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अख़बारी और सरकारी नहीं है अंबेडकर जयंती:- रविश कुमार

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अंबेडकर जयंती की शुभकामनाएं। आप इस जयंती को अख़बारों में छपे सरकारी विज्ञापनों से मत आंकिए। नेताओं की आपसी होड़ के कारण अंबेडकर के विज्ञापन छपते हैं। मगर कोई नेता जाति तोड़ने और इसके नाम पर होने वाले उत्पीड़न के लिए पसीना नहीं बहाता है। अगर आप अपने आस-पास नज़र घुमाएंगे तो अख़बारों के इन विज्ञापनों और सरकारी कार्यक्रमों की ज़रूरत ही नज़र नहीं आएगी। 14 अप्रैल एक लोक उत्सव है। इस दिन डॉक्टर अंबेडकर की जयंती होती है लेकिन वो असंख्य लोगों की भी होती है। जब आप इसे लोक उत्सव के रूप में देखेंगे तभी आप समझ पाएंगे कि ऐसा क्या है कि आबादी का हिस्सा दिलो जान से अंबेडकर जयंती मनाता है और एक हिस्सा या तो नहीं मनाता है या फिर मनाने के नाम पर औपचारिकता निभा देता है।

अंबेडकर जयंती के पंद्रह दिन पहले से कार्यक्रम शुरु हो जाते हैं। पंद्रह दिन बाद तक चलते हैं। मुझे ही इतने बुलावे आते हैं कि ना कहने में भी पसीने छूट जाते हैं। आपको अंदाज़ा तक नहीं होगा कि ऐसे कार्यक्रमों की संख्या लाखों में होती है। भारत भर के मोहल्लों में, गलियों में लोग अपने पैसे से, अपने संसाधनों से अंबेडकर जयंती मनाते हैं। हर कार्यक्रम में भीड़ होती है। सार्वजनिक ही नहीं, घरों में भी जयंती को अपने बच्चे के पहले जन्मदिन की तरह मनाया जाता है। लोग नए और अच्छे कपड़े पहनकर निकलते हैं। भारत में क्या, दुनिया में किसी भी नेता या विचारक की जयंती इस स्तर पर नहीं मनाई जाती है। यह लोक उत्सव भारत का सबसे आधुनिक उत्सव है। 13 और 14 की मध्य रात्रि भीम दीवाली के रूप में मनाई जाती है। असंख्य गीत लिखे जाते हैं। वीडियो बनते हैं। भीम गीत गाने वाले कलाकारों को पानी पीने की फुर्सत नहीं होती है। असंख्य प्रतियोगिता कार्यक्रम होते हैं।

आज के सभी अखबारों में अंबेडकर जयंती पर खूब सारे सरकारी विज्ञापन होंगे मगर उन्हीं अखबारों में अंबेडकर जयंती की समझभरी रिपोर्टिंग नहीं होगी। अव्वल तो होगी नहीं और होगी तो दो चार तस्वीरें लगाकर खानापूर्ति कर दी जाएगी। हम सभी को समझना चाहिए कि अंबेडकर जयंती अख़बारी और सरकारी कार्यक्रम नहीं है, यह लोक उत्सव है। एक तबका इस जयंती की तरफ देखता नहीं, एक तबका अपने सियासी इस्तमाल के लिए देखता है और एक तबका है जो इन सबकी चिन्ता को छोड़ कर अपने बाबा साहब की जयंती मना रहा होता है।

डॉ अंबेडकर अकेले हैं जो बाबा भी हैं और साहब भी और डॉक्टर भी क्योंकि डॉ अंबेडकर ने तार्किकता की बात की। उनकी बातों से बिल्कुल असहमत होना चाहिए। असहमति तो अंबेडकर ख़ुद ही प्रोत्साहित करते थे क्योंकि असहमति के सबसे बड़े ब्रांड अंबेसडर तो वही थे। लेकिन वे चाहते थे कि आप तार्किकता के सहारे बात करें, धार्मिकता का सहारा लेकर तर्कों को साबित न करें। जो लोग मूर्तियां तोड़ रहे हैं, वह इतनी सी बात भी नहीं समझते कि अंबेडकर ख़ुद ही मूर्तिभंजक थे। उन्होंने मूर्तियों को स्वीकार नहीं किया। मूर्तियों से अंबेडकर को कोई फर्क नहीं पड़ता है मगर तोड़ने वालों की मानसिकता से आपको फर्क पड़ना चाहिए। आपको दुख होना चाहिए कि उनकी मूर्तियां पिजड़े में कैद हैं। बगल में सिपाही पहरा दे रहा है। यह प्रमाण है कि आज भी जाति को लेकर नफ़रत किस हद तक है। सोचिए आज भी जब अंबेडकर की मूर्ति से इतनी नफ़रत है तो उन्हें मानने वालों से कितनी नफ़रत होगी। लेकिन अगर आप जयंती को समझना चाहते हैं कि उन घरों में जाइये जहां मनाई जा रही है, हो सके तो अपने घर में मना लीजिए। जाति को तोड़िए, मूर्ति को नहीं।

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वाराणसी में किया गया हनुमान जी के जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदन

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अब इस से बड़ा उदाहरण क्या होगा इस बात का की राजनीति में सब कुछ जायज है. अपने फ़ायदे के लिये किसी भी चीज को मुद्दा बनाकर राजनीति की जाती है, फिर चाहे भगवान ही क्यों न हों. ताज़ा मामला भगवान राम के बाद हनुमान को दलित बताने के बाद मचे सियासी घमासान का है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों एक चुनावी रैली में हनुमान को दलित समुदाय का बताया था, जिस पर राजनीति शुरू हो गई है. उत्तर प्रदेश के ही एक जिले में जहां दलित समुदाय द्वारा बजरंगबली के एक मंदिर पर कब्जे की खबर सामने आई, तो अब पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हनुमान जी का जाति प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है. इसके लिए बाकायदा आवेदन किया गया है.

जिला मुख्यालय पर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के युवजन सभा के लोग इकट्ठा हुए और उन्होंनेबजरंगबली के जाति प्रमाण पत्र की मांग की. इसके लिये कार्यकर्ताओं ने बाकायदा जाति प्रमाण पत्र प्राप्त का आवेदन फॉर्म भरा. रोचक बात यह है कि कार्यकर्ताओं ने आवेदन फॉर्म में वांछित जानकारी भी भरी है. जैसे, बजरंगबली के पिता का नाम महाराज केशरी, जाति में वनवासी आदि भरा हुआ है. कार्यकर्ता फॉर्म लेकर कार्यालय में गए और जाति प्रमाणपत्र की मांग की. प्रगतिशील युवजन सभा के लोग हनुमान जी के दलित होने पर उनके आरक्षण की भी मांग कर रहे है. सभा के जिला अध्यक्ष हरीश मिश्रा कहते हैं कि पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ ने हनुमान जी को दलित बताया था. उसी क्रम में आज यहां उनके जाती प्रमाण के लिए आवेदन दिया गया.

हरीश मिश्रा ने कहा कि जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी द्वारा लगातार भगवान को राजनीति में घसीटा जा रहा है, उसके विरोधस्वरूप हमने ये कदम उठाया. पहले राम जी को घसीटा, अब हनुमान को. अगर वह दलित हैं तो जाति प्रमाण पत्र दें और हम उनके आरक्षण की भी मांग करेंगे. आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों राजस्थान के अलवर में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘बजरंगबली एक ऐसे लोक देवता हैं, जो स्वयं वनवासी हैं, निर्वासी हैं, दलित हैं, वंचित हैं. भारतीय समुदाय को उत्तर से लेकर दक्षिण तक पुरब से पश्चिम तक सबको जोड़ने का काम बजरंगबली करते हैं.’

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मंत्री भी तलने लगे पकौड़ा- सरकार को भी मिला रोज़गार:- रवीश कुमार

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प्रधान सेवक के सच्चे सेवक। पकौड़ा तलते हुए मंत्री जी। स्व-रोज़गार जनता का है या सरकार का? सरकार रोज़गार दे नहीं सकती( कोई भी सरकार) तो वह आपके रोज़गार को अपना तो बता ही सकती है। प्रधानमंत्री के पकौड़ा तलने की बात की आलोचना हुई, लतीफ़े बने और लोग भूल गए। मंत्री जी उनकी बात को सैद्धांतिक जामा पहनाते हुए। अपने फ़िटनेस का प्रदर्शन काम से ज्यादा करते हैं।तस्वीरों के ज़रिए लोगों के मन में कई परतें बनानी होती हैं। नेता सामान्य है यह सबसे बड़ी तस्वीर है। यह समोसा खाकर या पकौड़ा तल कर हासिल की जा सकती है। जनता अपने चश्मे का नंबर बदले या शीशा साफ़ करे, उलझन में है। चुनाव नेता का मनोरंजन है और जनता का रसरंजन। नौजवान पकौड़ा तलें। परीक्षा की तैयारी न करें। हिन्दू- मुस्लिम कीजिए। नेता यही चाहते हैं। रोज़गार की चिन्ता न करें। पकौड़ा कभी भी तला जा सकता है। दरअसल यहाँ पकौड़ा नहीं जनता के अरमानों को तला जा रहा है।

तस्वीर – राजस्थान पत्रिका से साभार

नोट- कई लोग कमेंट में लिख रहे हैं कि जकार्ता एशियाड में मंत्री जी खिलाड़ियों को नाश्ता पेश कर रहे थे। 26 अगस्त को उनकी ट्रे लेकर जाते हुए तस्वीर ट्वीट होती है जिसमें इस बारे में कुछ नहीं लिखा होता है। सिर्फ तस्वीर होत है। सबने अतिउत्साह में यह खबर चला दी कि मंत्री नाश्ता पेश कर रहे हैं जो कि सही नहीं था। Alt news ने उस पर विस्तार से लिखा था, आप देख सकते हैं। मगर आल्ट न्यूज़ से ज्यादा लोगों तक तस्वीर के बहाने झूठी कहानी पहुंची और दिमाग़ में रह गई। अब आप चेक नहीं करेंगे, खुद को सतर्क नहीं रखेंगे तो ऐसी छवियों के जाल में फंसेंगे।

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मध्यप्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनाव 2019, योगी होंगे भाजपा में हिंदुत्व का मुख्य चेहरा

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चुनावी बयार शुरू होने को है और भाजपा ने हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगने के लिए हिंदुत्वा का खेहरा भी सामने खड़ा कर दिया है है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में भाजपा की प्रदेश इकाई चाहती है कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधानसभा चुनावों में प्रचार करें। पार्टी का मानना है कि योगी आदित्यनाथ के सहारे हिंदू वोट पाने में सफलता मिलेगी।

अमर उजाला के सौजन्य से मिली खबर के अनुसार , बता दें कि योगी आदित्यनाथ ने मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था। वह गोरखनाथ पीठ के महंत भी हैं। इससे पहले उन्होंने 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश और 2018 में कर्नाटक  में चुनावों के दौरान पार्टी का प्रचार किया था। मध्यप्रदेश भाजपा के नेता राजेश अग्रवाल ने बताया, “पार्टी हाईकमान योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम के आधार पर फैसला लेगी। हम चाहते हैं कि वह प्रदेश में चुनाव प्रचार करें क्योंकि वह यहां लोकप्रिय है और उनका प्रभाव पड़ेगा।”

राजस्थान भाजपा के प्रवक्ता मुकेश पारिख ने कहा कि योगी आदित्यनाथ की छवि के कारण प्रदेश में उनकी मांग है। वह एक उम्दा वक्त के साथ-साथ धार्मिक नेता हैं और उनकी छवि लोगों को आकर्षित करती है।

वरिष्ठ नेता ओंकार सिंह लाखवत ने कहा कि योगी आदित्यनाथ, नाथ संप्रदाय के मुखिया हैं और इस संप्रदाय का राजस्थान में बहुत प्रभाव है। नवीं शताब्दी में मारवाड़ और अलवर का इलाका नाथ संप्रदाय के केंद्रों में से एक था लिहाजा इन क्षेत्रों में उनके प्रचार से असर पड़ेगा। पार्टी सूत्रों की मानें तो नवंबर के पहले सप्ताह में योगी आदित्यनाथ राज्य में प्रचार कर सकते हैं।

बता दें कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ छत्तीसगढ़ में पहले से ही चुनाव प्रचार कर रहे हैं। मंगलवार को उन्होंने मुख्यमंत्री रमन सिंह के नामांकन के बाद एक भाषण भी दिया। योगी ने रामायण का संदर्भ देते हुए मतदाताओं से रमन सिंह को लगातार चौथी बार जीताने की अपील की। नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने खुद से 20 साल छोटे योगी के पांव भी छुए।

चुनावी सर्वे मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर होने जबकि राजस्थान में कांग्रेस की सत्ता में वापसी का अनुमान लगा रहे हैं। मध्यप्रदेश में एक ही चरण में 28 नवंबर और राजस्थान में 7 दिसंबर को मतदान होंगे।

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