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लोकसभा चुनाव 2019:- बेगूसराय में वामदल कितना मजबूत?

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हम सब यह जानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल फूंका जा चुका है, जिसके लिए हर दल ने अलग-अलग सीटों पर अपनी दाबेदरी पेश करना शुरू कर दिया है! इसी क्रम में बेगूसराय से लोकसभा प्रत्याशी के लिए CPI ने अपनी दाबेदरी कन्हैया कुमार के नाम से पेश किया है! डॉ. कन्हैया कुमार JNU छात्रसंघ के भूतपूर्व अध्यक्ष और देश के सबसे युवा चर्चित चेहरा हैं! वहीं दूसरी ओर अन्य दल ने भी अपनी दाबेदारी पेश की है! अब सवाल उठ रहा है कि CPI की दाबेदारी कितनी मजबूत है?

सबसे पहले यह बताता चलूँ कि वर्तमान बेगूसराय लोकसभा सीट पूर्व के बेगूसराय और बलिया को मिला के बना है जिसका क्षेत्र पूरा बेगूसराय ज़िला है, जिसमे सात विधानसभा आता है! ऐतिहासिक रूप से बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जाना जाता है जहाँ वामपंथ ने हमेशा के अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज की है!

सातों विधानसभा सभा का अवलोकन जब करते हैं तो यह पाते हैं कि बेगूसराय विधानसभा सभा को कांग्रेस ने 10, भाजपा ने 5, राजद ने 0 तथा वामपंथ ने 3 बार जीता है! वहीं दूसरी ओर अगर उप विजेता को देखा जाय तो कांग्रेस 4, भाजपा 1, राजद 0 और वामदल 9 वार दूसरे नंबर पर रही हैं!

बखरी विधानसभा में कांग्रेस 2, भाजपा 1, राजद 2, तथा वामदलों ने 10 बार जीत हासिल की हैं और कांग्रेस 5, भाजपा 1, वामदलों ने 3 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

तेघरा को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1 तथा वामदलों ने 2 बार जीता है तथा कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1, तथा वामदलों ने 2 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

मटिहानी को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 0, तथा वामदलों ने 3 बार जीता है जबकि कांग्रेस को 5, भाजपा को 1, राजद को 0 तथा वामदलों को 3 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

साहेबपुर कमाल जब से बना है एक बार राजद जीती और एक बार हारी है! जबकि पहले के बलिया विधानसभा में राजद, जदयू तथा लोजपा का दबदबा रहा है! तनवीर हसन साहब ख़ुद अपने यहाँ से दो बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं!

चेरिया बरियारपुर को कांग्रेस ने 2 बार, भाजपा ने 0, राजद ने 1 और वामदलों ने 1 बार जीता है वही दूसरी ओर कांग्रेस को 2, भाजपा को 0, राजद को 2 तथा वामदलों को 1 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

वही अगर पूर्व के बरौनी विधानसभा की बात करें तो सन 1977 से 2005 तक लगातार 8 बार सीपीआई ने चुनाव जीता है! सब मिलकर अगर देखा जाय तो हर दल से ज़्यादा वामदलों ने विधानसभा चुनाव जीतें हैं!
अब रही लोकसभा चुनाव की बात तो पहले बेगूसराय और बलिया दो अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र रहा है जिसमें से बेगूसराय में 1967 में सीपीआई ने कांग्रेस को हराकर चुनाव जीता था एवं पिछले चुनाव 2014 में भी सीपीआई ने 1,92,639 वोट लाकर तीसरा स्थान प्राप्त किया था जबकि 1967 में 1, 80, 883 वोट लाकर सीपीआई ने चुनाव जीत लिया था! कहने का तात्यापर्य यह है कि सीपीआई का कैडर वोट अभी भी उसके साथ है क्योंकि 2009 के चुनाव में भी सीपीआई को 1,64,843 वोट आए थे!

बलिया लोकसभा जो पहले बेगूसराय से अलग था वहाँ सीपीआई तीन बार 1980, 1991 तथा 1996 में लोकसभा चुनाव जीत चुकी है! 1998 में भी जब राजद चुनाव जीती थी उस वक़्त भी 1,87,635 वोट पाकर सीपीआई 52,484 वोट से पिछड़कर दूसरे पायदान पर थी!

अभी तक के लोकसभा चुनाव को देखा जाय तो कुल 16 लोकसभा चुनाव में से सीपीआई ने 1962 से छः चुनाव लड़ी है जिसमें से 1962 हासिम अख़्तर (51, 163),1977 इंद्रदेव सिंह (72, 096), 1998 रमेन्द्र कुमार (विजयी 1,44,540), 2009 शत्रुघ्न प्रसाद सिंह (164843) एवं 2014 राजेंद्र प्रसाद सिंह (1,92,639) चुनाव लड़े हैं! वाकी 1962 से पहले सीपीआई ने चुनाव नहीं लड़ा है और बाद में कई बार गठबंधन के कारण दूसरे दल को समर्थन किया है! इस बार जब सीपीआई के पास भारत का सबसे चर्चित क्रांतिकारी चेहरा ख़ुद है तो फिर यह सवाल कहाँ से आता है कि वामदल का बेगूसराय में आधार नहीं है!

लोकसभा और विधानसभा दोनों को मिलाकर अवलोकन करने पर हम यह पाते हैं कि वामदल पूरे बेगूसराय के 7 विधानसभा क्षेत्रों में से मटिहानी एवं साहेबपुर कमाल को छोड़कर किसी भी विधानसभा में महागठबंधन के सारे घटकदल में से सबसे ज़्यादा मजबूत है! और अगर संभावित उम्मीदवारों को देखें तो कन्हैया कुमार से ज़्यादा लोकप्रिय उम्मीदवार कोई नहीं है! जहाँ तक क्षेत्र में लोगों के बीच मिलना-जुलना और मेहनत की बात करें तो कन्हैया कुमार 2014 के लोकसभा चुनाव से ही अपने क्षेत्र के लोगों के बीच काम कर रहे हैं अन्य किसी भी दल का कोई व्यक्ति उनके मुक़ाबके कहीं नहीं टिकता! जब भी बेगूसराय में किसी भी प्रकार का कोई भी सामाजिक वैमनस्यता फैलाने की कोशिश हुई वामपंथियों ने हर समाज के लोगों से कंधा से कंधा मिलाकर साम्प्रदायिक शक्तियों का डट कर मुक़ाबला किया है तब और नेतागण कहाँ थे!

वर्तमान सरकार में जनता पर हुए हर अत्याचार के विरुद्ध यहाँ से लेकर दिल्ली तक कन्हैया कुमार एवं उनका संगठन (AISF) और दल (CPI) ने हर मोर्चे पर आंदोलन कर साम्प्रदायिक शक्तियों को परास्त किया है, तो आज जब समाज को इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है तब यह कहना कि इनका कोई आधार नही यह कहाँ तक उचित है! हाँ यह सच है कि राजद में तनवीर हसन ने बेगूसराय से पहली बार 2014 में कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ा और 3,69,892 वोट पाए लेकिन उनकी भी हार ही हुई, जबकि 2009 में जदयू से मुनाजिर हसन मात्र 2,05,680 वोट लाकर जीत हासिल की थी! तनवीर जी कई बार चुनाव लड़ चुके हैं पर अभी तक एक बार भी जीत नहीं पाएं हैं, हां एक बार MLC बने हैं जिसमें भी बेगूसराय सीपीआई के दो विधायकों ने ही उनकी मदद की थी!

अगर हम बेगूसराय लोकसभा की बात करें तो यहाँ का समीकरण हर बार अलग ही होता है! वर्तमान में सारे समीकरण, मेहनत, युवा जोश, ईमानदारी तथा लोकप्रियता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि अगर सीपीआई/कन्हैया कुमार अकेले भी चुनाव लड़ेंगे तो उनकी जीत की संभावना को नकारा नहीं जा सकता!

जानत के विश्वास में भी कन्हैया कुमार सबसे ऊपर हैं! यह बात तो तय है कि कन्हैया कुमार जितनी प्रमुखता से अपने क्षेत्र के बारे में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पटल पर बात रख सकते हैं कोई अन्य उम्मीदवार नहीं रख सकता! एक और बात जो कन्हैया कुमार को दूसरों से अलग करती है वो है उनकी विचारधारा जो किसी अन्य संभावित उम्मीदवार के पास नहीं है!

एक बात तो तय है कि कन्हैया कुमार दल बदलू नहीं हैं और ना ही उन्हें यह चिंता है कि हर बात कहने से पहले यह सोचना है कि कहीं कोई आका नाराज़ ना हो जाय! दूसरी बात कि कन्हैया कुमार जब अपने क्षेत्र का मुद्दा रखेंगे तो पूरा देश सुनेगा क्योंकि उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ बेगूसराय तक ही सीमित नहीं है! तीसरी बात वो बेगूसराय की भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ़ हैं और जानते हैं कि अगर युवाओं ने इस बार उनका साथ दिया तो बेगूसराय में व्यवसाय तथा लघुउद्योगों की अपार संभावनाएं हैं; बस धर्म, जाति, सम्प्रदाय इत्यादि से ऊपर उठकर एक बार पूरे समाज की भलाई के मद्देनजर सही दिशानिर्देशन में चलने की आवश्यकता है!

~शाहनवाज़ भारतीय

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जम्मू-कश्मीर आंतरिक कलह या अंतरराष्ट्रीय विवादित क्षेत्र

जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के भारत सरकार के क़दम को लेकर कई हलकों से बहुत गंभीर प्रतिक्रियाएं आई हैं.

सबसे अहम प्रतिक्रिया भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन से आई, जो जम्मू-कश्मीर प्रांत के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण रखते हैं. भारत इन हिस्सों पर अपना दावा करता है.

इसे याद रखना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों ही पड़ोसी मुल्क परमाणु शक्ति संपन्न हैं और इनके बीच आपसी ताल्लुकात भी विशेष हैं. ये दोनों भारत के साथ युद्ध भी लड़ चुके हैं.

सीमा विवाद और अन्य तनावों के कारण इन दोनों देशों के साथ भारत के संबंध लंबे वक़्त से प्रतिकूल रहे हैं.

यह पृष्ठभूमि ही इतना बताने के लिए काफ़ी है कि आख़िर क्यों पाकिस्तानी नेतृत्व ने पहले तो अपने कमांडरों और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के साथ गहन विचार-विमर्श किया और फिर अपनी संसद का संयुक्त सत्र बुलाया.

 

संसद में यह प्रस्ताव रखा गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से भारत की ओर से उठाए गए क़दम पर आपातकालीन सत्र बुलाने का आग्रह किया जाए.

पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा ने कश्मीरियों की मदद के लिए सेना के ‘किसी भी हद तक जाने’ के लिए तैयार होने की बात कही है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत के इस फ़ैसले पर दो तरह की संभावनाओं की ओर इशारा किया. उन्होंने दोबारा ‘पुलवामा’ जैसे आत्मघाती हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध की बात की.

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की दूसरी बैठक के बाद पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर कुछ नीतिगत फै़सलों का ऐलान किया- उच्चायुक्तों को वापस बुलाना, द्विपक्षीय व्यापार रोकना और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर निए सिरे से विचार करना.

हालांकि, इनके बयानों को दुनिया के अधिकांश देश उनकी अपनी जनता के बीच की गई बयानबाज़ी के रूप में देख रहे हैं. उनका मानना है कि पाकिस्तान किसी भी तरह की भारत विरोधी गंभीर कार्रवाई शुरू करने की स्थिति में ही नहीं है.

अगर चीन के साथ उसके अहम रिश्ते को केंद्र में रखकर देखें तो पाकिस्तान की ये प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं. विशेषज्ञ पाकिस्तान को चीन के संरक्षण में रहते हुए उसी की भाषा बोलने वाला बताते हैं.

जैसा कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान होता आया है, इस बार भी चीन की प्रतिक्रिया ने ही पाकिस्तान का रुख़ तय किया.

भारत के मामले में चीन छद्म रूप से पाकिस्तान का इस्तेमाल करता आया है जबकि ख़ुद हमेशा नपे-तुले क़दम चलता है. ऐसे में चीन की प्रतिक्रिया, जिसके गहरे मायने हैं, उसका गंभीर विश्लेषण और व्याख्या करने की ज़रूरत है.

सबसे पहले तो वैश्विक स्तर पर चीन आज एक बड़ा कद्दावर देश है जहां उसका एक छोटा से छोटा क़दम भी काफी वज़नदार लगता है. ख़ासकर बात जब एशियाई मामलों की आती है तो निश्चित तौर पर यहां वह हर मामले में सबसे बड़े देश के रूप में अपनी पहचान रखता है

हाल के दिनों में दुनिया ने चीन की विस्तारवादी नीतियों को देखा है जो अपने पड़ोसी मुल्कों में भारत को उभरते समकक्ष प्रतियोगी के रूप में पाता है.

अमरीका और उसके जो मित्र देश चीन की इन विस्तारवादी नीतियों का विरोध करते हैं, उनकी भारत से बढ़ती क़रीबी चीन के लिए चिंता का विषय रहा है. भारत द्वारा अपने जम्मू-कश्मीर प्रांत का पुनर्गठन किए जाने को लेकर चीन की ‘चिंता’ का कारण यह भी है.

जम्मू-कश्मीर प्रांत के अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर और शक्सगाम घाटी के 5,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाक़े पर चीन का नियंत्रण है.

जम्मू-कश्मीर के इस पुनर्गठन के बाद आई चीन की प्रतिक्रिया ने दोनों देशों के बीच पहले से चले आ रहे सीमा विवाद को एक बार फिर उभार दिया है, जिसका प्रभाव चीन और भारत के आपसी संबंधों से परे भी है.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, “चीन अपनी पश्चिमी सीमा के इलाक़े को भारत के प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल किए जाने का हमेशा ही विरोध करता रहा है.”

यह समझना आसान है कि चीन ने यह बात क्यों दोहराई. मगर चीन की चिंताएं उसके इस कथन से प्रकट होती हैं- “हाल ही में भारत ने अपने एकतरफ़ा क़ानून बदलकर चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को कम आंकना जारी रखा है. यह अस्वीकार्य है और यह प्रभाव में नहीं आएगा.”

ज़ाहिर है, यह अचानक इस तरह का बयान आया तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसे ‘भारत का आंतरिक मामला’ बताते हुए कहा कि ‘भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता और उम्मीद करता है कि दूसरे देश भी ऐसा ही करेंगे.’

दूसरा, चीन हमेशा की तरह भारत-पाकिस्तान तनाव पर ध्यान केंद्रित करते एक बार फिर ख़ुद को थर्ड अंपायर की तरह पेश करने का मौक़ा तलाश रहा है.

अपने लिखित जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, “संबंधित पक्षों को संयम और एहतियात बरतते हुए विवेकपूर्ण तरीक़े से कार्य करने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे कार्य करने से बचना चाहिए जो एकतरफ़ा रूप से यथास्थिति को बदलकर तनाव बढ़ा सकते हैं. हम दोनों पक्षों से संबंधित विवाद पर संवाद और परामर्श के ज़रिए शांतिपूर्वक हल करने और क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बनाए रखने का आग्रह करते हैं.”

चीन की ये प्रतिक्रिया निश्चित ही शिमला समझौते की भावनाओं और लगातार दी गई भारत की उस सफ़ाई के ख़िलाफ़ जाती है कि भारत-पाकिस्तान तनाव में चीन मध्यस्थ या किसी और तरह की कोई भूमिका नहीं चाहता.

यही नहीं, यह चीन के मसले पर समय-समय पर चीनी नेताओं की ओर से दिए गए नीति आधारित बयानों के भी ख़िलाफ़ है. चीन के प्रसिद्ध विदेश मंत्री छिएँन छीचेन के 1989 में नेपाल में दिए बयान से लेकर राष्ट्रपति चियांग चेमिन के 1996 में पाकिस्तानी सेनट में दिए भाषण का ही नतीजा था कि उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के कश्मीर के मुद्दे को सुरक्षा परिषद में उठाने से दो टूक मना कर दिया था.

कारगिल युद्ध तो वह दौर था जब भारत-पाकिस्तान तनाव को लेकर चीन की तटस्थता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण देखने को मिला था.

अंतरराष्ट्रीय दख़ल

तीसरा, जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन को भारत-पाकिस्तान के बीच का मुद्दा बताने के पीछे चीन की मंशा यह है कि वह बताना चाहता है कि यह भारत का आंतरिक मामला नहीं है. वह यह दिखाना चाहता है कि तटस्थ खिलाड़ी के तौर पर वह भारत-पाकिस्तान तनाव में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से समाधान का कोई परोक्ष मक़सद नहीं रखता है.

हाल ही में जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की भूमिका निभाने को कहा है, तब चीन ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि कश्मीर विवाद के निपटारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक रचनात्मक किरदार निभा सकता है.

यह पाकिस्तान के साथ उसके विशेष रिश्ते और जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से पर उसके कब्ज़े को देखते हुए मज़ाक की तरह लग रहा है.

India-Pakistan LoC-5

चीन का पाकिस्तान के साथ समझौता?

चौथा, चीन ने इस पर अपनी गंभीर चिंता जताई है कि भारत ने यथास्थिति में एकतरफ़ा बदलाव किया है जो इस क्षेत्र में तनाव को इतना बढ़ा सकता है कि चीन भारत के आंतरिक मामलों में दख़ल देने लगे.

साथ ही, अगर चीन मानता कि यह विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच का ही है तो उसका पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ जाने का बयान देना पूरी तरह अनुचित है.

मार्च 1963 को चीन-पाकिस्तान के बीच हुए सीमा समझौते में पाकिस्तान ने अपने कब्ज़े वाली शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी थी.

उसी समझौते के अनुच्छेद-6 में यह लिखा गया है कि “पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर विवाद के निपटारे के बाद, सीमा को लेकर संप्रभुता की वार्ता पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार के साथ फिर शुरू होगी.”

क्या इसका यह मतलब नहीं निकलता कि चीन को तब तक शांत रहना चाहिए जब तक कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर द्विपक्षीय समाधान नहीं कर लेते?

तो क्या बढ़ेगी भारत की सीमाई सुरक्षा?

बौद्ध बहुल लद्दाख को नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने के भारत के फ़ैसले से भी चीन हैरान दिख रहा है, जिसकी सीमा तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र से लगी हुई है.

अब यह इलाक़ा सीधे भारत की केंद्र सरकार के अधीन हो रहा है जहां दलाई लामा समेत सैकड़ों की संख्या में तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं.

शायद इसी कारण नई दिल्ली में चीन के राजदूत याओ जिंग ने भारतीय मीडिया से कहा कि कश्मीर “अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र है” और सुरक्षा परिषद का स्थानीय सदस्य होने के नाते उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करे.

विवादित जम्मू-कश्मीर से अलग होने पर लद्दाख में मनाई जा रही खुशी भारत के इस हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र में चीन के प्रभाव का मुक़ाबला करने में मदद कर सकती है जहां बौद्धों की पर्याप्त उपस्थिति है.

वास्तव में, चीन और पाकिस्तान से सटे जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन से नई दिल्ली अपनी सीमाओं के बेहतर नियंत्रण और प्रबंधन की उम्मीद कर रहा है.

पुनर्गठन की प्रक्रिया के गुणों और इसकी आंतरिक जटिलताओं को एक तरफ़ रखा जाए तो जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन से भारत की सरहदी सुरक्षा बेहतर होगी और इसी वजह से चीन और पाकिस्तान दोनों बेचैन हैं.

साभार: डॉक्टर स्वर्ण सिंह, (प्रोफ़ेसर) जेएनयू, दिल्ली

 

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दिल्ली का डॉन कहे जाने वाले अब्दुल नासिर पर दिल्ली क्राइम ब्रांच ने 9 जुलाई को कर दिया था MCOCA के तहत मुकदमा दर्ज!

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चौधरी हैदर अली

नई दिल्ली:दिल्ली क्राइम ब्रांच ने दिल्ली का डॉन कहे जाने वाले अब्दुल नासिर (31) के खिलाफ 9 जुलाई 2019 को मकोका के तहत मुकदमा दर्ज किया हुआ है!दिल्ली क्राइम ब्रांच के अनुसार अब्दुल नासिर के गैंग पर ऑर्गेनाइज क्राइम सिंडिकेट चलाने के साथ-साथ ठेके पर हत्या, जबरन वसूली करने का आरोप है!

“अब्दुल नासिर पर ऑर्गेनाइज क्राइम सिंडिकेट चलाने का लगाया है आरोप”

दिल्ली क्राइम ब्रांच का दावा है कि अब्दुल नासिर ने अपराध की दुनिया से कम से कम 50 करोड रुपए की प्रॉपर्टी बना रखी है इतना ही नहीं जिस कार से अब्दुल नासिर घूमता है उस कार की कीमत भी 1 करोड़ से ज्यादा है!दिल्ली क्राइम ब्रांच के मुताबिक डिपार्टमेंट से नासिर पर मकोका लगाए जाने की खबर लीक हो जाने की वजह से नासिर और उसके साथी 6 जुलाई 2019 से ही हो गए अंडरग्राउंड!

दिल्ली क्राइम ब्रांच के उपायुक्त श्री राजेश देव ने कहा हमने सक्षम अथॉरिटी से अप्रूवल लेकर अब्दुल नासिर पर मकोका के तहत मुकदमा दर्ज किया है उसकी सभी प्रॉपर्टी और गैंग मेंबरों के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है जल्द से जल्द इन लोगों पर सख्त एक्शन लिया जाएगा!

People’s BEAT एक जिम्मेदार न्यूज़ पोर्टल है इसलिए हमने दिल्ली क्राइम ब्रांच के साथ-साथ (MCOCA) के आरोपी अब्दुल नासिर के परिवार वालों का भी पक्ष लिया है!

हम जाफराबाद की गली नंबर 48 में स्थित अब्दुल नासिर के घर गए अब्दुल नासिर के घर पर हमारी मुलाकात अब्दुल नासिर की वाल्दा 63 वर्षीय श्रीमती इशरत जहां से हुई हमने अब्दुल नासिर की वाल्दा से पूछा के दिल्ली क्राइम ब्रांच का आप के बेटे अब्दुल नासिर पर आरोप है कि उसने अपराध जगत से अपनी संपत्ति 50 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की बना रखी है?
63 वर्षीय बुजुर्ग अब्दुल नासिर की अम्मी ने हमारे सवाल का जवाब देते हुए कहा हमारे पास सिर्फ यही एक घर है जो आज से 45-46 साल पहले नासिर के दादा जी ने खरीदा था! नासिर की वाल्दा ने कहा नासिर और उसके भाइयों के पास अगर पैसा होता तो सबसे पहले वह अपना यह घर बनवाते जोकि झर-झर हालत में है और इस घर से इन सभी बच्चों की यादें जुड़ी हुई हैं! उन्होंने कहा अगर इस पुश्तैनी मकान के अलावा 50 करोड़ तो दूर कोई नासिर पर 5 लाख की संपत्ति ही साबित कर दे उसके बाद जो सजा नासिर को दी जाएगी वह उसे कबूल होगी!

“दिल्ली अंडरवर्ल्ड की तीसरी किस्त जल्द ही आपके साथ सांझा की जाएगी!

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क्या है UAPA संशोधन बिल 2019, और क्यों हो रहा है इसका विरोध…

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UAPA बिल 2019 राज्यसभा से भी पास हो गया है आइए जानते हैं क्या है UAPA बिल और उसका इतना विरोध क्यों हो रहा है?

NIA को मिले असीमित अधिकार..

UAPA, Unlawful Activities Prevention Act 2019 (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून)बिल 2019 को संसद में काफी गर्मागर्म बहस के बाद पास कर दिया गया है. विपक्ष ने इस बिल को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई जिस पर  गृहमंत्री अमित शाह ने सिलसिलेवार तरीके से विपक्ष के सवालों का जवाब दिया है.

शाह ने कहा कि, ”यहां उस प्रावधान की ज़रूरत है जिसके तहत किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित किया जा सके. ऐसा संयुक्त राष्ट्र करता है. अमरीका, पाकिस्तान, चीन, इसराइल और यूरोपीय यूनियन में भी यह प्रावधान है. सबने आतंकवाद के ख़िलाफ़ ऐसा प्रावधान बना रखा है.”

इस बिल को लेकर जो सबसे ज्यादा सवाल उठाए जा रहे हैं, वो इसके गलत इस्तेमाल की आशंका के हैं. इस बिल के कानून बनने के बाद किसी भी व्यक्ति को आतंकी घोषित किया जा सकता है. आतंकी होने के नाम पर उसकी संपत्ति जब्त की जा सकती है. इस बिल ने NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को असीमित अधिकार दे दिए हैं.

ओवैसी ने यूएपीए के दुरुपयोग पर लोकसभा में कहा था, ”मैं इसके लिए कांग्रेस पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराता हूं क्योंकि उसी ने यह क़ानून बनाया था. मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि इस क़ानून का पीड़ित कौन है?”

ओवैसी ने कहा कि किसी को भी आतंकवादी आप तभी कह सकते हैं जब कोर्ट उसे सबूतों के आधार पर दोषी पाती है. ओवैसी ने पूछा कि सरकार महसूस करती है कि कोई व्यक्ति आतंकवादी है तो उसे आतंकवादी घोषित कर देगी. उन्होंने कहा था कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है.

सवाल है कि क्या सच में ऐसा है? UAPA बिल के पास हो जाने के बाद क्या हो जाएगा? इसे जानने की कोशिश करते हैं.

क्याहैUAPAबिल2019?
देश में आतंकवाद व् नक्सलवाद की समस्या को देखते हुए, आतंकी संगठनों और आतंकवादियों को  सबक सिखाने के लिए UAPA बिल 2019 को मंजूरी दी गई है. सरकार के अनुसार, ये मोदी सरकार के आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को प्रदर्शित करने वाला बिल है. लोकसभा ने इस बिल को 24 जुलाई को पास कर दिया था. अब राज्यसभा ने भी इसे पास कर दिया है.

इस बिल का मकसद आतंकवाद की घटनाओं में कमी लाना, आतंकी घटनाओं की स्पीडी जांच करना और आतंकियों को जल्दी सजा दिलवाना है. दरअसल ये देश की एकता और अखंडता पर चोट करने वाले के खिलाफ सरकार को असीमित अधिकार देती है. लेकिन इसी असीमित अधिकार की वजह से विपक्ष को लगता है कि सरकार और उसकी मशीनरी इसका गलत इस्तेमाल कर सकती है.

UAPA बिल के प्रावधानों के मुताबिक सरकार को क्या अधिकार मिले हैं?

  • संशोधित बिल के बाद सरकार किसी भी तरह से आतंकी गतिविधियों में शामिल संगठन या व्यक्ति को आतंकी घोषित कर सकती है. सरकार सबूत नहीं होने की हालत में भी, सिर्फ शक के आधार पर ही किसी को आतंकी घोषित कर सकती है.
  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को इस बिल में असीमित अधिकार दिए गए हैं. बिल के कानून बनने के बाद इंस्पेक्टर रैंक या उससे बड़ी रैंक के किसी भी अधिकारी को किसी भी मामले की जांच की पूरी छूट मिल जाएगी. हालांकि जांच शुरू करने से पहले उन्हें डायरेक्टर जनरल से परमिशन लेनी होगी.
  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के महानिदेशक (DG) को ये अधिकार मिल जाएगा कि वो आतंकी गतिविधि में शामिल व्यक्ति की संपत्ति जब्त कर ले या उसे कुर्क कर सके. इसके पहले जिस राज्य में संपत्ति है, उसके डीजीपी से अनुमति लेनी पड़ती थी.
  • कानून बनने के बाद किसी आतंकी संगठन या आतंकवादी की निजी या आर्थिक जानकारी पश्चिमी देशों के साथ शेयर की जा सकती है.
  • ये बिल एनआईए को ये अधिकार देता है कि वो किसी भी राज्य में जाकर रेड कर सकता है. इसके लिए राज्य सरकार या उसकी पुलिस से अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं है.
  • बिल के कानून बनने के बाद एनआईए के डीएसपी, अस्टिटेंट कमिश्नर या इससे ऊंचे रैंक के अधिकारी मामले की जांच कर सकते हैं.

बिल को लेकर विपक्ष ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं. खासकर किसी भी राज्य की अनुमति के बिना रेड और कुर्की-जब्ती के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता जाहिर की गयी है. कांग्रेस के पी चिदंबरम और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं. हालांकि कुछ मामलों में सरकार ने रिव्यू का प्रावधान रखा है.

गलत इस्तेमाल को लेकर ये सब प्रावधान किए गए हैं-

-बिल में मिले अधिकारों के गलत इस्तेमाल को लेकर गृहमंत्रालय की ओर से कहा गया है कि अगर किसी व्यक्ति को आंतकी घोषित किया जाता है तो वो गृहसचिव के सामने अपील कर सकता है. गृह सचिव को 45 दिन के भीतर अपील पर फैसला लेना होगा.

-केंद्र सरकार इस एक्ट के मुताबिक एक रिव्यू कमिटी बना सकती है. जिसके सामने आतंकी घोषित संगठन या व्यक्ति अपील कर सकता है और वहां सुनवाई की गुजारिश कर सकता है.

-अगर कोई व्यक्ति गृह सचिव के फैसले से संतुष्ट नहीं हो तो वो कमिटी में अपील कर सकता है. कमिटी में हाईकोर्ट के सीटिंग या रिटायर्ड जज के साथ कम से कम केंद्र सरकार के दो गृहसचिव रैंक के रिटायर्ड अधिकारी होंगे.

-केंद्र सरकार का कहना है कि इस कानून का इस्तेमाल सावधानी से होगा. यासिन भटकल और मसूद अजहर जैसे आतंकियों से निपटने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जाएगा.

-सरकार का कहना है कि इस कानून के बाद आतंकवाद की ओर प्रेरित लोग नए ग्रुप बनाने से बचेंगे.

-बिल के प्रावधान आतंकियों पर लगाम लगाने के लिए यूएन के सिक्योरिटी काउंसिल के नियम कायदों की तरह हैं.

 

 

 

 

 

 

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