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राजनीति

बीजेपी जिसे पाकिस्तान का एजेंटऔर देशद्रोही कहती है,उसे भी अपनी पार्टी में ले सकती है।

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राम से क्या काम, छलकाइये जाम, भाजपा में नरेश आए हैं

“व्हिस्की में विष्णु बसे, रम में बसे है राम , जिन में माता जानकी, ठर्रे में हनुमान।”

उपरोक्त बयान संत तुलसीदास के नहीं बल्कि संत नरेश अग्रवाल के हैं, जो समाजवादी पार्टी से निकल कर भाजपा में आ चुके हैं। जुलाई 2017 में जब राज्य सभा में उन्होंने अमृत वचन कहे थे तब भाजपा के नेता पर आक्रोशित हुए थे। चैनलों पर हिन्दू मुस्लिम डिबेट की महफिल सज़ी थी। जनता को बहलाने का मौका मिल गया था। वह भी गुस्से में मूल सवालों को छोड़ इस आक्रोश को पी रही थी कि क्या इस देश में राम के साथ अब ये भी होगा। चैनल से लेकर सड़कों पर ब्दाश्त के बाहर का माहौल बनाया गया। इस का लाभ उठाकर सांप्रदायिकता कूट कूट कर भरी गई थी। अग्रवाल को लिखित माफी मांगनी पड़ी थी। इस बयान के आठ महीने के भीतर नरेश अग्रवाल भाजपा में हैं। रेल मंत्री उन्हें चादर ओढ़ा कर स्वागत कर रहे थे।

उस वक्त क्या क्या नहीं कहा गया। राकेश सिन्हा ने ट्विट किया था कि नरेश अग्रवाल पर महाभियोग चलाया जाना चाहिए। संसद से निकाल दिया जाना चाहिए। नेशनल इंवेस्टिगेटिंग एजेंसी और रॉ पाकिस्तान के साथ इनके संबंधों की जांच करनी चाहिए। उम्मीद है ए आई ए ने अपनी जांच पूरी कर अमित शाह को रिपोर्ट सौंप दी होगी। इससे एक बात तो साबित होता है कि बीजेपी जिसे पाकिस्तान का एजेंट कहती है, देशद्रोही कहती है, उसे भी अपनी पार्टी में ले सकती है।

एक बीजेपी नेता ने कहा था कि नरेश अग्रवाल का मुंह काला करने वाले को एक लाख का इनाम मिलेगा। बेचारा वो नेता अब उसी नरेश अग्रवाल के लिए फूल माला लेकर खड़ा रहेगा। हम राजनीति में बहुत भोले हैं। यह सब बयान नेता बहुत दूर की सोच कर देते हैं। मुमकिन है अग्रवाल जी ने व्हिस्की में विष्णु बसे, रम में श्रीराम बोलकर भाजपा का ही काम किया होगा ताकि हंगामा हो, सांप्रदायिकता फैले, नफरत फैले और पार्टी का काम हो जाए। अब वही नरेश अग्रवाल भाजपा में हैं।

जुलाई 2015 में भाजपा के संसदीय दल ने कांग्रेस शासित राज्यों में भ्रष्टाचार पर एक बुकलेट निकाला। पहले पन्ने पर असम के हेमंत विश्वा शर्मा पर आरोप लिखा हुआ था, एक महीने बाद वही बीजेपी हेमंत विश्वा शर्मा का स्वागत कर रही थी। उससे पहले बीजेपी हेमंत विश्वा शर्मा पर घूम घूम कर आरोप लगाती थी कि ये गोगोई सरकार का सबसे भ्रष्ट चेहरा है। एक महीने बाद हेमंत विश्व शर्मा बीजेपी में शामिल हो गए।

मीडिया ने चालाकी से इस सवाल को हल्का कर दिया और आप उस वक्त के जितने भी विश्लेषण गूगल से निकाल कर पढ़ेंगे, सबमें लिखा मिलेगा कि राहुल गांधी ने इनसे बात नहीं कि इसलिए इस महान संगठनकर्ता ने कांग्रेस छोड़ दी। वे हेमंत विश्वा शर्मा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगा रहे थे बल्कि राहुल गांधी के अहंकार के सवाल को बड़ा बना रहे थे।

वो समय था जब मोदी सरकार या भाजपा के खिलाफ कहने पर आई टी सेल और समर्थकों का जमात टूट पड़ता था। जनता भी जुनून में इन सवालों पर ग़ौर नहीं कर रही थी। उसने ध्यान ही नहीं दिया कि जिस हेमंत विश्वा शर्मा पर बीजेपी बुकलेट निकाल चुकी है वह पूर्वोत्तर में उनका नायक है। आप असम के मुख्य मंत्री सोनेवाल से ज़्यादा इस नेता के बारे में ज़्यादा सुनेंगे। कहां विधायक ख़रीदना है, कहां सरकार बनानी है।

9 अप्रैल 2016 को अमित शाह ने कहा था कि हेमंत विश्वा शर्मा के खिलाफ सारे आरोपों की जांच होगी। विपक्ष का कोई नेता होता है तो सीबीआई ओवरटाइम करती है मगर अपने नेताओं की जांच भूल जाते हैं। सबको पता है हेमंत विश्वा शर्मा की छवि के बारे में। ऐसे नेता जब दूसरे दलों में होते हैं तो महाभ्रष्ट हो जाते हैं मगर भाजपा में होते हैं तो महान रणनीतिकार हो जाते हैं।

लेकिन हेमंत विश्वा शर्मा के आगमन पर एक शख्स ने विरोध किया था। आई आई एम अहमदाबाद से सीधा बीजेपी ज्वाइन करने वाले प्रद्युत बोहरा ने हेमंत विश्वा शर्मा के भाजपा में शामिल होने पर अमित शाह को एक पत्र लिखा और दस साल से ज्यादा समय तक भाजपा में रहने के बाद भाजपी छोड़ दी।

अमरीका में एक डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस है जिसने 7 जुलाई 2015 को लुई बर्गर कंपनी के खिलाफ केस किया कि इसने भारत सहित कई देशों में रिश्वत दी है। सबसे ज़्यादा रिश्वत भारत के अधिकारियों को दी है। इस कंपनी को गोवा और असम में पानी की सप्लाई के मामले में कंसलटेंसी का काम मिला था। उस आरोप पत्र में यह भी लिखा था कि कंपनी ने अधिकारियों के साथ एक मंत्री को भी रिश्वत दी है। बीजेपी ने पब्लिक में शर्मा के ख़िलाफ़ आरोप लगाए थे। तब सोनेवाल केंद्र में मंत्री थी, उन्होंने तरुण गोगोई से पूछा था कि वे क्यों चुप हैं। आज सोनेवाल चुप हैं और शर्मा उन्हीं के साथ मंत्री हैं। इस मामले की जांच कर रही सीआईडी तीन तीन बार कोर्ट में डांट खा चुकी है कि जांच में देरी क्यों हो रही है।

न खाऊंगा न खाने दूंगा। 2019 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता के बीच जाएं तो अपना नारा बदल देना चाहिए। जो खाया है उसे बुलाऊंगा, जो दे देगा उसे भगाऊंगा। हेमंत विश्वा शर्मा पर आरोप लगाकर, अपने ही आरोपों का थूक घोंट कर भाजपा ने पूर्वोत्तर में जो कामयाबी हासिल की है उम्मीद है कि वही कामयाबी व्हिस्की में विष्णु और रम में श्री राम का दर्शन करने वाले नरेश अग्रवाल यूपी में दिला देंगे।

भ्रष्टाचार का सवाल जनता को मूर्ख बनाने का होता है। नैतिकता का प्रश्न हम लेखकों के पास ही बचा होता है। जनता भी इन प्रश्नों को नज़रअंदाज़ कर देती है। हर दल का यही हाल है। आप विपक्ष की भी गारंटी नहीं ले सकते कि उसके यहां ऐसे नेता नहीं हैं और ऐसे नेता कहीं और से नहीं आएंगे। यह बात इज़ इक्वल टू के लिए नहीं कह रहा बल्कि यह बताने के लिए आप मतदाता के तौर पर उल्लू बनने के लिए अभिशप्त हैं।

आप विरोधी होकर भी उल्लू बन सकते हैं और समर्थक होकर उल्लू बन सकते हैं। भारत की जनता इन दो चार पार्टियों में उलझ गई है। नैतिकता की स्थापना का प्रश्न बेकार प्रश्न है। राम को जम कर गाली दो, राम मंदिर वालों की पार्टी में मिल जाओ। कहीं ऐसा न हो जाए कि विपक्षी दलों के सारे भ्रष्ट, बददिमाग़ भाजपा में चले जाएं और बिना कुछ हमारे महाभ्रष्ट विपक्षी दल अपने आप ईमानदार हो जाएं! भ्रष्टाचार भारत की राजनीति की आत्मा है। इसके शरीर पर राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता ओढ़ कर ये सब नौटंकी करते हैं। राजनीति को बदलना है तो कांग्रेस और बीजेपी से आगे सोचिए. कुछ नया सोचिए और नया कीजिए। वर्ना इज़ इक्वल टू करते रहिए। उस चुनाव में भी उल्लू बने, अगले चुनाव में भी उल्लू बनेंगे।

(यह पोस्ट मूलतः वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुई है)

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देश

लोकसभा चुनाव 2019:- बेगूसराय में वामदल कितना मजबूत?

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हम सब यह जानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल फूंका जा चुका है, जिसके लिए हर दल ने अलग-अलग सीटों पर अपनी दाबेदरी पेश करना शुरू कर दिया है! इसी क्रम में बेगूसराय से लोकसभा प्रत्याशी के लिए CPI ने अपनी दाबेदरी कन्हैया कुमार के नाम से पेश किया है! डॉ. कन्हैया कुमार JNU छात्रसंघ के भूतपूर्व अध्यक्ष और देश के सबसे युवा चर्चित चेहरा हैं! वहीं दूसरी ओर अन्य दल ने भी अपनी दाबेदारी पेश की है! अब सवाल उठ रहा है कि CPI की दाबेदारी कितनी मजबूत है?

सबसे पहले यह बताता चलूँ कि वर्तमान बेगूसराय लोकसभा सीट पूर्व के बेगूसराय और बलिया को मिला के बना है जिसका क्षेत्र पूरा बेगूसराय ज़िला है, जिसमे सात विधानसभा आता है! ऐतिहासिक रूप से बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जाना जाता है जहाँ वामपंथ ने हमेशा के अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज की है!

सातों विधानसभा सभा का अवलोकन जब करते हैं तो यह पाते हैं कि बेगूसराय विधानसभा सभा को कांग्रेस ने 10, भाजपा ने 5, राजद ने 0 तथा वामपंथ ने 3 बार जीता है! वहीं दूसरी ओर अगर उप विजेता को देखा जाय तो कांग्रेस 4, भाजपा 1, राजद 0 और वामदल 9 वार दूसरे नंबर पर रही हैं!

बखरी विधानसभा में कांग्रेस 2, भाजपा 1, राजद 2, तथा वामदलों ने 10 बार जीत हासिल की हैं और कांग्रेस 5, भाजपा 1, वामदलों ने 3 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

तेघरा को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1 तथा वामदलों ने 2 बार जीता है तथा कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1, तथा वामदलों ने 2 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

मटिहानी को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 0, तथा वामदलों ने 3 बार जीता है जबकि कांग्रेस को 5, भाजपा को 1, राजद को 0 तथा वामदलों को 3 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

साहेबपुर कमाल जब से बना है एक बार राजद जीती और एक बार हारी है! जबकि पहले के बलिया विधानसभा में राजद, जदयू तथा लोजपा का दबदबा रहा है! तनवीर हसन साहब ख़ुद अपने यहाँ से दो बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं!

चेरिया बरियारपुर को कांग्रेस ने 2 बार, भाजपा ने 0, राजद ने 1 और वामदलों ने 1 बार जीता है वही दूसरी ओर कांग्रेस को 2, भाजपा को 0, राजद को 2 तथा वामदलों को 1 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

वही अगर पूर्व के बरौनी विधानसभा की बात करें तो सन 1977 से 2005 तक लगातार 8 बार सीपीआई ने चुनाव जीता है! सब मिलकर अगर देखा जाय तो हर दल से ज़्यादा वामदलों ने विधानसभा चुनाव जीतें हैं!
अब रही लोकसभा चुनाव की बात तो पहले बेगूसराय और बलिया दो अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र रहा है जिसमें से बेगूसराय में 1967 में सीपीआई ने कांग्रेस को हराकर चुनाव जीता था एवं पिछले चुनाव 2014 में भी सीपीआई ने 1,92,639 वोट लाकर तीसरा स्थान प्राप्त किया था जबकि 1967 में 1, 80, 883 वोट लाकर सीपीआई ने चुनाव जीत लिया था! कहने का तात्यापर्य यह है कि सीपीआई का कैडर वोट अभी भी उसके साथ है क्योंकि 2009 के चुनाव में भी सीपीआई को 1,64,843 वोट आए थे!

बलिया लोकसभा जो पहले बेगूसराय से अलग था वहाँ सीपीआई तीन बार 1980, 1991 तथा 1996 में लोकसभा चुनाव जीत चुकी है! 1998 में भी जब राजद चुनाव जीती थी उस वक़्त भी 1,87,635 वोट पाकर सीपीआई 52,484 वोट से पिछड़कर दूसरे पायदान पर थी!

अभी तक के लोकसभा चुनाव को देखा जाय तो कुल 16 लोकसभा चुनाव में से सीपीआई ने 1962 से छः चुनाव लड़ी है जिसमें से 1962 हासिम अख़्तर (51, 163),1977 इंद्रदेव सिंह (72, 096), 1998 रमेन्द्र कुमार (विजयी 1,44,540), 2009 शत्रुघ्न प्रसाद सिंह (164843) एवं 2014 राजेंद्र प्रसाद सिंह (1,92,639) चुनाव लड़े हैं! वाकी 1962 से पहले सीपीआई ने चुनाव नहीं लड़ा है और बाद में कई बार गठबंधन के कारण दूसरे दल को समर्थन किया है! इस बार जब सीपीआई के पास भारत का सबसे चर्चित क्रांतिकारी चेहरा ख़ुद है तो फिर यह सवाल कहाँ से आता है कि वामदल का बेगूसराय में आधार नहीं है!

लोकसभा और विधानसभा दोनों को मिलाकर अवलोकन करने पर हम यह पाते हैं कि वामदल पूरे बेगूसराय के 7 विधानसभा क्षेत्रों में से मटिहानी एवं साहेबपुर कमाल को छोड़कर किसी भी विधानसभा में महागठबंधन के सारे घटकदल में से सबसे ज़्यादा मजबूत है! और अगर संभावित उम्मीदवारों को देखें तो कन्हैया कुमार से ज़्यादा लोकप्रिय उम्मीदवार कोई नहीं है! जहाँ तक क्षेत्र में लोगों के बीच मिलना-जुलना और मेहनत की बात करें तो कन्हैया कुमार 2014 के लोकसभा चुनाव से ही अपने क्षेत्र के लोगों के बीच काम कर रहे हैं अन्य किसी भी दल का कोई व्यक्ति उनके मुक़ाबके कहीं नहीं टिकता! जब भी बेगूसराय में किसी भी प्रकार का कोई भी सामाजिक वैमनस्यता फैलाने की कोशिश हुई वामपंथियों ने हर समाज के लोगों से कंधा से कंधा मिलाकर साम्प्रदायिक शक्तियों का डट कर मुक़ाबला किया है तब और नेतागण कहाँ थे!

वर्तमान सरकार में जनता पर हुए हर अत्याचार के विरुद्ध यहाँ से लेकर दिल्ली तक कन्हैया कुमार एवं उनका संगठन (AISF) और दल (CPI) ने हर मोर्चे पर आंदोलन कर साम्प्रदायिक शक्तियों को परास्त किया है, तो आज जब समाज को इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है तब यह कहना कि इनका कोई आधार नही यह कहाँ तक उचित है! हाँ यह सच है कि राजद में तनवीर हसन ने बेगूसराय से पहली बार 2014 में कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ा और 3,69,892 वोट पाए लेकिन उनकी भी हार ही हुई, जबकि 2009 में जदयू से मुनाजिर हसन मात्र 2,05,680 वोट लाकर जीत हासिल की थी! तनवीर जी कई बार चुनाव लड़ चुके हैं पर अभी तक एक बार भी जीत नहीं पाएं हैं, हां एक बार MLC बने हैं जिसमें भी बेगूसराय सीपीआई के दो विधायकों ने ही उनकी मदद की थी!

अगर हम बेगूसराय लोकसभा की बात करें तो यहाँ का समीकरण हर बार अलग ही होता है! वर्तमान में सारे समीकरण, मेहनत, युवा जोश, ईमानदारी तथा लोकप्रियता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि अगर सीपीआई/कन्हैया कुमार अकेले भी चुनाव लड़ेंगे तो उनकी जीत की संभावना को नकारा नहीं जा सकता!

जानत के विश्वास में भी कन्हैया कुमार सबसे ऊपर हैं! यह बात तो तय है कि कन्हैया कुमार जितनी प्रमुखता से अपने क्षेत्र के बारे में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पटल पर बात रख सकते हैं कोई अन्य उम्मीदवार नहीं रख सकता! एक और बात जो कन्हैया कुमार को दूसरों से अलग करती है वो है उनकी विचारधारा जो किसी अन्य संभावित उम्मीदवार के पास नहीं है!

एक बात तो तय है कि कन्हैया कुमार दल बदलू नहीं हैं और ना ही उन्हें यह चिंता है कि हर बात कहने से पहले यह सोचना है कि कहीं कोई आका नाराज़ ना हो जाय! दूसरी बात कि कन्हैया कुमार जब अपने क्षेत्र का मुद्दा रखेंगे तो पूरा देश सुनेगा क्योंकि उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ बेगूसराय तक ही सीमित नहीं है! तीसरी बात वो बेगूसराय की भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ़ हैं और जानते हैं कि अगर युवाओं ने इस बार उनका साथ दिया तो बेगूसराय में व्यवसाय तथा लघुउद्योगों की अपार संभावनाएं हैं; बस धर्म, जाति, सम्प्रदाय इत्यादि से ऊपर उठकर एक बार पूरे समाज की भलाई के मद्देनजर सही दिशानिर्देशन में चलने की आवश्यकता है!

~शाहनवाज़ भारतीय

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राजनीति

जेएनयू फरवरी 2016:- इन नारों की वजह से फंसाया गया है कन्हैया कुमार को।

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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में फरवरी 2016 में लगे नारों के मामले में दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी है. इस चार्जशीट में जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार, छात्र नेता उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को मुख्य आरोपी बनाया गया है. इन तीनों को इस मामले में जेल भी जाना पड़ा था.

दिल्ली पुलिस की 1200 पन्नों की चार्जशीट पर क्या संज्ञान लेना है, इसपर अदालत मंगलवार को फैसला करेगी. इस चार्जशीट में सात कश्मीरी छात्रों को भी मुख्य आरोपी बनाया गया है. इनके अलावा 36 अन्य को कॉलम नंबर 12 में आरोपी बनाया गया है, जो कि कथित तौर पर घटनास्थल पर मौजूद थे.

चार्जशीट में मुख्य आरोपी कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य हैं. इनके अलावा सात अन्य मुख्य आरोपियों में सात कश्मीरी छात्र हैं, जिनमें- मुजीर (जेएनयू), मुनीर (एएमयू), उमर गुल (जामिया), बशरत अली (जामिया), रईस रसूल (बाहरी), आकिब (बाहरी) और खालिद भट (जेएनयू) का नाम है.

इनके अलावा, नारेबाजी वाली जगह पर मौजूद 36 आरोपियों में शेहला राशिद, अपराजिता राजा, रामा नागा, बनज्योत्सना, आशुतोष, ईशान आदि हैं. केस के सबूत के तौर पर वीडियो फुटेज और 100 से ज्यादा प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही है.

चार्जशीट के मुताबिक ये नारे लगे थे जेएनयू में

हम क्या चाहते आजादी

हम लेके रहेंगे आजादी

गो इंडिया, गो बैक

संगबाजी वाली आजादी (पत्थर फेंकने के लिए आजादी)

भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह

कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी

भारत की बर्बादी तक आजादी

भारत के मुल्क को एक झटका और दो

भारत को एक रगड़ा और दो

हम छीन के लेंगे आजादी, लड़के लेंगे आजादी

तुम कितने मकबूल मारोगे, हर घर से मकबूल निकलेगा

इंडियान आर्मी को दो रगड़ा

इंडियन आर्मी पे हल्ला बोल

उमर और अनिर्बान ने कहा- झूठी सरकार के झूठे आरोप

उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य ने कहा है कि ये सारे आरोप झूठे हैं और वे इनका कानूनी तौर पर मुकाबला करेंगे. दोनों ने संयुक्त बयान में कहा है कि सरकार झूठ बोलने और जुमलेबाजी में माहिर है और चुनाव नजदीक आते ही मंदिर, मूर्ति, 10 फीसदी आरक्षण और एंटी-नेशनल जैसे मुद्दे सामने आ रहे हैं.

इनके अलावा कन्हैया कुमार ने भी इस मामले पर ट्वीट कर अपनी बात रखी है

“मोदी जी से हमने 15 लाख, रोज़गार और अच्छे दिन माँगे थे, देश के अच्छे दिन आए न आए कम से कम चुनाव से पहले हमारे ख़िलाफ़ चार्जशीट तो आई है। अगर यह ख़बर सही है तो मोदी जी और उनकी पुलिस को बहुत-बहुत धन्यवाद”।

जेएनयूएसयू ने कहा है कि मौजूदा केंद्र सरकार अपने काम में असफल रही है, इसलिए लोक सभा चुनावों से ठीक पहले तीन साल पुराने केस में चार्जशीट दाखिल की है. छात्र संघ ने कहा है कि वह इन बोगस चार्जों के अलावा अपने हर विद्यार्थी के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा.

इस मामले में शिकायत करने वाले छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने कहा है कि यह निर्णय एबीवीपी की जीत है. यह उन तथ्यों की जीत है जो एबीवीपी ने उसी समय सबके सामने रखे थे. यह कांग्रेस और उन सभी राजनीतिक लोगों पर तमाचा है जो उनका समर्थन कर रहे थे. राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल अब शांत क्यों हैं? उनको देश से माफी मागनी चाहिए.

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देश

वाराणसी में किया गया हनुमान जी के जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदन

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अब इस से बड़ा उदाहरण क्या होगा इस बात का की राजनीति में सब कुछ जायज है. अपने फ़ायदे के लिये किसी भी चीज को मुद्दा बनाकर राजनीति की जाती है, फिर चाहे भगवान ही क्यों न हों. ताज़ा मामला भगवान राम के बाद हनुमान को दलित बताने के बाद मचे सियासी घमासान का है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों एक चुनावी रैली में हनुमान को दलित समुदाय का बताया था, जिस पर राजनीति शुरू हो गई है. उत्तर प्रदेश के ही एक जिले में जहां दलित समुदाय द्वारा बजरंगबली के एक मंदिर पर कब्जे की खबर सामने आई, तो अब पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हनुमान जी का जाति प्रमाण पत्र मांगा जा रहा है. इसके लिए बाकायदा आवेदन किया गया है.

जिला मुख्यालय पर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के युवजन सभा के लोग इकट्ठा हुए और उन्होंनेबजरंगबली के जाति प्रमाण पत्र की मांग की. इसके लिये कार्यकर्ताओं ने बाकायदा जाति प्रमाण पत्र प्राप्त का आवेदन फॉर्म भरा. रोचक बात यह है कि कार्यकर्ताओं ने आवेदन फॉर्म में वांछित जानकारी भी भरी है. जैसे, बजरंगबली के पिता का नाम महाराज केशरी, जाति में वनवासी आदि भरा हुआ है. कार्यकर्ता फॉर्म लेकर कार्यालय में गए और जाति प्रमाणपत्र की मांग की. प्रगतिशील युवजन सभा के लोग हनुमान जी के दलित होने पर उनके आरक्षण की भी मांग कर रहे है. सभा के जिला अध्यक्ष हरीश मिश्रा कहते हैं कि पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ ने हनुमान जी को दलित बताया था. उसी क्रम में आज यहां उनके जाती प्रमाण के लिए आवेदन दिया गया.

हरीश मिश्रा ने कहा कि जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी द्वारा लगातार भगवान को राजनीति में घसीटा जा रहा है, उसके विरोधस्वरूप हमने ये कदम उठाया. पहले राम जी को घसीटा, अब हनुमान को. अगर वह दलित हैं तो जाति प्रमाण पत्र दें और हम उनके आरक्षण की भी मांग करेंगे. आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों राजस्थान के अलवर में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘बजरंगबली एक ऐसे लोक देवता हैं, जो स्वयं वनवासी हैं, निर्वासी हैं, दलित हैं, वंचित हैं. भारतीय समुदाय को उत्तर से लेकर दक्षिण तक पुरब से पश्चिम तक सबको जोड़ने का काम बजरंगबली करते हैं.’

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