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संसद में तार तार होते संविधान की फिक्र किसे है…. पुण्य प्रसून बाजपेयी

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मोदी सत्ता के दस फीसदी आरक्षण ने दसियो सवाल खडे कर दिये । कुछ को दिखायी दे रहा है कि बीजेपी-संघ का पिछडी जातियो के खिलाफ अगडी जातियो के गोलबंदी का तरीका है । तो कुछ मान रहे है कि जातिय आरक्षण के पक्ष में तो कभी बीजेपी रही ही नहीं तो संघ की पाठशाला जो हमेशा से आर्थिक तौर पर कमजोर तबके को आरक्षण देने के पक्ष में थी उसका श्रीगणेश हो गया । तो किसी को लग रहा है कि तीन राज्यो के चुनाव में बीजेपी के दलित प्रेम से जो अगडे रुठ गये थे उन्हे मनाने के लिये आरक्षण का पांसा फेंक दिया गया । तो किसी को लग रहा है आंबेडकर की थ्योरी को ही बीजेपी ने पलट दिया । जो आरक्षण के व्यवस्था इस सोच के साथ कर गये थे कि हाशिये पर पडे कमजोर तबके को मुख्यधारा से जोडने के लिये आरक्षण जरुरी है । तो कोई मान रहा है कि शुद्द राजनीतिक लाभ का पांसा बीजेपी ने अगडो के आरक्षण के जरीये फेंका है । तो किसी को लग रहा है बीजेपी को अपने ही आरक्षण पांसे से ना खुदा मिलेगा ना विलासे सनम । और कोई मान रहा है कि बीजेपी का बंटाधार तय है क्योकि आरक्षण जब सीधे सीधे नौकरी से जोड दिया गया है तो फिर नौकरी के लिये बंद रास्तो को बीजेपी कैसे खोलेगी । यानी युवा आक्रोष में आरक्षण घी का काम करेगा । और कोई तो इतिहास के पन्नो को पलट कर साफ कह रहा है जब वीपी सिंह को मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने वाले हालात में भी सत्ता नहीं मिली तो ओबीसी मोदी की हथेली पर क्या रेगेंगा ।

इन तमाम लकीरो के सामानांतर नौकरी से ज्यादा राजनीतिक सत्ता के लिये कैसे आरक्षण लाया जा रहा है और बिछी बिसात पर कैसी कैसी चाले चली जा रही है ये भी कम दिलचस्प नहीं है । क्योकि आरक्षण का समर्थन करती काग्रेस के पक्ष में जो दो दल खुल कर साथ है उनकी पहचान ही जातिय आरक्षण से जुडी रही है पर उन्ही दो दल [ आरजेडी और डीएमके ] ने मोदी सत्ता के आरक्षण का विरोध किया । फिर जिस तरह आठवले और पासवान मोदी के गुणगान में मायावती को याद करते रहे और मायावती मोदी सत्ता के खिलाफ लकीरो को गढा करती रही उसने अभी से संकेत देने शुरु कर दिये है कि इस बार का लोकसभा चुनाव वोटरो को भरमाने के लिये ऐसी बिसात बिछाने पर उतारु है जिसमें पार्टियो के भीतर उम्मीदवार दर उम्मीदवार का रुख अलग अलग होगा ।

तो क्या देश का सच आरक्षण में छिपे नौकरियो के लाभ का है । पर सवाल तो इसपर भी उठ चुके है । क्योकि एक तरफ नौकरिया हैा नहीं और दूसरी तरफ मोदी सत्ता के आरक्षण ने अगडे तबके में भी दरार कुछ ऐसी डाल दी कि जिसने दस फिसदी आरक्षण का लाभ उठाया वह भविष्य में फंस जायेगा । क्योकि 10 फिसदी आरक्षण के दाय.रे में आने का मतलब है सामन्य कोटे के 40 फिसदी से अलग हो जाना । तो 10 फिसदी आरक्षण का लाभ भविष्य में दस फिसदी के दायरे में ही सिमटा देगा । पर मोदी सत्ता के आरक्षण के फार्मूले ने पहली बार देश के उस सच को भी उजागर कर दिया है जिसे अक्सर सत्ता छुपा लेती थी । यानी देश में जो रोजगार है उसे भी क्यो भर पाने की स्थिति में कोई भी सत्ता क्यो नहीं आ पाती है ये सवाल इससे पहले गवर्नेस की काबिलियत पर सवाल उठाती थी । लेकिन इस बार आरक्षण कैसे एक खुला सियासी छल है ये भी खुले तौर पर ही उभरा है । यानी सवाल सिर्फ इतना भर नहीं है कि देश की कमजोर होती अर्थवयवस्था या विकास दर के बीच नौकरिया पैदा कहा से होगी । बल्कि नया सवाल तो भी है कि सरकार के खजाने में इतनी पूंजी ही नहीं है कि वह खाली पडे पदो को भर कर उन्हे वेटन तक देने की स्थिति में आ जाय़े । यूं ये अलग मसला है कि सत्ता उसी खजाने से अपनी विलासिता में कोई कसर छोडती नहीं है ।

तो ऐसे में आखरी सवाल उन युवाओ का है जो पाई पाई जोड कर सरकारी नौकरियो के फार्म भरने और लिखित परिक्षा दे रहे है । और इसके बाद भी वही सुवा भारत गुस्से में हो जिस युवा भारत को अपना वोटर बनाने के लिये वही सत्ता लालालियत है जो पूरे सिस्टम को हडप कर आरक्षण को ही सिस्टम बनाने तक के हालात बनाने की दिसा में बढ चुकी है । यानी जिन्दगी जीने की जद्दोजहद में राजनीतिक सत्ता से करीब आये बगैर कोई काम हो नहीं सकता । और राजनीतिक सत्ता खुद को सत्ता में बनाये रखने के लिये बेरोजगार युवाओ को राजनीतिक कार्यकर्ता बनाकर रोजगार देने से नहीं हिचक रही है । बीजेपी के दस करोड कार्यकत्ताओ की फौज में चार करोड युवा है । जिसके लिये राजनीतिक दल से जुडना ही रोजगार है । राजनीतिक सत्ता की दौड में लगे देश भर में हजारो नेताओ के साथ देश के सैकडो पढे-लिखे नौजवान इसलिये जुड चुके है क्योकि नेताओ की प्रोफाइल वह शानदार तरीके से बना सकते है । और नेता को उसके क्षेत्र से रुबरु कराकर नेता को कहा क्या कहना है इसे भी पढे लिखे युवा बताते है , और सोशल मीडिया पर नेता के लिये शब्दो को न्यौछावर यही पढे लिके नौजवान करते है । क्योकि नौकरी तो सत्ता ने अपनी विलासिता तले हडप लिया और सत्ता की विलासिता बरकरार रहे इसके लिये पढे लिके बेरोजगारो ने इन्ही नेताओ के दरवाजे पर नौकरी कर ली ।

शर्मिदा होने की जरुरत किसी को नहीं है क्योकि बीते चार बरस में दिल्ली में सात सौ से ज्यादा पत्रकार भी किसी नेता , किसी सांसद , किसी विधायक , किसी मंत्री या फिर पीएमओ में ही बेरोजगारी के डर तले उन्ही की तिमारदारी करने को ही नौकरी मान चुके है । यानी सवाल ये नहीं है कि आरक्षण का एलान किया ही क्यो गया जब कुछ लाभ नहीं है बल्कि सवाल तो अब ये है कि वह कौन सा बडा एलान आने वाले दो महीने में होने वाला है जो भारत का तकदीर बदलने के लिये होगा । और उससे डूबती सत्ता संभल जायेगी । क्या ये संभव है । अगर है तो इंतजार किजिये और अगर संभव नहीं है तो फिर सत्ता को संविधान मान लिजिये जिसका हर शब्द अब संसद में ही तार तार होता है ।

(यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के फेसबुक पोस्ट से लिया गया है)

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लोकसभा चुनाव 2019:- बेगूसराय में वामदल कितना मजबूत?

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हम सब यह जानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल फूंका जा चुका है, जिसके लिए हर दल ने अलग-अलग सीटों पर अपनी दाबेदरी पेश करना शुरू कर दिया है! इसी क्रम में बेगूसराय से लोकसभा प्रत्याशी के लिए CPI ने अपनी दाबेदरी कन्हैया कुमार के नाम से पेश किया है! डॉ. कन्हैया कुमार JNU छात्रसंघ के भूतपूर्व अध्यक्ष और देश के सबसे युवा चर्चित चेहरा हैं! वहीं दूसरी ओर अन्य दल ने भी अपनी दाबेदारी पेश की है! अब सवाल उठ रहा है कि CPI की दाबेदारी कितनी मजबूत है?

सबसे पहले यह बताता चलूँ कि वर्तमान बेगूसराय लोकसभा सीट पूर्व के बेगूसराय और बलिया को मिला के बना है जिसका क्षेत्र पूरा बेगूसराय ज़िला है, जिसमे सात विधानसभा आता है! ऐतिहासिक रूप से बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जाना जाता है जहाँ वामपंथ ने हमेशा के अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज की है!

सातों विधानसभा सभा का अवलोकन जब करते हैं तो यह पाते हैं कि बेगूसराय विधानसभा सभा को कांग्रेस ने 10, भाजपा ने 5, राजद ने 0 तथा वामपंथ ने 3 बार जीता है! वहीं दूसरी ओर अगर उप विजेता को देखा जाय तो कांग्रेस 4, भाजपा 1, राजद 0 और वामदल 9 वार दूसरे नंबर पर रही हैं!

बखरी विधानसभा में कांग्रेस 2, भाजपा 1, राजद 2, तथा वामदलों ने 10 बार जीत हासिल की हैं और कांग्रेस 5, भाजपा 1, वामदलों ने 3 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

तेघरा को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1 तथा वामदलों ने 2 बार जीता है तथा कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1, तथा वामदलों ने 2 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

मटिहानी को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 0, तथा वामदलों ने 3 बार जीता है जबकि कांग्रेस को 5, भाजपा को 1, राजद को 0 तथा वामदलों को 3 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

साहेबपुर कमाल जब से बना है एक बार राजद जीती और एक बार हारी है! जबकि पहले के बलिया विधानसभा में राजद, जदयू तथा लोजपा का दबदबा रहा है! तनवीर हसन साहब ख़ुद अपने यहाँ से दो बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं!

चेरिया बरियारपुर को कांग्रेस ने 2 बार, भाजपा ने 0, राजद ने 1 और वामदलों ने 1 बार जीता है वही दूसरी ओर कांग्रेस को 2, भाजपा को 0, राजद को 2 तथा वामदलों को 1 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

वही अगर पूर्व के बरौनी विधानसभा की बात करें तो सन 1977 से 2005 तक लगातार 8 बार सीपीआई ने चुनाव जीता है! सब मिलकर अगर देखा जाय तो हर दल से ज़्यादा वामदलों ने विधानसभा चुनाव जीतें हैं!
अब रही लोकसभा चुनाव की बात तो पहले बेगूसराय और बलिया दो अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र रहा है जिसमें से बेगूसराय में 1967 में सीपीआई ने कांग्रेस को हराकर चुनाव जीता था एवं पिछले चुनाव 2014 में भी सीपीआई ने 1,92,639 वोट लाकर तीसरा स्थान प्राप्त किया था जबकि 1967 में 1, 80, 883 वोट लाकर सीपीआई ने चुनाव जीत लिया था! कहने का तात्यापर्य यह है कि सीपीआई का कैडर वोट अभी भी उसके साथ है क्योंकि 2009 के चुनाव में भी सीपीआई को 1,64,843 वोट आए थे!

बलिया लोकसभा जो पहले बेगूसराय से अलग था वहाँ सीपीआई तीन बार 1980, 1991 तथा 1996 में लोकसभा चुनाव जीत चुकी है! 1998 में भी जब राजद चुनाव जीती थी उस वक़्त भी 1,87,635 वोट पाकर सीपीआई 52,484 वोट से पिछड़कर दूसरे पायदान पर थी!

अभी तक के लोकसभा चुनाव को देखा जाय तो कुल 16 लोकसभा चुनाव में से सीपीआई ने 1962 से छः चुनाव लड़ी है जिसमें से 1962 हासिम अख़्तर (51, 163),1977 इंद्रदेव सिंह (72, 096), 1998 रमेन्द्र कुमार (विजयी 1,44,540), 2009 शत्रुघ्न प्रसाद सिंह (164843) एवं 2014 राजेंद्र प्रसाद सिंह (1,92,639) चुनाव लड़े हैं! वाकी 1962 से पहले सीपीआई ने चुनाव नहीं लड़ा है और बाद में कई बार गठबंधन के कारण दूसरे दल को समर्थन किया है! इस बार जब सीपीआई के पास भारत का सबसे चर्चित क्रांतिकारी चेहरा ख़ुद है तो फिर यह सवाल कहाँ से आता है कि वामदल का बेगूसराय में आधार नहीं है!

लोकसभा और विधानसभा दोनों को मिलाकर अवलोकन करने पर हम यह पाते हैं कि वामदल पूरे बेगूसराय के 7 विधानसभा क्षेत्रों में से मटिहानी एवं साहेबपुर कमाल को छोड़कर किसी भी विधानसभा में महागठबंधन के सारे घटकदल में से सबसे ज़्यादा मजबूत है! और अगर संभावित उम्मीदवारों को देखें तो कन्हैया कुमार से ज़्यादा लोकप्रिय उम्मीदवार कोई नहीं है! जहाँ तक क्षेत्र में लोगों के बीच मिलना-जुलना और मेहनत की बात करें तो कन्हैया कुमार 2014 के लोकसभा चुनाव से ही अपने क्षेत्र के लोगों के बीच काम कर रहे हैं अन्य किसी भी दल का कोई व्यक्ति उनके मुक़ाबके कहीं नहीं टिकता! जब भी बेगूसराय में किसी भी प्रकार का कोई भी सामाजिक वैमनस्यता फैलाने की कोशिश हुई वामपंथियों ने हर समाज के लोगों से कंधा से कंधा मिलाकर साम्प्रदायिक शक्तियों का डट कर मुक़ाबला किया है तब और नेतागण कहाँ थे!

वर्तमान सरकार में जनता पर हुए हर अत्याचार के विरुद्ध यहाँ से लेकर दिल्ली तक कन्हैया कुमार एवं उनका संगठन (AISF) और दल (CPI) ने हर मोर्चे पर आंदोलन कर साम्प्रदायिक शक्तियों को परास्त किया है, तो आज जब समाज को इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है तब यह कहना कि इनका कोई आधार नही यह कहाँ तक उचित है! हाँ यह सच है कि राजद में तनवीर हसन ने बेगूसराय से पहली बार 2014 में कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ा और 3,69,892 वोट पाए लेकिन उनकी भी हार ही हुई, जबकि 2009 में जदयू से मुनाजिर हसन मात्र 2,05,680 वोट लाकर जीत हासिल की थी! तनवीर जी कई बार चुनाव लड़ चुके हैं पर अभी तक एक बार भी जीत नहीं पाएं हैं, हां एक बार MLC बने हैं जिसमें भी बेगूसराय सीपीआई के दो विधायकों ने ही उनकी मदद की थी!

अगर हम बेगूसराय लोकसभा की बात करें तो यहाँ का समीकरण हर बार अलग ही होता है! वर्तमान में सारे समीकरण, मेहनत, युवा जोश, ईमानदारी तथा लोकप्रियता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि अगर सीपीआई/कन्हैया कुमार अकेले भी चुनाव लड़ेंगे तो उनकी जीत की संभावना को नकारा नहीं जा सकता!

जानत के विश्वास में भी कन्हैया कुमार सबसे ऊपर हैं! यह बात तो तय है कि कन्हैया कुमार जितनी प्रमुखता से अपने क्षेत्र के बारे में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पटल पर बात रख सकते हैं कोई अन्य उम्मीदवार नहीं रख सकता! एक और बात जो कन्हैया कुमार को दूसरों से अलग करती है वो है उनकी विचारधारा जो किसी अन्य संभावित उम्मीदवार के पास नहीं है!

एक बात तो तय है कि कन्हैया कुमार दल बदलू नहीं हैं और ना ही उन्हें यह चिंता है कि हर बात कहने से पहले यह सोचना है कि कहीं कोई आका नाराज़ ना हो जाय! दूसरी बात कि कन्हैया कुमार जब अपने क्षेत्र का मुद्दा रखेंगे तो पूरा देश सुनेगा क्योंकि उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ बेगूसराय तक ही सीमित नहीं है! तीसरी बात वो बेगूसराय की भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ़ हैं और जानते हैं कि अगर युवाओं ने इस बार उनका साथ दिया तो बेगूसराय में व्यवसाय तथा लघुउद्योगों की अपार संभावनाएं हैं; बस धर्म, जाति, सम्प्रदाय इत्यादि से ऊपर उठकर एक बार पूरे समाज की भलाई के मद्देनजर सही दिशानिर्देशन में चलने की आवश्यकता है!

~शाहनवाज़ भारतीय

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देहरादून:- नमक सत्याग्रह की विरासत बचाने के लिए उत्तराखंड के युवा हुए एकजुट

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आज का दिन(12 मार्च) हिंदुस्तान के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण दिन है। आज से उन्नब्बे साल पहले 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी जी ने चिन्हित 78 आंदोलनकारियों के साथ साबरमती आश्रम से नमक आंदोलन के लिए डांडी मार्च प्रारम्भ किया था।इसी दिन महात्मा गांधी ने यह संकल्प भी लिया था की जब तक मुल्क को आजादी नहीं मिलेगी तब तक वह साबरमती आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। ऐसा ही हुआ।

इसके बाद गांधी जी साबरमती आश्रम नहीं जा पाए। सही मायने में यह दिन आज़ादी की लड़ाई का एक ऐसा महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ से ब्रितानिया साम्राज्यवाद की चूलें हिलनी शुरू हो गई थी। मैं देहरादून से हूँ। उत्तर भारत में मेरा जिला देहरादून एक मात्र ऐसा स्थान है जहाँ एक नदी के पानी से नमक बनाकर और उस नमक को बेचकर नमक क़ानून को तोडा गया था।

गांधी जी की इस डांडी यात्रा में देहरादून के रहने वाले वीर खडग बहादुर भी शामिल थे। उन्होंने गांधी जी से जिक्र किया था कि हमारे गावं के पास भी एक नदी बहती है जिसके कुछ हिस्से में नमकीन पानी पाया जाता है। तो फिर गांधी जी ने खड़गबहादुर को देहरादून जाकर इस नदी से नमक बनाकर नमक आंदोलन शरू करने की सलाह दी थी। गांधी जी की सलाह पर वीर खडग बहादुर ने शहर के तत्कालीन आंदोलनकारियों से मिलकर यहाँ नमक बनाकर नमक सत्याग्रह शुरू किया था। जिस जगह नमक बनाया गया था उसका नाम खारा खेत पड़ा।खारा का मतलब नमक है। इसी के बगल में नेम और नून नदी बहती है। जिसका पानी नमकीन है।

इस जगह का नाम है खराखेत। यह देहरादून से लगभग 22 किलोमीटर दूर पश्चिमी भाग में पड़ता है। इसका रास्ता प्रेमनगर से आगे नंदा की चौकी से उत्तर की और पौंधा गावं से होते हुए जसपाल राणा शूटिंग रेंज से होकर जाता है।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति उत्तराखंड ने भारत ज्ञान विज्ञान युवा समिति के साथ मिलकर आज इसी जगह से अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क के द्वारा चलाये जा रहे “सबका देश अपना देश” अभियान की शुरआत की। आज के कार्यक्रम walk & talk का नाम था अपनी विरासत को जानो। इस कार्यक्रम में तीस के लगभग युवा व अन्य साथी शामिल हुए। एक घंटे स्मारक स्थल पर श्रमदान कर सफाई की गई। फिर इस जगह के और नमक आंदोलन पर चर्चा की। इस विषय पर सर्वोदय मंडल देहरादून के साथी बीजू नेगी जी ने बिस्तार से जानकारी दी। तत्पश्चात अपने अपने घरों से बनाकर लाये खाने को मिल बाँट कर सामूहिक भोज का आनंद लिया। सबका देश हमारा देश अभियान को जोर शोर से करने के संकल्प के साथ आज के कार्यक्रम का समापन हुआ। आज मुख्य रूप से गीता गैरोला, बीजू नेगी , अनूप बडोला , गजेंद्र वर्मा , उमा भट्ट , इंद्रेश नौटियाल , एस एस रावत,नितेश खंतवाल, कमलेश खंतवाल , सतीश धौलखंडी ,नेहा चंद अग्रिम सुन्द्रियाल, देवेंद्र रावल हिमांशु चौहान सहित एस एफ आई के नेतृत्वकारी साथी उपस्थित रहे।
(साभार:Vijay Bhatt )

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चैनलों पर युद्ध का मंच सजा है, नायक विश्व शांति पुरस्कार लेकर लौटा है

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प्रतीकात्मक चित्र

न्यूज़ चैनलों में युद्ध का मोर्चा सजा है। नायक को बख़्तरबंद किए जाने की तैयारी हो रही है। तभी ख़बर आती है कि नायक दक्षिण कोरिया में विश्व शांति पुरस्कार लेने निकल पड़े हैं। मनमोहन सिंह ने ऐसा किया होता तो भाजपा मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस हो रही होती कि जब हमारे जवान मारे जा रहे हैं तो हमारे प्रधानमंत्री शांति पुरस्कार ले रहे हैं। चैनल युद्ध का माहौल बनाकर कवियों से दरबार सजवा रहे हैं और प्रधानमंत्री हैं कि शांति पुरस्कार लेकर घर आ रहे हैं। कहां तो ज्योति बने ज्वाला की बात थी, मां कसम बदला लूंगा का उफ़ान था लेकिन अंत में कहानी राम-लखन की हो गई है। वन टू का फोर वाली।

मोदी को पता है। गोदी मीडिया उनके इस्तमाल के लिए है न कि वे गोदी मीडिया के इस्तमाल के लिए। एक चैनल ने तो अपने कार्यक्रम में यहां तक लिख दिया कि इलेक्शन ज़रूरी है या एक्शन। जो बात अफवाह से शुरू हुई थी वो अब गोदी मीडिया में आधिकारिक होती जा रही है। मोदी के लिए माहौल बनाने और उन्हें उस माहौल में धकेल देने वाले चैनल डर के मारे पूछ नहीं पा रहे हैं कि मोदी हैं कहां। वे रैलियां क्यों कर रहे हैं, झांसी क्यों जा रहे हैं, वहां से आकर दक्षिण कोरिया क्यों जा रहे हैं, दक्षिण कोरिया से आकर गोरखपुर क्यों जा रहे हैं? युद्ध की दुकान सजी है, ललकार है मगर युद्ध न करन के लिए फटकार नहीं है!

प्रधानमंत्री को पता है कि गोदी मीडिया के पोसुआ पत्रकारों की औकात। जो एंकर उनसे दो सवाल पूछने की हिम्मत न रखता हो, उसकी ललकार पर मोर्चे पर जाने से अच्छा है वे दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल चले गए। चैनलों में हिम्मत होती तो यही पूछ लेते कि यहां हम चिल्ला चिल्ला कर गले से गोला दागे जा रहे हैं और आप हैं कि शांति पुरस्कार ले रहे हैं। आप कहीं रवीश कुमार का प्राइम टाइम तो नहीं देखने लगे।

स्क्रोल वेबसाइट पर रोहन वेंकटरामाकृष्णन की रिपोर्ट सभी को पढ़नी चाहिए। पाठक और पत्रकार दोनों को। रोहन ने इस मसले पर सरकारी सूत्रों के हवाले से अलग अलग अखबारों में छपी सफाई की ख़बरों को लेकर चार्ट बनाया है। जिससे आप देख सकते हैं कि किस किस बात के अलग-अलग वर्ज़न है। कौन-कौन सी बात सभी रिपोर्ट में एक है।

यह तय है कि प्रधानमंत्री ने पुलवामा हमले के दो घंटे बाद रुद्रपुर की रैली को फोन से संबोधित किया था और उसमें पुलवामा हमले का कोई ज़िक्र नहीं किया था। अपनी सरकार की कई योजनाओं को गिनाया। इस बात पर मीडिया में छपी सभी रिपोर्ट में सहमति है। रोहन ने दूरदर्शन की क्लिपिंग का सहारा लेते हुए बताया है कि प्रधानमंत्री ने 5 बज कर 10 मिनट पर फोन से रैली को संबोधित किया था। इतना बड़ा होने पर प्रधानमंत्री ही रैली कर सकते थे। उस भाषण में मौसम के कारण न आ पाने का दुख तो है मगर पुलवामा में मारे गए जवानों के लिए दुख नहीं है। स्क्रोल ने लिखा है कि इस एक बात के अलावा सभी मीडिया में हर बात के अलग-अलग दावे हैं।

स्थानीय अख़बारों में छपी रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस ने आरोप लगाए हैं। टेलिग्राफ अखबार से उत्तराखंड के एक अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया है और दिल्ली में कई पत्रकारों को सरकारी सूत्रों ने ब्रीफ किया है। उनकी ख़बरों का ब्यौरा है। चौथा इकोनोमिक्स टाइम्स में शुक्रवार को छपी एक खबर है। तो चार तरह के वर्ज़न हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि हमला होने के बाद मोदी 6 बज कर 45 मिनट तक डिस्कवरी चैनल और अपने प्रचार के लिए शूटिंग करते रहे। मोटर-बोट पर सैर करते रहे। उत्तराखंड के अनाम अधिकारी ने कहा है कि मोदी ने हमले से पहले बोट की सवारी की। लेकिन हमले के घंटे भर बाद वे जंगल सफारी पर गए। अपने फोन से काले हिरण की तस्वीर ली। वहां से वे खिन्नौली गेस्ट हाउस गए जहां 4 बज कर 30 मिनट तक शूटिंग होती रही। हमले का समय 3:10 बताया जाता है। अज्ञात सरकारी सूत्रों ने बताया कि रूद्रपुर रैली रद्द कर दी। वहां नहीं गए और फोन से संबोधित किया। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, गृहमंत्री, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल से बात की। कुछ नहीं खाया। एक वरिष्ठ अधिकारी हवाले से खबर छपी है कि मोदी ने रुदपुर की रैली रद्द कर दी क्योंकि वे फोन पर जानकारी लेकर समीक्षा कर रहे थे। उसके बाद रैली को फोन से संबोधित किया।

स्क्रोल ने लिखा है कि अलग-अलग वर्ज़न हैं। कौन सा बिल्कुल सही है बताना मुश्किल है। सवाल का जवाब नहीं मिलता है कि प्रधानमंत्री हमले के बाद तक डिस्कवरी चैनल की शूटिंग करते रहे या नहीं। जानकारी मिलने के बाद भी शूटिंग की या हमले से पहले शूटिंग हो चुकी थी।

मुझे अच्छी तरह याद है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि ख़राब मौसम के कारण प्रधानमंत्री तक सही समय पर सूचना नहीं पहुंची। यह बात न पचती है और न जंचती है। रैली करने लायक फोन का सिग्नल था तो उसी सिग्नल से उनतक बात पहुंच सकती है। समंदर के ऊपर उड़ रहे बीच आसामान में उनके जहाज़ पर सूचना पहुंच सकती है तो दिल्ली के पास रूद्रपुर में सूचना नहीं पहुंचेगी यह बात बच्चों जैसी लगती है।

प्रधानमंत्री का कार्यक्रम तय होता है। इसलिए उनके कार्यक्रम के इतने वर्ज़न नहीं होने चाहिए। लीपा-पोती की कोशिश हो रही है। दूसरा बीजेपी ने ही माहौल रचा है कि शोक का समय है। सबको अपना राष्ट्रवाद ज़ोर-ज़ोर से बोलकर ज़ाहिर करना होगा। तब इस संदर्भ में सवाल उठने लगेगा कि हमले की घटना के बाद तक शूटिंग कैसे हो सकती है। प्रधानमंत्री रैली कैसे कर सकते हैं। आगे के लिए आप स्क्रोल साइट पर रोहन की पूरी रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

गोदी मीडिया के लिए पीएम का शूटिंग करना कोई सवाल नहीं। अब उसने नितिन गडकरी का बयान थाम लिया है। वही पाकिस्तान को पान रोकने का बयान। उन्होंने भी रणनीति के तहत पुरानी खबर ट्वीट कर दी। 2016 के फैसले को ट्वीट किया तो यही बता देते कि कितना पानी रोका। लेकिन तथ्य से किसी को क्या मतलब। पाकिस्तान पर जल-प्रहार, पानी-पानी को तरसेगा पाकिस्तान जैसे मुखड़ों से चैनलों पर वीर-रस के गीत बजने लगे हैं। तथ्य यही है कि भारत पानी नहीं रोकेगा। अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने के लिए उसे कई डैम बनाने हैं। एक का निर्माण शुरू हुआ है। दो के बनने पर फैसला लेना है। जब बनेगा तभी पानी रोक पाएगा। तो पाकिस्तान पर जल-प्रहार नहीं हुआ है। भारत अपने हिस्से का ही पानी रोक रहा है न कि पाकिस्तान को पानी रोक रहा है।

चैनलों ने पाकिस्तान के नाम पर भारत के दर्शकों पर ही झूठ के गोले दाग रखे हैं। हमले में दर्शक घायल है। अच्छा किया प्रधानमंत्री ने विश्व शांति पुरस्कार जनता के नाम कर दिया। इस जनता में वो जनता भी है जो दिन रात पुलवामा के बाद राष्ट्रवाद की आड़ में सियासी माहौल बना रही है। शांति पुरस्कार लेकर जनता कंफ्यूज़ है। माहौल बनाने वाले कार्यकर्ताओं को रात में बुलवाया गया कि चलो, आओ और एय़रपोर्ट पर प्रधानमंत्री का स्वागत करो। वे शांति पुरस्कार जीत कर आ रहे हैं। एयरपोर्ट के रास्ते पोस्टर भी लगा दिए गए।

ये भी पढ़ें: हम महज कश्मीर चाहते हैं, कश्मीरी तो हमारे लिए आतंकवादी हैं?’

24 फरवरी को गोरखपुर में प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना का उद्घाटन करने वाले हैं। उत्तराखंड सरकार ने सभी ज़िलों में आदेश जारी किया है कि ज़िला और ब्लाक स्तर पर किसानों को सभागार में बिठाकर लाइव टेलिकास्ट दिखाना है। जनप्रतिनिधि भी शामिल होंगे। इसके लिए ज़िला स्तर पर 25,000 और ब्लाक लेवल पर 10,000 खर्च की मंज़ूरी दी गई है। आप हिसाब लगाए कि अकेले उत्तराखंड में जनता का 10-12 लाख पैसा पानी में बह जाएगा। भारत में 640 ज़िले हैं और 5500 के करीब ब्लाक हैं। सिर्फ इसी पर 7 करोड़ से अधिक की राशि खर्च हो जाएगी। हम नहीं जानते कि गोरखपुर की सभा के लिए कितना पैसा ख़र्च किया गया है। उसी गोरखपुर के ओबीसी और अनुसूचित जाति के छात्र रोज़ मेसेज करते हैं कि उन्हें छात्रवृत्ति नहीं मिल रही है। ग़रीब छात्रों को पढ़ने में दिक्कतें आ रही हैं।

न्यूज़ चैनलों की देशभक्ति से सावधान रहिए। अपनी देशभक्ति पर भरोसा कीजिए। जो चैनल देश की सरकार से सवाल नहीं पूछ सकते वे पाकिस्तान से पूछ रहे हैं। सेना के अच्छे भले अधिकारी भी इन कार्यक्रमों में जाकर प्रोपेगैंडा का शिकार हो रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि सेना अपनी रणनीति और अपने समय से कार्रवाई का फैसला लेगी। सेना अपने जवानों से कहे कि न्यूज़ चैनल न देखें। वर्ना गोली चलाने की जगह हंसी आने लगेगी। चैनलों के जोकरों को देखकर मोर्चे पर नहीं निकलना चाहिए। जय हिन्द।

(यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है)

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