर्ष कर लिया तथा कुपोषण की दर को 87 फीसदी से घटाकर 44% कर लिया, लेकिन हम आज भी गरीबी और अशिक्षा से पूर्णतया मुक्त नहीं हो पाए हैं और जो इसकी बात करता है उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता हैl हमने इन 71 सालों में अपनी अर्थव्यवस्था को क्रय-शक्ति-समता के आधार पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की कतार में ला खड़ा किया है, चाँद और मंगल की दूरियां नाप लीं लेकिन अंग्रेजो द्वारा बनाये गये काले कानून 124A को खत्म नहीं कर पाएl स्पेस रिसर्च और आईटी सेक्टर में हम अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं लेकिन मानव विकास सूचकांक में पिछले पायदान पर रहते हैंl इन इकहत्तर सालों में हमने प्लेग, कालाजार, चेचक और पोलियो जैसी बिमारियों पर काबू पा लिया लेकिन जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्म, भाषा और सम्प्रदायवाद के नाम पर होने वाली हिंसा आज भी बेकाबू हैl यानी एक तरफ हमारी संवृद्धि बढ़ रही है तो दूसरी तरफ आज भी कुछ कमियां हैं जिनसे हम उबर नहीं पाए हैंl यह सच है कि भारत वर्ष में जितनी आज़ादी है उतनी संभवतः दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में नहीं है पर यह भी सच है कि समय-समय पर आज़ादी के बाद भी उसमें राज्यसत्ता द्वारा कटौती की कोशिश की जाती रही हैl हालाँकि भारतीय समाज की आस्थाएं सामुदायिकतावादी रही हैं इसलिए हम सबकी आज़ादी का सम्मान करते हैं फिर भी बाह्य दुश्मन या आंतरिक शत्रु से यदि हमारी आज़ादी को खतरा हो तो उसके लिए हमें हमेशा तैयार रहने की ज़रूरत भी हैl साथ ही सरकार को भी यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि सत्ता को मान्यता जनता से इसलिए मिलती है ताकि वह जनता के अधिकारों की रक्षक बन सके न कि उनके अधिकारों में कटौती करने करने लगेl

क्या हमारे आज़ादी का मतलब इन इकहत्तर सालों में इतना पंगु हो गया है कि कोई नौजवान यदि गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, पूंजीवाद आदि से आज़ादी की बात करे तो उसे देशद्रोही करार दे दें, उसे जेल में डाल दें, उसकी लिंचिंग करवा देंl यदि ऐसा है तो सही ही कहा गया है कि :-

“भगत सिंह नहीं काया लेना फिर से भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फांसी की”

क्या हम आज़ाद भारत को एक ऐसा मुल्क बनाना चाहते हैं जहाँ सरकार की आलोचना देश की आलोचना समझ ली जाए? क्या हम इंडिया को ऐसा देश बनाना चाहते हैं जहाँ प्रधानमंत्री की आलोचना राष्ट्र की आलोचना मान ली जाए? क्या हम हिंदुस्तान को एक ऐसा वतन बनते देखना चाहते हैं जहाँ आम आवाम का हक़ सत्ता की बलि वेदी पर कुर्बान होता रहे? सता ने आम जनता के ऊपर जो फर्जी राष्ट्रवाद की की चादर डाल रखी है हमें उससे बाहर निकलकर देखना पड़ेगा तभी, आज़ादी का सही मायने समझ में आएगाl

आज़ादी के इस पावन पर्व पर हमें यह समझना होगा कि न सरकार और राज्य(Nation state) एक है, न ही सरकार और देशl सरकारें आती-जातीं रहतीं हैं लेकिन देश बना रहता हैl राज्य संविधान, कानून, प्रशासन तथा सेना से चलता है जबकि राष्ट्र एक भावना है जिसके मूल में राष्ट्रीयता का भाव निहित होता हैl इसलिए कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि राजद्रोह राष्ट्रभक्ति के आवश्यक हो जायेl ऐसी परिस्थिति में सरकार की आलोचना नागरिकों का पुनीत कर्तव्य हैl वस्तुतः उत्तरदायी शासन के लिए सरकार की आलोचना आवश्यक हैl इसके अभाव में सरकारें सर्वसत्तावादी बन सकती हैंl फांसीवादी और तानाशाही शासन इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैंl इसलिए दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देशों में विपक्ष की परिपाटी रही है, स्वतंत्र मीडिया रही है साथ ही नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की आज़ादी भी दी गई हैl तमाम रिजनेबुल रिस्क्रिक्टशन के बाबजूद यह मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उन्हें भी होनी चाहिए जिनके विचार आज की परिस्थितियों में गलत या भ्रामक लगेl हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्य हमेशा विरोधी विचारों के टकराव से ही पैदा होता हैl यदि हम सत्ता विरोधी आवाजें कुचल देंगे तो जनहितैषी संभावनाशील ज्ञान के लाभ से भी वंचित हो जायेंगे और अपनी तथा देश की आज़ादी को भी गंवा बैठेंगेl इसलिए व्यक्ति और सत्ता का सम्बन्ध आज़ादी के सकारात्मक सिधांतों के अनुरूप ही रहना चाहिएl राज्य, सत्ता, व्यक्ति और समाज जब पॉजिटिव way में आज़ादी को ग्रहण करते हुए विकास के पथ पर अग्रसर होगें तभी नये भारत का सपना साकार होगा और गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी से आज़ादी मिलेगीl अतः आज़ादी पर्व के इस सुअवसर पर आज़ादी के वास्तविक मायने को समझते हुए इस दिशा में आगे बढ़ने की ज़रूरत हैl

“दबे पैरों से उजाला आ रहा है, फिर कथाओं को खंगाला जा
प्रश्न का उत्तर कठिन है इसलिए भी, प्रश्न सौ सौ बार टाला जा रहा है”

धन्यवाद…

हेमंत कुमार

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देश

वे हमें डरा नहीं सकते:- उमर ख़ालिद

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कल बंदूक से उमर खालिद पर हुए हमले के बाद उमर खालिद ने अपने फेसबुक पर अंग्रेजी में एक स्टेटस डाला जिस का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है।

वे हमें डरा नहीं सकते!…………………उमर ख़ालिद

कल, मेरे जीवन को लेने की कोशिश पर मेरा बयान

मुझे पता है कि किसी भी दिन मेरे खिलाफ एक बंदूक हो सकती है ।

Dhabolkar, kalburgi, जुमेदार, गौरी लंकेश..लिस्ट बढ़ रही है । लेकिन क्या मैं यह कह सकता हूँ कि मैं इसके लिए तैयार था? क्या कभी कोई कह सकता है कि वे ऐसी स्थिती के लिए तैयार हैं? नहीं. और दो दिन पहले 15 अगस्त से भी सवाल यह भी है कि ” आजादी ” का भी क्या मतलब है कि इस देश के नागरिकों को सिर्फ अन्याय के खिलाफ मुखर होने के लिए अपने ” अपराध ” के लिए मरने के लिए तैयार रहना होगा?

सबसे ज्यादा उलटा क्या है कि मैं “डर से आजादी” नामक घटना में भाग लेने के लिए चला गया था, जब एक अज्ञात ने ने मुझे हमला किया और संविधान क्लब के सामने मुझे मारने की कोशिश की ।

यह तथ्य है कि स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले, राष्ट्रीय राजधानी के सबसे अधिक “उच्च सुरक्षा” क्षेत्र में एक सशस्त्र बच ने मुझे व्यापक रूप से हमला करने की हिम्मत कर सकती है, केवल पर दण्ड दिखाने के लिए जाता है कि कुछ लोगों को लगता है कि वे इस के तहत आनंद लेते हैं वर्तमान शासन । मुझे नहीं पता कि वह कौन था या उसके पीछे की ताकतें कौन हैं । कि पुलिस के लिए जांच करने के लिए है. लेकिन मैं यहाँ राज्य करना चाहता हूँ कि अगर कुछ shameful कल हुआ होता, या अगर कल होना होता, तो बस उस “अज्ञात ने” को जिम्मेदार मत रखना । असली गुनहगार वे हैं जो सत्ता की अपनी सीटों से, खूनखराबे और डर का माहौल बना रहे हैं. असली गुनहगार वे हैं जिन्होंने हत्यारे और mob जप्त के लिए पूरी सजा का माहौल प्रदान किया है. असली गुनहगार तो सत्ताधारी पार्टी और प्राइम टाइम एंकर और टीवी चैनलों के कोविन्द हैं जिन्होंने मेरे बारे में आसार फैला दिया है, ब्रांडेड मैं झूठ पर आधारित राष्ट्र विरोधी और वस्तुतः मेरे खिलाफ एक लिंच-भिड क़ौम है. इसने विशेष रूप से मेरे जीवन को अत्यधिक कमजोर बना दिया है ।

आज भी पुलिस ने धारा 307 और हथियार एक्ट के तहत एक अपराध दर्ज किया है, ऐसा क्यों है कि भाजपा से एक सांसद, मीनाक्षी लेखी और अन्य भगवा एजेंट ऑनलाइन हैं, यह सुझाव देने की कोशिश कर रहे हैं कि हमला कभी नहीं हुआ, या बदतर है कि मैं इसे अपने दम पर तैयार किया? जैसे मैंने किसी पर उंगलियों का इशारा नहीं किया है, वह कथा को मोड़ देने के लिए इतने बेताब क्यों हैं? इस छटपटाहट को किस की निशानी के रूप में लिया जाना चाहिए? उनका अपना मजबूर? खैर, अगर कोई गौरी लंकेश की हत्या को एक उदाहरण के रूप में देख रहा है, तो अन्य स्पष्ट रूप से हिंदुत्व आतंक के कपड़ों के हाथों को उजागर करता है. तो जब हम “अज्ञात बंदूकधारियों” कहते हैं, तो क्या महत्वपूर्ण है कि इन आतंक हमलों के पीछे असली खिलाड़ियों की पहचान करना है ।

मेरे खिलाफ ये नफरत अभियान पिछले दो साल से चल रहा है । कोई सबूत नहीं, सिर्फ झूठ है । कोई चार्ज-शीट नहीं हुआ है, केवल मीडिया-ट्रायल । कोई तर्क नहीं है, केवल घुमाना है । कोई बहस नहीं हुई, सिर्फ मौत की धमकियां । और आज यह सब एक बंदूक के लिए नीचे आ गया है. क्यों कि ” tukde tukde ” जैसे हैशटैग सचमुच मेरे नाम के लिए एक उपसर्ग बन गए हैं, जबकि भाजपा के नेताओं ने खुलकर समर्थन किया जो कहते हैं कि वे देश के ” tukde tukde ” करेंगे अगर एक निश्चित फिल्म जारी है? ऐसा क्यों है कि मुझे राष्ट्र विरोधी कहा जाता है और कभी भी मीडिया मुकदमा खत्म करने का काम नहीं कर रहा है, लेकिन राजधानी के दिल में संविधान को जलाने वालों के खिलाफ कोई आक्रोश नहीं है, दिल्ली पुलिस की उपस्थिति में बस कुछ दिन पीछे? ऐसा क्यों है कि जो लोग अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत-उकसा कर देश को polarizing कर रहे हैं और mob-जप्त को सम्मानित करके सम्मानित, श्रद्धेय और मचा हैं? और हम नफरत के खिलाफ बोलने वाले villainized हैं? ऐसा क्यों है कि जो लोग जाति के नाम पर समाज को बांटने की बात करते हैं और दलितों पर हमला करते हैं – shambhaji भिडे की पसंद, जिसे पीएम मोदी एक महापुरुष कहते हैं-देश को टुकड़े करने का आरोप नहीं लगा रहे हैं? ऐसा क्यों हो रहा है कि सत्ता में जो लोग इस देश के टुकड़े को इस देश के टुकड़े को टुकड़े करके बड़े बड़े स्कॉरपिओ के साथ बेचना चाहते हैं, उन्हें deshbhakts के रूप में मनाया जाता है और उनके आलोचकों को ” राष्ट्र विरोधी ” माना जाता है “? ये सभी प्रासंगिक प्रश्न हैं .

और अगर ये लोग इस बात पर ईमान रखते हैं कि इस तरह के हमलों के साथ हमें (अज़ाब से) डराने वाला है तो (आख़िर) ये लोग (ख़ुदा के अज़ाब से) गौरी लंकेश के विचार, विचार ” ने उन्हें outlived किया है । वे हमें मौन में नहीं ले सकते, न उनकी जेलों के साथ, और न ही उनकी गोलियों के साथ. हमने इसे कल ही साबित कर दिया । मुझ पर हमले के बावजूद, कार्यक्रम khauf से आजादी (डर से आजादी), नफरत के खिलाफ एकजुट होकर संविधान क्लब में सफलतापूर्वक आयोजित किया गया । नजीब की माँ फातिमा nafes, alimuddin की पत्नी (जिनके हत्यारे केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने हाल ही में) मरियम, जुनैद की माँ (16 साल पुरानी मार को पिछले साल एक ट्रेन पर) फातिमा, rakbar खान के भाई अकबर, डॉ कफ़ील खान साथ में प्रशांत भूषण, प्रो. परेशान, सीनियर darapuri, मनोज झा और कई अन्य लोगों ने अपनी आवाज को नफरत, अगर और आतंक के खिलाफ अपनी आवाज उठाने को संबोधित किया । यही हमारे प्रतिरोध की भावना है.

मैं भी इस मांग को दोहराना चाहता हूं कि दिल्ली पुलिस मुझे सुरक्षा के साथ प्रदान करें क्योंकि मेरे जीवन को लगातार खतरा है । पिछले दो सालों में मैंने दिल्ली पुलिस से दो बार पुलिस सुरक्षा की मांग की है, लेकिन केवल एक कठोर प्रतिक्रिया से मुलाकात की जा रही है । मुझे पिछले में कई बार मौत की धमकी दी गई है और सोशल मीडिया पर हर रोज कई खतरे और inciteful संदेश प्राप्त करते हैं. कल की घटना के बाद दिल्ली पुलिस का इंतजार क्या है? मैं सभी लोकतांत्रिक ताकतों से अपील करता हूँ कि दिल्ली पुलिस को सुरक्षा के साथ मुझे प्रदान करें, क्योंकि अब मैं सुरक्षा के बिना कहीं भी जाने के लिए संभव नहीं है.

मैं न्याय के अनगिनत शुभचिंतकों और सह-सेनानियों का धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने मेरे द्वारा खड़े होकर इस कायराना हरकत के खिलाफ बात की । यह लोकतंत्र के लिए सामूहिक लड़ाई है कि हम सभी का हिस्सा है और हम सावरकर और गोडसे के अनुयायियों को अवश्य परास्त करेंगे । कल जब एक बार फिर से उच्च ग्रुप के लाल किले के चबूतरे से हाई वोल्टेज झूठ और चीनी-कोटेड: की बौछार, असली आजादी और मर्यादा के लिए हमारी लड़ाई, और भगत सिंह और बाबासाहेब आंबेडकर के सपनों को हकीकत में बना रहे हैं अधिक समाधान के साथ जारी रहेगा.

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देश

युवाओं की आवाज़ जेल और गोलियों के डर से ना पहले कभी दबी थी, ना आगे कभी दबेगी:- कन्हैया कुमार

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उमर खालिद पर  हुए जानलेवा हमले के खिलाफ देशभर के युवा एक जुट होने लगे। जहां एक तरफ छात्र नेता शेहला रशीद ने उमर के पक्ष में ट्वीट करते हुए सत्ता के नशे में चूर सत्ताधारियों को लताड़ा वहीं जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने देश मे बढ़ रहे जंगलराज पर सरकार को आड़े हाथों लेटवहुये मीडिया को भी नही छोड़ा। उन्होंने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा कि:-

देश में जंगल राज का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि संसद भवन से थोड़ी दूर कभी संविधान की प्रतियाँ जला दी जाती हैं तो कभी उमर ख़ालिद पर गोली चलाने जैसे अपराध को अंजाम दिया जाता है। स्वतंत्रता दिवस से पहले संसद भवन के पास किसी नागरिक पर इस तरह हमला करना यह दर्शाता है कि इस देश में अपराधियों का मनोबल कितना बढ़ गया है। इसके लिए अपराधियों को मिलने वाला सरकारी संरक्षण और दरबारी मीडिया का प्रोत्साहन जिम्मेदार है। लेकिन युवाओं की आवाज़ जेल और गोलियों के डर से ना पहले कभी दबी थी, ना आगे कभी दबेगी।

इस शर्मनाक और कायराना हमले की सिर्फ़ आलोचना करने से काम नहीं चलेगा। हमें अभी डर का माहौल बनाकर देश को लूटने वालों के ख़िलाफ़ एक बड़ा मोर्चा बनाकर बार-बार सड़कों पर निकलना होगा। भाजपा की मीनाक्षी लेखी ने आज की इस कायराना हरकत को सनसनी फैलाने वाला तमाशा बताया है। यह बयान उस पार्टी की तरफ़ से आया है जिसने लोकतंत्र को ख़ुद तमाशा बना दिया है।

कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कहते हैं-

“भेड़िया गुर्राता है
तुम मशाल जलाओ।
उसमें और तुममें
यही बुनियादी फर्क है
भेड़िया मशाल नहीं जला सकता।

अब तुम मशाल उठा
भेड़िये के करीब जाओ
भेड़िया भागेगा।”

संघ-भाजपा की नफरतवादी विचारधारा के खिलाफ सभी प्रगतिशील ताकतों को एकजुट होकर प्रेम, सद्भावना और संघर्ष की मशाल जलानी होगी क्योंकि आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छा जाएगा।

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