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सरकारी बैंकों में पैसा नहीं, सरकार का झूठ जमा है: रविश कुमार

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“ मुद्रा लोन के बारे में सच्चाई बताऊँगा तो आप भी चौंक जायेंगे। बहुत सारे बैंको में 3 महीने के क्लोजिंग पर उन एकाउंट पर ज़्यादा ध्यान होता है जो PNPA होते हैं मतलब जो NPA होने के कगार पर होते हैं। अब मैनेजर एक 40 हज़ार या 50 हज़ार का मुद्रा लोन बेनामी नाम पर करता है,उस रुपये से वो 5-6 लोन सही कर लेता है जो NPA होने वाले होते हैं। क्योंकि इससे ऊपर से वो गाली खाने से बच जाता है। अब इस मुद्रा लोन के ब्याज देने के लिए अब अगले क्वाटर में जो बेनामी मुद्रा लोन करेगा,उससे चुका देगा। देखिए सिर्फ ऊपर से दिए टारगेट पूरा हो जाये,कोई गाली सुनना न पड़े उसके लिए हमको कितनी हेराफेरी करनी पड़ती है।कैसे हमें रात में नींद आती है हम ही जानते हैं। मैं शराब पीने लगा हूं“

यह कथा एक बैंकर की आत्मकथा है। अनगितन बैंकरों ने अपने नैतिक संकट के बारे में लिखा है। वे अपने ज़मीर पर झूठ का यह बोझ बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। मुद्रा लोन लेने वाला नहीं है मगर बैंकर पर दबाव डाला जा रहा है कि बिना जांच पड़ताल के ही किसी को भी लोन दे दो। मैं दावा नहीं कर रहा मगर बैंकरों के ज़मीर की आवाज़ के ज़रिए जो बात बाहर आ रही है, उसे भी सुना जाना चाहिए।

मैंने बैंकरों के हज़ारों मेसेज पढ़े हैं और डिलिट किए हैं। अब लग रहा है कि इनकी बातों को किसी न किसी रूप में पेश करते रहना चाहिए। आपको लग सकता है कि एक ही बात है सबमें मगर झूठ का बोझ इतना भारी हो चुका है कि हर दिन एक नया किस्सा हमें चौंका देता है। आप यकीन नहीं करेंगे कि एक बैंकर ने हमें क्या लिखा है।

“रविश जी, मैं आपको पहले भी एक बार मैसेज कर चुका हूँ। मेरी कुछ महीने की नौकरी शेष है। रिटायर होने जा रहा हूं। पिछले कुछ बरसों में मेरे स्वयं के मन से अपने संस्थान की प्रतिष्ठा कम हो गई है और कोई वजह नहीं बची है कि मैं उस पर गर्व कर सकूँ। हमारी शाखाओं में प्रतिदिन कई ग्राहक आते हैं जो कहते हैं कि उन्हें लेनदेन के मैसेज नहीं मिल रहे हैं(तकरीबन तीन साल से यह कमी है) हम लोग इस पर तरह तरह के बहाने बनाते हैं। बैंक अपने ग्राहकों को sms सेवा के लिए प्रति तिमाही 15 रु + gst लेती है (यानी सरकार तक भी हिस्सा जाता है) उस सेवा के लिए जो प्रॉपर तरीके से दी ही नहीं जाती है। मुश्किल से 20-30 प्रतिशत लेनदेन की सूचना जाती होगी पर charges बेशर्मी से पूरे लिए जाते हैं। आप शाखाओं में जाकर ग्राहकों से स्वयं पूछें तो आपको हकीकत पता चलेगी। मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक ग्राहक को बैंक पिछले 2 साल में काटे पैसे वापस करे और इस तरह से अपनी कुंडली में कुछ सुधार करे। क्या इसके लिए कुछ ग्राहक अदालत के मार्फ़त सब ग्राहकों को उनका पैसा लौटवा सकेंगे? इस अन्याय के विरुद्ध मैं आपको साथ देखना चाहता हूँ।“

बैंक सीरीज से फर्क यही आया है कि बैंकरों की आत्मा मुखर हो रही है। वे भी इंसान हैं। वे अपने ज़मीर पर बोझ बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। उन्हें पता है एक दिन चेयरमैन और ऊपर के लोग हवा में उड़ जाएंगे और ये लोग जेल जाएंगे। अब यह झूठ इतना फैल चुका है कि रिज़र्व बैंक भी बेअसर हो चुका है। उसकी क्षमता नहीं है कि वह इस पैमाने पर फैले झूठ को पकड़ सके। अगर आज बैंकरों को यक़ीन हो जाए कि हर हाल में जनता उनका साथ देगी तो वे ऐसे ऐसे झूठ सामने रखने लगेंगे जिससे आपके होश उड़ जाएंगे। आपके पैसे तो उड़ ही चुके हैं।

Want to share worst working conditions in the bank and showing concerns over Managed balance sheets of the bank which do not show true pictures to its stake holders whether they r employees. Shareholders GOVT or market etc. Officers Unions gave their helping hands in the times of crises and management cut their petrol reimbursement to 25 percent In the name of continued losses with a promise to restore the same when profits will emerge. But Inspite Of profits continued for the last 5~6 years petrol cut is not restored. Now in the name of PNB on going fraud cases Bank management is about to implement transfer policy as a result of which each and every officer who is in the state not in zone will be transferred to other state as a result of which mass transfers are going to take place in coming month as confirmed by Top management in IR meeting in 16.03.18.

अंग्रेज़ी में मेसेज आया है, हु-ब-हू रख दिया हूं। जनाब यही कह रहे हैं कि सबको ऊपर से ठीक लगे इसलिए बैंकों के बहीखाता में फर्ज़ी जोड़-घटाव किया जा रहा है। परम पूजनीय नीरव मोदी जी तो ख़ुद भाग गए, वित्त मंत्री अभी तक नहीं बोल पाए मगर इसकी सज़ा बैंकरों को मिल रही है। इस राज्य से उस राज्य में तबादला करके। तबादले का जो ख़र्च आता है वो भी अब बैंक पूरा नहीं देता है। आप अगर दो हज़ार बैंकरों से बात कर लेंगे तो यही लगेगा कि बैंकर भी अपनी जेब से बैंक चला रहे हैं। जिसका ज़िक्र में ग़ुलाम बैंकरों की दास्तान में कर चुका हूं। वे अपनी ग़ुलामी को समझने लगे हैं। अपनी नौकरी दांव पर रखकर सीधे बैंक के ख़िलाफ़ तो नहीं खड़े हो सकते मगर अब उनका ज़मीर बोलने के लिए मजबूर करने लगा है। देश भर के उन जगहों से बैंकर मुझे अपनी व्यथा बता रहे हैं जहां मेरा चैनल कई महीनों से आता भी नहीं है। सरकार के दावों को बड़ा और सच्चा बनाने के लिए बैंकों के भीतर जो फ़र्ज़ीवाडा हो रहा है, उस पर आप आज भले न ध्यान दें मगर जिस दिन ये बैंक भरभराएंगे, सड़क पर आकर आप रोते रह जाएंगे।

मैं रोज़ सोचता हूं कि इन मैसेज का इस्तमाल कैसे करूं। अब लगता है कि डिलिट करने से पहले उनकी बातों का एक हिस्सा उठाकर यहां रख दूं। मुद्रा लोन को लेकर जो फर्ज़ीवाड़ा चल रहा है, जो किस्से मैंने पढ़े हैं, मैं अब समझने लगा हूं कि अमरीका और ब्रिटेन के बैंकों के भीतर जो हुआ था, वही अब हिन्दुस्तान में हो रहा है। बैंकर अभी भी इस संकट को नहीं समझ रहे हैं। वे अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं सैलरी के लिए मगर व्यथा बताते हैं क्रास सेलिंग और झूठ बोलकर बीमा बेचने के दबाव की। मुद्रा लोन का आंकड़ा बड़ा लगे उसके लिए किए जा रहे फर्ज़ीवाड़े के कारण वे टूट रहे हैं। बैंक के ढांचे में किसी राज्य में चोटी के दस पांच लोग ही होते हैं। इनके ज़रिए हज़ारों कर्मचारियों और अधिकारियों पर दबाव डाला जा रहा है। बीमा बेचने का कमीशन इन्हीं दस पांच चोटी के अफसरों को मिलता है। जितना मैंने समझा है।

“Sir, bank has also sold me insurance policy with home loan forcefully without my consent and when I requested them to cancel in free look period, they have not done the same….”

अंग्रेज़ी में लिखे इस मेसेज से आप इतना तो समझ ही गए होंगे कि बिना इनकी अनुमति के बीमा पालिसी बेच दी गई। जब अंग्रेज़ी वाले बैंकों के झूठ के शिकार हैं तो कल्पना कीजिए ग़रीबों के साथ क्या हो रहा होगा। मुझे यह भी सुनने को मिला है कि ग़रीब खातेधारों के खाते से पैसे निकाल लिए जा रहे हैं, बिना उनकी अनुमति के। जब वे वापस करने की मांग कर रहे हैं तो बैंकर ने बताया कि पैसा वापस करने की कोई प्रक्रिया ही नहीं। एक बैंक के मैनेजर ने बताया कि इस तरह हमारा ही बैंक पांच छह हज़ार करोड़ का मुनाफा बना लेता है।

अटल पेंशन योजना। अटल जी के नाम से भी लोगों के साथ धोखा किया जा सकता है, मुझे यकीन नहीं था। सैंकड़ों की संख्या में बैंकर बता रहे हैं कि कोई ले नहीं रहा, हमें देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। एक बैंकर ने लिखा कि आज जब सात बज गया तो बाहर गया। चाय की दुकान से तीन लोगों को पकड़ लाया। दस्तखत कराया और अपनी जेब से सौ सौ सो रुपये डालकर अपना टार्गेट पूरा किया और घर चला गया। वरना साढ़े नौ बजे रात तक बैठना पड़ता। इस तरह से अटल पेंशन योजना बेची जा रही है। कई बैंकरों ने कहा कि ऐसे भी यह योजना सही नहीं है। इसमें कोई दम नहीं है। हमने पूछा हमें इतनी बारीकी समझ नहीं आती तो उनका ये जवाब है।

“ सर, आज के ज़माने में किसी ग्राहक को इंवेस्टमेंट के बारे में बताओ तो उसका पहला सवाल होता है कि रिटर्न कितना है और कितने साल में। सर, अटल पेंशन योजना के केस में मैं एंट्री ईयर्स है 20 साल। उसके बाद आता है ग्राहक के उम्र का फंडा जिससे प्रीमियम तय होता है। 20 साल का सुनकर ही 10 में से सात लोग ग़ायब हो जाते हैं। जो तीन बचे वो तीन भी अच्छे संबंधों के कारण प्लान ले लेते हैं। अब आती है पालिसी चलाने की बात। मैंने अभी तक कुछ 70 अटल पेंशन योजना की है। जिनमें से शायद ही किसी में 3- 4 प्रीमियम से ज़्यादा जमा हुआ होगा। सर, मैंने एम बी ए की पढ़ाई की है। मैंने अपना सारा ज्ञान और तरीके लगा दिए कि ग्राहक को सब कुछ बता कर इसे बेच लूं, मगर कोई फायदा नहीं है। इसका फायदा होता तो मैं ख़ुद नहीं ले लेता। अच्छा नहीं लगता है अपनी नौकरी बचाने के लिए, झूठी शान से अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए, एक ग्राहक जो भरोसे से अपनी मेहनत की कमाई मेरे भरोसे भविष्य के लिए बचाना चाहता है, उसे ग़लत सलाह से जाया करूं। जितनी मेहनत हम बैंक वालों से इन सब APY और बीमा बेचने के लिए करवाई जा रही है, उस टाइम में बैंकर्स बिजनेस का फीगर चेंज कर सकते थे। “

महिला बैंकरों की हालत पढ़कर मेरी हालत ख़राब होने लगी है। शनिवार शाम जब मेरी किताब लांच हो रही थी तब एक नंबर लगातार फ्लैश कर रहा था। इतनी बार फ्लैश किया कि अंत में चिढ़ गया। मैं ही ऊंची आवाज़ में बोलने लगा कि आप मेसेज कर देते। ऐसा क्या है कि आप लगातार आधे घंटे से फोन कर रहे हैं। उधर से आती कातर आवाज़ ने मेरा पूरा मूड बदल दिया। भूल गया कि अपनी किताब के लांच में आया हूं।

“सर, मेरी सहयोगी को बीमा न बेच पाने के कारण बैंक में बिठा लिया है। मैं तो आठ बजे निकल गया मगर उसे साढ़े नौ बजे रात के बाद ही छोड़ेंगे। उसका बच्चा बहुत बीमार है। बहुत तेज़ बुख़ार है। घर में कोई नहीं है। यहां अकेले अपने बच्चे के साथ रहती है। आप न्यूज़ फ्लैश कर देते तो उसे छुट्टी मिल जाती। वैसे भी उसे बैंक से घर आने में चालीस मिनट लगेंगे। उस मां की हालत बहुत ख़राब हो गई है। रोज़ की यही कहानी है। हम बीमा नहीं बेचते हैं तो बैंक में अफसरों को देर रात तक बिठा कर रखा जाता है।“

“I am also a banker and I had to go too bank today with my kid, as nobody was there for take care of my son at home”

आप समझ गए होंगे कि यह मेसेज महिला बैंकर का है। रविवार को भी बैंकरों को जाना पड़ता है। उसके बदले उन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती है। महिला बैंकरों की हालत पढ़कर असहाय सा महसूस करने लगा हूं। कई बार लगता है कि सरकार,चेयरमैन,ईडी टाइप के अफसरों की हेंकड़ी इतनी बढ़ सकती है या हमें इतनी बर्दाश्त करनी पड़ेगी कि ये हमारी हालत ग़ुलाम जैसी कर देंगे।
मैं किसी भावावेश में नहीं कहता कि बैंकों में जाकर वहां काम कर रही महिलाओं को बचा लीजिए।

सरकार बैंकों के भीतर जो झूठ जमा कर रही है,वहां अब झूठ ही बचा है। आप को मीडिया चुनावी जीत के किस्से दिखा रहा है,मगर आदमी की हालत ग़ुलाम सी हो गई है, वो नहीं दिखाएगा क्योंकि गोदी मीडिया तो ख़ुद में ग़ुलाम मीडिया है। आज न कल 13 लाख बैंकरों को सोचना पड़ेगा कि चोटी के चंद अफसरों को मिलने वाले कमीशन के लालच में क्या वे अपने लिए दासता स्वीकार कर सकते हैं? महिला बैंकरों को एक दूसरे का हाथ थामना ही होगा, निकलना ही होगा, आज़ादी के लिए कीमत चुकानी पड़ती है।

नोट- इस लेख को गांव गांव पहुंचा दें और लोगों को बता दें कि बैंकों के भीतर महिला बैंकर ग़ुलाम की तरह रखी गईं हैं, उन्हें बचाना है। मर्द बैंकरों की भी हालत बुरी है। उन्हें भी बचाना है।

(यह लेख मुख्यतः रविश कुमार के फेसबुक पेज पर प्रकाशित हुआ है)

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लोकसभा चुनाव 2019:- बेगूसराय में वामदल कितना मजबूत?

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हम सब यह जानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल फूंका जा चुका है, जिसके लिए हर दल ने अलग-अलग सीटों पर अपनी दाबेदरी पेश करना शुरू कर दिया है! इसी क्रम में बेगूसराय से लोकसभा प्रत्याशी के लिए CPI ने अपनी दाबेदरी कन्हैया कुमार के नाम से पेश किया है! डॉ. कन्हैया कुमार JNU छात्रसंघ के भूतपूर्व अध्यक्ष और देश के सबसे युवा चर्चित चेहरा हैं! वहीं दूसरी ओर अन्य दल ने भी अपनी दाबेदारी पेश की है! अब सवाल उठ रहा है कि CPI की दाबेदारी कितनी मजबूत है?

सबसे पहले यह बताता चलूँ कि वर्तमान बेगूसराय लोकसभा सीट पूर्व के बेगूसराय और बलिया को मिला के बना है जिसका क्षेत्र पूरा बेगूसराय ज़िला है, जिसमे सात विधानसभा आता है! ऐतिहासिक रूप से बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जाना जाता है जहाँ वामपंथ ने हमेशा के अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज की है!

सातों विधानसभा सभा का अवलोकन जब करते हैं तो यह पाते हैं कि बेगूसराय विधानसभा सभा को कांग्रेस ने 10, भाजपा ने 5, राजद ने 0 तथा वामपंथ ने 3 बार जीता है! वहीं दूसरी ओर अगर उप विजेता को देखा जाय तो कांग्रेस 4, भाजपा 1, राजद 0 और वामदल 9 वार दूसरे नंबर पर रही हैं!

बखरी विधानसभा में कांग्रेस 2, भाजपा 1, राजद 2, तथा वामदलों ने 10 बार जीत हासिल की हैं और कांग्रेस 5, भाजपा 1, वामदलों ने 3 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

तेघरा को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1 तथा वामदलों ने 2 बार जीता है तथा कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1, तथा वामदलों ने 2 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

मटिहानी को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 0, तथा वामदलों ने 3 बार जीता है जबकि कांग्रेस को 5, भाजपा को 1, राजद को 0 तथा वामदलों को 3 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

साहेबपुर कमाल जब से बना है एक बार राजद जीती और एक बार हारी है! जबकि पहले के बलिया विधानसभा में राजद, जदयू तथा लोजपा का दबदबा रहा है! तनवीर हसन साहब ख़ुद अपने यहाँ से दो बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं!

चेरिया बरियारपुर को कांग्रेस ने 2 बार, भाजपा ने 0, राजद ने 1 और वामदलों ने 1 बार जीता है वही दूसरी ओर कांग्रेस को 2, भाजपा को 0, राजद को 2 तथा वामदलों को 1 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

वही अगर पूर्व के बरौनी विधानसभा की बात करें तो सन 1977 से 2005 तक लगातार 8 बार सीपीआई ने चुनाव जीता है! सब मिलकर अगर देखा जाय तो हर दल से ज़्यादा वामदलों ने विधानसभा चुनाव जीतें हैं!
अब रही लोकसभा चुनाव की बात तो पहले बेगूसराय और बलिया दो अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र रहा है जिसमें से बेगूसराय में 1967 में सीपीआई ने कांग्रेस को हराकर चुनाव जीता था एवं पिछले चुनाव 2014 में भी सीपीआई ने 1,92,639 वोट लाकर तीसरा स्थान प्राप्त किया था जबकि 1967 में 1, 80, 883 वोट लाकर सीपीआई ने चुनाव जीत लिया था! कहने का तात्यापर्य यह है कि सीपीआई का कैडर वोट अभी भी उसके साथ है क्योंकि 2009 के चुनाव में भी सीपीआई को 1,64,843 वोट आए थे!

बलिया लोकसभा जो पहले बेगूसराय से अलग था वहाँ सीपीआई तीन बार 1980, 1991 तथा 1996 में लोकसभा चुनाव जीत चुकी है! 1998 में भी जब राजद चुनाव जीती थी उस वक़्त भी 1,87,635 वोट पाकर सीपीआई 52,484 वोट से पिछड़कर दूसरे पायदान पर थी!

अभी तक के लोकसभा चुनाव को देखा जाय तो कुल 16 लोकसभा चुनाव में से सीपीआई ने 1962 से छः चुनाव लड़ी है जिसमें से 1962 हासिम अख़्तर (51, 163),1977 इंद्रदेव सिंह (72, 096), 1998 रमेन्द्र कुमार (विजयी 1,44,540), 2009 शत्रुघ्न प्रसाद सिंह (164843) एवं 2014 राजेंद्र प्रसाद सिंह (1,92,639) चुनाव लड़े हैं! वाकी 1962 से पहले सीपीआई ने चुनाव नहीं लड़ा है और बाद में कई बार गठबंधन के कारण दूसरे दल को समर्थन किया है! इस बार जब सीपीआई के पास भारत का सबसे चर्चित क्रांतिकारी चेहरा ख़ुद है तो फिर यह सवाल कहाँ से आता है कि वामदल का बेगूसराय में आधार नहीं है!

लोकसभा और विधानसभा दोनों को मिलाकर अवलोकन करने पर हम यह पाते हैं कि वामदल पूरे बेगूसराय के 7 विधानसभा क्षेत्रों में से मटिहानी एवं साहेबपुर कमाल को छोड़कर किसी भी विधानसभा में महागठबंधन के सारे घटकदल में से सबसे ज़्यादा मजबूत है! और अगर संभावित उम्मीदवारों को देखें तो कन्हैया कुमार से ज़्यादा लोकप्रिय उम्मीदवार कोई नहीं है! जहाँ तक क्षेत्र में लोगों के बीच मिलना-जुलना और मेहनत की बात करें तो कन्हैया कुमार 2014 के लोकसभा चुनाव से ही अपने क्षेत्र के लोगों के बीच काम कर रहे हैं अन्य किसी भी दल का कोई व्यक्ति उनके मुक़ाबके कहीं नहीं टिकता! जब भी बेगूसराय में किसी भी प्रकार का कोई भी सामाजिक वैमनस्यता फैलाने की कोशिश हुई वामपंथियों ने हर समाज के लोगों से कंधा से कंधा मिलाकर साम्प्रदायिक शक्तियों का डट कर मुक़ाबला किया है तब और नेतागण कहाँ थे!

वर्तमान सरकार में जनता पर हुए हर अत्याचार के विरुद्ध यहाँ से लेकर दिल्ली तक कन्हैया कुमार एवं उनका संगठन (AISF) और दल (CPI) ने हर मोर्चे पर आंदोलन कर साम्प्रदायिक शक्तियों को परास्त किया है, तो आज जब समाज को इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है तब यह कहना कि इनका कोई आधार नही यह कहाँ तक उचित है! हाँ यह सच है कि राजद में तनवीर हसन ने बेगूसराय से पहली बार 2014 में कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ा और 3,69,892 वोट पाए लेकिन उनकी भी हार ही हुई, जबकि 2009 में जदयू से मुनाजिर हसन मात्र 2,05,680 वोट लाकर जीत हासिल की थी! तनवीर जी कई बार चुनाव लड़ चुके हैं पर अभी तक एक बार भी जीत नहीं पाएं हैं, हां एक बार MLC बने हैं जिसमें भी बेगूसराय सीपीआई के दो विधायकों ने ही उनकी मदद की थी!

अगर हम बेगूसराय लोकसभा की बात करें तो यहाँ का समीकरण हर बार अलग ही होता है! वर्तमान में सारे समीकरण, मेहनत, युवा जोश, ईमानदारी तथा लोकप्रियता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि अगर सीपीआई/कन्हैया कुमार अकेले भी चुनाव लड़ेंगे तो उनकी जीत की संभावना को नकारा नहीं जा सकता!

जानत के विश्वास में भी कन्हैया कुमार सबसे ऊपर हैं! यह बात तो तय है कि कन्हैया कुमार जितनी प्रमुखता से अपने क्षेत्र के बारे में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पटल पर बात रख सकते हैं कोई अन्य उम्मीदवार नहीं रख सकता! एक और बात जो कन्हैया कुमार को दूसरों से अलग करती है वो है उनकी विचारधारा जो किसी अन्य संभावित उम्मीदवार के पास नहीं है!

एक बात तो तय है कि कन्हैया कुमार दल बदलू नहीं हैं और ना ही उन्हें यह चिंता है कि हर बात कहने से पहले यह सोचना है कि कहीं कोई आका नाराज़ ना हो जाय! दूसरी बात कि कन्हैया कुमार जब अपने क्षेत्र का मुद्दा रखेंगे तो पूरा देश सुनेगा क्योंकि उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ बेगूसराय तक ही सीमित नहीं है! तीसरी बात वो बेगूसराय की भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ़ हैं और जानते हैं कि अगर युवाओं ने इस बार उनका साथ दिया तो बेगूसराय में व्यवसाय तथा लघुउद्योगों की अपार संभावनाएं हैं; बस धर्म, जाति, सम्प्रदाय इत्यादि से ऊपर उठकर एक बार पूरे समाज की भलाई के मद्देनजर सही दिशानिर्देशन में चलने की आवश्यकता है!

~शाहनवाज़ भारतीय

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देहरादून:- नमक सत्याग्रह की विरासत बचाने के लिए उत्तराखंड के युवा हुए एकजुट

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आज का दिन(12 मार्च) हिंदुस्तान के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण दिन है। आज से उन्नब्बे साल पहले 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी जी ने चिन्हित 78 आंदोलनकारियों के साथ साबरमती आश्रम से नमक आंदोलन के लिए डांडी मार्च प्रारम्भ किया था।इसी दिन महात्मा गांधी ने यह संकल्प भी लिया था की जब तक मुल्क को आजादी नहीं मिलेगी तब तक वह साबरमती आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। ऐसा ही हुआ।

इसके बाद गांधी जी साबरमती आश्रम नहीं जा पाए। सही मायने में यह दिन आज़ादी की लड़ाई का एक ऐसा महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ से ब्रितानिया साम्राज्यवाद की चूलें हिलनी शुरू हो गई थी। मैं देहरादून से हूँ। उत्तर भारत में मेरा जिला देहरादून एक मात्र ऐसा स्थान है जहाँ एक नदी के पानी से नमक बनाकर और उस नमक को बेचकर नमक क़ानून को तोडा गया था।

गांधी जी की इस डांडी यात्रा में देहरादून के रहने वाले वीर खडग बहादुर भी शामिल थे। उन्होंने गांधी जी से जिक्र किया था कि हमारे गावं के पास भी एक नदी बहती है जिसके कुछ हिस्से में नमकीन पानी पाया जाता है। तो फिर गांधी जी ने खड़गबहादुर को देहरादून जाकर इस नदी से नमक बनाकर नमक आंदोलन शरू करने की सलाह दी थी। गांधी जी की सलाह पर वीर खडग बहादुर ने शहर के तत्कालीन आंदोलनकारियों से मिलकर यहाँ नमक बनाकर नमक सत्याग्रह शुरू किया था। जिस जगह नमक बनाया गया था उसका नाम खारा खेत पड़ा।खारा का मतलब नमक है। इसी के बगल में नेम और नून नदी बहती है। जिसका पानी नमकीन है।

इस जगह का नाम है खराखेत। यह देहरादून से लगभग 22 किलोमीटर दूर पश्चिमी भाग में पड़ता है। इसका रास्ता प्रेमनगर से आगे नंदा की चौकी से उत्तर की और पौंधा गावं से होते हुए जसपाल राणा शूटिंग रेंज से होकर जाता है।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति उत्तराखंड ने भारत ज्ञान विज्ञान युवा समिति के साथ मिलकर आज इसी जगह से अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क के द्वारा चलाये जा रहे “सबका देश अपना देश” अभियान की शुरआत की। आज के कार्यक्रम walk & talk का नाम था अपनी विरासत को जानो। इस कार्यक्रम में तीस के लगभग युवा व अन्य साथी शामिल हुए। एक घंटे स्मारक स्थल पर श्रमदान कर सफाई की गई। फिर इस जगह के और नमक आंदोलन पर चर्चा की। इस विषय पर सर्वोदय मंडल देहरादून के साथी बीजू नेगी जी ने बिस्तार से जानकारी दी। तत्पश्चात अपने अपने घरों से बनाकर लाये खाने को मिल बाँट कर सामूहिक भोज का आनंद लिया। सबका देश हमारा देश अभियान को जोर शोर से करने के संकल्प के साथ आज के कार्यक्रम का समापन हुआ। आज मुख्य रूप से गीता गैरोला, बीजू नेगी , अनूप बडोला , गजेंद्र वर्मा , उमा भट्ट , इंद्रेश नौटियाल , एस एस रावत,नितेश खंतवाल, कमलेश खंतवाल , सतीश धौलखंडी ,नेहा चंद अग्रिम सुन्द्रियाल, देवेंद्र रावल हिमांशु चौहान सहित एस एफ आई के नेतृत्वकारी साथी उपस्थित रहे।
(साभार:Vijay Bhatt )

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चैनलों पर युद्ध का मंच सजा है, नायक विश्व शांति पुरस्कार लेकर लौटा है

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प्रतीकात्मक चित्र

न्यूज़ चैनलों में युद्ध का मोर्चा सजा है। नायक को बख़्तरबंद किए जाने की तैयारी हो रही है। तभी ख़बर आती है कि नायक दक्षिण कोरिया में विश्व शांति पुरस्कार लेने निकल पड़े हैं। मनमोहन सिंह ने ऐसा किया होता तो भाजपा मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस हो रही होती कि जब हमारे जवान मारे जा रहे हैं तो हमारे प्रधानमंत्री शांति पुरस्कार ले रहे हैं। चैनल युद्ध का माहौल बनाकर कवियों से दरबार सजवा रहे हैं और प्रधानमंत्री हैं कि शांति पुरस्कार लेकर घर आ रहे हैं। कहां तो ज्योति बने ज्वाला की बात थी, मां कसम बदला लूंगा का उफ़ान था लेकिन अंत में कहानी राम-लखन की हो गई है। वन टू का फोर वाली।

मोदी को पता है। गोदी मीडिया उनके इस्तमाल के लिए है न कि वे गोदी मीडिया के इस्तमाल के लिए। एक चैनल ने तो अपने कार्यक्रम में यहां तक लिख दिया कि इलेक्शन ज़रूरी है या एक्शन। जो बात अफवाह से शुरू हुई थी वो अब गोदी मीडिया में आधिकारिक होती जा रही है। मोदी के लिए माहौल बनाने और उन्हें उस माहौल में धकेल देने वाले चैनल डर के मारे पूछ नहीं पा रहे हैं कि मोदी हैं कहां। वे रैलियां क्यों कर रहे हैं, झांसी क्यों जा रहे हैं, वहां से आकर दक्षिण कोरिया क्यों जा रहे हैं, दक्षिण कोरिया से आकर गोरखपुर क्यों जा रहे हैं? युद्ध की दुकान सजी है, ललकार है मगर युद्ध न करन के लिए फटकार नहीं है!

प्रधानमंत्री को पता है कि गोदी मीडिया के पोसुआ पत्रकारों की औकात। जो एंकर उनसे दो सवाल पूछने की हिम्मत न रखता हो, उसकी ललकार पर मोर्चे पर जाने से अच्छा है वे दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल चले गए। चैनलों में हिम्मत होती तो यही पूछ लेते कि यहां हम चिल्ला चिल्ला कर गले से गोला दागे जा रहे हैं और आप हैं कि शांति पुरस्कार ले रहे हैं। आप कहीं रवीश कुमार का प्राइम टाइम तो नहीं देखने लगे।

स्क्रोल वेबसाइट पर रोहन वेंकटरामाकृष्णन की रिपोर्ट सभी को पढ़नी चाहिए। पाठक और पत्रकार दोनों को। रोहन ने इस मसले पर सरकारी सूत्रों के हवाले से अलग अलग अखबारों में छपी सफाई की ख़बरों को लेकर चार्ट बनाया है। जिससे आप देख सकते हैं कि किस किस बात के अलग-अलग वर्ज़न है। कौन-कौन सी बात सभी रिपोर्ट में एक है।

यह तय है कि प्रधानमंत्री ने पुलवामा हमले के दो घंटे बाद रुद्रपुर की रैली को फोन से संबोधित किया था और उसमें पुलवामा हमले का कोई ज़िक्र नहीं किया था। अपनी सरकार की कई योजनाओं को गिनाया। इस बात पर मीडिया में छपी सभी रिपोर्ट में सहमति है। रोहन ने दूरदर्शन की क्लिपिंग का सहारा लेते हुए बताया है कि प्रधानमंत्री ने 5 बज कर 10 मिनट पर फोन से रैली को संबोधित किया था। इतना बड़ा होने पर प्रधानमंत्री ही रैली कर सकते थे। उस भाषण में मौसम के कारण न आ पाने का दुख तो है मगर पुलवामा में मारे गए जवानों के लिए दुख नहीं है। स्क्रोल ने लिखा है कि इस एक बात के अलावा सभी मीडिया में हर बात के अलग-अलग दावे हैं।

स्थानीय अख़बारों में छपी रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस ने आरोप लगाए हैं। टेलिग्राफ अखबार से उत्तराखंड के एक अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया है और दिल्ली में कई पत्रकारों को सरकारी सूत्रों ने ब्रीफ किया है। उनकी ख़बरों का ब्यौरा है। चौथा इकोनोमिक्स टाइम्स में शुक्रवार को छपी एक खबर है। तो चार तरह के वर्ज़न हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि हमला होने के बाद मोदी 6 बज कर 45 मिनट तक डिस्कवरी चैनल और अपने प्रचार के लिए शूटिंग करते रहे। मोटर-बोट पर सैर करते रहे। उत्तराखंड के अनाम अधिकारी ने कहा है कि मोदी ने हमले से पहले बोट की सवारी की। लेकिन हमले के घंटे भर बाद वे जंगल सफारी पर गए। अपने फोन से काले हिरण की तस्वीर ली। वहां से वे खिन्नौली गेस्ट हाउस गए जहां 4 बज कर 30 मिनट तक शूटिंग होती रही। हमले का समय 3:10 बताया जाता है। अज्ञात सरकारी सूत्रों ने बताया कि रूद्रपुर रैली रद्द कर दी। वहां नहीं गए और फोन से संबोधित किया। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, गृहमंत्री, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल से बात की। कुछ नहीं खाया। एक वरिष्ठ अधिकारी हवाले से खबर छपी है कि मोदी ने रुदपुर की रैली रद्द कर दी क्योंकि वे फोन पर जानकारी लेकर समीक्षा कर रहे थे। उसके बाद रैली को फोन से संबोधित किया।

स्क्रोल ने लिखा है कि अलग-अलग वर्ज़न हैं। कौन सा बिल्कुल सही है बताना मुश्किल है। सवाल का जवाब नहीं मिलता है कि प्रधानमंत्री हमले के बाद तक डिस्कवरी चैनल की शूटिंग करते रहे या नहीं। जानकारी मिलने के बाद भी शूटिंग की या हमले से पहले शूटिंग हो चुकी थी।

मुझे अच्छी तरह याद है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि ख़राब मौसम के कारण प्रधानमंत्री तक सही समय पर सूचना नहीं पहुंची। यह बात न पचती है और न जंचती है। रैली करने लायक फोन का सिग्नल था तो उसी सिग्नल से उनतक बात पहुंच सकती है। समंदर के ऊपर उड़ रहे बीच आसामान में उनके जहाज़ पर सूचना पहुंच सकती है तो दिल्ली के पास रूद्रपुर में सूचना नहीं पहुंचेगी यह बात बच्चों जैसी लगती है।

प्रधानमंत्री का कार्यक्रम तय होता है। इसलिए उनके कार्यक्रम के इतने वर्ज़न नहीं होने चाहिए। लीपा-पोती की कोशिश हो रही है। दूसरा बीजेपी ने ही माहौल रचा है कि शोक का समय है। सबको अपना राष्ट्रवाद ज़ोर-ज़ोर से बोलकर ज़ाहिर करना होगा। तब इस संदर्भ में सवाल उठने लगेगा कि हमले की घटना के बाद तक शूटिंग कैसे हो सकती है। प्रधानमंत्री रैली कैसे कर सकते हैं। आगे के लिए आप स्क्रोल साइट पर रोहन की पूरी रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

गोदी मीडिया के लिए पीएम का शूटिंग करना कोई सवाल नहीं। अब उसने नितिन गडकरी का बयान थाम लिया है। वही पाकिस्तान को पान रोकने का बयान। उन्होंने भी रणनीति के तहत पुरानी खबर ट्वीट कर दी। 2016 के फैसले को ट्वीट किया तो यही बता देते कि कितना पानी रोका। लेकिन तथ्य से किसी को क्या मतलब। पाकिस्तान पर जल-प्रहार, पानी-पानी को तरसेगा पाकिस्तान जैसे मुखड़ों से चैनलों पर वीर-रस के गीत बजने लगे हैं। तथ्य यही है कि भारत पानी नहीं रोकेगा। अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने के लिए उसे कई डैम बनाने हैं। एक का निर्माण शुरू हुआ है। दो के बनने पर फैसला लेना है। जब बनेगा तभी पानी रोक पाएगा। तो पाकिस्तान पर जल-प्रहार नहीं हुआ है। भारत अपने हिस्से का ही पानी रोक रहा है न कि पाकिस्तान को पानी रोक रहा है।

चैनलों ने पाकिस्तान के नाम पर भारत के दर्शकों पर ही झूठ के गोले दाग रखे हैं। हमले में दर्शक घायल है। अच्छा किया प्रधानमंत्री ने विश्व शांति पुरस्कार जनता के नाम कर दिया। इस जनता में वो जनता भी है जो दिन रात पुलवामा के बाद राष्ट्रवाद की आड़ में सियासी माहौल बना रही है। शांति पुरस्कार लेकर जनता कंफ्यूज़ है। माहौल बनाने वाले कार्यकर्ताओं को रात में बुलवाया गया कि चलो, आओ और एय़रपोर्ट पर प्रधानमंत्री का स्वागत करो। वे शांति पुरस्कार जीत कर आ रहे हैं। एयरपोर्ट के रास्ते पोस्टर भी लगा दिए गए।

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24 फरवरी को गोरखपुर में प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना का उद्घाटन करने वाले हैं। उत्तराखंड सरकार ने सभी ज़िलों में आदेश जारी किया है कि ज़िला और ब्लाक स्तर पर किसानों को सभागार में बिठाकर लाइव टेलिकास्ट दिखाना है। जनप्रतिनिधि भी शामिल होंगे। इसके लिए ज़िला स्तर पर 25,000 और ब्लाक लेवल पर 10,000 खर्च की मंज़ूरी दी गई है। आप हिसाब लगाए कि अकेले उत्तराखंड में जनता का 10-12 लाख पैसा पानी में बह जाएगा। भारत में 640 ज़िले हैं और 5500 के करीब ब्लाक हैं। सिर्फ इसी पर 7 करोड़ से अधिक की राशि खर्च हो जाएगी। हम नहीं जानते कि गोरखपुर की सभा के लिए कितना पैसा ख़र्च किया गया है। उसी गोरखपुर के ओबीसी और अनुसूचित जाति के छात्र रोज़ मेसेज करते हैं कि उन्हें छात्रवृत्ति नहीं मिल रही है। ग़रीब छात्रों को पढ़ने में दिक्कतें आ रही हैं।

न्यूज़ चैनलों की देशभक्ति से सावधान रहिए। अपनी देशभक्ति पर भरोसा कीजिए। जो चैनल देश की सरकार से सवाल नहीं पूछ सकते वे पाकिस्तान से पूछ रहे हैं। सेना के अच्छे भले अधिकारी भी इन कार्यक्रमों में जाकर प्रोपेगैंडा का शिकार हो रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि सेना अपनी रणनीति और अपने समय से कार्रवाई का फैसला लेगी। सेना अपने जवानों से कहे कि न्यूज़ चैनल न देखें। वर्ना गोली चलाने की जगह हंसी आने लगेगी। चैनलों के जोकरों को देखकर मोर्चे पर नहीं निकलना चाहिए। जय हिन्द।

(यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है)

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