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समाज

तोगड़िया का रोना और 13 साल पहले शहीद हुए कामरेड महेंद्र सिंह की याद

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चमोली: क्या इन दोनों बातों में कोई साम्य है?जी नहीं,एक एनकाउंटर का नाम भर, सुनकर थरथराते हुए आंसू बहाने वाले और बहादुरी से मौत का मुकबला करने वाले के बीच न कोई साम्य हो सकता है,न कोई साम्य है.13 साल के अंतराल के साथ केवल दोनों घटनाओं की तिथियों में साम्यता है.

प्रवीण तोगड़िया जिस दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस में टसुए बहा रहे तो वो दिन था 16 जनवरी 2018.कामरेड महेंद्र सिंह ने जिस दिन शहादत का वरण किया,वो तारीख थी-16 जनवरी 2005. कामरेड महेंद्र सिंह एकीकृत बिहार और बाद में झारखंड की विधानसभा में भाकपा(माले) के विधायक थे.1990 में पहली बार विधायक चुने जाने के बाद वे अपने जीवन के अंतिम दिन तक विधायक चुने जाते रहे.झारखंड की विधानसभा में आधिकारिक रूप से विपक्ष के नेता का दर्जा उन्हें हासिल नहीं था.पर विपक्ष के नेता की भूमिका उन्होंने विधानसभा के भीतर और बाहर बखूबी अदा की.

 झारखंड सरकार ने विधायकों की तनख्वाह बढ़ाने की कोशिश की तो उन्होंने सदन में उसका विरोध किया.विधानसभा में विभिन्न विभागों द्वारा अपना बजट पास कराने के लिए बांटे जाने वाले तमाम उपहारों का उन्होंने हमेशा विरोध किया.विधायक निधि के कामों में कौन विधायक कितना कमीशन खाता है,इसकी सूची तक महेंद्र सिंह विधानसभा में ले आये.झारखण्ड विधानसभा में पेश की गई इस सूची में तमाम अन्य विधायकों के अलावा तब के विधानसभा अध्यक्ष द्वारा लिए गए कमीशन का भी ब्यौरा था. ऐसा व्यक्ति जो सत्ता की हर काली करतूत का खुलासा कर दे,उसे खामोश करने का,हत्या के अलावा सत्ता के पास और क्या रास्ता हो सकता है?और यही महेंद्र सिंह के साथ हुआ.16 जनवरी 2005 को उनकी हत्या कर दी गयी.जन आंदोलन के दबाव में उनको हत्या की सी.बी.आई. जांच की घोषणा हुई पर हत्यारे कानून की गिरफ्त से बाहर ही रहे.सरकारी तोता मालिकों से पूरी वफादारी जो निभाता है!

लेकिन यहां तोगड़िया के प्रेस कॉन्फ्रेंस में रोने पर महेंद्र सिंह का जिक्र क्यों किया जा रहा है?यह जिक्र एक खास फर्क को रेखांकित करने के लिए है,जो आगे की पंक्तियों में समझा जा सकेगा.

 तोगड़िया उनके अनुयायियों के लिए शेर थे,जो जम कर दूसरे धर्म वालों के खिलाफ दहाड़ते रहते थे.उनकी दहाड़ ने अक्सरहां समाज मे वैमनस्य की आग फैलाने का काम ही किया है.साम्प्रदायिक सौहार्द के विघटन और दंगाई-उन्मादी मानसिकता के प्रसार को तोगड़िया के अनुयायी उनकी दहाड़ की सफलता के मानक के तौर पर देखते रहे हैं.जितनी अधिक आग,हिंसा,घृणा-दहाड़ उतनी सफल.

लेकिन समाज में जम कर आग फैलाने वाला यह स्वयम्भू शेर,एक दिन आंखों में गंगा-जमुना की धार लिए पत्रकारों से कहता है कि मुझे एनकाउंटर में मारने की साजिश हो रही है.तब बरबस मन मे जिज्ञासा पैदा होती है कि यह कैसा शेर है,जो मारे जाने की काल्पनिक धमकी से थरथर कांपता हुआ पहले होश खो बैठा और अब आंसू बहा रहा है?

ठीक इसी मौके पर कामरेड महेंद्र सिंह की हत्या का वाकया याद आया.महेंद्र सिंह विधानसभा के चुनाव प्रचार में एक सभा संबोधित करके निकल रहे थे.अचानक दो बंदूकधारी मोटरसाइकिल पर आए.उन्होंने पूछा-महेंद्र सिंह कौन है?अज्ञात बंदूकधारियों को देखते ही उनकी मंशा समझ ली गयी.पर महेंद्र सिंह बिना किसी भय के बोले-मैं महेंद्र सिंह हूँ. हत्यारों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां दागी और फरार हो गए.

सत्ता जब चाहती हो कि समाज मे आग लगे तो फिर उस सत्ता की छांव में,जेड सिक्युरिटी की सुरक्षा में गर्जन-तर्जन करके समाज मे कमजोरों के घर और उनकी जिंदगियां जलाना बहादुरी नहीं कायरता है,तोगड़िया जी.आप यह कायराना कृत्य बहादुरी समझ कर करते रहे और सत्ता ने जरा आंखें तरेरी तो सारी हेकड़ी धरी रह गई.

 प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनकाउंटर किये जाने की कल्पना भर से रोता तोगड़िया और हत्यारों के सामने-मैं महेंद्र सिंह हूँ-का घोष करके शहादत का वरण करते महेंद्र सिंह.ये दक्षिण और वाम की दो प्रतिनिधि तस्वीरों हैं.और यही उनके बीच का असली फर्क भी है. |

इन्द्रेश मैखुरी

(ये लेखक के अपने विचार है, लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है और वामपंथ विचाधारा में यकीन रखते हैं)

देश

गांधी शांति प्रतिष्ठान में हत्यारे ब्रहमेश्वर मुखिया पर कार्यक्रम, सोशल मीडिया पर बवाल

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पिछले दिनों गांधी शांति प्रतिष्ठान में हत्यारे ब्राहमेश्वर मुखिया की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लोग सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ लिख रहे हैं। हालांकि, संस्थान की तरफ से सफाई भी आ गयी है।

मुकेश ने लिखा है –

सरकारी गांधीवादी संस्था-गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली ने गांधी के हत्यारों को महिमामंडित करने वाले संगठन विश्व हिंदू परिषद को अपने परिसर में कार्यक्रम की इजाजत दी। और जितने दिनों तक परिषद का कार्यक्रम चलता रहा, उतने दिनों तक के लिए गांधी समाधि का गेट आमलोगों के लिए बंद कर दिया गया। इसका विरोध हुआ। विरोध जायज था। गांधी समाधि को दो दिनों तक बंद रखा जाना और गांधी के नाम पर बनी संस्था में साम्प्रदायिक नफरत फैलाने व गांधी के हत्यारे को महिमामंडित करने वाले संगठन को कार्यक्रम की अनुमति दिया जाना गांधी का अपमान करने जैसा है।

अभी यह मामला थमा भी न था कि मठाधीश गांधीवादी संस्था-गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा कुख्यात रणवीर सेना के सरगना ब्रह्मेश्वर मुखिया को महिमामंडित करने वालों को कार्यक्रम की अनुमति देने का मामला सामने आ गया। यह वही ब्रह्मेश्वर मुखिया है, जिसके द्वारा बनाये गए संगठन -रणवीर सेना ने बिहार में एक दर्जन से ज्यादा नरसंहार मचाया था। जिसमें दो सौ से अधिक दलितों-वंचितों की निर्मम हत्या की गई थी। इस मामले के सामने आने पर संस्था की ओर से सफाई भी पेश की गई। सरकारी निधि पर चलने वाली संस्था ने फंड की कमी का रोना भी रोया।

सरकारी गांधीवादी और मठाधीश गांधीवादियों के कारनामों पर क्या कहा जाए??
ये संस्थाएं गांधी के कार्यक्रमों-प्रयोगों को आगे बढ़ाने के बजाय ऐसे संगठनों-कार्यक्रमों की आयोजन स्थली में आखिर क्यों तब्दील होती जा रही हैं??
डॉ. लोहिया ने गांधीवादियों को 3 श्रेणियों में विभक्त करते हुए अपने को कुजात गांधीवादी की श्रेणी में रखा था। आज अगर लोहिया जीवित होते तो सरकारी व मठी गांधीवादी संस्थाओं के इन कारनामों पर क्या स्टैंड लेते??

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बीट विशेष

भारत में धर्म का बोझ ओबीसी और दलित अपने कंधे पर ढो रहा है

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शीर्षक- कांवड़ यात्रा और जनेऊ का अंतर्संबंध: मेरठ के विशेष संदर्भ में

प्रस्तावना: मेरे एक मित्र की मेरठ जिले में ड्यूटी लगी थी कांवड़ रुट पर. मैंने उन्हें एक सोशल एक्सपेरिमेंट करने के लिए रिक्वेस्ट किया. यह शोध 2017 में किया गया.

हाइपोथिसिस : कांवड़ यात्रा में जाना सवर्णों ने छोड़ दिया है.

शोध प्रश्न – मेरठ के कांवड़ा यात्रा रूट से पैदल गुजरने वाले भक्त जनेऊधारी हैं या नहीं?

शोध विधि – 500 कांवड़ यात्रियों के सैंपल साइज में जनेऊधारी और गैरजनेऊधारी देखना था. उन्होंने एक जगह पर सिक्युरिटी चेक के नाम पर बैरियर लगाकर खुद चेकिंग की. इसके लिए उन्हें सिर्फ कंधे पर हाथ रखना था. सारा डाटा प्राइमरी है और इंपीरिकल तरीके से इकट्ठा किया गया.

शोध की सीमाएं- 1. डाटा संग्रह में गलती की संभावना इतनी है कि किसी व्यक्ति ने अगर उस खास दिन जनेऊ नहीं पहना है, तो इसका असर डाटा पर पड़ेगा.
2. यह सिर्फ मेरठ के कांवड़ रूट का आंकड़ा है. बाकी जगह अलग डाटा सामने आ सकता है.

निष्कर्ष – आप जानते हैं क्या पता चला? उस सैंपल में एक भी जनेऊधारी नहीं था. इस डाटा से हमारी हायपोथिसिस की पुष्टि होती है कि जनेऊधारी कांवड़ यात्रा पर नहीं जाते. यह धार्मिक कार्य सिर्फ अद्विज जातियां कर रही हैं.

विमर्शः भारत में धर्म का बोझ ओबीसी और दलित अपने कंधे पर ढो रहा है. उस धर्म को, जो उसे सवर्ण जातियों से नीच बताता है. जो उसकी ज्यादातर तकलीफों का कारण हैं. जिसने उसके साधारण नागरिक होने के मार्ग में बाधाएं खड़ी हो गई हैं.

इसे ग्राम्शी “हेजेमनी बाई कसेंट” यानी सहमति से चल रहा वर्चस्ववाद कहते हैं. यह जबरन या दबाव की वजह से काम नहीं करता. नीचे वाला ऊपर वाले को ऊपर वाला मानता, इसलिए जातिवाद चल रहा है.

एक बार दलितों और ओबीसी रीढ़ की हड्डी सीधी करके खड़ा हो गया, तो जातिवाद का खेल खत्म.

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देश

रामराज्य : सीएम की पत्‍नी 22 साल से देहरादून में तैनात और बुजुर्ग शिक्षिका को कर दिया सस्पैंड

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टीचर उत्तरा बहुगुणा पंत के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खुद विवादों में फंसते हुए नजर आ रहे हैं। दरअसल उत्तरा बहुगुणा के तबादले के बीच सीएम की पत्नी की तैनाती से जुड़ी एक जानकारी ने राज्य में अब नई चर्चा शुरू कर दी है। शुक्रवार (29 जून, 2019) को आरटीआई के जवाब में मांगी गई जानकारी के मुताबिक शिक्षा विभाग ने अपने जवाब में बताया है कि सीएम रावत की पत्नी सुनीता रावत भी टीचर हैं। नौकरी शुरू करने के चार साल के बाद उन्होंने अपना तबादला दुर्गम इलाके से देहरादून में करवा लिया। एनबीटी के अखबार में छपी जानकारी के मुताबिक इसके बाद से 22 तक उनका तबादला नहीं हुआ है। चौकाने वाली बात यह है कि साल 2008 में प्रमोशन भी हुआ, फिर तबादला नहीं हुआ।

बता दें कि मुख्यमंत्री के ‘जनता मिलन’ कार्यक्रम में टीचर उत्तरा बहुगुणा और मुख्यमंत्री रावत के बीच बहस का एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें टीचर के बात करने के तरीके से नाराज होकर मुख्यमंत्री उन्हें निलंबित करने और हिरासत में लेने का आदेश देते हुए देखे जा सकते हैं। उनके खिलाफ पुलिस ने शांति भंग के तहत चालान कर दिया था। हालांकि, उसी शाम को ही उन्हें सिटी मजिस्टेट की अदालत में पेश किया गया जहां से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। बाद में पूरे मामले में उत्तराखंड राजकीय राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ ने मामले का संज्ञान लेते हुए कहा कि शिक्षिका के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करने का अनुरोध अधिकारियों से किया जाएगा।

57 वर्षीय उत्तरा के पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि वह बहुत दुखी हैं और कल शाम से ही रो रही हैं। वर्ष 2015 में अपने पति की मृत्यु के बाद से ही वह परेशान चल रही थीं और अपने स्थानांतरण को लेकर शिक्षा विभाग के अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक अपनी गुहार लगा चुकी हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने भी यही सवाल उठाया था। उत्तरा उत्तरकाशी जिले के नौगांव में प्राथमिक विद्यालय में तैनात हैं।

उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षा संघ के महासचिव दिग्विजय सिंह चौहान ने कहा कि संघ इस प्रकरण को लेकर अधिकारियों से वार्ता करने का प्रयास करेगा और अनुरोध करेगा कि उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई न की जाये। चौहान ने कहा कि शिक्षिका 25 वर्षों से दुर्गम स्थान पर कार्यरत हैं और विधवा भी हैं, इसलिए उनकी स्थानांतरण की मांग जायज है जिसे सुना जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षिका द्वारा अपनी मांग के लिए मुख्यमंत्री के सामने प्रयोग की गयी ‘अमर्यादित भाषा’ का वह कतई समर्थन नहीं करते।

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