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सरकारी बैंकों में पैसा नहीं, सरकार का झूठ जमा है: रविश कुमार

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“ मुद्रा लोन के बारे में सच्चाई बताऊँगा तो आप भी चौंक जायेंगे। बहुत सारे बैंको में 3 महीने के क्लोजिंग पर उन एकाउंट पर ज़्यादा ध्यान होता है जो PNPA होते हैं मतलब जो NPA होने के कगार पर होते हैं। अब मैनेजर एक 40 हज़ार या 50 हज़ार का मुद्रा लोन बेनामी नाम पर करता है,उस रुपये से वो 5-6 लोन सही कर लेता है जो NPA होने वाले होते हैं। क्योंकि इससे ऊपर से वो गाली खाने से बच जाता है। अब इस मुद्रा लोन के ब्याज देने के लिए अब अगले क्वाटर में जो बेनामी मुद्रा लोन करेगा,उससे चुका देगा। देखिए सिर्फ ऊपर से दिए टारगेट पूरा हो जाये,कोई गाली सुनना न पड़े उसके लिए हमको कितनी हेराफेरी करनी पड़ती है।कैसे हमें रात में नींद आती है हम ही जानते हैं। मैं शराब पीने लगा हूं“

यह कथा एक बैंकर की आत्मकथा है। अनगितन बैंकरों ने अपने नैतिक संकट के बारे में लिखा है। वे अपने ज़मीर पर झूठ का यह बोझ बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। मुद्रा लोन लेने वाला नहीं है मगर बैंकर पर दबाव डाला जा रहा है कि बिना जांच पड़ताल के ही किसी को भी लोन दे दो। मैं दावा नहीं कर रहा मगर बैंकरों के ज़मीर की आवाज़ के ज़रिए जो बात बाहर आ रही है, उसे भी सुना जाना चाहिए।

मैंने बैंकरों के हज़ारों मेसेज पढ़े हैं और डिलिट किए हैं। अब लग रहा है कि इनकी बातों को किसी न किसी रूप में पेश करते रहना चाहिए। आपको लग सकता है कि एक ही बात है सबमें मगर झूठ का बोझ इतना भारी हो चुका है कि हर दिन एक नया किस्सा हमें चौंका देता है। आप यकीन नहीं करेंगे कि एक बैंकर ने हमें क्या लिखा है।

“रविश जी, मैं आपको पहले भी एक बार मैसेज कर चुका हूँ। मेरी कुछ महीने की नौकरी शेष है। रिटायर होने जा रहा हूं। पिछले कुछ बरसों में मेरे स्वयं के मन से अपने संस्थान की प्रतिष्ठा कम हो गई है और कोई वजह नहीं बची है कि मैं उस पर गर्व कर सकूँ। हमारी शाखाओं में प्रतिदिन कई ग्राहक आते हैं जो कहते हैं कि उन्हें लेनदेन के मैसेज नहीं मिल रहे हैं(तकरीबन तीन साल से यह कमी है) हम लोग इस पर तरह तरह के बहाने बनाते हैं। बैंक अपने ग्राहकों को sms सेवा के लिए प्रति तिमाही 15 रु + gst लेती है (यानी सरकार तक भी हिस्सा जाता है) उस सेवा के लिए जो प्रॉपर तरीके से दी ही नहीं जाती है। मुश्किल से 20-30 प्रतिशत लेनदेन की सूचना जाती होगी पर charges बेशर्मी से पूरे लिए जाते हैं। आप शाखाओं में जाकर ग्राहकों से स्वयं पूछें तो आपको हकीकत पता चलेगी। मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक ग्राहक को बैंक पिछले 2 साल में काटे पैसे वापस करे और इस तरह से अपनी कुंडली में कुछ सुधार करे। क्या इसके लिए कुछ ग्राहक अदालत के मार्फ़त सब ग्राहकों को उनका पैसा लौटवा सकेंगे? इस अन्याय के विरुद्ध मैं आपको साथ देखना चाहता हूँ।“

बैंक सीरीज से फर्क यही आया है कि बैंकरों की आत्मा मुखर हो रही है। वे भी इंसान हैं। वे अपने ज़मीर पर बोझ बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। उन्हें पता है एक दिन चेयरमैन और ऊपर के लोग हवा में उड़ जाएंगे और ये लोग जेल जाएंगे। अब यह झूठ इतना फैल चुका है कि रिज़र्व बैंक भी बेअसर हो चुका है। उसकी क्षमता नहीं है कि वह इस पैमाने पर फैले झूठ को पकड़ सके। अगर आज बैंकरों को यक़ीन हो जाए कि हर हाल में जनता उनका साथ देगी तो वे ऐसे ऐसे झूठ सामने रखने लगेंगे जिससे आपके होश उड़ जाएंगे। आपके पैसे तो उड़ ही चुके हैं।

Want to share worst working conditions in the bank and showing concerns over Managed balance sheets of the bank which do not show true pictures to its stake holders whether they r employees. Shareholders GOVT or market etc. Officers Unions gave their helping hands in the times of crises and management cut their petrol reimbursement to 25 percent In the name of continued losses with a promise to restore the same when profits will emerge. But Inspite Of profits continued for the last 5~6 years petrol cut is not restored. Now in the name of PNB on going fraud cases Bank management is about to implement transfer policy as a result of which each and every officer who is in the state not in zone will be transferred to other state as a result of which mass transfers are going to take place in coming month as confirmed by Top management in IR meeting in 16.03.18.

अंग्रेज़ी में मेसेज आया है, हु-ब-हू रख दिया हूं। जनाब यही कह रहे हैं कि सबको ऊपर से ठीक लगे इसलिए बैंकों के बहीखाता में फर्ज़ी जोड़-घटाव किया जा रहा है। परम पूजनीय नीरव मोदी जी तो ख़ुद भाग गए, वित्त मंत्री अभी तक नहीं बोल पाए मगर इसकी सज़ा बैंकरों को मिल रही है। इस राज्य से उस राज्य में तबादला करके। तबादले का जो ख़र्च आता है वो भी अब बैंक पूरा नहीं देता है। आप अगर दो हज़ार बैंकरों से बात कर लेंगे तो यही लगेगा कि बैंकर भी अपनी जेब से बैंक चला रहे हैं। जिसका ज़िक्र में ग़ुलाम बैंकरों की दास्तान में कर चुका हूं। वे अपनी ग़ुलामी को समझने लगे हैं। अपनी नौकरी दांव पर रखकर सीधे बैंक के ख़िलाफ़ तो नहीं खड़े हो सकते मगर अब उनका ज़मीर बोलने के लिए मजबूर करने लगा है। देश भर के उन जगहों से बैंकर मुझे अपनी व्यथा बता रहे हैं जहां मेरा चैनल कई महीनों से आता भी नहीं है। सरकार के दावों को बड़ा और सच्चा बनाने के लिए बैंकों के भीतर जो फ़र्ज़ीवाडा हो रहा है, उस पर आप आज भले न ध्यान दें मगर जिस दिन ये बैंक भरभराएंगे, सड़क पर आकर आप रोते रह जाएंगे।

मैं रोज़ सोचता हूं कि इन मैसेज का इस्तमाल कैसे करूं। अब लगता है कि डिलिट करने से पहले उनकी बातों का एक हिस्सा उठाकर यहां रख दूं। मुद्रा लोन को लेकर जो फर्ज़ीवाड़ा चल रहा है, जो किस्से मैंने पढ़े हैं, मैं अब समझने लगा हूं कि अमरीका और ब्रिटेन के बैंकों के भीतर जो हुआ था, वही अब हिन्दुस्तान में हो रहा है। बैंकर अभी भी इस संकट को नहीं समझ रहे हैं। वे अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं सैलरी के लिए मगर व्यथा बताते हैं क्रास सेलिंग और झूठ बोलकर बीमा बेचने के दबाव की। मुद्रा लोन का आंकड़ा बड़ा लगे उसके लिए किए जा रहे फर्ज़ीवाड़े के कारण वे टूट रहे हैं। बैंक के ढांचे में किसी राज्य में चोटी के दस पांच लोग ही होते हैं। इनके ज़रिए हज़ारों कर्मचारियों और अधिकारियों पर दबाव डाला जा रहा है। बीमा बेचने का कमीशन इन्हीं दस पांच चोटी के अफसरों को मिलता है। जितना मैंने समझा है।

“Sir, bank has also sold me insurance policy with home loan forcefully without my consent and when I requested them to cancel in free look period, they have not done the same….”

अंग्रेज़ी में लिखे इस मेसेज से आप इतना तो समझ ही गए होंगे कि बिना इनकी अनुमति के बीमा पालिसी बेच दी गई। जब अंग्रेज़ी वाले बैंकों के झूठ के शिकार हैं तो कल्पना कीजिए ग़रीबों के साथ क्या हो रहा होगा। मुझे यह भी सुनने को मिला है कि ग़रीब खातेधारों के खाते से पैसे निकाल लिए जा रहे हैं, बिना उनकी अनुमति के। जब वे वापस करने की मांग कर रहे हैं तो बैंकर ने बताया कि पैसा वापस करने की कोई प्रक्रिया ही नहीं। एक बैंक के मैनेजर ने बताया कि इस तरह हमारा ही बैंक पांच छह हज़ार करोड़ का मुनाफा बना लेता है।

अटल पेंशन योजना। अटल जी के नाम से भी लोगों के साथ धोखा किया जा सकता है, मुझे यकीन नहीं था। सैंकड़ों की संख्या में बैंकर बता रहे हैं कि कोई ले नहीं रहा, हमें देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। एक बैंकर ने लिखा कि आज जब सात बज गया तो बाहर गया। चाय की दुकान से तीन लोगों को पकड़ लाया। दस्तखत कराया और अपनी जेब से सौ सौ सो रुपये डालकर अपना टार्गेट पूरा किया और घर चला गया। वरना साढ़े नौ बजे रात तक बैठना पड़ता। इस तरह से अटल पेंशन योजना बेची जा रही है। कई बैंकरों ने कहा कि ऐसे भी यह योजना सही नहीं है। इसमें कोई दम नहीं है। हमने पूछा हमें इतनी बारीकी समझ नहीं आती तो उनका ये जवाब है।

“ सर, आज के ज़माने में किसी ग्राहक को इंवेस्टमेंट के बारे में बताओ तो उसका पहला सवाल होता है कि रिटर्न कितना है और कितने साल में। सर, अटल पेंशन योजना के केस में मैं एंट्री ईयर्स है 20 साल। उसके बाद आता है ग्राहक के उम्र का फंडा जिससे प्रीमियम तय होता है। 20 साल का सुनकर ही 10 में से सात लोग ग़ायब हो जाते हैं। जो तीन बचे वो तीन भी अच्छे संबंधों के कारण प्लान ले लेते हैं। अब आती है पालिसी चलाने की बात। मैंने अभी तक कुछ 70 अटल पेंशन योजना की है। जिनमें से शायद ही किसी में 3- 4 प्रीमियम से ज़्यादा जमा हुआ होगा। सर, मैंने एम बी ए की पढ़ाई की है। मैंने अपना सारा ज्ञान और तरीके लगा दिए कि ग्राहक को सब कुछ बता कर इसे बेच लूं, मगर कोई फायदा नहीं है। इसका फायदा होता तो मैं ख़ुद नहीं ले लेता। अच्छा नहीं लगता है अपनी नौकरी बचाने के लिए, झूठी शान से अपनी रोजी रोटी चलाने के लिए, एक ग्राहक जो भरोसे से अपनी मेहनत की कमाई मेरे भरोसे भविष्य के लिए बचाना चाहता है, उसे ग़लत सलाह से जाया करूं। जितनी मेहनत हम बैंक वालों से इन सब APY और बीमा बेचने के लिए करवाई जा रही है, उस टाइम में बैंकर्स बिजनेस का फीगर चेंज कर सकते थे। “

महिला बैंकरों की हालत पढ़कर मेरी हालत ख़राब होने लगी है। शनिवार शाम जब मेरी किताब लांच हो रही थी तब एक नंबर लगातार फ्लैश कर रहा था। इतनी बार फ्लैश किया कि अंत में चिढ़ गया। मैं ही ऊंची आवाज़ में बोलने लगा कि आप मेसेज कर देते। ऐसा क्या है कि आप लगातार आधे घंटे से फोन कर रहे हैं। उधर से आती कातर आवाज़ ने मेरा पूरा मूड बदल दिया। भूल गया कि अपनी किताब के लांच में आया हूं।

“सर, मेरी सहयोगी को बीमा न बेच पाने के कारण बैंक में बिठा लिया है। मैं तो आठ बजे निकल गया मगर उसे साढ़े नौ बजे रात के बाद ही छोड़ेंगे। उसका बच्चा बहुत बीमार है। बहुत तेज़ बुख़ार है। घर में कोई नहीं है। यहां अकेले अपने बच्चे के साथ रहती है। आप न्यूज़ फ्लैश कर देते तो उसे छुट्टी मिल जाती। वैसे भी उसे बैंक से घर आने में चालीस मिनट लगेंगे। उस मां की हालत बहुत ख़राब हो गई है। रोज़ की यही कहानी है। हम बीमा नहीं बेचते हैं तो बैंक में अफसरों को देर रात तक बिठा कर रखा जाता है।“

“I am also a banker and I had to go too bank today with my kid, as nobody was there for take care of my son at home”

आप समझ गए होंगे कि यह मेसेज महिला बैंकर का है। रविवार को भी बैंकरों को जाना पड़ता है। उसके बदले उन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती है। महिला बैंकरों की हालत पढ़कर असहाय सा महसूस करने लगा हूं। कई बार लगता है कि सरकार,चेयरमैन,ईडी टाइप के अफसरों की हेंकड़ी इतनी बढ़ सकती है या हमें इतनी बर्दाश्त करनी पड़ेगी कि ये हमारी हालत ग़ुलाम जैसी कर देंगे।
मैं किसी भावावेश में नहीं कहता कि बैंकों में जाकर वहां काम कर रही महिलाओं को बचा लीजिए।

सरकार बैंकों के भीतर जो झूठ जमा कर रही है,वहां अब झूठ ही बचा है। आप को मीडिया चुनावी जीत के किस्से दिखा रहा है,मगर आदमी की हालत ग़ुलाम सी हो गई है, वो नहीं दिखाएगा क्योंकि गोदी मीडिया तो ख़ुद में ग़ुलाम मीडिया है। आज न कल 13 लाख बैंकरों को सोचना पड़ेगा कि चोटी के चंद अफसरों को मिलने वाले कमीशन के लालच में क्या वे अपने लिए दासता स्वीकार कर सकते हैं? महिला बैंकरों को एक दूसरे का हाथ थामना ही होगा, निकलना ही होगा, आज़ादी के लिए कीमत चुकानी पड़ती है।

नोट- इस लेख को गांव गांव पहुंचा दें और लोगों को बता दें कि बैंकों के भीतर महिला बैंकर ग़ुलाम की तरह रखी गईं हैं, उन्हें बचाना है। मर्द बैंकरों की भी हालत बुरी है। उन्हें भी बचाना है।

(यह लेख मुख्यतः रविश कुमार के फेसबुक पेज पर प्रकाशित हुआ है)

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भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण देर रात होंगे जेल से रिहा

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चंद्रशेखर रावण जी हां पिछले कुछ महीनों से चुनाव के शोरगुल और पढ़ते पेट्रोल और गिरते रूपए के बीच भले ही यह नाम मीडिया से गायब ह गया हो पर लोगों की जहाँ में यह नाम आज भी जर्रोर गूंज रहा होगा.

चंद्रशेखर को बीते साल सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा के बाद गिरफ़्तार कर लिया गया था.

उन पर हिंसा भड़काने के आरोप थे. गृह विभाग की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि रावण की मां की अपील पर विचार करते हुए उन्हें समय से पहले रिहा करने का फ़ैसला किया गया है.

मामले में चंद्रशेखर रावण सहित छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया था, जिनमें से तीन को पिछले सप्ताह रिहा कर दिया गया था.

पिछले साल 05 मई को सहारनपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर शिमलाना में महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन किया गया था.

जिसमें शामिल होने जा रहे युवकों की शोभा यात्रा पर दलितों ने आपत्ति जताई थी और पुलिस बुला लिया था.

विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों तरफ से पथराव होने लगे थे, जिसमें ठाकुर जाति के एक युवक की मौत हो गई थी.

इसके बाद शिमलाना गांव में जुटे हज़ारों लोग करीब तीन किलोमीटर दूर शब्बीरपुर गांव आ गए.

जहां भीड़ ने दलितों के घरों पर हमला कर उनके 25 घर जला दिए थे. इस हिंसा में 14 दलित गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

घटना से आक्रोशित दलित युवाओं के संगठन भीम आर्मी ने 09 मई, 2017 को सहारनपुर के गांधी पार्क में एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया था.

इसमें क़रीब एक हज़ार प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए थे लेकिन प्रशासन की इजाज़त नहीं मिलने के कारण पुलिस ने इसे रोकने की कोशिश की.

चंद्रशेखर रावण ने उस वक़्त बीबीसी को बताया था कि पुलिस के रोकने के कारण प्रदर्शनकारियों का आक्रोश बढ़ा और गई जगहों पर भीड़ और पुलिस में झड़पें हुईं.

इस दौरान एक पुलिस चौकी फूंक दी गई और कई वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया था.

इन घटनाओं के बाद 21 मई, 2017 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन का आयोजन किया गया था, जिसमें चंद्रशेखर रावण सार्वजनिक रूप से सामने आए थे.

इसके तीन दिन बाद बसपा प्रमुख मायावती शब्बीरपुर के पीड़ित दलित परिवारों से मिलने गई थीं.

(Source:BBC)

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मान लीजिए…..मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को संभालने में विफल है..पुण्य प्रसून वाजपयी

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हो सकता है डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत का असर सरकार पर ना पड़ रहा हो और सरकार ये सोच रही हो कि उसका वोटर तो देशभक्त है और रुपया देशभक्ति का प्रतीक है क्योंकि डॉलर तो विदेशी करेंसी है। पर जब किसी देश की अर्थव्यवस्था संभाले ना संभले तो सवाल सिर्फ करेंसी का नहीं होता। और ये कहकर कोई सरकार बच भी नहीं सकती है कि उसके खजाने में डॉलर भरा पड़ा है । विदेशी निवेश पहली की सरकार की तुलना में कहीं ज्यादा है । तो फिर चिन्ता किस बात की। दरअसल किस तरह देश जिस रास्ते निकल पड़ा है, उसमें सवाल सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने भर का नहीं है । देश में उच्च शिक्षा का स्तर इतना नीचे जा चुका है कि 40 फीसदी की बढ़ोतरी बीते तीन बरस में छात्रों के विदेश जाने की हो गई है। सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं बल्कि कोयला खादानो को लेकर सरकार के रुख ने ये हालात पैदा कर दिए हैं कि कोयले का आयात 66 फीसदी तक बढ़ गया है । भारत में इलाज सस्ता जरुर है लेकिन जो विदेश में इलाज कराने जाने वालो की तादाद में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है । चीनी , चावल, गेहूं , प्याज के आयात में भी 6 से 11 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो गई है। और दुनिया के बाजार से कोई भी उत्पाद लाने या दुनिया के बाजार में जाकर पढ़ाई करने या इलाज कराने का मतलब है डॉलर से भुगतान करना।

तो सच कहां से शुरु करें। पहला सच तो शिक्षा से ही जुड़ा है । 2013-14 में भारत से विदेश जाकर पढने वाले छात्रों को 61.71 रुपये के हिसाब से डॉलर का भुगतान करना पड़ता था । तो विदेश में पढ रहे भारतीय बच्चों को ट्यूशन फीस और हास्टल का कुल खर्चा 1.9 बिलियन डॉलर यानी 117 अरब 24 करोड 90 लाख रुपये देने पड़ते थे। और 2017-18 में ये रकम बढकर 2.8 बिलियन डॉलर यानी 201 अरब 88 करोड़ रुपये हो गई । और ये रकम इसलिये बढ़ गई क्योंकि रुपया कमजोर हो गया। डॉलर का मूल्य बढ़ता गया । यानी डॉलर जो 72 रुपये को छू रहा है अगर वह 2013-14 के मूल्य के बराबर टिका रहता तो करीब तीस अरब रुपये से ज्यादा भारतीय छात्रों का बच जाता । पर यहा सवाल सिर्फ डॉलर भर नहीं है । सवाल तो ये है कि आखिर वह कौन से हालात हैं, जब भारतीय यूनिवर्सिटिज को लेकर छात्रों का भरोसा डगमगा गया है । तो सरकार कह सकती है कि जो पढने बाहर जाते है उन्हें वह रोक नहीं सकते लेकिन शिक्षा के हालात तो बेहतर हुये हैं। तो इसका दूसरा चेहरा विदेश से भारत आकर पढ़ने वाले छात्रों की तादाद में कमी क्यो आ गई इससे समझा जा सकता है । रिजर्व बैंक की ही रिपोर्ट कहती है कि 2013-14 में जब मनमोहन सरकार थी तब विदेश से जितने छात्र पढने भारत आते थे उससे भारत को 600 मिलियन डालर की कमाई होती थी । पर 2017-18 में ये कम होते होते 479 मिलियन डालर पर आ गई । यानी कही ना कही शिक्षा अनुरुप हालात नहीं है तो फिर डॉलर या रुपये से इतर ज्यादा बडा सवाल तो ये हो चला है कि उच्च सिक्षा के लिये अगर भारतीय बच्चे विदेश जा रहे हैं और पढाई के बाद भारत लौटना नहीं चाहते हैं तो जिम्मेदारी किसकी होगी या फिर वोट बैक पर असर नही पडता है, यह सोचकर हर कोई खामोश है।

क्योंकि आलम तो ये भी है कि अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया जाकर पढने वाले बच्चों की तादाद लाखों में बढ़ गई है । सिर्फ अमेरिका जाने वाले बच्चो की तादाद मनमोहन सरकार के आखिरी दिनों में 1,25,897 थी जो 2016-17 में बढकर 1,86,267 हो गई । इसी तरह आस्ट्रेलिया में पढ़ने वाले बच्चो की संख्या में 35 फिसदी से ज्यादा का इजाफा हो गया । 2014 में 42 हजार भारतीय बच्चे आस्ट्रलिया में थे तो 2017 में ये बढकर 68 हजार हो गये । लोकसभा में सरकार ने ही जो आंकडे रखे वह बताता है कि बीते तीन बरस में सवा लाख छात्रो को वीजा दिया गया । तो क्या सिर्फ डॉलर के मुकाबले रुपये की कम होती कीमत भर का मामला है । क्योंकि देश छोडकर जाने वालो की तादाद और दुनिया के बाजार से भारत आयात किये जाने वाले उत्पादों में लगातार वृद्दि हो रही है। और इसे हर कोई जानता समझता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होगा तो आयल इंपोर्ट बिल बढ जायेगा । चालू खाते का घाटा बढ़ जायेगा। व्यापार घाटा और ज्यादा बढ जायेगा । जो कंपनियां आयात ज्यादा करती है उनका मार्जिन घट रहा है । विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ने लगा है क्योंकि दुनिया के बाजार में छात्रों की ट्यूशन फीस की तरह ही सरकार को भी भुगतान डालर में ही करना पडता है । और इन सब का सीधा असर कैसे महंगाई पर पड़ रहा है और सवाल मीडिल क्लास भर का नहीं है बल्कि देश में किसानों को सिंचाई तक की व्यवस्था ना पाने वाली अर्थवयवस्था या कहे इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के दावों के बीच का सच यही है कि 42 फीसदी किसान डीजल का उपयोग कर ट्यूबवेल से पानी निकालते है । और महंगा होता डीजल उनकी सुबह शाम की रोटी पर असर डाल रहा है । तो महंगे हालात या कहें डॉलर के मुकाबले रुपये की चिंता तब नहीं होती जब भारत स्वालंबी होता । सरकार ही जब विदेशी चुनावी फंड या विदेशी डालर के कमीशन पर जा टिकेगी तो फिर डालर की महत्ता होगी क्या ये बताने की जरुरत होनी नहीं चाहिये। और ये सवाल होगा ही कि सरकार इक्नामी संभालने में सक्षम नहीं है, क्योंकि चीन अमेरिका व्यापार युद्द में भी भारत फंसा । अमेरिकी फेडरेल बैक ने ब्याज दर बढाई तो अमेरिकी कारोबारी उत्साहित हुय़े । भारत में डालर लगाकर बैठे अमेरिकी कारोबारी ही नहीं दुनिया भर के कारोबारियों ने या कहें निवेशकों ने भारत से पैसा निकाला। वह अमेरिका जाने लगे हैं।

इससे अंतर्रष्ट्रीय बाजार में डालर की मांग लगातार बढ़ गई । यूरोपिय देशों के औसत प्रदर्शन से भी अमेरिका में निवेश और डॉलर को लगातार मजबूती मिल रही है । और इन हालातो के बीच कच्चे तेल की बढती किमतो ने भारत के खजाने पर कील ठोंकने का काम कर दिया है । यानी ये सोचा ही नहीं गया कि इक्नामी संभालने का मतलब ये भी होता है कि भारत खुद हर उत्पाद का इतना उत्पादन करें कि वह निर्यात करने लगे । तक्षशिला और नालंदा यूनिवर्सिटी के जरीये दुनिया को पाठ पढाने वाले भारत को आज विदेशी शिक्षकों तक की जरुरत पड़ गई । यानी कैसे सत्ता ने खुद को ही देश से काटकर देश से जुडे होने का दावा किया ये भी कम दिलचस्प नहीं है । लकीर महीन पर पर समझना जरुरी है कि गांव का देश भारत कैसे स्मार्ट सीटी बनाने की दिशा में बढ गया । और स्मार्ट सिटी बनाने के लिये जिस इन्फ्रस्ट्क्चर को खड़ा करने की जरुरत बनायी गई उसमें भी विदेशी कंपनियो की ही भरमार है । चीन ने अपने गांव को देखा । जनसंख्या के जरीये श्रम को परखा । अपनी करेंसी की कीमत को कम कर दुनिया के बाजारा को अपने उत्पाद से भर दिया । भारत ने गांव की तरफ देखा ही नहीं । खेत से फैक्ट्री कैसे जुडे । खनिज संसाधनो का उपयोग उत्पादन बढाने में कैसे लगाये । उत्पादन के साथ रोजगार को कैसे जोडें । इन हालातो को दरकिनार कर उल्टे रास्ते इकनामी को चला दिया । जिससे सरकार का खजाना बढे या कहे राजनीतिक सत्ता तले ही सारे निर्णय हो । उसकी एवज में उसी पूंजी मिले । उसी पूंजी से वह चुनाव लडे । और चुनाव लडने के लिये रास्ता इतना महंगा कर दें कि कोई सामान्य सोच ना सके कि लोकतंत्र का स्वाद वह भी चख सकता है । तो हुआ यही कि भारतीय मजदूर सबसे सस्ते हैं । जमीन मुफ्त में मिल जाती है । खनिज संपदा के मोल कौड़ियों के भाव हैं। और इसकी एवज में सत्ता सरकार को कुछ डालर थमाने होंगे। क्योंकि ध्यान दीजिये देश की संपदा की लूट बेल्लारी से लेकर झारखंड तक कैसे होती है । और तो और भारतीय कंपनिया ही लूट में हिस्सेदारी कर कैसे बहुराष्ट्रीय बन जाती है । सबकुछ आंखों के सामने है पर ये कोई बोलने की हिम्मत कर नहीं पाता कि राजनीतिक सत्ता ने देश की इक्नामी का बेडा गर्क कर देश के सामाजिक हालातो को उस पटरी पर ला खड़ा किया जहां जाति-धर्म का बोलबाला हो । क्योंकि जैसे ही नजर इस सच पर जायेगी कि रिजर्व बैंक को भी अब डॉलर खरीदने पड रहे है । और अपनी जरुरतों के लेकर भारत दुनिया के बाजार पर ही निर्भर हो चुका है । तो फिर अगला सवाल ये भी होगा कि चुनाव जीतने का प्रचार मंत्र भी जब गुगल , ट्विटर , सोशल मीडिया या कहें विदेशी मीडिया पर जा टिका है तो वहा भी भुगतान को डालर में ही करना पडता है । तो तस्वीर साफ होगी कि सवाल सिर्फ डॉलर की किमत बढने या रुपये का मूल्य कम होने भर का नहीं है बल्कि देश की राजनीतिक व्यवस्था ने सिर्फ तेल, कोयला, स्टील , सेव मेवा, प्याज, गेहू भर को डालर पर निर्भर नहीं किया है बल्कि एक वोट का लोकतंत्र भी डालर पर निर्भर हो चला है।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपाई के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुई है, यह लेखक के अपने विचार हैं )

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अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट के लिए पीएमओ के कहने पर किया गया नियमों में बदलाव

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फाइल फोटो

उपरोक्त संदर्भ में चौकीदार कौन है, नाम लेने की ज़रूरत नहीं है। वर्ना छापे पड़ जाएंगे और ट्विटर पर ट्रोल कहने लगेंगे कि कानून में विश्वास है तो केस जीत कर दिखाइये। जैसे भारत में फर्ज़ी केस ही नहीं बनता है और इंसाफ़ झट से मिल जाता है। आप लोग भी सावधान हो जाएं। आपके ख़िलाफ़ कुछ भी आरोप लगाया जा सकता है। अगर आप कुछ नहीं कर सकते हैं तो इतना तो कर दीजिए कि हिन्दी अख़बार लेना बंद कर दें या फिर ऐसा नहीं कर सकते तो हर महीने अलग अलग हिन्दी अख़बार लें, तभी पता चलेगा कि कैसे ये हिन्दी अख़बार सरकार की थमायी पर्ची को छाप कर ही आपसे महीने का 400-500 लूट रहे हैं। हिन्दी चैनलों का तो आप हाल जानते हैं। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसके लिए आपको 28 और 29 अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस में ऋतिका चोपड़ा की ख़बर बांचनी होगी।
आप सब इतना तो समझ ही सकते हैं कि इस तरह की ख़बर आपने अपने प्रिय हिन्दी अख़बार में कब देखी थी।

इंडियन एक्सप्रेस की ऋतिका चोपड़ा दो दिनों से लंबी-लंबी रिपोर्ट फाइल कर रही हैं कि किस तरह अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट के लिए पीएमओ के कहने पर नियमों में बदलाव किया गया। ऋतिका ने आर टी आई के ज़रिए मानव संसाधन मंत्रालय और पीएमओ के बीच पत्राचार हासिल कर यह रिपोर्ट तैयार की है। मानव संसाधन मंत्रालय ने शुरू में जो नियम बनाए थे उसके अनुसार अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को प्रतिष्ठित संस्थान का टैग नहीं मिल पाता। यहां तक कि वित्त मंत्रालय ने भी चेतावनी दी थी कि जिस संस्थान का कहीं कोई वजूद नहीं है उसे इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का लेबल देना तर्कों के ख़िलाफ़ है। इससे भारत में शिक्षा सिस्टम को ठेस पहुंचती है। इसके बाद भी अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को मानव संसाधन मंत्रालय की सूची में शामिल करने के लिए मजबूर किया गया।

वित्त मंत्रालय के ख़र्चा विभाग यानी डिपार्टमेंट आफ एक्सपेंडिचर ने मानव संसाधन मंत्रालय को लिखा था कि इस तरह से एक ऐसे संस्थान को आगे करना जिसकी अभी स्थापना तक नहीं हुई है, उन संस्थानों की तुलना में उसके ब्रांड वैल्यू को बढ़ाना होगा जिन्होंने अपने संस्थान की स्थापना कर ली है। इससे उनका उत्साह कम होगा। सिर्फ मंशा के आधार पर कि भविष्य में कुछ ऐसा करेंगे, किसी संस्थान को इंस्टीट्यूट ऑफ़ एमिनेंस का दर्जा देना तर्कों के ख़िलाफ़ है। इसलिए जो नए नियम बनाए गए हैं उनकी समीक्षा की जानी चाहिए।

वित्त मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय की राय के ख़िलाफ़ जाकर पीएमओ से अंबानी के जियो संस्थान को दर्जा दिलवाने की ख़बर आप इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ सकते हैं। भले ही इस खबर में यह नहीं है कि चौकीदार जी अंबानी के लिए इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं लेकिन इस ख़बर को पढ़ते ही आपको यही समझ आएगा। दो दिनों से ख़बर छप रही है मगर किसी ने खंडन नहीं किया है।

अडानी जी की एक कंपनी है। अडानी एंटरप्राइजेज़ लिमिटेड। यह कंपनी सिंगापुर के हाईकोर्ट में अपना केस हार चुकी है। भारत के रेवेन्यु इंटेलिजेंस ने कई पत्र जारी कर इस कंपनी के बारे में जवाब मांगे हैं, दुनिया के अलग अलग देशों से, तो इसके खिलाफ अडानी जी बांबे हाईकोर्ट गए हैं कि डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यु इंटेलिजेंस के लेटर्स रोगेटरी को रद्द कर दिया जाएगा। जब आप विदेशी मुल्क से न्यायिक मदद मांगते हैं तो उस मुल्क को लेटर ऑफ़ रोगेटरी जारी करना पड़ता है।

आप जानते हैं कि चौकीदार जी ने मुंबई के एक कार्यक्रम में हमारे मेहुल भाई कह दिया था। आप यह भी जानते हैं कि यही हमारे मेहुल भाई ने
महान भारत की नागरिकता छोड़ कर महान एंटीगुआ की नागरिकता ले ली है। चौकीदार जी के हमारे मेहुल भाई लगातार भारत को शर्मिंदा कर रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि वे भारत नहीं जाएंगे क्योंकि वहां के जेलों की हालत बहुत ख़राब है।

चौकीदार जी के हमारे मेहुल भाई पर मात्र 13,500 करोड़ के गबन के आरोप हैं। सरकार चाहे तो इनके लिए 1 करोड़ ख़र्च कर अलग से जेल बनवा सकती है, या किसी होटल के कमरे को जेल में बदल सकती है। कम से कम मेहुल भाई को वहां रहने में तो दिक्कत नहीं होगी। कहां तो काला धन आने वाला था, कहां काला धन वाले ही चले गए।

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले श्री रविशंकर का एक ट्विट घूमता है कि मोदी जी प्रधानमंत्री बनेंगे तो एक डॉलर 40 रुपये का हो जाएगा। फिलहाल यह 70 रुपये का हो गया है और भारत के इतिहास में इतना कभी कमज़ोर नहीं हुआ है। वैसे भी आप तक इसकी ख़बर प्रमुखता से नहीं पहुंची होगी और जिनके पास पहुंची है उनके लिए तर्क के पैमाने बदले जा रहे हैं।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं राजीव कुमार। राजीव ने कहा है कि हमें मुद्रा के आधार पर अर्थव्यवस्था को जज करने की मानसिकता छोड़नी ही पड़ेगी। मज़बूत मुद्रा में कुछ भी नहीं होता है।

वाकई ऐसे लोगों के अच्छे दिन हैं। कुछ भी तर्क देते हैं और मार्केट में चल जाता है। राजीव कुमार को पता नहीं है कि उनके चेयरमैन चौकीदार जी भी भारतीय रुपये की कमज़ोरी को दुनिया में भारत की गिरती साख और प्रतिष्ठा से जोड़ा करते थे। सबसे पहले उन्हें जाकर ये बात समझाएं। वैसे वे समझ गए होंगे।

वैसे आप कोई भी लेख पढ़ेंगे, उसमें यही होगा कि रुपया कमज़ोर होता है तो उसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। वित्तीय घाटा बढ़ता है। 2018 के साल में भारतीय रुपया ही दुनिया भर में सबसे ख़राब प्रदर्शन कर रहा है। वैसे रामदेव ने भी रजत शर्मा के आपकी अदालत में कहा था कि मोदी जी आ जाएंगे तो पेट्रोल 35 रुपया प्रति लीटर मिलेगा। इस समय तो कई शहरों में 86 और 87 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है।

ये सब सवाल पूछना बंद कर दीजिए वर्ना कोई आएगा फर्ज़ी कागज़ पर आपका नाम लिखा होगा और फंसा कर चला जाएगा। जब टीवी और अखबारों में इतना डर घुस जाए तभी शानदार मौका होता है कि आप अपनी मेहनत की कमाई का 1000 रुपया बचा लें। दोनों को बंद कर दें। कुछ नहीं तो कम से कम ये काम तो कर ही सकते हैं। हमेशा के लिए नहीं बंद कर सकते मगर एक महीने के लिए तो बंद कर ही सकते हैं।

(यह लेख मुख्यतः वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुआ है)

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