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हाई स्किल परंतु अस्थायी काम ही रोज़गार का नया चेहरा होगा- नरेन्द्र मोदी

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“फोर्थ इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन में पूंजी से ज्यादा महत्व प्रतिभा का होगा। हाई स्किल परंतु अस्थायी वर्क रोज़गार का नया चेहरा होगा। मैन्यूफैक्चरिंग, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन डिजाइन मे मौलिक बदलाव आएगे। डिजिटल प्लेटफार्म, आटोमेशन और डेटा फ्लोस( प्रवाह) से भौगोलिक दूरियों का महत्व कम हो जाएगा। ई कामर्स, डिजिटल प्लेटफार्म मार्केट प्लेसेस जब ऐसी टेक्नालजी से जुड़ेंगे जब एक नए प्रकार के इंडस्ट्रियल और बिजनेस लीडर सामने आएंगे।“

यह भाषण प्रधानमंत्री मोदी का है जो उन्होंने ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में दिया है। यह भाषण आपको बीजेपी की साइट और यू ट्यूब पर हर जगह मिल जाएगा। आप इसे सुनें तो पता चलेगा कि रोज़गार को लेकर प्रधानमंत्री क्या सोच रहे हैं? क्या भारतीय युवाओं को पता है कि रोज़गार को लेकर उनके प्रधानमंत्री क्या राय रखते हैं? परमानेंट रोज़गार की तैयारी में जवानी के पांच पांच साल हवन कर रहे हैं भारतीय युवाओं के बीच यह बात क्यों नहीं कही जा रही है कि रोज़गार का चेहरा बदल गया है। अब अस्थायी काम ही रोज़गार का नया चेहरा होगा।

प्रधानमंत्री को यही बात ब्रिक्स में नहीं, भारत में कहनी चाहिए। वैसे प्रधानमंत्री पकौड़ा वगैरह का उदाहरण देकर यही बात कह रहे हैं मगर उन्हें युवाओं के बीच आकर साफ-साफ कहना चाहिए कि ज़माना बदल गया है। अस्थायी काम ही रोज़गार का चेहरा हो गया है। 2019 में जब वे रोज़गार देने का वादा करें तो साफ साफ कहें कि अगले पांच में हम अस्थायी रोज़गार देंगे। रोज़गार का चेहरा बदल गया है इसलिए आप भी बदल जाओ। क्या युवा अपने प्रिय प्रधानमंत्री से ये बात सुनना चाहेंगे?

29 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड में अजय मोदी की एक ख़बर छपी है। देश के सबसे तेज़ी से बढ़ते हुए ऑटोमोबिल सेक्टर में स्थायी नौकरियां घटती जा रही हैं। इस सेक्टर की जितनी भी बड़ी कंपनियां हैं वे मांग के हिसाब से अस्थायी तौर पर लोगों को काम दे रही हैं। अजय मोदी ने मारुति सुज़ुकी, हीरो मोटोकोर, अशोल लेलैंड और टीवीएस मोटर का विश्वेशण किया है। इन कंपनियों में 2017-18 में 24,350 अतिरिक्त स्टाफ रखे हैं। जिनमें से 4 प्रतिशत से भी कम नौकरी पक्की है। सब की सब नौकरियां ठेके की हैं। अस्थायी प्रकृति की हैं। 23,500 से अधिक नौकरियां ठेके की हैं। यह बदलाव जो आ रहा है।

प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर जवाब देते हुए रोज़गार के कई आंकड़े दिए थे। आप उस भाषण को फिर से सुनिए। वैसे रोज़गार को लेकर शोध करने और लगातार लिखने वाले महेश व्यास ने 24 जुलाई के बिजनेस स्टैंडर्ड में उनके भाषण की आलोचना पेश की है। प्रधानमंत्री आंकड़े दे रहे हैं कि सितंबर 2017 से मई 2018 के बीच भविष्य निधि कोष से 45 लाख लोग जुड़े हैं। इसी दौरान नेशनल पेंशन स्कीम में करीब साढ़े पांच लाख लोग जुड़े हैं। अब महेश व्यास कहते हैं कि यह संख्या होती है पचास लाख मगर प्रधानमंत्री आसानी से 70 लाख कर देते हैं। राउंड फिगर के चक्कर में बीस लाख बढ़ा देते हैं।

फिर प्रधानमंत्री कहते हैं कि चार्टर्ड अकाउंटेंट, डॉक्टर और वकीलों को भी काम मिला है यह संख्या करीब 6 लाख होती है। 17000 चार्टर्ड अकाउंटेंट सिस्टम में जुड़े हैं। इनमें से 5000 ने अपना कारोबार शुरू किया है। अगर सबने 20 लोगों को भी काम दिया होगा तो उन्होंने एक लाख रोज़गार दिए होंगे। ( नए सीए फर्म में क्या वाकई में 20 लोग होते होंगे ?) हर साल 80,000 डाक्टर, डेंटल सर्जन, आयुष डाक्टर पढ़कर निकलते हैं। इनमें से 60 प्रतिशत अपनी प्रैक्टिस करते हैं। 5 लोगों को कम से कम रोज़गार देते ही हैं। यह संख्या 2 लाख 40,000 हो जाती है। यह सब प्रधानमंत्री बता रहे हैं लोकसभा में।

प्रधानमंत्री कहते हैं कि उसी तरह 80,000 वकील निकलते हैं जो दो लोगों को तो काम देते ही हैं, इस तरह रोज़गार में 2 लाख नौकरियां जुड़ जाती हैं।
अब आप बताइये क्या यह मज़ाक नहीं है। जो कालेज से पढ़कर वकील निकलता है वो अपने लिए काम ढूंढता रहता है या बाहर आकर दो लोगों को नौकरियां दे देता है। प्रधानमंत्री कम से कम अरुण जेटली से ही पूछ लेते। नया वकील तो कई महीनों तक मुफ्त में काम करता है, काम सीखने के लिए। कब खुद के लिए कमाना शुरू करता है वही नहीं जानता। इस तरह से कोई रोज़गार के आंकड़े जोड़ेगा और वो भी प्रधानमंत्री तो फिर कैसे बात होगी।

आप अविश्वास प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री के भाषण निकाल कर सुनिए। वे कहे जा रहे हैं कि परिवहन सेक्टर में 20 लाख ड्राईवर और क्लीनर जुड़े हैं। नई कर्मशियल गाड़ियां जब सड़क पर आती हैं तब 10 लाख लोगों को रोज़गार देती हैं। ढाई लाख नई कारें सड़क पर आती हैं इनमें से पांच लाख ड्राइवर रखे जाते हैं। आटो रिक्शा भी करीब साढ़े तीन लाख लोगों को रोज़गार देता है। प्रधानमंत्री ने ई रिक्शा औऱ साइकिल रिक्शा और रेहड़ी पटरी को क्यों नहीं जोड़ा, समझ नहीं पा रहा हूं। वैसे उन्होंने कुल संख्या भी दी और कहा कि 90 लाख 19 हज़ार (9.19 मिलयन) लोगों को काम मिला है। प्रधानमंत्री इस संख्या को भी गोल गोल करके 1 करोड़ कर दिया।

आप कहेंगे कि क्यों मीन मेख निकाल रहा हूं? प्रधानमंत्री मोदी कोई साधारण मंत्री नहीं हैं। वे देश के सामने रोज़गार के आंकड़े रखते हैं तो देखना चाहिए कि उन आंकड़ों का आधार क्या है। किस डेटा से वे जान गए कि नई कारों ने पांच लाख लोगों को काम दिया है। ड्राइवर के तौर पर रखे गए हैं। किस डेटा से उन्हें ये जानकारी मिली है कि वकीलों ने 2 लाख लोगों को काम दिया है। जो ख़ुद काम खोज रहे होते हैं।

महेश व्यास कहते हैं कि विवाद इस पर नहीं है कि रोज़गार का सृजन हुआ है या नहीं। रोज़गार का सृजन हुआ है। हमेशा की नौकरियां पैदा होती रहती हैं। बहस इस बात को लेकर है कि क्या इन नौकरियों की संख्या इतनी पर्याप्त है जो बेरोज़गारी को संभाल सके? EPS में जो नए नाम जुड़ रहे हैं वो ज़रूरी नहीं है कि नई नौकरियों के नाम हैं। महेश व्यास के तर्क को समझिए। प्रधानमंत्री कहते हैं कि चार्टर्ड अकाउंटेंट ने एक लाख नौकरियां दी हैं। तो क्या ये एक लाख भविष्य निधि वाले डेटा में शामिल नहीं होंगे?कहीं ऐसा तो नहीं कि सबको पहले भविष्य निधि वाले खाते से जोड़ लो और फिर उन्हें अलग अलग जोड़ लो और टोटल करके एक करोड़ बता दो। कमाल का गणित है।

महेश व्यास ने तर्क दिया है कि बड़ी संख्या में कर्मशियल गाड़ियां के ख़रीदार राज्य परिवहन विभाग होते हैं। बड़ी प्राइवेट कंपनियां ख़रीदती हैं। खनन और लाजिस्टिक कंपनियां खरीदती हैं। चूंकि ये बड़ी कंपनियां होती हैं इसलिए अपने कर्मचारियों का भविष्य निधि खाता खोलती हैं। अगर ऐसा हुआ है तो ये संख्या कर्मचारी भविष्य निधि के डेटा में दिखेगी। फिर इन्हें अलग से जोड़ने का मतलब क्या हुआ।

मान लीजिए एक हाथ में 90 रुपया है। एक हाथ में 10 रुपया है। आपने एक बार 90 और 10 को एक साथ पकडा और कहा कि सौ रुपया हो गया। फिर यह दूसरे हाथ के 10 रुपये को एक और बार जोड़ कर 110 रुपये बता दिया। या तो आप एक ही बार जोड़ेंगे या एक ही बार घटाएंगे। महेश व्यास के और भी तर्क हैं, मैं यहां नहीं लिखूंगा, मोदी भक्त आहत हो जाएंगे। उन्हें समझ नहीं आएगा कि मैं ये क्यों कर रहा हूं।

“एक अहम सवाल रोज़गार के प्रकार और अवसर का होगा,जहां तक हम देख सकते हैं ट्रेडिशनल मैन्यूफैक्चरिंग हमारे युवाओं के लिए रोज़गार का एक प्रमुख ज़रिया बनी रहेगी। दूसरी ओर हमारे वर्कर के लिए अति आवश्यक होगा कि वे अपने स्किल में बदलाव ला सके। इसलिए शिक्षा और कौशल समाज के लिए हमारा और हमारे नज़रिया और नीतियों में तेजी से बदलाव लाना होगा। स्कूल और कालेज के पाठ्यक्रम को इस तरह से बनाना होगा जिससे यह हमारे युवाओं को भविष्य के लिए तैयार कर सके। टेक्नालजी में आने वाले तेज बदलाव उसी गति से स्थान पा सकें।“

यह भी प्रधानमंत्री के ही भाषण का हिस्सा है जो उन्होंने ब्रिक्स देशों के नेताओं के बीच दिया था। भारत ने स्किल डेवलपमेंट शब्द ही सीखा है जर्मनी और चीन से। शायद किसी और देश से। जर्मनी का स्किल डेवलपमेंट कोर्स आप देखेंगे तो हैरान रह जाएंगे। जर्मनी ब्रिक्स का हिस्सा नहीं है मगर मैं उदाहरण दे रहा हूं। चीन का स्किल डेवलपमेंट भारत से कहीं आगे हैं।

अब आप ईमानदारी से दो सवाल का जवाब दीजिए। क्या भारत का कौशल विकास कार्यक्रम उच्च दक्षता यानी हाई स्किल का प्रशिक्षण देता है? आप किसी भी कौशल विकास केंद्र में जाकर देख लीजिए। इसका जवाब आप दीजिए। वर्ना मेरे सवालों को आप सहन नहीं कर पाएंगे। कौशल विकास केंद्र वाले रोज़ मेरे पास आते हैं कि किस तरह से कुछ के साथ भेदभाव हो रहा है। उन्होंने मोदी पर भरोसा कर लाखों का लोन लेकर कौशल विकास केंद्र खोला है मगर वे खाली हैं। ज़्यादा कहेंगे तो तस्वीर सहित दिखा दूंगा। वे कैसे बर्बाद हुए हैं, वो भी दिखा दूंगा। फिर प्रधानमंत्री ने क्यों नहीं बताया कि स्किल इंडिया कार्यक्रम के तहत कितनों को प्रशिक्षण दिया गया और कितनों को रोज़गार मिला। क्या अविश्वास प्रस्ताव के समय याद नहीं रहा?

बेहतर है रोज़गार पर बहस हो, ठीक से बात हो। विपक्ष में दम नहीं है तो क्या हुआ। युवाओं की ज़िंदगी का सवाल तो है। क्या उनकी ज़िंदगी से इसलिए खेला जाएगा कि विपक्ष यह सवाल उठाने के लायक नहीं है? क्या युवा अपनी ज़िंदगी से खेलना चाहते हैं?

नोट- इस लेख को लिखने में काफी समय लगा है। हिन्दी के अखबार और चैनल अपने पाठकों को उल्लू बना रहे हैं। उनके यहां इस तरह के विश्लेषण नहीं मिलेंगे। इसलिए यहां वहां से खोजकर आपके लिए हिन्दी में पेश करते हैं।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुआ है)

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‘हम महज कश्मीर चाहते हैं, कश्मीरी तो हमारे लिए आतंकवादी हैं?’

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बीते दिनों हमारे जवानों पर आतंकवादियों द्वारा किये गए कायराना हमले से पूरा देश स्तब्ध है, गुस्सा इतना की देश में हर जगह पाकिस्तान और आतंकवादियों के खिलाफ जुलूस निकला जा रहा है और अपने आक्रोश को लोग प्रदर्शित कर रहे हैं, जवानों को श्रधांजलि देने के लिए गली कुचों में भी आम आदमी द्वारा कैंडल मार्च निकला गया. ये दृश्य बताता है की हमारे देश में मानवता अभी मारा नहीं है भावनाएं आहात हुई हैं पर लोगों को अपने सरकार, संविधान और सेना पर पूरा भरोसा है उन्हें ये भी भरोसा है की इसका बदला जरूर लिया जायेगा.

वही दूसरी तरफ हमारे देश में कुछ चरमपंथी लोग भी हैं जो ऐसे मौकों के तलाश में रहते है जिससे वो अपनी राजनैतिक भूख को शांत कर सके चाहे उसमे उन्हें अपने लोगों को ही नुक्सान पहुचना पड़े. आतंकवादी हमलों के बाद देश के अलग अलग हिस्सों में देश का अभिन्न अंग कश्मीर के लोगों पर कुछ लोगों द्वारा हमले की खबर आम हो चली है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताविक देहरादून में कुछ चरमपंथियों ने कश्मीरी युवाओं पर हमला किया और उन्हें बुरी तरह मारा और पीटा गया, वही दूसरी तरफ बिहार के पटना में कश्मीरी दुकानदारों पर हमला कर उनके दुकानों को तोडा गया और उन्हें बिहार छोड़ने की धमकी भी दी गयी और सोशल मीडिया पर कश्मीरी युवाओं के खिलाफ जहर उगलते पोस्ट अचानक ही वायरल होते नज़र आने लगे.

इन्हें देख कर मन में सहसा एक विचार आया की इन्हीं चरमपंथियों द्वारा कश्मीर हमारा है का नारा लगाया जाता है और इनके द्वारा ही उनके वाशिंदों को पीट कर उन्हें वापस कश्मीर भेजा जाता है या भेजने के लिए वाध्य किया जाता है, तो क्या गलत है अगर कश्मीरी युवा देश के उन तमाम लोगों को अपने कश्मीर में आने न देना चाहे जो उन्हें देश का हिस्सा नहीं मानते, फिर हमें कोई हक़ नहीं है की उन्हें गुनाहगार माने अगर वो खुद को देश से अलग थलग समझने लगे.

कश्मीर में हुए हमले के लिए अगर कश्मीरी जिम्मेदार है और उन्हें मारा पीटा जाता है तो क्या गाँधी की हत्या एक ब्राहमण द्वारा किये जाने पर तमाम ब्राहमण समुदाय को गुनाहगार मनन जाये, गुजरात में हुए नरसंघार के कारन तमाम गुजरातियों को देश से वापस गुजरात भेज दिया जाए.

हमारी ये घृणित सोच हमारे देश के लिए ज्यादा खतरनाक है जो आये दिन अलगाववादी सोच और लोग पैदा कर रहे हैं.

जहाँ सोशल मीडिया पर एक तबका कश्मीरियों के विरोध में खड़ा हुआ वही कई ऐसे लोग भी है जो उनके मदद को सामने आये और देश के युवाओं से ऐसा न करने की अपील की. वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने कहा की अगर किसी भी कश्मीरी छात्र को किसी भी तरीके से परेशां किया जा रहा है तो वो मुझे कभी भी कॉल कर सकते हैं, मेरे घर और दिल के दरवाजे हमेशा आपके लिए खुले हैं.

उन्होंने कश्मीरी छात्रों पर हो रहे हमले को भी शर्मनाक बताया.

देखते ही देखते कश्मीरी युवाओं के समर्थन में एक बड़ा तबका खड़ा हो गया और ट्विटर पर   #KashmiriStudent ट्रेंड करने लगा. कई नामचीन लोग इसके समर्थन में आये.

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बिहार रेल हादसा:- जोगबनी से दिल्ली जा रही सीमांचल एक्सप्रेस पटरी से उतरी अब तक 8 लोगों के मरने की खबर।

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बिहार के वैशाली जिले में रविवार तड़के बड़ा रेल हादसा हो गया। जोगबनी से दिल्ली के आनंद विहार जा रही सीमांचल एक्सप्रेस सहदेई बुजुर्ग के पास पटरी से उतर गई। हादसे में अब तक आठ लोगों के मरने की सूचना मिली है, हालांकि रेल प्रशासन ने सात की मौत की पुष्टि की है। करीब दो दर्जन यात्री घायल बताए जा रहे हैं। दुर्घटना टूटी पटरी पर ट्रेन के गुजरने के कारण हुई। ऐसे में तोड़फोड़ की आशंका से इनकार नहीं किया सकता। ट्रेन में कुंभ स्नान के लिए जा रहे यात्रियों की भीड़ ज्‍यादा थी। दुर्घटना को लेकर रेलवे ने हेल्‍पलाइन नंबर जारी किए हैं।
दुर्घटना के बाद राहत व बचाव कार्यों को लेकर रेल मंत्री पीयूष गोयल लगातार रेलवे बोर्ड के संपर्क में हैं। उन्‍होंने रेल यात्रियों की मौत पर संवेदना प्रकट की है। साथ ही घायलों के शीघ स्‍वस्‍थ होने की कामना की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने भी इस दुखद घटना को लेकर शोक प्रकट किया है।

मिली जानकारी के अनुसार ट्रेन तड़के 3.52 बजे मेहनर रोड से गुजरी थी। इसके बाद करीब 3.58 बजे सहदेई बुजुर्ग के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गई। रेलवे के अनुसार दुर्घटना का कारण पटरी का टूटा होना था।
ट्रेन के 11 डिब्बों के पटरी से उतरने की खबर है। इनमें से तीन स्लीपर (एस-8, एस-9 और एस-10) हैं। एक जनरल कोच और एक एसी कोच (बी-3) भी पटरी से उतरे हैं। हादसे में एक डिब्बा पूरी तरह से पलट गया।

हादसे के बाद सहदेई बुजुर्ग स्टेशन पर एनडीआरएफ टीम पहुंची गई। क्रेन की मदद से ट्रेन के डिब्बों को काटकर यात्रियों को निकाला गया। सूचना मिलने पर वैशाली डीएम राजीव रौशन और एसपी मानवजीत सिंह ढिल्लों भी पहुंचे। हालांकि, राहत व बचाव में विलंब के कारण भड़के लोगों ने पथराव भी किया। सुरक्षा बलों ने मुश्किल से स्थिति को नियंत्रित किया। ,
मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख मुआवजा की घोषणा
रेल मंत्रालय ने मृतकों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा कर दी गई है। गंभीर घायलों को एक लाख तथा अन्‍य घायलों को 50 हजार रुपये के मुआवजे का ऐलान कर दिया गया है।

मरने वालों के बिहार व पश्चिम बंगाल के तीन-तीन की पहचान
मरने वालों में खगड़िया के तीन तथा पश्चिम बंगाल के तीन यात्रियों की पहचान कर ली गई है। मृतक सुदर्शन दास (60), इलचा देवी (66) और इंदिरा देवी (60) बिहार के खगड़िया के रहने वाले थे, जबकि शायदा खातून (40), अंसार आलम (19) और शमशुद्दीन आलम (26) पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे। एक अन्‍य शव की पहचान अभी तक नहीं की जा सकी है।

इस बीच रेलवे ने हेल्‍पलाइन नंबर जारी कर दिए हैं। राहत बचाव कार्य के लिए सोनपुर और बरौनी से ART टीम को रवाना कर दिया गया है। हादसे के बाद बछवाड़ा-हाजीपुर सिंगल लाइन पर परिचालन रद कर दिया गया है।
दुर्घटना के संबंध में जानकारी लेने के लिए पूर्व मध्य रेल ने हेल्पलाईन नंबर जारी किए हैं। इन नंबरों पर फोन कर पीड़ितों के बारे जानकारी ली जा सकती है।
पटना- 06122202290, 06122202291, 06122202292, 06122213234
सोनपुर- 06158-221645
हाजीपुर- 06224-272230
बरौनी- 06279-23222
कटिहार- 9473198026

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आगरा में रेंगती नागरिकता, पुणे मे तेलतुम्बडे को लेकर चुप नागरिकता

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अब आपको याद भी नहीं होगा कि प्रधानमंत्री की हत्या की कथित साज़िश में गिरफ्तार सुधा भारद्वाज जैसों के साथ क्या हो रहा होगा? मीडिया और राजनीति आपके सामने आतंकवाद के ख़तरे परोसते रहे। पहले बताया कि आतंकवाद के लिए एक खास धर्म के लोग ज़िम्मेदार हैं। एक दुश्मन का चेहरा दिखाया गया। फिर अचानक आपके ही बीच के लोगों को उसके नाम पर उठाया जाने लगा।

आनंद तेलतुम्बडे पुणे से मुंबई जा रहे थे ताकि अगली सुबह हाईकोर्ट में अपनी अग्रिम ज़मानत की याचिका दायर कर सके। पुणे की पुलिस भोर बेला में 3 बज कर 30 मिनट पर एयरपोर्ट से गिरफ्तार कर लेती है। सुबह होती है और उसी कोर्ट में बहस होती है जिसने एक दिन पहले आनंद की अग्रिम ज़मानत याचिका रद्द कर दी थी। आनंद के वकील कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने 14 जनवरी को आदेश दिया था कि 11 फरवरी तक आनंद की गिरफ्तारी नहीं हो सकती है। इसके बाद भी पुणे की पुलिस गिरफ्तार कर लेती है। आनंद के वकील कहते हैं कि यह गिरफ्तारी अवैध है। कोर्ट ज़मानत दे देती है। आनंद तेलतुम्बडे बाहर आ जाते हैं।

आख़िर एक पुलिस अवैध तरीके से काम करने के लिए क्यों उतावली है? प्रोफेसर अपूर्वानंद ने ठीक लिखा है कि क्या यह उद्वेलित करने वाली बात नहीं है। क्या आनंद आतंकवादी हैं? हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस की खबर याद कीजिए। दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधर ने गौतम नवलखा के मामले में संरक्षण देने का फैसला दिया तो सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम में उनके तबादले की दो-दो बार कोशिश हुई मगर कुछ जजों के एतराज़ से टल गया। क्या आप वाकई ऐसा भारत चाहते हैं जहां इस तरह की ख़बरों से आप सामान्य होने लग जाएं?

आनंद तेलतुम्बडे पर भीमा कोरेगांव की रैली के बाद हुई हिंसा और प्रधानमंत्री मोदी की कथित हत्या की साज़िश का आरोप है। इसी आरोप में सुधा भारद्वाज गिरफ्तार हैं।गौतम नवलखा आरोपी हैं।आनंद तेलतुम्बडे तो भीमा कोरेगांव की सभा में गए भी नहीं थे। बल्कि दि वायर में लिखा था कि ऐसे आयोजनों की वैचारिक दिक्कतें क्या हैं। दक्षिणपंथी नेता संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे पर भी इसी मामले में हिंसा भड़काने के कथित आरोप लगे थे मगर इन दोनों को बिना पूछताछ के बरी कर दिया गया।

प्रोफेसर आनन्द तेलतुम्बडे आई आई एम अहमदाबाद के छात्र रहे हैं। आई आई टी खड़गपुर में प्रोफेसर रहे हैं। पेट्रोनेट इंडिया के सीईओ रहे हैं। गोवा इन्स्टिट्यूट आफ मैनेजमेण्ट में ‘बिग डाटा एनालिटिक्स’ के विभाग प्रमुख हैं। आनंद ने 26 किताबें लिखी हैं। उनके पक्ष में आई आई टी खड़गपुर के 120 से अधिक छात्रों और प्रोफेसरों ने पत्र लिखा है। आई आई एम अहमदाबाद और आई आई एम बंगलुरू के प्रोफेसरों और छात्रों ने लिखा है।

कानून अपना काम करेगा की आड़ में फर्ज़ी केस में फंसाना कौन सी बड़ी बात है। मगर यह खेल इतना बढ़ जाए कि जहां नागरिक मात्र प्यादा बन कर रह जाए तो ऐसी स्थिति को मंज़ूरी देने से पहले क्या आपने ठीक से सोच लिया है?

गांधी के पोस्टर पर बंदूक चला कर फिर से मारने का अभ्यास करने और उनकी हत्या के बाद जश्न का सुख प्राप्त करने वालों को पुलिस पकड़ नहीं पाई। मगर राज्य की नीतियों की आलोचना करना, समीक्षा करना, अलग राजनीतिक राय रखना अब आपको आतंकवादी, भारत विरोधी बनाने के लिए काफी है। दि प्रिंट की उस ख़बर को भी आपने अनदेखा कर दिया होगा कि खुफिया विभाग ने रिपोर्ट तैयार की है कि अशोका यूनिवर्सिटी, जिन्दल यूनिवर्सिटी और अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में मोदी विरोधी बातें होती हैं।

क्या आपने ऐसी ही भारत चाहा था? क्या आप वाकई चाहते थे कि क्लास रूप में खुफिया विभाग के कैमरे लगे हों? मैं समझ सकता हूं कि आपमें विरोध करने की शक्ति नहीं होगी। आपको डर लगता होगा। कहीं आपको पुलिस न उठा ले। ट्रोल सेना आप पर हमला न कर दे। मैं समझ सकता हूं कि आप इन बातों के विरोध और अपने प्रिय नेता के प्रति आंख बंद कर समर्थन में फर्क नहीं कर पा रहे हैं।

मैं अब भी यकीन करना चाहूं कि भारत के लोगों को अपने नागरिक होने के अधिकार से बहुत प्यार होगा। यह नागरिकता किसी देवी देवता से नहीं मिलती है। संविधान से मिलती है। फिर भी जब नागरिकों को इस तरह दुर्बलतम स्थिति में देखता हूं तो दुख होता है। आपका चुप रहना एक एक कर आपको उन अधिकारों से अलग करता जाता है जिसे संविधान ने दिया है। आप ख़ुद को संविधानविहीन बनाते जा रहे हैं।

आगरा के आलू किसानों ने अपनी एक तस्वीर भेजी है। वे अपनी हालत पर जनता और सरकार की नज़र चाहते हैं। यह दृश्य हम सभी की नागरिकता की हार है। क्या राज्य की क्रूरता के प्रति आपका समर्थन इस कदर बढ़ चुका है कि आप अपनी नागरिकता ही दांव पर लगा देना चाहते हैं? क्या आप रेंगना चाहते हैं?

साभार रविश कुमार के फेसबुक पेज से

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