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बैंकों के भीतर ग़ुलामी की कालकोठरी सीरीज़ 3,”आप बुज़दिल इंडिया चाहते हैं या बहादुर इंडिया ?”

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तीन चार दिन पहले की बात है। एक बैंक का सीनियर अफसर बाज़ार से चूड़ियां ख़रीद लाया अपने नीचे के अफसर को पहनाने के लिए। जुर्म क्या था? अटल पेंशन योजना बेचने का जो दैनिक टारगेट दिया गया था, उसे पूरा नहीं कर पाया था। पूरे बैंक में खड़े उस बैंक कर्मचारी की हालत सोचिए। जो मैनेजर चूड़ियां ख़रीद लाया था उस नालायक के बारे में भी सोचिए कि वह अपनी पत्नी के साथ कैसे बर्ताव करता होगा। पहनाने की नौबत नहीं आई क्योंकि कुछ अफसरों ने दोस्ताना एतराज़ किया।

पिछले दस दिनों में हर राज्य के हर बैंक के सैंकड़ों बैंक कर्मचारियों और अफसरों से बात कर गया हूं। उनकी बातचीत से जो सरकारी बैंकों के भीतर का जो सच जाना है, वो भयावह है। झूठ और फ्राड की बुनियाद पर टिकी आपकी राजनीतिक निष्ठाएं तार तार हो जाएंगी। मुझे सिर्फ एक ही मंज़र नज़र आता है। कोई खदान हैं जहां लाखों कोयला मज़दूरों के होंठ सिल दिए गए हैं। उनकी एक आंख फोड़ दी गई है। लाइन में लगाकर उनसे ग़ुलामी कराई जा रही है।

क्या आप जानते हैं कि मुद्रा योजना के तहत 100, 500 और 1000 रुपये तक के भी लोन दिए गए हैं? क्या सरकार बताएगी कि मुद्रा योजना का ब्रेक अप क्या है? इंफोसिस ने एक सिस्टम बनाकर बैंकों को दिया है। आपको पता भी नहीं होगा कि आप भी मुद्रा लोन के ग्राहकों में गिने जा चुके हैं। होता यह है कि इंफोसिस के दिए सिस्टम में आपका नाम और खाता नंबर एंटर किया जाता है। उसके सामने एक राशि लिख दी जाती है और फिर एक कोड डाल दिया जाता है। कोड डालते ही मुख्य कमांड में रजिस्टर हो जाता है कि किसी ने मुद्रा के तहत लोन लिया है। बाद में उस लिस्ट से आपका नाम हटा दिया जाता है। बैंक को सिर्फ आंकड़ा दिखाने से मतलब है कि कितने लोगों को मुद्रा दिया गया।

ये भी पढ़ें: रुपये की कालकोठरी में काम कर रहे ग़ुलाम बैंकरों की दास्तान- पार्ट 2

मुद्रा के तहत किसी भी राशि का लोन दिया जाता है और वो भी बिना कुछ बंधक रखे। बैंकरों और वित्त को समझने वाले अधिकारियों से बात करते हुए बहुत पहले से पता लग गया था कि मुद्रा के तहत NPA की तादाद बढ़ती जा रही है। इसकी रिपोर्टिंग नहीं होने दी जा रही है। मैनेजरों को टारगेट दिया जा रहा है कि आपको हर हाल में मुद्रा देना है। बैंक अधिकारी किसी को भी लोन देने से डरते हैं इसलिए भी जानबूझ कर देरी करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि लोन लेने वाला डुबा देगा। तब उन पर टारगेट की तलवार चलाई जाती है।

सरकार बताएगी नहीं कि कितने लोन ऐसे हैं जो 10,000 रुपये से कम के हैं, बताएगी भी तो कई तरह के झोल होंगे। किसी भी बैंकर से पूछ लीजिए मुद्रा लोन की क्या हक़ीकत है, वो ऑफ रिकार्ड बता देगा कि कितना बड़ा फ्राड चल रहा है। उन्हें पता है कि जल्द ही ये लोन एन पी ए होंगे और उन सभी को विजिलेंस से लेकर सीबीआई का सामना करना पड़ेगा क्योंकि बिना पात्रता के लोन बांटने का कोई नतीजा भी नहीं आ रहा है। नगण्य प्रतिशत में लोगों ने इसे लेकर बिजनेस खड़ा किया है। अधिकांश पैसा चपत कर गए हैं।

अब आते हैं अटल पेंशन योजना पर। मैं हैरान हूं कि अटल जी के नाम पर बनी योजना को भी झूठ के हवाले किया जा सकता है। राजनीति कितनी क्रूर हो सकती है। बैंकर को ही इस योजना में विश्वास नहीं हैं। वे कहते हैं कि इसका रिटर्न बेकार है। इतना ही पैसा अगर आप फिक्स डिपॉज़िट में रख दें तो ज़्यादा मिल सकता है। मगर बैंकरों को अटल पेंशन योजना बेचने का टारगेट दिया जाता है। उनका रीजनल हेड दिन में पांच बार फोन कर टार्चर करता है कि जब तक पांच या दस अटल पेंशन योजना की पॉलिसी नहीं बिकेगी, ब्रांच बंद नहीं होगा।

ग्राहक जब बैंक आता है तो उसे भरमा कर ज़बरन अटल पेंशन योजना बेची जाती है। ग्राहक और बैंकर के बीच भरोसे का रिश्ता होता है। वो इस भरोसे को दांव पर लगा कर एक बेकार स्कीम ख़रीद लेता है। जिसकी बैंक से कोई सर्विस नहीं मिलती है। बैंकर नई पालिसी बेचने के दबाव में है। अगर दस अटल पेंशन योजना नहीं बिकेगी तो शादी के लिए छुट्टी नहीं मिलेगी। एक मैनेजर को मुश्किल से छुट्टी मिली तो फोन आया कि आपका पचास हज़ार का टारगेट कम हुआ है, वो बेचारा अपनी शादी की ख़रीदारी को छोड़ बैंक गया और काम किया। यह कोई अपवाद नहीं है बल्कि ऐसे लाखों किस्से हैं।

आपने भरोसे से अटल पेंशन योजना ले ली। बहुतों को यह योजना धोखे से भी बेची जा रही है। कई तरह के फार्म के नीचे लिखकर साइन करा लिया जाता है। खाते से प्रीमियम कट जाता है। जिसने अटल पेंशन योजना ली है, उससे बस एक सवाल कीजिए। क्या आपने ख़ुद से ली है या आपको मजबूर किया गया है? अटल बिहार वाजपेयी आज बोलने की स्थिति में होते तो दहाड़ मारते हुए बाहर आते और कहते कि बस करो, मेरे नाम पर मेरे देशवासियों की गर्दन मत दबोचो।

बड़ी संख्या में ग्राहक अटल पेंशन योजना का दूसरा प्रीमियम नहीं भर रहे हैं। बैंकर के पास वक्त नहीं है उन्हें फिर से समझाने के लिए क्योंकि उन्हें नया बेचने के लिए दबाव बनाना है। अगर आप यही आंकड़ा देखेंगे कि कितने लोगों ने अटल पेंशन योजना का दूसरा प्रीमियम भरा है तो पता चलेगा कि बड़ी संख्या में लोगों ने स्कीम को बीच रास्ते में ही छोड़ दिया। इससे बीमा कंपनियों को बड़ा लाभ होता है। आपने अपनी जेब से 300 से 500 रुपये बीमा कंपनी को दे दिए। ये पैसा कंपनी के खाते में गया।

वैसे बीमा पालिसी बेचने का काम बैंक का नहीं है, भारतीय रिज़र्व बैंक इस काम के लिए मना करता है। जब रिज़र्व बैंक के अधिकारी बैंकों के सर्वे पर जाते हैं तो कहते भी हैं मगर उनके जाते ही रीजनल हेड फोन कर धमकाता है कि चुपचाप बीमा बेचो। टारगेट पूरा होने के डर से बैंक कर्मचारी ख़ुद अपने और अपने परिवार के नाम से अटल पेंशन योजना ले रहे हैं। यह तो घोटाला है। दो प्रतिशत की संख्या में बैंकों के ये बड़े अफसर अपने छोटे अफसरों से ग़ुलामी करा रहे हैं। वो यह काम इसलिए कर रहे हैं कि उन्हें कमीशन मिल रहा है। सौ दो ब्रांच पर एक रीजनल हेड होता है। वहां से ऊपर के अफसरों को इस लूट का हिस्सा मिल रहा है। आप यह भी चेक कर सकते हैं।

वे किस चीज़ के दबाव में ब्रांच पर दबाव डाल रहे हैं कि ये पालिसी बेचो। कमीशन या है किसी बादशाह को अपनी बुनियाद में झूठ की ईंटे रखनी हैं।
वे ऐसी पालिसी क्यों बेच रहे हैं जिसमें उनका ही यक़ीन नहीं है। एक बैंकर की बात ठीक लगी। अगर यह पालिसी इतनी दमदार होती तो ग्राहक खुद मांगने आता। मगर उनके अनुभव में एक भी ग्राहक ने ख़ुद से इसकी मांग नहीं की।

बैंकों को भीतर से बर्बाद कर दिया गया है। एक शानदार नौकरी का काडर तहस नहस कर दिया गया है। आप नौजवान अब किस नौकरी का ख़्वाब देखेंगे। यह बैंकों पर हमला नहीं है, आपके भावी सपनों पर हमला हैं। प्रोबेशनर अफसर और बैंक क्लर्क का इम्तहान पास करने वाले मेधावी छात्र होते हैं। एक अच् नौकरी का सपना लेकर वहां जाते हैं तो क्या देखते हैं? पहले ही दिन से यातनाएं की कतार में लगा दिए जाते हैं।

इन बैंकों के लाखों लोगों ने बीजेपी को वोट किया है। यहां भी बीजेपी और संघ के कट्टर समर्थक की ख़ूब तादाद है। वे भी इस यातना से गुज़र रहे हैं। ऐसे कई लोगों ने भी मुझे लिखा है। मुझे गाली देने के लिए माफी मांगी है। मैं उनकी इस ईमानदारी के आगे अपना सर झुकाता हूं। मेरे खजाने में इनकी लिखी चिट्ठियां सोने की तरह रखी हुई हैं। आपको इन बातों पर यकीन न हो तो इस लेख का प्रिंट आउट ले लीजिए। उन समर्थकों के पास ले जाइये। पूछिए कि क्या रवीश कुमार ने इस लेख में झूठ लिखा है? बस उनका चेहरा देखते रहिएगा। ज़ुबान ख़ामोश नज़र आएगी और आंखों से आंसू निकल रहे होंगे।

बीजेपी का कोई भी असली समर्थक होगा, वो अटल जी को बहुत प्यार करता है। उनके नाम पर उसी पर एक दिन ये यातना थोपी जाएगी, सोचा नहीं होगा। मैं ऐसे लाखों भगवा समर्थकों की पीड़ा समझता हूं। उन्होंने किसी राजनीतिक दल का समर्थन कर कोई गुनाह नहीं किया है। लोग राजनीतिक दल का हाथ थामते हैं इसलिए नहीं कि डूब जाएंगे, इसलिए कि इसके सहारे उनके सपने बड़े हो जाएंगे। आज उनके सपनों पर किसी ने जूता रख दिया है।

टारगेट और ट्रासफर की तलवार से बैंकरों की गर्दन काटी जा रही है। आप हैं कि फ़र्ज़ी आंकड़ों के जश्न में डूबे हैं। स्लोगन में स्वर्ग नहीं होता है। कामयाबी के इन स्लोगनों में नरक छिपा है। क्या आप झूठ पर आधारित अपनी जीवन यात्रा पूरी करना चाहते हैं? फिर गीता की सौगंध क्यों खाते हैं, गीता क्यों पढ़ते हैं ?

कभी किसी सरकारी बैंक में ज़रूर जाइये। मैनेजरों क्लर्कों के कंधे पर हाथ रखकर उनका हाल पूछिए। वे नहीं बोलकर भी सब बोल देंगे। एक दिन इन बैंकों को बेच दिया जाएगा, उससे पहले इन्हें निचोड़ा जा रहा है। आपको बताया जाएगा कि ये सरकारी बैंकर नकारे हैं। चोर हैं। आप चोर-चोर कहने लगेंगे और तभी इसका लाभ उठाकर बड़ा डकैत घोड़े पर माल लाद कर गंगा पार कर चुका होगा। आप इन बैंकरों को दासता से निकालिए। इनकी आवाज़ बनिए।

मेरी एक-एक बात सही है। फिर भी अगर आप मुझे गाली देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। मैं कब डरा गालियों से। आई टी सेल की ताकत लगा दीजिए मगर एक मिनट के लिए यह भी सोचिए। जब तेरह चौदह लाख बैंकरों की हालत ग़ुलाम जैसी की जा सकती है तो आपका नंबर भी एक दिन आएगा। क्या आप ऐसा हिन्दुस्तान चाहते हैं? आप बुज़दिल इंडिया चाहते हैं या बहादुर इंडिया चाहते हैं?

नोट- अगर आपकी जानकारी या सहमति के बिना आपसे बैंक ने अटल पेंशन योजना या कोई और योजना बेची है तो अपना संपर्क दें। अगर आप चाहते हैं कि अपना बयान वीडियो रिकार्ड कर भेजें। हम चैनल पर दिखाना चाहते हैं। जय हिन्द। डरिए मत बोलते रहिए। मैं हूं न।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुआ था)

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भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण देर रात होंगे जेल से रिहा

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चंद्रशेखर रावण जी हां पिछले कुछ महीनों से चुनाव के शोरगुल और पढ़ते पेट्रोल और गिरते रूपए के बीच भले ही यह नाम मीडिया से गायब ह गया हो पर लोगों की जहाँ में यह नाम आज भी जर्रोर गूंज रहा होगा.

चंद्रशेखर को बीते साल सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा के बाद गिरफ़्तार कर लिया गया था.

उन पर हिंसा भड़काने के आरोप थे. गृह विभाग की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि रावण की मां की अपील पर विचार करते हुए उन्हें समय से पहले रिहा करने का फ़ैसला किया गया है.

मामले में चंद्रशेखर रावण सहित छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, जिनमें से तीन को पिछले सप्ताह रिहा कर दिया गया था.

पिछले साल 05 मई को सहारनपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन किया गया था.

जिसमें शामिल होने जा रहे युवकों की शोभा यात्रा पर दलितों ने आपत्ति जताई थी और पुलिस बुला लिया था.

विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों तरफ से पथराव होने लगे थे, जिसमें ठाकुर जाति के एक युवक की मौत हो गई थी.

इसके बाद शिमलाना गांव में जुटे हज़ारों लोग करीब तीन किलोमीटर दूर शब्बीरपुर गांव आ गए.

जहां भीड़ ने दलितों के घरों पर हमला कर उनके 25 घर जला दिए थे. इस हिंसा में 14 दलित गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

घटना से आक्रोशित दलित युवाओं के संगठन भीम आर्मी ने 09 मई, 2017 को सहारनपुर के गांधी पार्क में एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था.

इसमें क़रीब एक हज़ार प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए थे लेकिन प्रशासन की इजाज़त नहीं मिलने के कारण पुलिस ने इसे रोकने की कोशिश की.

चंद्रशेखर रावण ने उस वक़्त बीबीसी को बताया था कि पुलिस के रोकने के कारण प्रदर्शनकारियों का आक्रोश बढ़ा और गई जगहों पर भीड़ और पुलिस में झड़पें हुईं.

इस दौरान एक पुलिस चौकी फूंक दी गई और कई वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था.

इन घटनाओं के बाद 21 मई, 2017 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन का आयोजन किया गया था, जिसमें चंद्रशेखर रावण सार्वजनिक रूप से सामने आए थे.

इसके तीन दिन बाद बसपा प्रमुख मायावती शब्बीरपुर के पीड़ित दलित परिवारों से मिलने गई थीं.

(Source:BBC)

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मान लीजिए…..मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को संभालने में विफल है..पुण्य प्रसून वाजपयी

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हो सकता है डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत का असर सरकार पर ना पड़ रहा हो और सरकार ये सोच रही हो कि उसका वोटर तो देशभक्त है और रुपया देशभक्ति का प्रतीक है क्योंकि डॉलर तो विदेशी करेंसी है। पर जब किसी देश की अर्थव्यवस्था संभाले ना संभले तो सवाल सिर्फ करेंसी का नहीं होता। और ये कहकर कोई सरकार बच भी नहीं सकती है कि उसके खजाने में डॉलर भरा पड़ा है । विदेशी निवेश पहली की सरकार की तुलना में कहीं ज्यादा है । तो फिर चिन्ता किस बात की। दरअसल किस तरह देश जिस रास्ते निकल पड़ा है, उसमें सवाल सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने भर का नहीं है । देश में उच्च शिक्षा का स्तर इतना नीचे जा चुका है कि 40 फीसदी की बढ़ोतरी बीते तीन बरस में छात्रों के विदेश जाने की हो गई है। सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं बल्कि कोयला खादानो को लेकर सरकार के रुख ने ये हालात पैदा कर दिए हैं कि कोयले का आयात 66 फीसदी तक बढ़ गया है । भारत में इलाज सस्ता जरुर है लेकिन जो विदेश में इलाज कराने जाने वालो की तादाद में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है । चीनी , चावल, गेहूं , प्याज के आयात में भी 6 से 11 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो गई है। और दुनिया के बाजार से कोई भी उत्पाद लाने या दुनिया के बाजार में जाकर पढ़ाई करने या इलाज कराने का मतलब है डॉलर से भुगतान करना।

तो सच कहां से शुरु करें। पहला सच तो शिक्षा से ही जुड़ा है । 2013-14 में भारत से विदेश जाकर पढने वाले छात्रों को 61.71 रुपये के हिसाब से डॉलर का भुगतान करना पड़ता था । तो विदेश में पढ रहे भारतीय बच्चों को ट्यूशन फीस और हास्टल का कुल खर्चा 1.9 बिलियन डॉलर यानी 117 अरब 24 करोड 90 लाख रुपये देने पड़ते थे। और 2017-18 में ये रकम बढकर 2.8 बिलियन डॉलर यानी 201 अरब 88 करोड़ रुपये हो गई । और ये रकम इसलिये बढ़ गई क्योंकि रुपया कमजोर हो गया। डॉलर का मूल्य बढ़ता गया । यानी डॉलर जो 72 रुपये को छू रहा है अगर वह 2013-14 के मूल्य के बराबर टिका रहता तो करीब तीस अरब रुपये से ज्यादा भारतीय छात्रों का बच जाता । पर यहा सवाल सिर्फ डॉलर भर नहीं है । सवाल तो ये है कि आखिर वह कौन से हालात हैं, जब भारतीय यूनिवर्सिटिज को लेकर छात्रों का भरोसा डगमगा गया है । तो सरकार कह सकती है कि जो पढने बाहर जाते है उन्हें वह रोक नहीं सकते लेकिन शिक्षा के हालात तो बेहतर हुये हैं। तो इसका दूसरा चेहरा विदेश से भारत आकर पढ़ने वाले छात्रों की तादाद में कमी क्यो आ गई इससे समझा जा सकता है । रिजर्व बैंक की ही रिपोर्ट कहती है कि 2013-14 में जब मनमोहन सरकार थी तब विदेश से जितने छात्र पढने भारत आते थे उससे भारत को 600 मिलियन डालर की कमाई होती थी । पर 2017-18 में ये कम होते होते 479 मिलियन डालर पर आ गई । यानी कही ना कही शिक्षा अनुरुप हालात नहीं है तो फिर डॉलर या रुपये से इतर ज्यादा बडा सवाल तो ये हो चला है कि उच्च सिक्षा के लिये अगर भारतीय बच्चे विदेश जा रहे हैं और पढाई के बाद भारत लौटना नहीं चाहते हैं तो जिम्मेदारी किसकी होगी या फिर वोट बैक पर असर नही पडता है, यह सोचकर हर कोई खामोश है।

क्योंकि आलम तो ये भी है कि अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया जाकर पढने वाले बच्चों की तादाद लाखों में बढ़ गई है । सिर्फ अमेरिका जाने वाले बच्चो की तादाद मनमोहन सरकार के आखिरी दिनों में 1,25,897 थी जो 2016-17 में बढकर 1,86,267 हो गई । इसी तरह आस्ट्रेलिया में पढ़ने वाले बच्चो की संख्या में 35 फिसदी से ज्यादा का इजाफा हो गया । 2014 में 42 हजार भारतीय बच्चे आस्ट्रलिया में थे तो 2017 में ये बढकर 68 हजार हो गये । लोकसभा में सरकार ने ही जो आंकडे रखे वह बताता है कि बीते तीन बरस में सवा लाख छात्रो को वीजा दिया गया । तो क्या सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपये की कम होती कीमत भर का मामला है । क्योंकि देश छोडकर जाने वालो की तादाद और दुनिया के बाजार से भारत आयात किये जाने वाले उत्पादों में लगातार वृद्दि हो रही है। और इसे हर कोई जानता समझता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होगा तो आयल इंपोर्ट बिल बढ जायेगा । चालू खाते का घाटा बढ़ जायेगा। व्यापार घाटा और ज्यादा बढ जायेगा । जो कंपनियां आयात ज्यादा करती है उनका मार्जिन घट रहा है । विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ने लगा है क्योंकि दुनिया के बाजार में छात्रों की ट्यूशन फीस की तरह ही सरकार को भी भुगतान डालर में ही करना पडता है । और इन सब का सीधा असर कैसे महंगाई पर पड़ रहा है और सवाल मीडिल क्लास भर का नहीं है बल्कि देश में किसानों को सिंचाई तक की व्यवस्था ना पाने वाली अर्थवयवस्था या कहे इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के दावों के बीच का सच यही है कि 42 फीसदी किसान डीजल का उपयोग कर ट्यूबवेल से पानी निकालते है । और महंगा होता डीजल उनकी सुबह शाम की रोटी पर असर डाल रहा है । तो महंगे हालात या कहें डॉलर के मुकाबले रुपये की चिंता तब नहीं होती जब भारत स्वालंबी होता । सरकार ही जब विदेशी चुनावी फंड या विदेशी डालर के कमीशन पर जा टिकेगी तो फिर डालर की महत्ता होगी क्या ये बताने की जरुरत होनी नहीं चाहिये। और ये सवाल होगा ही कि सरकार इक्नामी संभालने में सक्षम नहीं है, क्योंकि चीन अमेरिका व्यापार युद्द में भी भारत फंसा । अमेरिकी फेडरेल बैक ने ब्याज दर बढाई तो अमेरिकी कारोबारी उत्साहित हुय़े । भारत में डालर लगाकर बैठे अमेरिकी कारोबारी ही नहीं दुनिया भर के कारोबारियों ने या कहें निवेशकों ने भारत से पैसा निकाला। वह अमेरिका जाने लगे हैं।

इससे अंतर्रष्ट्रीय बाजार में डालर की मांग लगातार बढ़ गई । यूरोपिय देशों के औसत प्रदर्शन से भी अमेरिका में निवेश और डॉलर को लगातार मजबूती मिल रही है । और इन हालातो के बीच कच्चे तेल की बढती किमतो ने भारत के खजाने पर कील ठोंकने का काम कर दिया है । यानी ये सोचा ही नहीं गया कि इक्नामी संभालने का मतलब ये भी होता है कि भारत खुद हर उत्पाद का इतना उत्पादन करें कि वह निर्यात करने लगे । तक्षशिला और नालंदा यूनिवर्सिटी के जरीये दुनिया को पाठ पढाने वाले भारत को आज विदेशी शिक्षकों तक की जरुरत पड़ गई । यानी कैसे सत्ता ने खुद को ही देश से काटकर देश से जुडे होने का दावा किया ये भी कम दिलचस्प नहीं है । लकीर महीन पर पर समझना जरुरी है कि गांव का देश भारत कैसे स्मार्ट सीटी बनाने की दिशा में बढ गया । और स्मार्ट सिटी बनाने के लिये जिस इन्फ्रस्ट्क्चर को खड़ा करने की जरुरत बनायी गई उसमें भी विदेशी कंपनियो की ही भरमार है । चीन ने अपने गांव को देखा । जनसंख्या के जरीये श्रम को परखा । अपनी करेंसी की कीमत को कम कर दुनिया के बाजारा को अपने उत्पाद से भर दिया । भारत ने गांव की तरफ देखा ही नहीं । खेत से फैक्ट्री कैसे जुडे । खनिज संसाधनो का उपयोग उत्पादन बढाने में कैसे लगाये । उत्पादन के साथ रोजगार को कैसे जोडें । इन हालातो को दरकिनार कर उल्टे रास्ते इकनामी को चला दिया । जिससे सरकार का खजाना बढे या कहे राजनीतिक सत्ता तले ही सारे निर्णय हो । उसकी एवज में उसी पूंजी मिले । उसी पूंजी से वह चुनाव लडे । और चुनाव लडने के लिये रास्ता इतना महंगा कर दें कि कोई सामान्य सोच ना सके कि लोकतंत्र का स्वाद वह भी चख सकता है । तो हुआ यही कि भारतीय मजदूर सबसे सस्ते हैं । जमीन मुफ्त में मिल जाती है । खनिज संपदा के मोल कौड़ियों के भाव हैं। और इसकी एवज में सत्ता सरकार को कुछ डालर थमाने होंगे। क्योंकि ध्यान दीजिये देश की संपदा की लूट बेल्लारी से लेकर झारखंड तक कैसे होती है । और तो और भारतीय कंपनिया ही लूट में हिस्सेदारी कर कैसे बहुराष्ट्रीय बन जाती है । सबकुछ आंखों के सामने है पर ये कोई बोलने की हिम्मत कर नहीं पाता कि राजनीतिक सत्ता ने देश की इक्नामी का बेडा गर्क कर देश के सामाजिक हालातो को उस पटरी पर ला खड़ा किया जहां जाति-धर्म का बोलबाला हो । क्योंकि जैसे ही नजर इस सच पर जायेगी कि रिजर्व बैंक को भी अब डॉलर खरीदने पड रहे है । और अपनी जरुरतों के लेकर भारत दुनिया के बाजार पर ही निर्भर हो चुका है । तो फिर अगला सवाल ये भी होगा कि चुनाव जीतने का प्रचार मंत्र भी जब गुगल , ट्विटर , सोशल मीडिया या कहें विदेशी मीडिया पर जा टिका है तो वहा भी भुगतान को डालर में ही करना पडता है । तो तस्वीर साफ होगी कि सवाल सिर्फ डॉलर की किमत बढने या रुपये का मूल्य कम होने भर का नहीं है बल्कि देश की राजनीतिक व्यवस्था ने सिर्फ तेल, कोयला, स्टील , सेव मेवा, प्याज, गेहू भर को डालर पर निर्भर नहीं किया है बल्कि एक वोट का लोकतंत्र भी डालर पर निर्भर हो चला है।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपाई के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुई है, यह लेखक के अपने विचार हैं )

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अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट के लिए पीएमओ के कहने पर किया गया नियमों में बदलाव

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फाइल फोटो

उपरोक्त संदर्भ में चौकीदार कौन है, नाम लेने की ज़रूरत नहीं है। वर्ना छापे पड़ जाएंगे और ट्विटर पर ट्रोल कहने लगेंगे कि कानून में विश्वास है तो केस जीत कर दिखाइये। जैसे भारत में फर्ज़ी केस ही नहीं बनता है और इंसाफ़ झट से मिल जाता है। आप लोग भी सावधान हो जाएं। आपके ख़िलाफ़ कुछ भी आरोप लगाया जा सकता है। अगर आप कुछ नहीं कर सकते हैं तो इतना तो कर दीजिए कि हिन्दी अख़बार लेना बंद कर दें या फिर ऐसा नहीं कर सकते तो हर महीने अलग अलग हिन्दी अख़बार लें, तभी पता चलेगा कि कैसे ये हिन्दी अख़बार सरकार की थमायी पर्ची को छाप कर ही आपसे महीने का 400-500 लूट रहे हैं। हिन्दी चैनलों का तो आप हाल जानते हैं। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसके लिए आपको 28 और 29 अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस में ऋतिका चोपड़ा की ख़बर बांचनी होगी।
आप सब इतना तो समझ ही सकते हैं कि इस तरह की ख़बर आपने अपने प्रिय हिन्दी अख़बार में कब देखी थी।

इंडियन एक्सप्रेस की ऋतिका चोपड़ा दो दिनों से लंबी-लंबी रिपोर्ट फाइल कर रही हैं कि किस तरह अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट के लिए पीएमओ के कहने पर नियमों में बदलाव किया गया। ऋतिका ने आर टी आई के ज़रिए मानव संसाधन मंत्रालय और पीएमओ के बीच पत्राचार हासिल कर यह रिपोर्ट तैयार की है। मानव संसाधन मंत्रालय ने शुरू में जो नियम बनाए थे उसके अनुसार अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को प्रतिष्ठित संस्थान का टैग नहीं मिल पाता। यहां तक कि वित्त मंत्रालय ने भी चेतावनी दी थी कि जिस संस्थान का कहीं कोई वजूद नहीं है उसे इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का लेबल देना तर्कों के ख़िलाफ़ है। इससे भारत में शिक्षा सिस्टम को ठेस पहुंचती है। इसके बाद भी अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को मानव संसाधन मंत्रालय की सूची में शामिल करने के लिए मजबूर किया गया।

वित्त मंत्रालय के ख़र्चा विभाग यानी डिपार्टमेंट आफ एक्सपेंडिचर ने मानव संसाधन मंत्रालय को लिखा था कि इस तरह से एक ऐसे संस्थान को आगे करना जिसकी अभी स्थापना तक नहीं हुई है, उन संस्थानों की तुलना में उसके ब्रांड वैल्यू को बढ़ाना होगा जिन्होंने अपने संस्थान की स्थापना कर ली है। इससे उनका उत्साह कम होगा। सिर्फ मंशा के आधार पर कि भविष्य में कुछ ऐसा करेंगे, किसी संस्थान को इंस्टीट्यूट ऑफ़ एमिनेंस का दर्जा देना तर्कों के ख़िलाफ़ है। इसलिए जो नए नियम बनाए गए हैं उनकी समीक्षा की जानी चाहिए।

वित्त मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय की राय के ख़िलाफ़ जाकर पीएमओ से अंबानी के जियो संस्थान को दर्जा दिलवाने की ख़बर आप इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ सकते हैं। भले ही इस खबर में यह नहीं है कि चौकीदार जी अंबानी के लिए इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं लेकिन इस ख़बर को पढ़ते ही आपको यही समझ आएगा। दो दिनों से ख़बर छप रही है मगर किसी ने खंडन नहीं किया है।

अडानी जी की एक कंपनी है। अडानी एंटरप्राइजेज़ लिमिटेड। यह कंपनी सिंगापुर के हाईकोर्ट में अपना केस हार चुकी है। भारत के रेवेन्यु इंटेलिजेंस ने कई पत्र जारी कर इस कंपनी के बारे में जवाब मांगे हैं, दुनिया के अलग अलग देशों से, तो इसके खिलाफ अडानी जी बांबे हाईकोर्ट गए हैं कि डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यु इंटेलिजेंस के लेटर्स रोगेटरी को रद्द कर दिया जाएगा। जब आप विदेशी मुल्क से न्यायिक मदद मांगते हैं तो उस मुल्क को लेटर ऑफ़ रोगेटरी जारी करना पड़ता है।

आप जानते हैं कि चौकीदार जी ने मुंबई के एक कार्यक्रम में हमारे मेहुल भाई कह दिया था। आप यह भी जानते हैं कि यही हमारे मेहुल भाई ने
महान भारत की नागरिकता छोड़ कर महान एंटीगुआ की नागरिकता ले ली है। चौकीदार जी के हमारे मेहुल भाई लगातार भारत को शर्मिंदा कर रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि वे भारत नहीं जाएंगे क्योंकि वहां के जेलों की हालत बहुत ख़राब है।

चौकीदार जी के हमारे मेहुल भाई पर मात्र 13,500 करोड़ के गबन के आरोप हैं। सरकार चाहे तो इनके लिए 1 करोड़ ख़र्च कर अलग से जेल बनवा सकती है, या किसी होटल के कमरे को जेल में बदल सकती है। कम से कम मेहुल भाई को वहां रहने में तो दिक्कत नहीं होगी। कहां तो काला धन आने वाला था, कहां काला धन वाले ही चले गए।

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले श्री रविशंकर का एक ट्विट घूमता है कि मोदी जी प्रधानमंत्री बनेंगे तो एक डॉलर 40 रुपये का हो जाएगा। फिलहाल यह 70 रुपये का हो गया है और भारत के इतिहास में इतना कभी कमज़ोर नहीं हुआ है। वैसे भी आप तक इसकी ख़बर प्रमुखता से नहीं पहुंची होगी और जिनके पास पहुंची है उनके लिए तर्क के पैमाने बदले जा रहे हैं।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं राजीव कुमार। राजीव ने कहा है कि हमें मुद्रा के आधार पर अर्थव्यवस्था को जज करने की मानसिकता छोड़नी ही पड़ेगी। मज़बूत मुद्रा में कुछ भी नहीं होता है।

वाकई ऐसे लोगों के अच्छे दिन हैं। कुछ भी तर्क देते हैं और मार्केट में चल जाता है। राजीव कुमार को पता नहीं है कि उनके चेयरमैन चौकीदार जी भी भारतीय रुपये की कमज़ोरी को दुनिया में भारत की गिरती साख और प्रतिष्ठा से जोड़ा करते थे। सबसे पहले उन्हें जाकर ये बात समझाएं। वैसे वे समझ गए होंगे।

वैसे आप कोई भी लेख पढ़ेंगे, उसमें यही होगा कि रुपया कमज़ोर होता है तो उसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। वित्तीय घाटा बढ़ता है। 2018 के साल में भारतीय रुपया ही दुनिया भर में सबसे ख़राब प्रदर्शन कर रहा है। वैसे रामदेव ने भी रजत शर्मा के आपकी अदालत में कहा था कि मोदी जी आ जाएंगे तो पेट्रोल 35 रुपया प्रति लीटर मिलेगा। इस समय तो कई शहरों में 86 और 87 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है।

ये सब सवाल पूछना बंद कर दीजिए वर्ना कोई आएगा फर्ज़ी कागज़ पर आपका नाम लिखा होगा और फंसा कर चला जाएगा। जब टीवी और अखबारों में इतना डर घुस जाए तभी शानदार मौका होता है कि आप अपनी मेहनत की कमाई का 1000 रुपया बचा लें। दोनों को बंद कर दें। कुछ नहीं तो कम से कम ये काम तो कर ही सकते हैं। हमेशा के लिए नहीं बंद कर सकते मगर एक महीने के लिए तो बंद कर ही सकते हैं।

(यह लेख मुख्यतः वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुआ है)

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