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मंत्री भी तलने लगे पकौड़ा- सरकार को भी मिला रोज़गार:- रवीश कुमार

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प्रधान सेवक के सच्चे सेवक। पकौड़ा तलते हुए मंत्री जी। स्व-रोज़गार जनता का है या सरकार का? सरकार रोज़गार दे नहीं सकती( कोई भी सरकार) तो वह आपके रोज़गार को अपना तो बता ही सकती है। प्रधानमंत्री के पकौड़ा तलने की बात की आलोचना हुई, लतीफ़े बने और लोग भूल गए। मंत्री जी उनकी बात को सैद्धांतिक जामा पहनाते हुए। अपने फ़िटनेस का प्रदर्शन काम से ज्यादा करते हैं।तस्वीरों के ज़रिए लोगों के मन में कई परतें बनानी होती हैं। नेता सामान्य है यह सबसे बड़ी तस्वीर है। यह समोसा खाकर या पकौड़ा तल कर हासिल की जा सकती है। जनता अपने चश्मे का नंबर बदले या शीशा साफ़ करे, उलझन में है। चुनाव नेता का मनोरंजन है और जनता का रसरंजन। नौजवान पकौड़ा तलें। परीक्षा की तैयारी न करें। हिन्दू- मुस्लिम कीजिए। नेता यही चाहते हैं। रोज़गार की चिन्ता न करें। पकौड़ा कभी भी तला जा सकता है। दरअसल यहाँ पकौड़ा नहीं जनता के अरमानों को तला जा रहा है।

तस्वीर – राजस्थान पत्रिका से साभार

नोट- कई लोग कमेंट में लिख रहे हैं कि जकार्ता एशियाड में मंत्री जी खिलाड़ियों को नाश्ता पेश कर रहे थे। 26 अगस्त को उनकी ट्रे लेकर जाते हुए तस्वीर ट्वीट होती है जिसमें इस बारे में कुछ नहीं लिखा होता है। सिर्फ तस्वीर होत है। सबने अतिउत्साह में यह खबर चला दी कि मंत्री नाश्ता पेश कर रहे हैं जो कि सही नहीं था। Alt news ने उस पर विस्तार से लिखा था, आप देख सकते हैं। मगर आल्ट न्यूज़ से ज्यादा लोगों तक तस्वीर के बहाने झूठी कहानी पहुंची और दिमाग़ में रह गई। अब आप चेक नहीं करेंगे, खुद को सतर्क नहीं रखेंगे तो ऐसी छवियों के जाल में फंसेंगे।

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संघ – भाजपा में खलबली, भाजपा नेता ने आपातकाल जैसे हालात बताकर दिया इस्तीफ़ा

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राजस्थान में विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी सत्तारूढ़ भाजपा को अपने वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवारी के इस्तीफे से झटका लगा है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सरपरस्ती में पोषित और पल्लवित तिवारी ने ये कहते हुए भाजपा से अपना वर्षों पुराना नाता तोड़ लिया कि देश और प्रदेश अघोषित आपातकाल में जी रहा है.

सत्तारूढ़ भाजपा ने तिवारी के इस्तीफ़े की ये कहकर महत्ता कम करने की कोशिश की है कि इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.

राज्य में छह बार विधायक और दो बार मंत्री रहे तिवारी ने राजस्थान में भाजपा के पितृ पुरुष रहे भैरोंसिंह शेखावत के सानिध्य में सियासत की सीढ़ियां चढ़ीं और फिर सत्तारूढ़ भाजपा में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मुखर विरोधी होकर उभरे.

देश में आपातकाल लगा तो तिवारी ये नारा बुलंद करते रहे- ‘संघ पर प्रतिबंध लगाया है, सोता शेर जगाया है.’

भारत में हालात आपातकाल से कम नहीं

वह इमरजेंसी में जेल में रहे लेकिन अब संघ के ये स्वंयसेवक ये कहकर भाजपा से अलग हो गए कि भारत में हालात आपातकाल से कम नहीं हैं.

वह कहते हैं, “आपातकाल घोषित था, अब एक अघोषित इमर्जेंसी है. मीडिया की ज़बान बंद है और न्यायपालिका पर भी दबाव है.”

कभी पूर्व मंत्री तिवारी ने भाजपा का ब्राह्मण चेहरा बनने की कोशिश की और सवर्ण वर्ग के ग़रीब समुदाय के लिए आरक्षण की पैरवी की. अब वे भारत वाहिनी पार्टी नाम से नया दल बनाकर सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस को चुनौती दे रहे हैं.

इस लंबे सियासी सफर में उनके सहयात्री रहे गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने मीडिया से कहा, “तिवारी के जाने से पार्टी में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.”

बीजेपी सरकार में मंत्री अनीता भदेल ने कहा, “तिवारी एहसान फ़रामोश हैं.”

लेकिन तिवारी कहते हैं, “मुख्य मंत्री राजे के सम्मुख बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने घुटने टेक दिए. राजस्थान को बहुत लूटा गया है और विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस विफल साबित हुई है. ऐसे में मैं राज्य के सामने एक सार्थक विकल्प लेकर आया हूं.”

भाजपा से अलग होने पर दुख भी जताया

राजस्थान में भाजपा सरकार गठित होने के साथ ही तिवारी की गिनती उन गिने-चुने नेताओं में होने लगी जो मुख्यमंत्री राजे के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए मिले.

हाल में जब अदालत ने पूर्व मुख्यमंत्रियों से बंगले खाली कराने का आदेश जारी किया तो तिवारी ने इसे मुद्दा बनाया और मुख्यमंत्री राजे को निशाने पर लिया. उनका कहना था कि राजे को मुख्यमंत्री के लिए नामित आवास में जाना चाहिए.

तिवारी से पूछा गया कि वे बीजेपी हाई कमांड से क्यों बात नहीं करते?

इसपर वे कहने लगे, “हाई कमांड ने सुना और माना कि राजस्थान में भारी भ्रष्टाचार है, मगर आखिर में पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व राजस्थान के मामले में निर्बल और बेबस साबित हुआ.”

तिवारी कहते हैं कि उनकी नई पार्टी राज्य के सभी 200 विधान सभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ेगी.

राज्य की राजनीति के जानकार एक प्रेक्षक कहते हैं, “तिवारी की ये पहल ब्राह्मण वोटों पर असर डाल सकती है. यह कांग्रेस के लिए भी नुकसान कर सकता है और भाजपा के लिए भी. लेकिन इतना तय है कि इससे भाजपा की फ़िज़ा खराब हुई है.”

भाजपा से वर्षों पुराना नाता तोड़ते हुए तिवारी ने पार्टी प्रमुख अमित शाह को एक भावपूर्ण चिट्ठी लिखी और कहा, “छह-सात साल की उम्र में मैं संघ से जुड़ा और फिर तृतीय वर्ष तक दीक्षित हुआ. मैं विद्यार्थी परिषद से लेकर अनेक अनुसांगिक संगठनों के साथ रहा. इतना लंबा वक्त साथ गुज़ारने के बाद अब अलग होने का मुझे गहरा दुख है.”

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INTERNATIONAL YOGA DAY SPECIAL : योगा ब्राह्मणों का मनरेगा है

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योगा ब्राह्मणों का मनरेगा है,
जिसमें कुछ काम गैर-ब्राह्मणों के हिस्से भी आएगा.
लेकिन यह रहेगा ब्राह्मणों का ही मनरेगा.

भारत सरकार जिस योग को फैलाना चाहती है, उसका किसी धर्म से कोई लेनादेना नहीं है, ऐसा कहने वाले सरासर झूठ बोल रहे हैं। आश्चर्य है कि योग ने उन्हें सच बोलने की तमीज़ नहीं सिखाई।

देखिए भारतीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में योगा कैसे पढ़ाया जाता है और उसका टीचर कैसे बनते हैं-

योग का UGC यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन का सिलेबस देखिए। 100 नंबर का इसमें एक पेपर है। इसमें चार टॉपिक पढ़ना है। सांख्य योग, गीता, उपनिषद और ईश्वर और मनुष्य का संबंध।

योगा का सरकारी टीचर बनने के लिए संस्कृत पढ़ना जरूरी है. यह सिलेबस में है.

इसलिए धोखे में न रहें। योग मतलब सिर्फ कसरत करना नहीं है। सिलेबस के मुताबिक, यह भी पढ़ना है कि रिश्तेदारों के साथ युद्ध करना क्यों जरूरी है। सिलेबस देखिए। पूरे सिलेबस का लिंक कमेंट में है।

इस सौ नंबर के अलावा 35 नंबर संस्कृत का है। बाकी पेपर में भी ढेर सारा धर्म है।

लेकिन यह अच्छा है कि किसी धर्म के लोगों ने योग का विरोध नहीं किया। वरना दादरी और कैराना के साथ RSS इसे भी चुनावी मुद्दा बना लेगा।

वैसे मुझे लगता है कि योग एक खास बिरादरी के लिए मनरेगा है। योगा ट्रेनर की काफी नौकरियाँ निकलेंगी। कोर्स में संस्कृत को शामिल करके सरकार ने खेल कर दिया है।

दिलिप मंडल की फेसबुक दीवार से

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“काला ” फिल्म का एक और रिव्यू दिलीप मंडल ने लिखा है, अब तो देखना पङेगा

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काला फिल्म हिंदी के दर्शकों को चौंकाएगी और परेशान भी करेगी, क्योंकि ऐसी कोई फिल्म हिंदी में कभी बनी ही नहीं है. क्या है इस फिल्म में खास?

दिलीप मंडल

वैसे तो कोई कह सकता है कि फिल्मों का जाति या समाज या विचार से क्या मतलब? टिकट खरीदा, फिल्म देखी, मस्ती की, हॉल से निकल आए. फिल्म खत्म, पैसा हजम! लेकिन क्या फिल्में हमारे लिए सिर्फ यही मतलब रखती है?

नहीं.

फिल्में दरअसल हमें बनाती हैं. हमें रचती हैं. हमारे जीने और सोचने के तरीके में हस्तक्षेप करती हैं. फिल्में ड्रेस सेंस देती हैं. चलने-बोलने की अदाएं सिखाती हैं. प्रेम और विवाह के मायने बताती और बदलती है. घरों की साजसज्जा तक पर फिल्मों का असर होता है.

फिल्में पॉपुलर क्लचर का निर्माण करती हैं और कई बार राजनीति से प्रभावित होती हैं और राजनीति को प्रभावित करती हैं. आम तौर पर जो विचार समाज पर हावी है, पॉपुलर फिल्में उसे मजबूत करती है और अन्य या विरोधी और विद्रोही विचारों को किनारे लगा देती है. सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने में फिल्मों की बड़ी भूमिका होती है.

ऐसे में अगर कोई फिल्म किसी जमी-जमाई हुई सोच और प्रभावशाली विचारधारा को चुनौती दे, तो वह फिल्म चौंकाती है. यही काम पा. रंजीत निर्देशित फिल्म ‘काला’ ने किया है. इसलिए इस फिल्म के बारे में जो बात हो रही है, उसका दायरा मनोरंजन से बड़ा है.

यह फिल्म चार सौ करोड़ का कुल बिजनेस करने की और बढ़ रही है, फिल्म में रजनीकांत हैं, उनका स्टाइल है, रोमांस हैं, नाच-गाना है लेकिन ज्यादा बात इस पर हो रही है कि काला फिल्म ने समाज के किस अनछुए पहलू को सामने रख दिया.

काला फिल्म इसलिए स्पेशल है क्योंकि इसने भारतीय समाज के सबसे विवादित पहलू- जाति- को दलित नजरिए से छेड़ दिया है. यह फिल्म और बहुत कुछ करते हुए दलित सौंदर्यशास्त्र यानी एस्थेटिक्स को रचती है और उसे वर्चस्व की संस्कृति के मुकाबले खड़ा कर देती है. इसलिए यह एक यूनीक फिल्म है. हिंदी के दर्शकों को तो यह फिल्म बुरी तरह चौंकाएगी और परेशान भी करेगी, क्योंकि ऐसी या मिलती-जुलती कोई फिल्म हिंदी में अब तक बनी नहीं है.

इस फिल्म का सब्जेक्ट मैटर वंचित समाज है. दलित और आदिवासी यानी एससी-एसटी इस देश की एक चौथाई आबादी हैं. यानी हममें से हर चौथा आदमी दलित, जिन्हें पहले अछूत कहा जाता था, या आदिवासी है. जनगणना के मुताबिक ये लगभग 30 करोड़ की विशाल आबादी है. भारत में किसी सिनेमा हॉल का भरना या न भरना इन पर भी निर्भर है.

ये लोग भी टिकट खरीदते हैं. फिल्में देखते हैं. लेकिन ये लोग फिल्मों में अक्सर नहीं दिखते. लीड रोल में शायद ही कभी आते हैं. ये लोग फिल्में बनाते भी नहीं हैं. इनकी कहानियां भी फिल्मों में नजर नहीं आती. खासकर, हिंदी फिल्म उद्योग में तो ऐसा ही होता है.

वैसे, हिंदी फिल्मों में दलित कभी कभार दिख जाते हैं. अछूत कन्या और सुजाता जैसी दसेक साल में कभी-कभार कोई फिल्म आ जाती है, जिसमें दलित पात्र होता है, जो अक्सर बेहद लाचार होता है और जिसका भला कोई गैर-दलित हीरो करता है.

भारत के लोकप्रिय सिनेमा में आखिरी चर्चित दलित पात्र आमिर खान की फिल्म लगान में नजर आया. उसका नाम था कचरा. वह अछूत है. उसमें अपना कोई गुण नहीं है. उसे पोलियो है और इस वजह से उसकी टेढ़ी उंगलियां अपने आप स्पिन बॉलिंग कर लेती हैं. उसकी प्रतिभा को एक गैर-दलित भुवन पहचानता है और उसे मौका देकर उस पर एहसान करता है.

इसके अलावा आरक्षण फिल्म में सैफ अली खान दलित रोल में नजर आता है. लेकिन उस पर एहसान करने के लिए अमिताभ बच्चन का किरदार फिल्म में है. फिल्म गुड्डू रंगीला में अरसद वारसी को दलित चरित्र के रूप में दिखाया गया है, लेकिन उसकी पहचान साफ नहीं है. मांझी फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने एक दलित का रोल किया है, लेकिन दलित पहचान को फिल्म में छिपा लिया गया है. मसान जैसी ऑफ बीट फिल्मों में दलित हीरो बेशक कभी-कभार नजर आ जाता है, लेकिन मुख्यधारा में उनका अकाल ही है.

ऐसे समय में मूल रूप से तमिल में बनी और हिंदी में डब होकर उत्तर में आई रजनीकांत अभिनीत और पा. रंजीत द्वारा निर्देशित ‘काला’ अलग तरह की दुनिया रचती है.

काला पहली नजर में एक मसाला फिल्म लग सकती है. इसमें रजनीकांत हैं. ग्लैमर के लिए हुमा कुरैशी है. इसमें बुराई पर अच्छाई की जीत का फार्मूला है. नाच-गाना और मारधाड़ है. एक्शन सीन हैं. लेकिन अपने मिजाज में यह एक राजनीतिक-सामाजिक वक्तव्य भी है.

फिल्म में काला या करिकालन बने रजनीकांत की जाति कहीं बताई नहीं गई है, लेकिन उसे छिपाया भी नहीं गया है. जिस सीन में रजनीकांत की एंट्री होती है, वहां गली क्रिकेट का खेल चल रहा होता है और बैकग्राउंड में महात्मा बुद्ध और ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब आंबेडकर के पोस्टर लगे होते हैं. काला के घर में बुद्ध की प्रतिमा नजर आती है. काला अपनी बैठक बुद्ध विहार में करता है.

काला का समर्थक पुलिस हवलदार एक जगह भाषण देता है और अंत में आंबेडकरवादियों में प्रचलित अभिवादन ‘जय भीम’ बोलता है. ऐसे प्रतीक पूरी फिल्म में जिस तरह से बिखरे पड़े हैं, उसे देखकर यही लगता है कि निर्देशक पा. रंजीत अपने जीवन की आखिरी फिल्म बना रहे हों और अपने विचार और सोच को हर फ्रेम में चिपका देना चाहते हों. फिल्म में आखिर में परदे पर जो रंग बिखरते हैं, उनमें दलित जागृति का रंग नीला बहुत प्रमुखता से आता है. फिल्म के डायलॉग में भी लगातार यह बात नजर आती है और वंजितों की आवाज को लगातार स्वर मिलता है. फिल्म में रैपर्स का एक ग्रुप है, जो बीच-बीच में रैप गाता है. यह अमेरिका के ब्लैक रैपर्स की याद ताजा कराता है.

फिल्म में जो विलेन का पक्ष है, वहां भी पा. रंजीत अपने प्रतीक सावधानी से चुनते हैं. जो बिल्डर गरीबों और दलितों की जमीन छीन लेना चाहता है, उसका नाम मनु बिल्डर रखकर रंजीत बारीकी से अपनी बात कह जाते हैं. फिल्म दो विलेन हैं. मुख्य विलेन बने नाना पाटेकर का नाम हरिनाथ अभ्यंकर है जबकि उनके गुर्गे का नाम विष्णु है.

दोनों को गोरा दिखाया गया है. दोनों सफेद कपड़े पहनते हैं, जबकि काला तो काली ड्रेस ही पहनता है. अभ्यंकर जब काला के घर आता है तो उसके घर का पानी पीने से मना कर देता है. काला की पत्नी इस बात को बोलती भी है. लेकिन काला जब अभ्यंकर के घर जाता है तो न सिर्फ उसके घर का पानी पीता है, बल्कि अभ्यंकर की पोती को पैर छूने से रोक देता है. अभ्यंकर को पैर छुआने का शोक है, तो काला को अपने स्वाभिमान को बचाने का.

फिल्म के आखिरी दृश्यों में जब अभ्यंकर के गुंडे काला को मारने के अभियान पर निकलते हैं तो अभ्यंकर के घर में रामकथा का पाठ हो रहा होता है. रामकथा में रावण वध की तैयारी होती है तो दूसरी और काला की हत्या की कोशिशें. रामकथा में रावण की हत्या की घोषणा होती है, तभी काला के पीठ पर गोली उतार दी जाती है.

लेकिन रावण यानी काला इस फिल्म में सारी सहानुभूति बटोर ले जाता है. और अंत में वह जनता के विभिन्न रूपों में लौट कर आता है और हरि अभ्यंकर को परास्त करता है. रामकथा का यह आख्यान तमिल दर्शकों के लिए जितना सहज है, वैसा हिंदी दर्शकों के लिए नहीं है. इसके बावजूद यह तो पता चल ही जाता है कि निर्देशक कहना क्या चाहता है.

काला फिल्म दरअसल भारतीय समाज की एक सच्चाई –जातिवाद से समाज को रुबरू कराती है और वंचितों के पक्ष में खड़ी होती है. यही काम मराठी फिल्मों में नागराज मंजुले कर चुके हैं. उनकी फिल्म फंड्री और सैराट भी जाति के सवालों से टकराती है और जातिवाद के खिलाफ खड़ी होती है. सैराट मराठी फिल्म इतिहास की अब तक की सबसे कामयाब फिल्म है, जिसने 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का बिजनेस किया है. इस फिल्म के न सिर्फ डायरेक्टर, बल्कि लीड एक्टर और एक्ट्रेस भी दलित हैं. यह एक दलित युवक की सवर्ण लड़की से प्रेम की कहानी है, जिसका अंत ऑनर किलिंग में होता है. इस फिल्म का हिंदी रिमेक धड़क रिलीज के लिए तैयार है. इस फिल्म का ट्रेलर रिलीज हो चुका है. हिंदी में बनी धड़क सैराट के बागी स्वरूप को कितना बचा पाती है, यह देखना दिलचस्प होगा.

कोई कह सकता है कि फिल्मों में किसी जाति या समूह का होना या न होना क्यों महत्वपूर्ण है. या कि कलाकार और फिल्मकार की जाति नहीं होती. उसे इस बात से नहीं तौला जाना चाहिए कि उसकी जाति क्या है, बल्कि उसे उसके काम से देखा और परखा जाना चाहिए. यह बात तर्कसंगत लगती है. लेकिन किसी समाज में बन रही फिल्मों में अगर समाज का एक हिस्सा अनुपस्थित है तो इस बारे में सवाल जरूर उठने चाहिए और बात भी होनी चाहिए. इसका यह मतलब कतई नहीं है कि फिल्मों में आरक्षण होना चाहिए. इसका मतलब है कि फिल्मों के दरवाजे हर किसी के लिए और तमाम तरह कि विषयों के लिए खुले होने चाहिए और वातावरण ऐसा होना चाहिए, जिसमें ऐसी फिल्में बनें, जिनमें पूरा भारत दिखे, न कि एक खंडित समाज का एक टुकड़ा.

किसी भी दौर का पॉपुलर सिनेमा एक फैंटसी रचता है, मनोरंजन करता और साथ में अपने समय के कुछ दस्तावेजी सबूत भी साथ लेकर चलता है. किसी भी अच्छी फिल्म का अच्छा होना इस बात से भी स्थापित होता है कि उसमें इन तीन तत्वों का कैसा मेल है. काला इस दृष्टि से एक सफल फिल्म है कि उसने मनोरंजन भी किया और डायरेक्टर ने अगर इसके जरिए कोई संदेश देने की कोशिश की है, तो वह संदेश बहुत जोरदार तरीके से सुनाई देता है. पा. रंजीत ने साबित कर दिया है कि फिल्म अभिनेता का नहीं, निर्देशक का माध्यम है.

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