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बीट विशेष

RSS संचालित स्कूल में मासूम बच्चों से पूछा जा रही उसकी जाति, पिता ने किया फेसबुक पोस्ट

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कागज़ के फूलों से पूछी जा रही उसकी खुशबू की जाति !

गुरूजी, आखिर क्यों पूछते हो बच्चो से उनकी जाति ?

मासूम बच्चो के कोमल मनमस्तिष्क में भरी जा रही जाति का जहर

आनंदराम ढांढनिया सरस्वती विद्या मंदिर भागलपुर में अनोखा कारनामा

भागलपुर के आनंदराम ढांढनिया सरस्वती विद्या मंदिर में छोटे छोटे बच्चो से उसकी जाति पूछी जा रही है . यह कारनामा और कोई नहीं खुद स्कूल के क्लास टीचर कर रहे है… जिसे स्कूल में बच्चे आचार्य जी कह कर सम्बोधित करते है, शनिवार को अंतिम पीरियड में क्लास में बच्चो से क्रमवार तरीके से उसकी जाति पूछी गयी …कई बच्चो ने ठीक से जबाब से दे दिया लेकिन जब पांचवी में पढ़ने वाली मेरी बिटिया तनिष्का सिंह से जब यह सवाल पूछा गया तो वह सही जबाब नहीं दे सकी ,,उसने अपना नाम बताया तनिष्का सिंह तो क्लास टीचर ने कहा भूमिहार हो ? मेरी बेटी ने कहा ये क्या होता है ,, मैं नहीं जानती , क्लास टीचर ने कहा ,,, स्कूल आईडी दिखाओ-जहा नाम लिखा था – तनिष्का सिंह गहलौत . क्लास टीचर ने कहा – बाबू साहब हो ,,,मेरी बिटिया ने कहा – नहीं जानते सर.. राजपूत हो … बिटिया ने कहा नहीं जानते सर,, मेरे पापा को pata होगा,? क्लास टीचर ने आईडी कार्ड पर मेरा नाम लिखा देखा, कहा – सोमनाथ आर्य,, जाति समझ में नहीं आया ,,, तो बोले क्या करते है पापा ? बिटिया बोली – जौर्नालिस्ट है? क्लास टीचर ने कहा सोमवार को जाति पता कर आना,…
बिटिया जब घर आयी तो बोली – पापा मैं कौन सा कास्ट हूँ .मैंने कहा क्यों ? उसने कहा क्लास टीचर ने पूछा है… मैंने सिलसिलेवार तरीके से पूरी जानकारी ली. फिर स्कूल फ़ोन लगाया ,,,मैंने सवाल किया – छोटे बच्चो से उनकी जाति क्यों पूछी जा रही है, जबाब मिला,पटना से एक फॉर्म आया है,उसके लिए जाति पूछना अनिवार्य है … मैं अपने बच्चो को उसकी जाति बता दू या स्कूल जाकर उसके क्लास टीचर से मिलू ? मार्गदर्शन करे ? …… बच्चों से उसकी जाति पूछने वाले क्लास टीचर का नाम है ,,गोपाल आचार्य जो गणित पढाते है.

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बीट विशेष

डॉक्टर कफील की मेहनत बताती है कि अगर हम सचमुच संजीदा होते तो कई बच्चों की जान बच सकती थी।

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बिहार: मुजफ्फरनगर त्रासदी देश मे हर एक सजीव और संवेदनशील व्यक्ति के आंखों में आंसू ला सकता है। चश्मदीद की मानें तो अस्पताल का मंजर भयावह है, चारो तरफ मौत का मंजर, बेबस मा बाप की चीख पुकार और अस्पताल प्रबंधन को मोह चिढ़ाती वहां गंदगी का अम्बार किसी के मन को विचलित कर सकता है।

ऐसे माहौल जब वहां का प्रशासन बेबस और डॉक्टर लाचार नज़र आ रहे थे तभी वहाँ आत्मविश्वास से लबरेज एक इंसान फरिश्ते की तरह वहां पहुँचा और दिन रात अपने मेहनत से सैकड़ों बच्चों और उनके मा बाप को इस भयानक बीमारी से न सिर्फ बचाने के मुहीम में जुट गया बल्कि लोगों से चंद मांग कर उनके लिए दवाई और डॉक्टरों की व्यवस्था की, जिसका नाम है डॉक्टर कफील खान।

जी हां हम उसी डॉक्टर कफील की बात कर रहे हैं जिनका नाम सब से पहले गोरखपुर के ऑक्सीजन हादसे के बाद मीडिया में आया, वही डॉक्टर कफील जिसने वहां भी भगवान बन कर अपने बूते ऑक्सीजन की व्यवस्था कर कई घर के चिराग को बुझने से बचाया, वही डॉक्टर कफील जिसे राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित करने के वजाय सबके सामने जलील किया गया,वही डॉक्टर कफील जिन्हें अपने नेक काम के बजाय झुठे आरोप में फ़सा कर उन्हें जेल भेज गया।

पर कहते हैं ना जो इंसान दिल से जितना नेक होता है उसकी सच के लिए लड़ने की हिम्मत पहाड़ से ज्यादा मजबूत भी होता है और यही साबित किया डॉक्टर कफील ने, अपने हक और अधिकार के लिए वो लाडे और सर्वोच्च न्यायालय तक गए और कानून ने इनके पक्ष में फैसला दिया।

मुजफ्फरपुर त्रासदी में जिस तरह दिन रात मुफ्त कैम्प लगा कर डॉक्टर कफील बच्चों का इलाज कर रहे है ये बताता है कि जहां एक तरफ डॉक्टर के ऊपर लोगों का भरोसा काम हो रहा है वहां ऐसे भी लोग है जो दिन रात गर्मी और बारिश की परवाह किये बिना जान सेवा में लगे हुए हैं।

आज डॉक्टर कफील ने प्रेस रिलीज के जरिये एक बार फिर अपनी बात अवाम तक पहुचने की कोशिश कर रहे हैं जो इस प्रकार है।

Press release
Muzaffarpur chamki bimari encephalitis fact finding report dated 23/06/19

चमकी बीमारी से बिहार में हुईं २०० से ज़्यादा मौतों से पूरा भारत व्यथित है चमकी बीमारी के कारक का पता नहीं हो पाया है पर इसके लक्षण उत्तर प्रदेश के मस्तिष्क ज्वर जैसे ही हैं अंतर केवल इतना है की उत्तर प्रदेश में मस्तिष्क ज्वर का प्रकोप वर्षा होने पर पाया गया है और बिहार का चमकी बीमारी अत्यधिक गर्मी में घातक होती है .

बिहार का मुआयना करने के बाद कुछ बातें चमकी बीमारी के बारे में समझ आयीं
१-केवल लीची खाने से ही चमकी बीमारी नहीं हो रही और भी कारण हैं क्योंकि बहुत से माता पिता ने बताया कि उन्होंने बच्चें को लीची नहीं खिलायें थी
२- अगर जल्द से जल्द इलाज स्टार्ट करा दिया जाए तो चमकी बीमारी का इलाज संभव है
३- बीमारी से ज़्यादा सरकारी अव्यवस्था बच्चों की मृत्यु का कारण है .श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज सरकारी दुर्व्यवस्था का उदाहरण है डॉक्टर /नर्स की कमी है ,ज़रूरी दवाई की क़िल्लत है ,एक एक बेड पर ३-३ मरीज़ों का इलाज चल रहा है ,गंदगी का अंबार है .
बिहार की प्राथमिक चिकित्सा बेहद ख़राब हालत में है .
४- जागरूकता अभियान ज़ोर शॉर से चलाने की आवश्यकता है

डॉक्टर कफ़ील खान मिशन स्माइल फ़ाउंडेशंज़ तथा इंसाफ़ मंच के सौजन्य से पिछले एक हफ़्ते में मुज़फ़्फ़रपुर बिहार में ७ चमकी बीमारी जाँच शिविर में क़रीब १५०० बच्चों की जाँच कर और उन्हें दवाइयाँ मुफ़्त दी गयी
पेरेंट्स को चमकी बीमारी के लक्षण और बचाव के तरीक़ों से अवगत कराया गया
यह जाँच शिविर दमोदरपुर ,चैनपुर बाँगर , चकिया पूर्वी चंपारन , नीम चौक ,नथुनी चौक सुमेरा, मेकरी मुर्रा टोला , अली नेउरा में लगाया गया

7 गाँवों में चौपाल लगा करा चमकी बीमारी के बारे में जानकारी दी गयी सभी परिवारों को बुखार नापने का डिजिटल थर्मामीटर और ORS भी निशुल्क दिया गया .
२२/०६/१९ के कैम्प मे कन्हैया कुमार जी ने उपस्थित होकर अपना योगदान देने का वादा किया |

डाक्टरो की टीम में डाक्टर कफील खान के आलावा डा एन आजम,डाo आशीष गुप्ता ,डॉक्टर अरशद अंजुम शामिल थे .इंसाफ मंच बिहार के उपाध्यक्ष जफर आज़म, कामरान रहमानी, दानिश, धरामदेव यादव ,चंदन पासवान ,ऐजाज,सोनू तिवारी तथा पिंटू गुप्ता का भी योगदान सराहनीय रहा

चमकी बुखार से बच्चो को बचाने के लिऐ बच्चो को
1- धुप से दुर रखे।
2-अधिक से अधिक पानी का सेवन कराऐ।
3-हलका साधारण खाना खिलाऐ ,बच्चो को जंक फुड से दुर रखे।
4-खाली पेट लिची ना खिलाऐ।
5-रात को खाने के बाद थोरा मिठा ज़रूर खिलाऐ।
6-घर के आसपास पानी जमा न होने दे ।किटनाशक दवाओ का छिरकाओ करे।
7-रात को सोते समय मछर दानी का ईस्तेमाल करे ।
8- पुरे बदन का कपड़ा पेहनाऐ।
9-सड़े गले फल का सेवन ना कराऐ ।ताज़ा फल ही खीलाऐ।
10- बच्चो के शरीर मे पानी की कमी ना होने दें।अधिक से अधिक बच्चो को पानी पीलाऐ ।

लक्षण :-

बच्चो को –
1-अचानक तेज बुखार आना।
2-हाथ पेर मे अकड़ आना/टाईट हो जाना ।
3-बेहोश हो जाना।
4-बच्चो के शरीर का चमकना/शरिर का कांपना ।
5-शरीर पे चकत्ता निकलना ।
6-गुलकोज़ का शरीर मे कम हो जाना ।
7-शुगर कम हो जाना। ईत्यादि

मुख्यतः तीन विन्दु उभरकर सामने आए जिसपर तत्काल पहलकदमी की आवश्यकता है.

1. *आईसीयू में बेड संख्या 200 करना:* अस्पताल में बच्चों का 14 बेड का पीआईसीयू था, जिसे अभी बढा़कर 50 किया गया है. लेकिन अभी भी अस्पतामल में 96 बच्चे भर्ती हैं. इसका मतलब यह है कि एक बेड पर दो बच्चे हैं. सुपटेंडेंट ने कहा कि यदि इसे बढ़ाकर 200 बेड कर दिया जाए तो सभी बच्चों को राहत मिल सकती है. माले राज्य सचिव ने कहा कि 200 बेड वाले आईसीयू करने में आखिर सरकार का क्या परेशानी हो रही है? इसे तत्काल किया जाना चाहिए.

2. *प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर डाॅक्टर, दवा व एंबुलेस:* दूसरे सुझाव में डाॅक्टरों की टीम ने बताया कि प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेंद्रों की स्थिति ठीक किया जाना चाहिए और वहां बड़ी संख्या में बच्चे के डाॅक्टर बहाल किए जाने चाहिए. यदि 3 घंटे के भीतर बच्चे स्वास्थ्य केंद्र पर पहूंच जाते हैं, तो उन्हें बचाना ज्यादा आसान हो जाएगा. केंद्रों पर दवा व एंबुलेस का भी प्रबंध होना चाहिए.

3. *साफ पानी, ग्लूकोज लेवल मेंटेन रखना:*
तीसरे सुझाव में कहा कि बीमारी के स्रोत पर हमला किया जाना चाहिए. सरकार को इस बात का उपाय करना चाहिए कि दवा का लगातार छिड़काव होता रहे और साफ पानी की व्यवस्था हो. यदि बच्चों का ग्लूकोज लेवल मेंटन कर लिया जाए और इसके लिए भोजन की उचित व्यवस्था हो तो इस महामारी पर रोक लगाई जा सकती है.

कफील खान ने ने आगे कहा कि अब तक 700 इस बीमारी से ग्रसित हो चुके है और 200 से ज़्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है. मृत्यु की दर 25 प्रतिशत है.

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बीट विशेष

कम्युनिस्टों ने जब लालू जी को मुख्यमंत्री बनने में सहयोग दिया तब उनको अहीर नही सामाजिक न्याय का मसीहा समझा

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कम्युनिज्म में सुधार की पूरी संभावना है। इसलिए खुल के आलोचना भी की जा सकती है। लेकिन सीपीआई या कम्युनिस्ट मूवमेंट की आलोचना से पहले थोड़ा अध्ययन जरूर कर लेना चाहिए; इसका इतिहास समृद्ध है। लफ्फाजी इधर नहीं चलेगा।

मंडल** के चेलों/अम्बेडकरवादियों को सीपीआई के शीर्ष पर भूमिहार नेताओं होने से तकलीफ है। हमें भी है। हम इसको लेकर पार्टी के भीतर स्ट्रगल में हैं। आइये इस स्ट्रगल में साथ दीजिये।

हो सके तो सपा बसपा राजद और बीजेपी के नेताओं से भी पूछियेगा कि वहां सभी जातियों की नुमाइंदगी क्यों नहीं हैं। महिलाएं क्यों नहीं है। बीजेपी में अल्पसंख्यक क्यों नहीं है? शायद इन पार्टियों में ये सवाल पूछने की गुंजाइश ही नहीं है। लेकिन सीपीआई के नेताओं से जरूर पूछा जा सकता है।

एक बार यूं हुआ कि बिहार में सीपीआई के आधे दर्जन यादव सरनेम वाले विधायक एक साथ राजद में शामिल हो गये। कई लालू सरकार में मंत्री भी बनाये गए। वैसे ही जैसे कम्युनिस्ट नेता भोला सिंह जीवन के उत्तरार्ध में बीजेपी के टिकट से चुनाव लड़े और बेगूसराय से सांसद बने।

ऐसा होता है,कोई कभी भी बदल सकता है। जब तक कोई ठीक है उसका साथ दिया जाना चाहिए।

सभी पार्टियों में दलबदल सामान्य सी बात हो गयी है। शाम में कमल के साथ होते हैं तो सुबह में हाथ के साथ और अगर वहां भी बात नहीं बने तो लालटेन थामने में भी कोई गुरेज नहीं रखते हैं। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी में दलबदल नहीं के बराबर है। इसलिये कम्युनिस्ट पार्टियां चुनाव के समय दूसरे दलों के असंतुष्टों को टिकट देने से परहेज रखती है। नही तो चुनाव में दो चार सीट लाना कोई बड़ी बात नहीं है।

सीपीआई ने ही पहली बार लालू यादव का समर्थन करके उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था। तब बिहार में सीपीआई विधायकों की ठीक ठाक संख्या थी। तब शायद सीपीआई के ‘भूमिहार’ नेताओं ने लालू को अहीर नहीं सामाजिक क्रांति का वाहक माना होगा।

बहुजनों के लिए आवाज उठाने वालों में ज्यादातर सवर्ण ही रहे हैं। सामाजिक बदलाव के शुरुआती दौर में अपने समाज के विरोध में जाकर प्रेमचंद, दिनकर, भगत सिंह जैसे हजारों नाम हैं जिन्होंने पिछड़ों के लिए आवाज उठाई। जिनके लिए आज जातिसूचक शब्द इस्तेमाल होने लगा है। तब इन महापुरुषों ने जाति नहीं देखी। आज भी इसी परम्परा से लोग आ रहे हैं। जो जाति देखकर काम नहीं करते हैं। कम्युनिस्ट भी जाति देखकर काम नहीं करते हैं। बहुत से लोग जाति देखकर काम नहीं करते हैं।

बिहार में जातीय नरसंहार हुआ। सरकार की जिम्मेदारी नरसंहार को रोकना और हत्यारों को सजा दिलवाना था। लेकिन तत्कालीन लालू यादव सरकार (तब सीपीआई ने समर्थन वापस ले लिया था) ने इसको बढ़ावा दिया। नतीजतन एमसीसी ने सवर्णों की हत्या की और रणवीर सेना ने दलितों को मारा। लालू इसे रोक सकते थे। यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है। आखिर हम 2002 के दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को दोषी क्यों मानते हैं?

जातीय संघर्ष के दीर्घकालिक समाधान के लिए भूमिसुधार जैसे फैसले लिए जा सकते थे। लेकिन लालू यादव ने ऐसा करने की बजाय जातीय मारकाट को बढ़ावा दिया। और राजनीतिक फायदे के लिए अपराधियों के संरक्षक बन बैठे। आज शहाबुद्दीन भी जेल में हैं और लालू यादव भी।

इस चुनाव में राजद अगर सीपीआई को समर्थन देती तब भी यही सच होता। कन्हैया को लेकर आपका जातिवाद जाग गया है। जबकि वह बार बार कहा है कि उसकी लड़ाई साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ है महागठबंधन से नहीं। खैर यही एक कम्युनिस्ट नेता की असल परीक्षा होगी।

Kanhaiya Kumar के फेसबुक पोस्ट को देखकर उसके संघर्षों का अनुमान लगा सकते हैं। रोहित वेमुला से लेकर 13 पॉइंट रोस्टर का विरोध आपको दिखेगा।

बेशक आप किसी को भी वोट करें लेकिन समाज में हिंसा और नफरत मत फैलाएं।

कम्युनिस्ट बनने में बहुत तपना पड़ता है। कभी कम्युनिस्ट आंदोलनकारी बनकर देखिये। कम्युनिस्ट मूवमेंट में सिर्फ जाति बता देने से लोग साथ नहीं आते हैं। 100 सवालों के जवाब देने होते हैं।

यही वजह है कम्युनिस्ट विचारधारा को जीनेवाले एक फीसदी लोग नहीं मिलेंगे। कोई जाति, धर्म जैसे पूर्वाग्रहों को छोड़कर कम्युनिस्ट बनता है। कभी कभी लगता है कम्युनिस्ट ही असल माइनॉरिटी हैं। खैर नास्तिक और रैशनल लोग तो और भी कम हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी सीमित संसाधनों में हर किसी के लिए लड़ती भिड़ती रही है।

कम से कम मैंने बिहार में सीपीआई के कैडर को अपना सबकुछ गवां कर काम करते तो देखा ही हूं।

अपनी जमीन बचाने के लिए जितने लोग कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े होंगे, उससे कई गुना ज्यादा लोगों को कम्युनिस्ट मूवमेंट की वजह से जमीन पर अधिकार मिला। लाख कमियों के बावजूद कम्युनिस्ट मूवमेंट जैसा सुलझा और दूरदर्शी आंदोलन कम से कम स्वतंत्र भारत में नहीं हुआ है।

आज ऐसे थोड़े से कम्युनिस्ट विचारधारा को मानने वालों के खिलाफ तमाम जातिवादी/साम्प्रदायिक और कॉरपोरेट दुश्मन बने बैठे हैं।

कम्युनिस्ट के खिलाफ कुप्रचार करने वालों को 100 साल बाद दुनिया कैसे देखेगी, एक बार जरूर सोचियेगा।

लाल सलाम!

लेखक: कुमार गौरव

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बीट विशेष

जो ऊपर हैं वो मग़रूर हैं, जो नीचे हैं वो मजबूर हैं

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Pic Credit: Cartoonstock.com
 हमारी पस्ती का सिर्फ़ एक ही कारण है कि, “जो ऊपर हैं वो मग़रूर हैं, जो नीचे वो मजबूर! ऊपर के लोग अपने से नीचे के लोगों की राय लेना आपनी तौहीन समझते हैं! कोई व्यक्ति अपनी ख़ूबी दिखा ही नहीं सकता अगर आप उसकी अवहेलना ही करते रहेंगे!
उसूल और पाबन्दी, पाबन्दी और सख़्ती, सख्ती और ज़ुल्म के बीच की लाईन बड़ी महीन है जिसकी पहचान होना हुक्मरानों के लिए बहुत ज़रूरी है! एक अच्छे हुक्मरान के लिए यह ज़रूरी है कि उठाए गए सवालों की गहराई में जाएं, ना कि सवाल करने वालों को ही बदनाम करने की कोशिश में लग जाएं!
सीधे पहाड़ की चोटी पर उतरने से पहाड़ पर चढ़ने का तज़र्बा नहीं मिलता! ज़िन्दगी की सीख पहाड़ की चढ़ानो पर मिलती है चोटी पर नहीं! चढानों पर ही तज़ुर्बे मिलते हैं और ज़िन्दगी मँझती है! आप किसी भी सख्स को चोटी पर तो चढ़ा सकते हैं लेकिन अगर उसे चढ़ाई का तज़र्बा नहीं तो यह उसके और आपके मिशन, दोनों के लिए ख़तरनाक होगा!
कोई भी शख़्स अपनी ज़िम्मेवारी में तभी क़ामयाब हो सकता है, अगर वो विश्वासी तथा उत्तरदायी हो और अपने फ़ैसलों के लिए उसे सही हद तक आज़ादी हो! आज़ादी हासिल करने के लिए भी उसी हद तक शिक्षित हो! शिक्षा एक बहुत ही महत्वपूर्ण हथियार है, शिक्षा जितनी ज़्यादा होगा उतनी ही आज़ादी मिल पाना संभव होगा!
लोकतंत्र में आज़ादी पाने के लिए सच्चे रहनुमाओं की ज़रूरत है!और सच्चे रहनुमा वही हो सकते हैं जिनकी जानकारी मुक़म्मल हो! जानकारी तभी मुक़म्मल होगी जब आप शिक्षण तथा प्रशिक्षण को बढ़ावा देंगे! अपने काम को अपना फ़ख्र समझेंगे, जिस काम में यक़ीन हो वही करें वरना दूसरों के विश्वासघात का शिकार बनते रहेंगे!
लेकिन, हमारी सच्चाई यही है कि हम अपने प्रशिक्षित, ईमानदार तथा उपयोगी लोगों को हद दर्जे तक निचोड़ कर छोड़ देते हैं, जिससे वो नाकाम और निकम्मे लोगों से चिढ़ने लगते हैं! अलग-अलग हुक्मरानों से वफ़ा करते-करते हमने अपनी हैसियत खो दी है! मौजूदा हालात ऐसे हो गए हैं कि हमे अपने ही समाज से चिढ़ होने लगी है और हम तकलीफ़ में रहने लगे हैं, लेकिन फिरसे उठ खड़े होने को जी चाहता है जब बेंजामिन फ्रेंक्लिन की यह बात नज़र पे आती है!
“जिन बातों से तकलीफ़ होती है, उनसे ही तालीम भी मिलती है”!
लेखक:शाहनवाज़ भारतीय, शोधकर्ता, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली!
नोट:ऊपर लिखी गई बातों में अधिकांश बातें डॉ. ए. पी. जे अबुल कलाम की हैं जो आज के नेताओं को भी आईना दिखाती हैं अगर वो देखना चाहें तो!
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