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बीट विशेष

एक हारा हुआ सांसद, जिसने हजारों लोगों को अपने बल पर राहत पहुँचाया।

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बिहार के कई जिले बाढ़ की चपेट में हैं , इसका असर आम जन जीवन पर बहुत बुरा पड़ा है यातायात,स्वास्थ्य और खाने से लेकर पीने के पानी की समस्या से आम आदमी को जूझना पड़ रहा है, कुछ ही दिन हुए जब मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से बच्चे काल के गाल में समा रहे थे।
यह महज कुछ घटनाएं नहीं है यह पोल खोलती है हमारे तथाकथित विकास की क्या हम इतने गए गुजरे हो गए हैं कि कभी एक राज्य के कुछ जिले आपदा ग्रस्त हुए और सरकारी महकमा हाथ खड़े कर देता है,जिस तरह से सडा हुआ आलू और खाद्य सामग्री बिहार सरकार के द्वारा वितरित की जा रही है वह और ज्यादा रोगी बनायगी लोगों को।

मुख्य सवाल यही है कि लगे हाथ हम डोनेट का रोना रोने लगते है,और इसे उसे कोसने लगते हैं हम इस बात पर विचार करना क्यों जरूरी नहीं समझते कि यह सब आपदा प्रबंधन के लिए बड़े बड़े सरकारी महकमे बने हुए है जो मोटी तनख्वाहों से ऐशो आराम करते हैं..उनका काम इसी समय आता है।

इस बाढ़ का प्रकोप हो या चमकी बुखार का एक पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव खुले हाथों से लोगों की मदद करने को आगे रहे है, वह आज भी जेसीबी और टैक्टर पर बैठकर चलकर राहत सामग्री बांट रहे हैं।

जब यह मधेपुरा सांसद थे उस समय काफी बार इनसे मिलना होता था मंडी हाउस वाले आवास पर उस समय का एक वाकया याद आता है मैं छात्रसंघ का चुनाव लड़ रहा था और मेरी हर सम्भव मदद करने का आश्वासन इन्होंने दिया था, उसी समय कॉलेज में से फोन आता है कि कुछ लोग अपने प्रत्याशी से झगड़ा कर रहे हैं,जब स्तिथि से अवगत कराया तो सांसद जी ने तुरंत ही dsp को फोन कर स्तिथि सम्हालने की हिदायत दी थी।

वैसे मैं किसी का गुणगान करने से बचता हूँ लेकिन मेरे सहयोगियों द्वारा एक बार ही कहने पर यह पूरे जोश के साथ मेरा प्रचार करने भी आये थे कॉलेज में ,वह दौर गुजर गया कुछ यादें रह गयी लेकिन आज फिर एक अनुभव ताजा हो गया।

39 सांसदों में एक हारा हुआ सांसद मोर्चा संभाल रहा है………..और जनता अपना नेता चुनने में अक्सर भूल कर देती है कभी कभी।

अजीत आर्य

 

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बीट विशेष

कई इमारतें गिरने के बाद भी भजनपुरा के सुभाष मोहल्ले में बिल्डर माफिया धड़ल्ले से कर रहे अवैध फ्लैट निर्माण!

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“सुभाष मोहल्ले की गली नंबर 13 में बिल्डर माफिया द्वारा बनाई जा रही हैं तीन अवैध इमारतें”

चौधरी हैदर अली
दिल्ली के उत्तर-पूर्वी जिले में आए दिन इमारतें गिरने की खबर तो आप सुनते रहते होंगे आज हम आपको बताने जा रहे हैं आखिर इतनी इमारतें गिरने की क्या वजह है! जिसकी वजह से सैकड़ों लोग मलबे के ढेर में दब कर अपनी जान से हाथ धो बैठे!

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के बाबरपुर और सीलमपुर विधानसभा क्षेत्र में पिछले 5 सालों मे बिल्डर माफिया 500 से ज्यादा अवैध फ्लैट निर्माण करा चुके हैं जिनकी हालत अब जर्जर हो रही हैं और दर्जनभर इमारत तो मलबे के ढेर में तब्दील हो गई! इमारतें गिरने और जर्जर होने की वजह है बेकार मैटेरियल का इस्तमाल, बिल्डर माफिया चंद पैसों के खातिर लोगों की कीमती जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं, जिसे पूर्वी-दिल्ली नगर निगम और दिल्ली सरकार नज़र-अंदाज़ कर आंखें मूंदे तमाशा देख रही है!

स्थानीय लोगों का कहना है इस वक़्त बिल्डर माफिया बाबरपुर विधानसभा के वार्ड 48/E में काफी तेजी के साथ फ्लैट निर्माण कर रहे हैं, पिछले 2 साल में 100 से ज्यादा अवैध फ्लैट नुमा इमारतें बिल्डर माफिया बना चुके जिनमें से काफी इमारतें तो जर्जर भी हो चुकी हैं और कभी भी गिर सकती हैं!सुभाष मोहल्ला वार्ड 48 ई की गली नंबर 13 में अब्दुल सलाम मस्जिद के आसपास रहने वाले लोगों ने कहां कि हमने गली में हो रहे तीनों अवैध निर्माणों की शिकायत नगर निगम को दी लेकिन बिल्डर माफियाओं की पहुंच काफी ऊपर तक होने की वजह से नगर निगम अधिकारियों ने सभी शिकायत कर्ताओं के नाम बिल्डर माफिया को बता दिए जिसके बाद बिल्डर माफियाओं ने शिकायत कर्ताओं को दोबारा शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी दी!

People’s Beat ने जनता के आग्रह पर बिल्डर माफिया, स्थानीय पुलिस एवं नगर निगम के कर्मचारियों की शिकायत माननीय प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री जी को दे दी है!

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बीट विशेष

पूर्व गृह मंत्री व् अनुभवी सीपीआई के नेता इन्द्रजीत गुप्ता का जन्म शताब्दी समारोह दिल्ली में मनाया गया

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इन्द्रजीत गुप्ता 1919-2001.

भारत के वो नेता जो सबसे अधिक 11 बार जीते लोकसभा चुनाव,  

CPI और AITUC के महासचिव रह चुके.

इंद्रजीत गुप्ता भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (CPI) के कुशल व् प्रखर राजनेता रहे हैं. उन्होंने 1960 में पहली बार हुए उपचुनावों से भारतीय राजनीति में कदम रखा और जीतकर लोकसभा में पहुंचे. साल 1919 में जन्मे इन्द्रजीत गुप्ता का 2001 में जब निधन हुआ तब भी वे लोकसभा के सदस्य थे. आज 21 जुलाई 2019 को इनका जन्मशताब्दी समारोह constitution club दिल्ली में मनाया गया जिसमे CPI(M) के महासचिव सीताराम येचुरी व् पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने शिरकत की. इन्द्रजीत गुप्ता को याद करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा “आज का यह अवसर लोकतंत्र को समृद्ध करने में इन्द्रजीत गुप्ता के योगदान को प्रतिबिंबित करता है. सीपीआई के ये पूर्व महासचिव जीवन भर मजदूर आन्दोलन के लिए समर्पित रहे.”

ये अनुभवी नेता बीच के 3 साल(1977 से 1980) को छोड़ कर ताउम्र सांसद रहे. उन्होंने शुरुआती चुनाव (1962 से 1967) कलकत्ता साउ‌थ वेस्ट इसके बाद (1967 से 1977) अलीपुर, (1980 से 1989) बशीरहाट और (1989-2001) मिदनापुर से चुनाव जीते. वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और All India Trade Union (AITUC) के महासचिव भी रह चुके हैं.

इन्द्रजीत गुप्ता एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के शासनकाल में देश के गृहमंत्री रहे.  सादगी की मिशाल माने जाने वाले सांसद इन्द्रजीत गुप्ता गृह मंत्री बनने के बाद भी दिल्ली की वेस्टर्न कोर्ट में आवंटित आवास में रहते थे जहाँ आम तौर पर रसूख वाले सांसद रहने से कतराते हैं. कभी उनके निवास के ठीक बगल में रहने वाले वरिष्ठ राजनेता क्रांति प्रकाश बताते हैं, “देश के गृहमंत्री होने के बावजूद उन्होंने वेस्टर्न कोर्ट को नहीं छोड़ा. वे अपने दो-रूम के क्वॉर्टर से अपनी गतिविधियों को अंजाम देते थे. वे असल में सादगी के मिसाल थे.”

भारतीय जनता पार्टी के प्रखर नेता हुकुमदेव नारायण यादव ने संसद में बोलते हुए एक बार कहा था, ”वे एक कम्यूनिस्ट नेता थे. लेकिन इससे बड़ी बात यह थी कि वे एक महान सांसद थे.”

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बीट विशेष

अस्तित्व की लड़ाई लड़ती कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नवनिर्वाचित महासचिव के लिए रास्ता नही होगा आसान ।

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सीपीआई के नवनिर्वाचित महासचिव कॉमरेड डी.राजा को अग्रिम बधाई। हालाँकि अभी औपचारिक घोषणा सीपीआई की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक की समाप्ति के बाद आज से २ दिन बाद होगी। यह कम्युनिस्ट पार्टी के लिए भी ऎतिहासिक क्षण होगा जब पार्टी पे आरोप लगती रही है कि कोई दलित अभी तक पार्टी के सर्वोच्य पद पर अभी तक नहीं पहुंच पाया था। पार्टी को बधाई।

कॉमरेड डी.राजा एक ऐसे समय में पार्टी की कमान संभालने जा रहे है जब पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। यहाँ तक की सीपीआई पर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म होने का भी खतरा मंडरा रहा है। केरला जैसे राज्य को छोड़ दे तो किसी और राज्य में पार्टी की विधानमंडलों और लोकसभा में भी कोई निर्णायक भूमिका नहीं बची है। सांगठनिक तौर पर भी पार्टी क्षरण की ओर अग्रसर है। कॉमरेड डी.राजा के लिए इस वक़्त यह भूमिका ग्रहण करना काटों भरा ताज पहनने से कम नहीं है और अगर वे पार्टी को इससे उबार पाए तो निश्चित ही वे चैंपियन होंगे। नए नेतृत्व को एक दिशाहीन पार्टी में नयी ऊर्जा ,जूनून और लक्ष्य निर्धारण करके आगे बढ़ने की गंभीर चुनौती है।

पार्टी के पिछले महाधिवेशन में कन्हैया कुमार ने जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया को कन्फ्यूज्ड पार्टी ऑफ़ इंडिया कहा तब बड़ा बवाल मचा था. लेकिन मैं समझता हूँ की उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा था। आज लगभग हर राज्यों में पार्टी का संगठन होने के बावजूद पार्टी अपने दम पर हर सीट पर कैंडिडेट नहीं उतार पाती है। राष्ट्रीय नेता ऑफिसों में बैठकर, देश भर में घूम घूम कर भाषण देकर और पार्टी की मीटिंग अटेंड करके आत्ममुग्ध रहते है,और इसी का अनुसरण राज्यों के नेता भी करते है। और जब इन नेताओ से पार्टी की चुनावी हार पर बात कीजिये तब ये कहेंगे की ” हम चुनावी (संसदीय ) राजनीति के लिए नहीं बने है “.यह जवाब निश्चित ही “संशोधनवादी होने ” के आरोप का प्रतिउत्तर लगता है. यही से साबित होता है की पार्टी पूरी तरह कन्फ्यूज्ड है। क्योँकि इस जवाब से फिर यह सवाल भी उठता है कि तब आप चुनाव लड़ते ही क्योँ है? क्या सिर्फ इसलिए की आपकी पार्टी का राष्ट्रीय दर्जा बचा रहे और आप आराम से नेता बने रहे। लेकिन उनका क्या जो जमीन पर हर दुःख दर्द जुल्म सहकर पार्टी का झंडा उठाये हुए है। इस शुद्धतावादी सोच से आगे बढ़ना होगा। सोवियत संघ के विघटन के ‘शॉक’ से बाहर निकलना होगा। कॉमरेड इस ‘शॉक’ ने न जाने कितने प्रतिभाशाली पार्टी कार्यकर्ताओ की ज़िंदगी ख़राब कर दी है।
पार्टी को एक सर्जरी की अत्यंत जरुरत है। असक्षम और निक्कम्मे नेताओ से पार्टी को किनारा करना होगा। पार्टी और जन संगठनो में सदस्यता की जाँच होनी चाहिए। आज फर्जी सदस्यता के कारण ही नाकाम और असक्षम नेतृत्व कुर्सी जमा कर बैठे हुए है। यह न सिर्फ पार्टी बल्कि आंदोलन के साथ भी गद्दारी है। क्या कारण है कि महिला संगठन, शिक्षक संगठन, कर्मचारी संगठन ,इप्टा, प्रलेस इत्यादि में पार्टी सदस्य जनरल सेक्रेटरी तो है लेकिन संगठन खंड खंड बिखरा हुआ है? न तो इन संगठनो पर पार्टी के नेता का कोई प्रभाव होता है न ही इसके अधिकतर सदस्यों का पार्टी और विचारधारा से कोई लगाव होता है। मुझे याद आता है की २०११ -१२ में बिहार में असक्षम नेतृत्व के कारण कॉलेज का एडमिनिस्ट्रेशन कॉलेज के शिक्षक और कर्मचारी संगठन पर हावी हो जाता है और पार्टी का शिक्षक और कर्मचारी संघ AISF को असामाजिक तत्व बताते हुए एडमिनिस्ट्रेशन को समर्थन पत्र लिखता है। पार्टी को आज इस बात पर भी मंथन करना चाहिए की क्या अपने जन संगठनो को पार्टी का जन संगठन बताने से परहेज करना और सभी के लिए जन संगठन का दरवाजा खुला रखना, कही पार्टी और आंदोलन को नुकसान तो नहीं पंहुचा रहा है। उदाहरण के लिए मजदूरों के संगठन AITUC में भाजपा का विधायक नेता कैसे बना हुआ है।

आज पार्टी के कार्यकर्ताओं में घोर निराशा है जिसको ख़त्म करने की चुनौती नए नेतृत्व की है। वरना गोवा की आज़ादी के लिए लड़ने वाली सीपीआई अब गोवा में चुनाव नहीं लड़ती वही हाल देश भर में हो जायेगा, और कुछ समय बाद सीपीआई गोवा की तरह सिर्फ पार्टी का नाम ,पार्टी का ऑफिस और पार्टी के नेता बचेंगे, बस पार्टी नहीं बचेगी।
–पीयूष रंजन झा

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