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अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट के लिए पीएमओ के कहने पर किया गया नियमों में बदलाव

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फाइल फोटो

उपरोक्त संदर्भ में चौकीदार कौन है, नाम लेने की ज़रूरत नहीं है। वर्ना छापे पड़ जाएंगे और ट्विटर पर ट्रोल कहने लगेंगे कि कानून में विश्वास है तो केस जीत कर दिखाइये। जैसे भारत में फर्ज़ी केस ही नहीं बनता है और इंसाफ़ झट से मिल जाता है। आप लोग भी सावधान हो जाएं। आपके ख़िलाफ़ कुछ भी आरोप लगाया जा सकता है। अगर आप कुछ नहीं कर सकते हैं तो इतना तो कर दीजिए कि हिन्दी अख़बार लेना बंद कर दें या फिर ऐसा नहीं कर सकते तो हर महीने अलग अलग हिन्दी अख़बार लें, तभी पता चलेगा कि कैसे ये हिन्दी अख़बार सरकार की थमायी पर्ची को छाप कर ही आपसे महीने का 400-500 लूट रहे हैं। हिन्दी चैनलों का तो आप हाल जानते हैं। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसके लिए आपको 28 और 29 अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस में ऋतिका चोपड़ा की ख़बर बांचनी होगी।
आप सब इतना तो समझ ही सकते हैं कि इस तरह की ख़बर आपने अपने प्रिय हिन्दी अख़बार में कब देखी थी।

इंडियन एक्सप्रेस की ऋतिका चोपड़ा दो दिनों से लंबी-लंबी रिपोर्ट फाइल कर रही हैं कि किस तरह अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट के लिए पीएमओ के कहने पर नियमों में बदलाव किया गया। ऋतिका ने आर टी आई के ज़रिए मानव संसाधन मंत्रालय और पीएमओ के बीच पत्राचार हासिल कर यह रिपोर्ट तैयार की है। मानव संसाधन मंत्रालय ने शुरू में जो नियम बनाए थे उसके अनुसार अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को प्रतिष्ठित संस्थान का टैग नहीं मिल पाता। यहां तक कि वित्त मंत्रालय ने भी चेतावनी दी थी कि जिस संस्थान का कहीं कोई वजूद नहीं है उसे इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का लेबल देना तर्कों के ख़िलाफ़ है। इससे भारत में शिक्षा सिस्टम को ठेस पहुंचती है। इसके बाद भी अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को मानव संसाधन मंत्रालय की सूची में शामिल करने के लिए मजबूर किया गया।

वित्त मंत्रालय के ख़र्चा विभाग यानी डिपार्टमेंट आफ एक्सपेंडिचर ने मानव संसाधन मंत्रालय को लिखा था कि इस तरह से एक ऐसे संस्थान को आगे करना जिसकी अभी स्थापना तक नहीं हुई है, उन संस्थानों की तुलना में उसके ब्रांड वैल्यू को बढ़ाना होगा जिन्होंने अपने संस्थान की स्थापना कर ली है। इससे उनका उत्साह कम होगा। सिर्फ मंशा के आधार पर कि भविष्य में कुछ ऐसा करेंगे, किसी संस्थान को इंस्टीट्यूट ऑफ़ एमिनेंस का दर्जा देना तर्कों के ख़िलाफ़ है। इसलिए जो नए नियम बनाए गए हैं उनकी समीक्षा की जानी चाहिए।

वित्त मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय की राय के ख़िलाफ़ जाकर पीएमओ से अंबानी के जियो संस्थान को दर्जा दिलवाने की ख़बर आप इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ सकते हैं। भले ही इस खबर में यह नहीं है कि चौकीदार जी अंबानी के लिए इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं लेकिन इस ख़बर को पढ़ते ही आपको यही समझ आएगा। दो दिनों से ख़बर छप रही है मगर किसी ने खंडन नहीं किया है।

अडानी जी की एक कंपनी है। अडानी एंटरप्राइजेज़ लिमिटेड। यह कंपनी सिंगापुर के हाईकोर्ट में अपना केस हार चुकी है। भारत के रेवेन्यु इंटेलिजेंस ने कई पत्र जारी कर इस कंपनी के बारे में जवाब मांगे हैं, दुनिया के अलग अलग देशों से, तो इसके खिलाफ अडानी जी बांबे हाईकोर्ट गए हैं कि डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यु इंटेलिजेंस के लेटर्स रोगेटरी को रद्द कर दिया जाएगा। जब आप विदेशी मुल्क से न्यायिक मदद मांगते हैं तो उस मुल्क को लेटर ऑफ़ रोगेटरी जारी करना पड़ता है।

आप जानते हैं कि चौकीदार जी ने मुंबई के एक कार्यक्रम में हमारे मेहुल भाई कह दिया था। आप यह भी जानते हैं कि यही हमारे मेहुल भाई ने
महान भारत की नागरिकता छोड़ कर महान एंटीगुआ की नागरिकता ले ली है। चौकीदार जी के हमारे मेहुल भाई लगातार भारत को शर्मिंदा कर रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि वे भारत नहीं जाएंगे क्योंकि वहां के जेलों की हालत बहुत ख़राब है।

चौकीदार जी के हमारे मेहुल भाई पर मात्र 13,500 करोड़ के गबन के आरोप हैं। सरकार चाहे तो इनके लिए 1 करोड़ ख़र्च कर अलग से जेल बनवा सकती है, या किसी होटल के कमरे को जेल में बदल सकती है। कम से कम मेहुल भाई को वहां रहने में तो दिक्कत नहीं होगी। कहां तो काला धन आने वाला था, कहां काला धन वाले ही चले गए।

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले श्री रविशंकर का एक ट्विट घूमता है कि मोदी जी प्रधानमंत्री बनेंगे तो एक डॉलर 40 रुपये का हो जाएगा। फिलहाल यह 70 रुपये का हो गया है और भारत के इतिहास में इतना कभी कमज़ोर नहीं हुआ है। वैसे भी आप तक इसकी ख़बर प्रमुखता से नहीं पहुंची होगी और जिनके पास पहुंची है उनके लिए तर्क के पैमाने बदले जा रहे हैं।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं राजीव कुमार। राजीव ने कहा है कि हमें मुद्रा के आधार पर अर्थव्यवस्था को जज करने की मानसिकता छोड़नी ही पड़ेगी। मज़बूत मुद्रा में कुछ भी नहीं होता है।

वाकई ऐसे लोगों के अच्छे दिन हैं। कुछ भी तर्क देते हैं और मार्केट में चल जाता है। राजीव कुमार को पता नहीं है कि उनके चेयरमैन चौकीदार जी भी भारतीय रुपये की कमज़ोरी को दुनिया में भारत की गिरती साख और प्रतिष्ठा से जोड़ा करते थे। सबसे पहले उन्हें जाकर ये बात समझाएं। वैसे वे समझ गए होंगे।

वैसे आप कोई भी लेख पढ़ेंगे, उसमें यही होगा कि रुपया कमज़ोर होता है तो उसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। वित्तीय घाटा बढ़ता है। 2018 के साल में भारतीय रुपया ही दुनिया भर में सबसे ख़राब प्रदर्शन कर रहा है। वैसे रामदेव ने भी रजत शर्मा के आपकी अदालत में कहा था कि मोदी जी आ जाएंगे तो पेट्रोल 35 रुपया प्रति लीटर मिलेगा। इस समय तो कई शहरों में 86 और 87 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है।

ये सब सवाल पूछना बंद कर दीजिए वर्ना कोई आएगा फर्ज़ी कागज़ पर आपका नाम लिखा होगा और फंसा कर चला जाएगा। जब टीवी और अखबारों में इतना डर घुस जाए तभी शानदार मौका होता है कि आप अपनी मेहनत की कमाई का 1000 रुपया बचा लें। दोनों को बंद कर दें। कुछ नहीं तो कम से कम ये काम तो कर ही सकते हैं। हमेशा के लिए नहीं बंद कर सकते मगर एक महीने के लिए तो बंद कर ही सकते हैं।

(यह लेख मुख्यतः वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुआ है)

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गुजरात इंफ़ैंट्री बनाम अहीर बख़्तरबंद के बीच है मुक़ाबला यूपी में !

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गुजरात इंफ़ैंट्री रेजीमेंट। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह दोनों समाजवादी पार्टी का घोषणापत्र पढ़कर चौंक गए होंगे।

दोनों भाजपाई सोच रहे होंगे कि ये सपाई क्यों उनके राज्य के नाम पर रेजीमेंट बना रहा है? बनाना था तो गुजरात बख़्तरबंद रेजीमेंट बनाते और अहीर इंफ़ैंट्री रेजीमेंट! सैनिक स्कूल में पढ़े अखिलेश यादव का गेम प्लान है क्या। अमित शाह ने तो चचा शिवराज से पूछा होगा कि अखिलेश क्यों अहीर बख़्तरबंद रेजीमेंट और गुजरात इंफ़ैंट्री रेजीमेंट बना रहे हैं?

यूपी जब गुजरात के मोदी को पीएम बना सकता है तो उनके राज्य के नाम पर रेजीमेंट नहीं दे सकता? यूपी का दिल बड़ा भी तो है! कहीं इसके विरोध में गुजरात में आंदोलन न हो जाए कि आप हमारे राज्य के नाम पर रेजीमेंट क्यों बना रहे हैं? क्यों सेना में भेजना चाहते हैं? सब लड़ाई में चले जाएँगे तो कारोबार कौन करेगा! मोदी जी की सेना ठीक नहीं है तो गुजरात के नाम पर सेना बनाने की बात कैसे ठीक है!

मज़ाक़ छोड़िए। पिछले दिनों कई नेताओं ने कहा कि गुजरात के लोग शहीद नहीं होते। यह बात सही नहीं है। 2017 में scoop whoop ने इस पर अलग अलग जगहों पर छपी रिपोर्ट को संकलित किया है। ऋतु सिंह ने बताया था कि 31 मार्च 2017 तक गुजरात में 26,656 पूर्व सैनिक थे। गुजरात के 39 सैनिकों को बहादुरी का पुरस्कार मिला है। आतंकवाद से लड़ते हुए 20 जवानों ने बलिदान दिया है। 24 जवानों ने सीमा पर शहादत दी है। कब से कब तक का ज़िक्र नहीं है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और उत्तराखंड से सेना में ख़ूब लोग जाते हैं। कुछ राज्य से नहीं जाते। राज्यों के बीच शहीदों की संख्या को लेकर तुलना नहीं की जा सकती। वैसे यूपी से शहीदों की संख्या का पता नहीं चल पाया।

रेडिफ पर आकार पटेल की रिपोर्ट है कि नेपाल आकार गुजरात से आधा है वो सेना में गुजरात से ज़्यादा सैनिक भेजता है। गुजरात में 2009 में विशेष अभियान के बाद 719 सैनिक भर्ती हुए थे। उसके पहले 230 सैनिक भर्ती हुए थे। सेना को ही सभी राज्यों की सूची निकाल देनी चाहिए। शहीदों की भी। इससे एक लाभ यह होगा कि कोई मदद करना चाहे तो वह सीधे परिवार से संपर्क कर सकता है।

कई जगहों पर ख़ास नौकरी में जाने का ट्रेंड बन जाता है। सेना का भी बन जाता है। एक वक़्त में गुजरात के लोगों ने लंबी समुद्री यात्राएँ कर दुनिया भर में कारोबार किया। वो कम साहसिक नहीं रहा होगा। मैं तो लहरों की ऊँचाई देख कर लकड़ी की नाव से उतर ही जाता! अनजान जगहों पर जाकर कारोबार करना साहसिक और दुस्साहसिक होता है। 2014 में दो गुजरातियों का यूपी के धुरंधरों को ज़ीरो पर पहुँचा देना भी कम साहसिक नहीं था!

जिस तरह से सेना का राजनीतिकरण हो रहा है। करने वाला किसी लोक लिहाज़ की परवाह नहीं करता है। उसके जवाब में तो ये सब होगा। कोई पूछेगा कि गुजरात अर्ध सैनिक बलों के शहीदों के परिवारों को चार लाख क्यों देता है और यूपी पचीस लाख क्यों? सभी राज्यों में एक नीति होनी चाहिए। एक नीति यह भी हो कि सेना को लेकर राजनीति न हो।

वैसे अखिलेश यादव को पता होना चाहिए कि मोदी और शाह अपने आप में गुजरात इंफ़ैंट्री रेजीमेंट हैं, यूपी वालों को जवाब में बख़्तरबंद रेजीमेंट बनाना पड़ गया है! फ़ायर ! ढ ढ ढ ढ ढ ।

सपा के घोषणापत्र में अमीरों पर टैक्स बढ़ाने की बात है। ढाई करोड़ से अधिक की संपत्ति पर दो परसेंट अलग से टैक्स की बात है। मिडिल क्लास राष्ट्रवादियों और अर्थशास्त्रियों का क्या कहना है इस पर !

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लोकसभा चुनाव 2019:- बेगूसराय में वामदल कितना मजबूत?

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हम सब यह जानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल फूंका जा चुका है, जिसके लिए हर दल ने अलग-अलग सीटों पर अपनी दाबेदरी पेश करना शुरू कर दिया है! इसी क्रम में बेगूसराय से लोकसभा प्रत्याशी के लिए CPI ने अपनी दाबेदरी कन्हैया कुमार के नाम से पेश किया है! डॉ. कन्हैया कुमार JNU छात्रसंघ के भूतपूर्व अध्यक्ष और देश के सबसे युवा चर्चित चेहरा हैं! वहीं दूसरी ओर अन्य दल ने भी अपनी दाबेदारी पेश की है! अब सवाल उठ रहा है कि CPI की दाबेदारी कितनी मजबूत है?

सबसे पहले यह बताता चलूँ कि वर्तमान बेगूसराय लोकसभा सीट पूर्व के बेगूसराय और बलिया को मिला के बना है जिसका क्षेत्र पूरा बेगूसराय ज़िला है, जिसमे सात विधानसभा आता है! ऐतिहासिक रूप से बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जाना जाता है जहाँ वामपंथ ने हमेशा के अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज की है!

सातों विधानसभा सभा का अवलोकन जब करते हैं तो यह पाते हैं कि बेगूसराय विधानसभा सभा को कांग्रेस ने 10, भाजपा ने 5, राजद ने 0 तथा वामपंथ ने 3 बार जीता है! वहीं दूसरी ओर अगर उप विजेता को देखा जाय तो कांग्रेस 4, भाजपा 1, राजद 0 और वामदल 9 वार दूसरे नंबर पर रही हैं!

बखरी विधानसभा में कांग्रेस 2, भाजपा 1, राजद 2, तथा वामदलों ने 10 बार जीत हासिल की हैं और कांग्रेस 5, भाजपा 1, वामदलों ने 3 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

तेघरा को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1 तथा वामदलों ने 2 बार जीता है तथा कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1, तथा वामदलों ने 2 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

मटिहानी को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 0, तथा वामदलों ने 3 बार जीता है जबकि कांग्रेस को 5, भाजपा को 1, राजद को 0 तथा वामदलों को 3 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

साहेबपुर कमाल जब से बना है एक बार राजद जीती और एक बार हारी है! जबकि पहले के बलिया विधानसभा में राजद, जदयू तथा लोजपा का दबदबा रहा है! तनवीर हसन साहब ख़ुद अपने यहाँ से दो बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं!

चेरिया बरियारपुर को कांग्रेस ने 2 बार, भाजपा ने 0, राजद ने 1 और वामदलों ने 1 बार जीता है वही दूसरी ओर कांग्रेस को 2, भाजपा को 0, राजद को 2 तथा वामदलों को 1 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

वही अगर पूर्व के बरौनी विधानसभा की बात करें तो सन 1977 से 2005 तक लगातार 8 बार सीपीआई ने चुनाव जीता है! सब मिलकर अगर देखा जाय तो हर दल से ज़्यादा वामदलों ने विधानसभा चुनाव जीतें हैं!
अब रही लोकसभा चुनाव की बात तो पहले बेगूसराय और बलिया दो अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र रहा है जिसमें से बेगूसराय में 1967 में सीपीआई ने कांग्रेस को हराकर चुनाव जीता था एवं पिछले चुनाव 2014 में भी सीपीआई ने 1,92,639 वोट लाकर तीसरा स्थान प्राप्त किया था जबकि 1967 में 1, 80, 883 वोट लाकर सीपीआई ने चुनाव जीत लिया था! कहने का तात्यापर्य यह है कि सीपीआई का कैडर वोट अभी भी उसके साथ है क्योंकि 2009 के चुनाव में भी सीपीआई को 1,64,843 वोट आए थे!

बलिया लोकसभा जो पहले बेगूसराय से अलग था वहाँ सीपीआई तीन बार 1980, 1991 तथा 1996 में लोकसभा चुनाव जीत चुकी है! 1998 में भी जब राजद चुनाव जीती थी उस वक़्त भी 1,87,635 वोट पाकर सीपीआई 52,484 वोट से पिछड़कर दूसरे पायदान पर थी!

अभी तक के लोकसभा चुनाव को देखा जाय तो कुल 16 लोकसभा चुनाव में से सीपीआई ने 1962 से छः चुनाव लड़ी है जिसमें से 1962 हासिम अख़्तर (51, 163),1977 इंद्रदेव सिंह (72, 096), 1998 रमेन्द्र कुमार (विजयी 1,44,540), 2009 शत्रुघ्न प्रसाद सिंह (164843) एवं 2014 राजेंद्र प्रसाद सिंह (1,92,639) चुनाव लड़े हैं! वाकी 1962 से पहले सीपीआई ने चुनाव नहीं लड़ा है और बाद में कई बार गठबंधन के कारण दूसरे दल को समर्थन किया है! इस बार जब सीपीआई के पास भारत का सबसे चर्चित क्रांतिकारी चेहरा ख़ुद है तो फिर यह सवाल कहाँ से आता है कि वामदल का बेगूसराय में आधार नहीं है!

लोकसभा और विधानसभा दोनों को मिलाकर अवलोकन करने पर हम यह पाते हैं कि वामदल पूरे बेगूसराय के 7 विधानसभा क्षेत्रों में से मटिहानी एवं साहेबपुर कमाल को छोड़कर किसी भी विधानसभा में महागठबंधन के सारे घटकदल में से सबसे ज़्यादा मजबूत है! और अगर संभावित उम्मीदवारों को देखें तो कन्हैया कुमार से ज़्यादा लोकप्रिय उम्मीदवार कोई नहीं है! जहाँ तक क्षेत्र में लोगों के बीच मिलना-जुलना और मेहनत की बात करें तो कन्हैया कुमार 2014 के लोकसभा चुनाव से ही अपने क्षेत्र के लोगों के बीच काम कर रहे हैं अन्य किसी भी दल का कोई व्यक्ति उनके मुक़ाबके कहीं नहीं टिकता! जब भी बेगूसराय में किसी भी प्रकार का कोई भी सामाजिक वैमनस्यता फैलाने की कोशिश हुई वामपंथियों ने हर समाज के लोगों से कंधा से कंधा मिलाकर साम्प्रदायिक शक्तियों का डट कर मुक़ाबला किया है तब और नेतागण कहाँ थे!

वर्तमान सरकार में जनता पर हुए हर अत्याचार के विरुद्ध यहाँ से लेकर दिल्ली तक कन्हैया कुमार एवं उनका संगठन (AISF) और दल (CPI) ने हर मोर्चे पर आंदोलन कर साम्प्रदायिक शक्तियों को परास्त किया है, तो आज जब समाज को इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है तब यह कहना कि इनका कोई आधार नही यह कहाँ तक उचित है! हाँ यह सच है कि राजद में तनवीर हसन ने बेगूसराय से पहली बार 2014 में कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ा और 3,69,892 वोट पाए लेकिन उनकी भी हार ही हुई, जबकि 2009 में जदयू से मुनाजिर हसन मात्र 2,05,680 वोट लाकर जीत हासिल की थी! तनवीर जी कई बार चुनाव लड़ चुके हैं पर अभी तक एक बार भी जीत नहीं पाएं हैं, हां एक बार MLC बने हैं जिसमें भी बेगूसराय सीपीआई के दो विधायकों ने ही उनकी मदद की थी!

अगर हम बेगूसराय लोकसभा की बात करें तो यहाँ का समीकरण हर बार अलग ही होता है! वर्तमान में सारे समीकरण, मेहनत, युवा जोश, ईमानदारी तथा लोकप्रियता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि अगर सीपीआई/कन्हैया कुमार अकेले भी चुनाव लड़ेंगे तो उनकी जीत की संभावना को नकारा नहीं जा सकता!

जानत के विश्वास में भी कन्हैया कुमार सबसे ऊपर हैं! यह बात तो तय है कि कन्हैया कुमार जितनी प्रमुखता से अपने क्षेत्र के बारे में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पटल पर बात रख सकते हैं कोई अन्य उम्मीदवार नहीं रख सकता! एक और बात जो कन्हैया कुमार को दूसरों से अलग करती है वो है उनकी विचारधारा जो किसी अन्य संभावित उम्मीदवार के पास नहीं है!

एक बात तो तय है कि कन्हैया कुमार दल बदलू नहीं हैं और ना ही उन्हें यह चिंता है कि हर बात कहने से पहले यह सोचना है कि कहीं कोई आका नाराज़ ना हो जाय! दूसरी बात कि कन्हैया कुमार जब अपने क्षेत्र का मुद्दा रखेंगे तो पूरा देश सुनेगा क्योंकि उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ बेगूसराय तक ही सीमित नहीं है! तीसरी बात वो बेगूसराय की भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ़ हैं और जानते हैं कि अगर युवाओं ने इस बार उनका साथ दिया तो बेगूसराय में व्यवसाय तथा लघुउद्योगों की अपार संभावनाएं हैं; बस धर्म, जाति, सम्प्रदाय इत्यादि से ऊपर उठकर एक बार पूरे समाज की भलाई के मद्देनजर सही दिशानिर्देशन में चलने की आवश्यकता है!

~शाहनवाज़ भारतीय

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देहरादून:- नमक सत्याग्रह की विरासत बचाने के लिए उत्तराखंड के युवा हुए एकजुट

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आज का दिन(12 मार्च) हिंदुस्तान के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण दिन है। आज से उन्नब्बे साल पहले 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी जी ने चिन्हित 78 आंदोलनकारियों के साथ साबरमती आश्रम से नमक आंदोलन के लिए डांडी मार्च प्रारम्भ किया था।इसी दिन महात्मा गांधी ने यह संकल्प भी लिया था की जब तक मुल्क को आजादी नहीं मिलेगी तब तक वह साबरमती आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। ऐसा ही हुआ।

इसके बाद गांधी जी साबरमती आश्रम नहीं जा पाए। सही मायने में यह दिन आज़ादी की लड़ाई का एक ऐसा महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ से ब्रितानिया साम्राज्यवाद की चूलें हिलनी शुरू हो गई थी। मैं देहरादून से हूँ। उत्तर भारत में मेरा जिला देहरादून एक मात्र ऐसा स्थान है जहाँ एक नदी के पानी से नमक बनाकर और उस नमक को बेचकर नमक क़ानून को तोडा गया था।

गांधी जी की इस डांडी यात्रा में देहरादून के रहने वाले वीर खडग बहादुर भी शामिल थे। उन्होंने गांधी जी से जिक्र किया था कि हमारे गावं के पास भी एक नदी बहती है जिसके कुछ हिस्से में नमकीन पानी पाया जाता है। तो फिर गांधी जी ने खड़गबहादुर को देहरादून जाकर इस नदी से नमक बनाकर नमक आंदोलन शरू करने की सलाह दी थी। गांधी जी की सलाह पर वीर खडग बहादुर ने शहर के तत्कालीन आंदोलनकारियों से मिलकर यहाँ नमक बनाकर नमक सत्याग्रह शुरू किया था। जिस जगह नमक बनाया गया था उसका नाम खारा खेत पड़ा।खारा का मतलब नमक है। इसी के बगल में नेम और नून नदी बहती है। जिसका पानी नमकीन है।

इस जगह का नाम है खराखेत। यह देहरादून से लगभग 22 किलोमीटर दूर पश्चिमी भाग में पड़ता है। इसका रास्ता प्रेमनगर से आगे नंदा की चौकी से उत्तर की और पौंधा गावं से होते हुए जसपाल राणा शूटिंग रेंज से होकर जाता है।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति उत्तराखंड ने भारत ज्ञान विज्ञान युवा समिति के साथ मिलकर आज इसी जगह से अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क के द्वारा चलाये जा रहे “सबका देश अपना देश” अभियान की शुरआत की। आज के कार्यक्रम walk & talk का नाम था अपनी विरासत को जानो। इस कार्यक्रम में तीस के लगभग युवा व अन्य साथी शामिल हुए। एक घंटे स्मारक स्थल पर श्रमदान कर सफाई की गई। फिर इस जगह के और नमक आंदोलन पर चर्चा की। इस विषय पर सर्वोदय मंडल देहरादून के साथी बीजू नेगी जी ने बिस्तार से जानकारी दी। तत्पश्चात अपने अपने घरों से बनाकर लाये खाने को मिल बाँट कर सामूहिक भोज का आनंद लिया। सबका देश हमारा देश अभियान को जोर शोर से करने के संकल्प के साथ आज के कार्यक्रम का समापन हुआ। आज मुख्य रूप से गीता गैरोला, बीजू नेगी , अनूप बडोला , गजेंद्र वर्मा , उमा भट्ट , इंद्रेश नौटियाल , एस एस रावत,नितेश खंतवाल, कमलेश खंतवाल , सतीश धौलखंडी ,नेहा चंद अग्रिम सुन्द्रियाल, देवेंद्र रावल हिमांशु चौहान सहित एस एफ आई के नेतृत्वकारी साथी उपस्थित रहे।
(साभार:Vijay Bhatt )

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