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45 साल में सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी की रिपोर्ट से डर गई सरकार

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2017-18 के लिए नेशनल सैंपल सर्वे आफिस की तरफ से कराये जाने वाले श्रम शक्ति सर्वे के नतीजों को सरकार दबा रही है। इस साल पिछले 45 साल में बेरोज़गारी की दर सबसे अधिक रही है। दिसंबर 2018 के पहले हफ्ते में राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग( NSC) ने सर्वे को मंज़ूर कर सरकार के पास भेज दिया लेकिन सरकार उस पर बैठ गई। यही आरोप लगाते हुए आयोग के प्रभारी प्रमुख मोहनन और एक सदस्य जे वी मीमांसा ने इस्तीफ़ा दे दिया है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड के सोमेश झा ने इस रिपोर्ट की बातें सामने ला दी है। एक रिपोर्टर का यही काम होता है। जो सरकार छिपाए उसे बाहर ला दे। अब सोचिए अगर सरकार खुद यह रिपोर्ट जारी करे कि 2017-18 में बेरोज़गारी की दर 6.1 हो गई थी जो 45 साल में सबसे अधिक है तो उसकी नाकामियों का ढोल फट जाएगा। इतनी बेरोज़गारी तो 1972-73 में थी। शहरों में तो बेरोज़गारी की दर 7.8 प्रतिशत हो गई थी और काम न मिलने के कारण लोग घरों में बैठने लगे थे।

सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इंकॉनमी(CMIE) के महेश व्यास तो पिछले तीन साल से बेरोज़गारी के आँकड़े सामने ला रहे हैं। उनके कारण जब बेरोज़गारी के आँकड़ों पर बात होने लगी तो सरकार ने लेबर रिपोर्ट जारी करनी बंद कर दी। उन्होंने पिछले महीने के प्राइम टाइम में बताया था कि बेरोज़गारी की दर नौ प्रतिशत से भी ज़्यादा है जो कि अति है।

आप इंटरनेट पर रोज़गार और रोज़गार के आँकड़ों से संबंधित ख़बरों को सर्च करें। आपको पता चलेगा कि लोगों में उम्मीद पैदा करते रहने के लिए ख़बरें पैदा की जाती रही हैं। बाद में उन ख़बरों का कोई अता-पता नहीं मिलता है। जैसे फ़रवरी 2018 में सरकार अपने मंत्रालयों से कहती है कि अपने सेक्टर में पैदा हुए रोज़गार की सूची बनाएँ। एक साल बाद वो सूची कहाँ हैं।

पिछले साल टी सी ए अनंत की अध्यक्षता में एक नया पैनल बना था। उसे बताना था कि रोज़गार के विश्वसनीय आँकड़े जमा करने के लिए क्या किया जाए। इसके नाम पहले जो लेबर रिपोर्ट जारी होती थी, वह बंद कर दी गई। जुलाई 2018 इस पैनल को अपनी रिपोर्ट देनी थी मगर उसने छह महीने का विस्तार माँग लिया।

इसीलिए बेहतर आँकड़े की व्यवस्था के नाम पर उन्होंने पुरानी रिपोर्ट बंद कर दी क्योंकि उसके कारण सवाल उठने लगते थे। अब जब राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग की रिपोर्ट आई है तो उसे दबाया जा रहा है। सोचिए सरकार चाहती है कि आप उसका मूल्याँकन सिर्फ झूठ, धार्मिक और भावुक बातों पर करें।

सरकार की आर्थिक नीतियाँ फ़ेल हो चुकी हैं। इसलिए
भाषण को आकर्षक बनाए रखने के लिए अमरीकी मॉडल की तरह स्टेडियम को सजाया जा रहा है। अच्छी लाइटिंग के ज़रिए प्रधानमंत्री को फिर से महान उपदेशक की तरह पेश किया जा रहा है। उन्होंने शिक्षा और रोज़गार को अपने एजेंडे और भाषणों से ग़ायब कर दिया है। उन्हें पता है कि अब काम करने का मौक़ा भी चला गया।

इसलिए उन्होंने एक तरह प्रधानमंत्री कार्यालय छोड़ सा दिया है। भारत के प्रधानमंत्री सौ सौ रैलियाँ कर रहा हैं लेकिन एक में भी शिक्षा और रोज़गार पर बात नहीं कर रहे हैं। मैंने इतना नौजवान विरोधी प्रधानमंत्री नहीं देखा। सरकारी ख़र्चे पर होने वाली इन सौ रैलियों के कारण प्रधानमंत्री बीस दिन के बराबर काम नहीं करेंगे। इसे अगर बारह-बारह घंटे में बाँटे तो चालीस दिन के बराबर काम नहीं करेंगे। वे दिन रात कैमरे की नज़र में रहते हैं। आप ही सोचिए वे काम कब करते हैं ?

न्यूज़ चैनलों के ज़रिए धार्मिक मसलों का बवंडर पैदा किया जा रहा है ताकि लोगों के सवाल बदल जाएँ। वे नौकरी छोड़ कर सेना की बहादुरी और मंदिर की बात करने लग जाएँ। हमारी सेना तो हमेशा से ही बहादुर रही है। सारी दुनिया लोहा मानती है। प्रधानमंत्री क्यों बार बार सेना-सेना कर रहे हैं? क्या सैनिक के बच्चे को शिक्षा और रोज़गार नहीं चाहिए? उन्हें पता है कि धार्मिक कट्टरता ही बचा सकती है। इसलिए एक तरफ अर्ध कुंभ को कुंभ बताकर माहौल बनवाया जा रहा है तो दूसरी तरह रोज़गार के सवाल ग़ायब करने के लिए अनाप-शनाप मुद्दे पैदा किए जा रहे हैं।

हे भारत के बेरोज़गार नौजवानों ईश्वर तुम्हारा भला करे ! मगर वो भी नहीं करेगा क्योंकि उसका भी इस्तमाल चुनाव में होने लगा है। तुम्हारी नियति पर किसी ने कील ठीक दी है। हर बार नाम बताने की ज़रूरत नहीं है।

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जम्मू-कश्मीर आंतरिक कलह या अंतरराष्ट्रीय विवादित क्षेत्र

जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के भारत सरकार के क़दम को लेकर कई हलकों से बहुत गंभीर प्रतिक्रियाएं आई हैं.

सबसे अहम प्रतिक्रिया भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन से आई, जो जम्मू-कश्मीर प्रांत के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण रखते हैं. भारत इन हिस्सों पर अपना दावा करता है.

इसे याद रखना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों ही पड़ोसी मुल्क परमाणु शक्ति संपन्न हैं और इनके बीच आपसी ताल्लुकात भी विशेष हैं. ये दोनों भारत के साथ युद्ध भी लड़ चुके हैं.

सीमा विवाद और अन्य तनावों के कारण इन दोनों देशों के साथ भारत के संबंध लंबे वक़्त से प्रतिकूल रहे हैं.

यह पृष्ठभूमि ही इतना बताने के लिए काफ़ी है कि आख़िर क्यों पाकिस्तानी नेतृत्व ने पहले तो अपने कमांडरों और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के साथ गहन विचार-विमर्श किया और फिर अपनी संसद का संयुक्त सत्र बुलाया.

 

संसद में यह प्रस्ताव रखा गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से भारत की ओर से उठाए गए क़दम पर आपातकालीन सत्र बुलाने का आग्रह किया जाए.

पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा ने कश्मीरियों की मदद के लिए सेना के ‘किसी भी हद तक जाने’ के लिए तैयार होने की बात कही है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत के इस फ़ैसले पर दो तरह की संभावनाओं की ओर इशारा किया. उन्होंने दोबारा ‘पुलवामा’ जैसे आत्मघाती हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध की बात की.

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की दूसरी बैठक के बाद पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर कुछ नीतिगत फै़सलों का ऐलान किया- उच्चायुक्तों को वापस बुलाना, द्विपक्षीय व्यापार रोकना और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर निए सिरे से विचार करना.

हालांकि, इनके बयानों को दुनिया के अधिकांश देश उनकी अपनी जनता के बीच की गई बयानबाज़ी के रूप में देख रहे हैं. उनका मानना है कि पाकिस्तान किसी भी तरह की भारत विरोधी गंभीर कार्रवाई शुरू करने की स्थिति में ही नहीं है.

अगर चीन के साथ उसके अहम रिश्ते को केंद्र में रखकर देखें तो पाकिस्तान की ये प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं. विशेषज्ञ पाकिस्तान को चीन के संरक्षण में रहते हुए उसी की भाषा बोलने वाला बताते हैं.

जैसा कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान होता आया है, इस बार भी चीन की प्रतिक्रिया ने ही पाकिस्तान का रुख़ तय किया.

भारत के मामले में चीन छद्म रूप से पाकिस्तान का इस्तेमाल करता आया है जबकि ख़ुद हमेशा नपे-तुले क़दम चलता है. ऐसे में चीन की प्रतिक्रिया, जिसके गहरे मायने हैं, उसका गंभीर विश्लेषण और व्याख्या करने की ज़रूरत है.

सबसे पहले तो वैश्विक स्तर पर चीन आज एक बड़ा कद्दावर देश है जहां उसका एक छोटा से छोटा क़दम भी काफी वज़नदार लगता है. ख़ासकर बात जब एशियाई मामलों की आती है तो निश्चित तौर पर यहां वह हर मामले में सबसे बड़े देश के रूप में अपनी पहचान रखता है

हाल के दिनों में दुनिया ने चीन की विस्तारवादी नीतियों को देखा है जो अपने पड़ोसी मुल्कों में भारत को उभरते समकक्ष प्रतियोगी के रूप में पाता है.

अमरीका और उसके जो मित्र देश चीन की इन विस्तारवादी नीतियों का विरोध करते हैं, उनकी भारत से बढ़ती क़रीबी चीन के लिए चिंता का विषय रहा है. भारत द्वारा अपने जम्मू-कश्मीर प्रांत का पुनर्गठन किए जाने को लेकर चीन की ‘चिंता’ का कारण यह भी है.

जम्मू-कश्मीर प्रांत के अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर और शक्सगाम घाटी के 5,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाक़े पर चीन का नियंत्रण है.

जम्मू-कश्मीर के इस पुनर्गठन के बाद आई चीन की प्रतिक्रिया ने दोनों देशों के बीच पहले से चले आ रहे सीमा विवाद को एक बार फिर उभार दिया है, जिसका प्रभाव चीन और भारत के आपसी संबंधों से परे भी है.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, “चीन अपनी पश्चिमी सीमा के इलाक़े को भारत के प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल किए जाने का हमेशा ही विरोध करता रहा है.”

यह समझना आसान है कि चीन ने यह बात क्यों दोहराई. मगर चीन की चिंताएं उसके इस कथन से प्रकट होती हैं- “हाल ही में भारत ने अपने एकतरफ़ा क़ानून बदलकर चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को कम आंकना जारी रखा है. यह अस्वीकार्य है और यह प्रभाव में नहीं आएगा.”

ज़ाहिर है, यह अचानक इस तरह का बयान आया तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसे ‘भारत का आंतरिक मामला’ बताते हुए कहा कि ‘भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता और उम्मीद करता है कि दूसरे देश भी ऐसा ही करेंगे.’

दूसरा, चीन हमेशा की तरह भारत-पाकिस्तान तनाव पर ध्यान केंद्रित करते एक बार फिर ख़ुद को थर्ड अंपायर की तरह पेश करने का मौक़ा तलाश रहा है.

अपने लिखित जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, “संबंधित पक्षों को संयम और एहतियात बरतते हुए विवेकपूर्ण तरीक़े से कार्य करने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे कार्य करने से बचना चाहिए जो एकतरफ़ा रूप से यथास्थिति को बदलकर तनाव बढ़ा सकते हैं. हम दोनों पक्षों से संबंधित विवाद पर संवाद और परामर्श के ज़रिए शांतिपूर्वक हल करने और क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बनाए रखने का आग्रह करते हैं.”

चीन की ये प्रतिक्रिया निश्चित ही शिमला समझौते की भावनाओं और लगातार दी गई भारत की उस सफ़ाई के ख़िलाफ़ जाती है कि भारत-पाकिस्तान तनाव में चीन मध्यस्थ या किसी और तरह की कोई भूमिका नहीं चाहता.

यही नहीं, यह चीन के मसले पर समय-समय पर चीनी नेताओं की ओर से दिए गए नीति आधारित बयानों के भी ख़िलाफ़ है. चीन के प्रसिद्ध विदेश मंत्री छिएँन छीचेन के 1989 में नेपाल में दिए बयान से लेकर राष्ट्रपति चियांग चेमिन के 1996 में पाकिस्तानी सेनट में दिए भाषण का ही नतीजा था कि उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के कश्मीर के मुद्दे को सुरक्षा परिषद में उठाने से दो टूक मना कर दिया था.

कारगिल युद्ध तो वह दौर था जब भारत-पाकिस्तान तनाव को लेकर चीन की तटस्थता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण देखने को मिला था.

अंतरराष्ट्रीय दख़ल

तीसरा, जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन को भारत-पाकिस्तान के बीच का मुद्दा बताने के पीछे चीन की मंशा यह है कि वह बताना चाहता है कि यह भारत का आंतरिक मामला नहीं है. वह यह दिखाना चाहता है कि तटस्थ खिलाड़ी के तौर पर वह भारत-पाकिस्तान तनाव में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से समाधान का कोई परोक्ष मक़सद नहीं रखता है.

हाल ही में जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की भूमिका निभाने को कहा है, तब चीन ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि कश्मीर विवाद के निपटारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक रचनात्मक किरदार निभा सकता है.

यह पाकिस्तान के साथ उसके विशेष रिश्ते और जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से पर उसके कब्ज़े को देखते हुए मज़ाक की तरह लग रहा है.

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चीन का पाकिस्तान के साथ समझौता?

चौथा, चीन ने इस पर अपनी गंभीर चिंता जताई है कि भारत ने यथास्थिति में एकतरफ़ा बदलाव किया है जो इस क्षेत्र में तनाव को इतना बढ़ा सकता है कि चीन भारत के आंतरिक मामलों में दख़ल देने लगे.

साथ ही, अगर चीन मानता कि यह विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच का ही है तो उसका पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ जाने का बयान देना पूरी तरह अनुचित है.

मार्च 1963 को चीन-पाकिस्तान के बीच हुए सीमा समझौते में पाकिस्तान ने अपने कब्ज़े वाली शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी थी.

उसी समझौते के अनुच्छेद-6 में यह लिखा गया है कि “पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर विवाद के निपटारे के बाद, सीमा को लेकर संप्रभुता की वार्ता पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार के साथ फिर शुरू होगी.”

क्या इसका यह मतलब नहीं निकलता कि चीन को तब तक शांत रहना चाहिए जब तक कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर द्विपक्षीय समाधान नहीं कर लेते?

तो क्या बढ़ेगी भारत की सीमाई सुरक्षा?

बौद्ध बहुल लद्दाख को नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने के भारत के फ़ैसले से भी चीन हैरान दिख रहा है, जिसकी सीमा तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र से लगी हुई है.

अब यह इलाक़ा सीधे भारत की केंद्र सरकार के अधीन हो रहा है जहां दलाई लामा समेत सैकड़ों की संख्या में तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं.

शायद इसी कारण नई दिल्ली में चीन के राजदूत याओ जिंग ने भारतीय मीडिया से कहा कि कश्मीर “अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र है” और सुरक्षा परिषद का स्थानीय सदस्य होने के नाते उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करे.

विवादित जम्मू-कश्मीर से अलग होने पर लद्दाख में मनाई जा रही खुशी भारत के इस हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र में चीन के प्रभाव का मुक़ाबला करने में मदद कर सकती है जहां बौद्धों की पर्याप्त उपस्थिति है.

वास्तव में, चीन और पाकिस्तान से सटे जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन से नई दिल्ली अपनी सीमाओं के बेहतर नियंत्रण और प्रबंधन की उम्मीद कर रहा है.

पुनर्गठन की प्रक्रिया के गुणों और इसकी आंतरिक जटिलताओं को एक तरफ़ रखा जाए तो जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन से भारत की सरहदी सुरक्षा बेहतर होगी और इसी वजह से चीन और पाकिस्तान दोनों बेचैन हैं.

साभार: डॉक्टर स्वर्ण सिंह, (प्रोफ़ेसर) जेएनयू, दिल्ली

 

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क्या है UAPA संशोधन बिल 2019, और क्यों हो रहा है इसका विरोध…

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UAPA बिल 2019 राज्यसभा से भी पास हो गया है आइए जानते हैं क्या है UAPA बिल और उसका इतना विरोध क्यों हो रहा है?

NIA को मिले असीमित अधिकार..

UAPA, Unlawful Activities Prevention Act 2019 (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून)बिल 2019 को संसद में काफी गर्मागर्म बहस के बाद पास कर दिया गया है. विपक्ष ने इस बिल को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई जिस पर  गृहमंत्री अमित शाह ने सिलसिलेवार तरीके से विपक्ष के सवालों का जवाब दिया है.

शाह ने कहा कि, ”यहां उस प्रावधान की ज़रूरत है जिसके तहत किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित किया जा सके. ऐसा संयुक्त राष्ट्र करता है. अमरीका, पाकिस्तान, चीन, इसराइल और यूरोपीय यूनियन में भी यह प्रावधान है. सबने आतंकवाद के ख़िलाफ़ ऐसा प्रावधान बना रखा है.”

इस बिल को लेकर जो सबसे ज्यादा सवाल उठाए जा रहे हैं, वो इसके गलत इस्तेमाल की आशंका के हैं. इस बिल के कानून बनने के बाद किसी भी व्यक्ति को आतंकी घोषित किया जा सकता है. आतंकी होने के नाम पर उसकी संपत्ति जब्त की जा सकती है. इस बिल ने NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को असीमित अधिकार दे दिए हैं.

ओवैसी ने यूएपीए के दुरुपयोग पर लोकसभा में कहा था, ”मैं इसके लिए कांग्रेस पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराता हूं क्योंकि उसी ने यह क़ानून बनाया था. मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि इस क़ानून का पीड़ित कौन है?”

ओवैसी ने कहा कि किसी को भी आतंकवादी आप तभी कह सकते हैं जब कोर्ट उसे सबूतों के आधार पर दोषी पाती है. ओवैसी ने पूछा कि सरकार महसूस करती है कि कोई व्यक्ति आतंकवादी है तो उसे आतंकवादी घोषित कर देगी. उन्होंने कहा था कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है.

सवाल है कि क्या सच में ऐसा है? UAPA बिल के पास हो जाने के बाद क्या हो जाएगा? इसे जानने की कोशिश करते हैं.

क्याहैUAPAबिल2019?
देश में आतंकवाद व् नक्सलवाद की समस्या को देखते हुए, आतंकी संगठनों और आतंकवादियों को  सबक सिखाने के लिए UAPA बिल 2019 को मंजूरी दी गई है. सरकार के अनुसार, ये मोदी सरकार के आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को प्रदर्शित करने वाला बिल है. लोकसभा ने इस बिल को 24 जुलाई को पास कर दिया था. अब राज्यसभा ने भी इसे पास कर दिया है.

इस बिल का मकसद आतंकवाद की घटनाओं में कमी लाना, आतंकी घटनाओं की स्पीडी जांच करना और आतंकियों को जल्दी सजा दिलवाना है. दरअसल ये देश की एकता और अखंडता पर चोट करने वाले के खिलाफ सरकार को असीमित अधिकार देती है. लेकिन इसी असीमित अधिकार की वजह से विपक्ष को लगता है कि सरकार और उसकी मशीनरी इसका गलत इस्तेमाल कर सकती है.

UAPA बिल के प्रावधानों के मुताबिक सरकार को क्या अधिकार मिले हैं?

  • संशोधित बिल के बाद सरकार किसी भी तरह से आतंकी गतिविधियों में शामिल संगठन या व्यक्ति को आतंकी घोषित कर सकती है. सरकार सबूत नहीं होने की हालत में भी, सिर्फ शक के आधार पर ही किसी को आतंकी घोषित कर सकती है.
  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को इस बिल में असीमित अधिकार दिए गए हैं. बिल के कानून बनने के बाद इंस्पेक्टर रैंक या उससे बड़ी रैंक के किसी भी अधिकारी को किसी भी मामले की जांच की पूरी छूट मिल जाएगी. हालांकि जांच शुरू करने से पहले उन्हें डायरेक्टर जनरल से परमिशन लेनी होगी.
  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के महानिदेशक (DG) को ये अधिकार मिल जाएगा कि वो आतंकी गतिविधि में शामिल व्यक्ति की संपत्ति जब्त कर ले या उसे कुर्क कर सके. इसके पहले जिस राज्य में संपत्ति है, उसके डीजीपी से अनुमति लेनी पड़ती थी.
  • कानून बनने के बाद किसी आतंकी संगठन या आतंकवादी की निजी या आर्थिक जानकारी पश्चिमी देशों के साथ शेयर की जा सकती है.
  • ये बिल एनआईए को ये अधिकार देता है कि वो किसी भी राज्य में जाकर रेड कर सकता है. इसके लिए राज्य सरकार या उसकी पुलिस से अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं है.
  • बिल के कानून बनने के बाद एनआईए के डीएसपी, अस्टिटेंट कमिश्नर या इससे ऊंचे रैंक के अधिकारी मामले की जांच कर सकते हैं.

बिल को लेकर विपक्ष ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं. खासकर किसी भी राज्य की अनुमति के बिना रेड और कुर्की-जब्ती के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता जाहिर की गयी है. कांग्रेस के पी चिदंबरम और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं. हालांकि कुछ मामलों में सरकार ने रिव्यू का प्रावधान रखा है.

गलत इस्तेमाल को लेकर ये सब प्रावधान किए गए हैं-

-बिल में मिले अधिकारों के गलत इस्तेमाल को लेकर गृहमंत्रालय की ओर से कहा गया है कि अगर किसी व्यक्ति को आंतकी घोषित किया जाता है तो वो गृहसचिव के सामने अपील कर सकता है. गृह सचिव को 45 दिन के भीतर अपील पर फैसला लेना होगा.

-केंद्र सरकार इस एक्ट के मुताबिक एक रिव्यू कमिटी बना सकती है. जिसके सामने आतंकी घोषित संगठन या व्यक्ति अपील कर सकता है और वहां सुनवाई की गुजारिश कर सकता है.

-अगर कोई व्यक्ति गृह सचिव के फैसले से संतुष्ट नहीं हो तो वो कमिटी में अपील कर सकता है. कमिटी में हाईकोर्ट के सीटिंग या रिटायर्ड जज के साथ कम से कम केंद्र सरकार के दो गृहसचिव रैंक के रिटायर्ड अधिकारी होंगे.

-केंद्र सरकार का कहना है कि इस कानून का इस्तेमाल सावधानी से होगा. यासिन भटकल और मसूद अजहर जैसे आतंकियों से निपटने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जाएगा.

-सरकार का कहना है कि इस कानून के बाद आतंकवाद की ओर प्रेरित लोग नए ग्रुप बनाने से बचेंगे.

-बिल के प्रावधान आतंकियों पर लगाम लगाने के लिए यूएन के सिक्योरिटी काउंसिल के नियम कायदों की तरह हैं.

 

 

 

 

 

 

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रवीश कुमार को मिला एशिया का नोबेल रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड

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NDTV में चिट्ठियां छांटने से लेकर पत्रकारिता के शिखर पर पहुंचने तक का सफर

 वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को 2019 का प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे सम्मान दिया जाएगा. यह सम्मान एशियाई समाज में साहसिक और परिवर्तनकारी नेतृत्व के लिए दिया गया है.

पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर  रवीश कुमार  को एक बार फिर सम्मानित किया गया है. इस बार उन्हें वर्ष 2019 के ‘रेमन मैगसेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. एनडीटीवी के रवीश कुमार को ये सम्मान हिंदी टीवी पत्रकारिता में उनके योगदान के लिए मिला है. ‘रेमन मैगसेसे’ को एशिया का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है.

रवीश कुमार के अलावा वर्ष 2019 रैमॉन मैगसेसे अवार्ड के चार अन्य विजेताओं में म्यांमार से को स्वे विन, थाईलैंड से अंगखाना नीलापजीत, फिलीपींस से रेमुंडो पुजांते कैयाब और दक्षिण कोरिया से किम जोंग हैं.

अवॉर्ड देने वाले संस्थान ने कहा है कि रवीश कुमार अपनी पत्रकारिता के ज़रिए उनकी आवाज़ को मुख्यधारा में ले आए, जिनकी हमेशा उपेक्षा की जाती है. रेमन मैग्सेसे संस्थान की ओर से कहा गया है कि अगर आप लोगों की आवाज़ बनते हैं तो आप पत्रकार हैं.

रेमन मैग्सेस अवॉर्ड फ़ाउंडेशन ने रवीश कुमार की पत्रकारिता को उच्चस्तरीय, सत्य के प्रति निष्ठा, ईमानदार और निष्पक्ष बताया है. फ़ाउंडेशन ने कहा है कि रवीश कुमार ने बेज़ुबानों को आवाज़ दी है.

इससे पहले बेहतरीन पत्रकारिता के लिए पी साईनाथ को भी मैग्सेसे सम्मान मिल चुका है. इसके अलावा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, अरुणा रॉय और संजीव चतुर्वेदी समेत कई भारतीयों को मिला है.

बता दें कि रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार एशिया के व्यक्तियों और संस्थाओं को उनके अपने क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय कार्य करने के लिए प्रदान किया जाता है. यह पुरस्कार फिलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रैमॉन मैगसेसे की याद में दिया जाता है.

पुरस्कार संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान “बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है.” रैमॉन मैगसेसे अवार्ड फाउंडेशन ने इस संबंध में कहा, “रवीश कुमार का कार्यक्रम ‘प्राइम टाइम’ ‘आम लोगों की वास्तविक, अनकही समस्याओं को उठाता है.” साथ ही प्रशस्ति पत्र में कहा गया, ‘अगर आप लोगों की अवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं.’ रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं जिनको यह पुरस्कार मिला है. इससे पहले अमिताभ चौधरी (1961), बीजी वर्गीज (1975), अरुण शौरी (1982), आरके लक्ष्मण (1984), पी. साईंनाथ (2007) को यह पुरस्कार मिल चुका है.

वर्ष 1996 से रवीश कुमार एनडीटीवी से जुड़े रहे हैं. शुरुआती दिनों में एनडीटीवी में आई चिट्ठियां छांटा करते थे. इसके बाद वो रिपोर्टिंग की ओर मुड़े और उनकी सजग आंख देश और समाज की विडंबनाओं को अचूक ढंग से पहचानती रही. उनका कार्यक्रम ‘रवीश की रिपोर्ट’ बेहद चर्चित हुआ और हिंदुस्तान के आम लोगों का कार्यक्रम बन गया.

बाद में एंकरिंग करते हुए उन्होंने टीवी पत्रकारिता की जैसे एक नई परिभाषा रची. इस देश में जिसे भी लगता है कि उसकी आवाज कोई नहीं सुनता है, उसे रवीश कुमार से उम्मीद होती है. टीवी पत्रकारिता के इस शोर-शराबे भरे दौर में उन्होंने सरोकार वाली पत्रकारिता का परचम लहराए रखा है. सत्ता के खिलाफ बेखौफ पत्रकारिता करते रहे. आज उनकी पत्रकारिता को एक और बड़ी मान्यता मिली है.

 

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