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कलेक्शन और आंकड़ों की होड़ लघु पैमाने पर बनी फिल्मों के लिए घातक

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कलेक्शन और आंकड़ों की होड़ लघु पैमाने पर बनी फिल्मों के लिए घातक

सौ करोड़ क्लब जी हां यह लाइन आज से कुछ वर्ष पहले से बॉलीवुड फिल्मों के बॉक्सऑफिस कलेक्शन में उपयोग की जा रही है। शुरुआती वर्षो में यह वाक्य सिर्फ फिल्म समीक्षकों तथा बॉलीवुड इंडस्ट्री तक ही सीमित था किंतु अब यह आम जन के लिए भी लुभावना सिद्ध हो रहा है। अब दर्शक फिल्म के रिबयूज़ नही बल्कि कलेक्शन का इंतज़ार करते हैं, उनके मुताबिक फिल्म की लोकर्पियता एवं गुणवत्ता फिल्म के कलेक्शन पर निर्भर करती है। हालाँकि यह तथ्य  सार्थकता से कोषों दूर है। सौ , दो सौ, पाँच सौ, हज़ार करोड़ यह आंकड़ों की होड़ लघु पैमाने पर बनायी जाने वाली फिल्मों के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। लेकिन सभी फिल्मे बॉक्सऑफिस के मद्देनजर निर्मित नही होती बल्कि कई बार फिल्म निर्माता कला के उत्कृष्ठ प्रदर्शन तथा सामाजिक हित के लिए भी फिल्म का निर्माण करता है। उसके पास सिर्फ एक विचार होता है जिसके जरिये वह हमारे समाज को एक संदेश देना चाहता है।

मैं एक ऐसी सुनामी का जिक्र करना चाहूंगा जिसने हाल ही में बॉक्सऑफिस पर धमाल मचा दिया था, उस सुनामी का नाम है बाहुबली। जी हां यह एक बड़े पैमाने पर बनाई गई बेहतरीन फिल्म थी और इसकी सफलता सराहनीय है लेकिन इसने एक आंकड़ो का मायाजाल भी तैयार कर लिया है। अब दर्शक हर फिल्म से इसी तरह के बड़े पैमाने तथा आंकड़ों की अपेक्षा करता है लेकिन ऐसा संभव नही है, क्योंकि हर फिल्म की अपनी सीमायें होती है। आप सभी फिल्मो को मसाले से लबरेज़ हर वर्ग को लुभाने वाली फिल्म तयार नही कर सकते। लघु पैमाने पर बनाई जाने वाली फिल्में कुछ खास वर्ग के लोगो को ही पसन्द आ पाती है किंतु सीमित पहुँच होने से इनको ज्यादा एवज नही मिल पाती है फिर चाहे बात दर्शकों के बीच की हो या फिर हमारी धन प्रेमी व मसाले की भूखी मीडिया।

इन करोड़ों के आंकड़ो ने आमजन को आकर्षित कर लिया है तथा वे सिर्फ बड़ी फिल्मों के समर्थन में ही सिनेमाघरों की ओर दौड़ते हैं जिससे मैं एक कला प्रेमी के तौर पर आहत हूँ। मेरा मानना है कि सिनेमा की गुणवत्ता उसके आंकड़ो की सफलता यह बड़े पैमाने से निर्धारित नही होनी चाइये बल्कि उसकी विषयवस्तु को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हमे इन मीडिया द्वारा उछाले गये आंकड़ों को जरूरत से ज्यादा तवज्जो नही देनी चाहिए। जरूरी नही की 500 करोड़ का बिजनेस करने वाली फिल्म 5 करोड़ का बिजनेस करने वाली फिल्म से 100 गुना बेहतर हो , बल्कि यकीन मानिए तस्वीर एक दम उलट हो सकती है।

-अमित नौटियाल

{https://twitter.com/@moviebuffammy95}

अमित नौटियाल को ट्विटर पर फोलो करें

 

 

 

 

 

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रंजीत आंबेडकरवादी हैं और अपनी पहचान छिपाते नहीं , उनकी नयी फिल्म “काला” देख आइये

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Pa Ranjith की फिल्म “काला” आज रिलीज हो रही है.

तमिल, तेलुगु और हिंदी में. रंजीत दक्षिण के सबसे सफल फिल्मकार हैं. इनकी फिल्म कबाली ने 700 करोड़ का कारोबार किया था. रंजीत आंबेडकरवादी हैं और अपनी यह पहचान वे छिपाते नहीं है. फिल्म बनाने में उनके साथ की टीम भी आम तौर पर बहुजन समुदाय की होती है. हालांकि वे मौका हर किसी को देते हैं.

उनकी फिल्मों में बाबा साहेब कई जगह, कई रूपों में नजर आते हैं.

मिसाल के तौर पर इस जीप को देखिए, जिस पर रजनीकांत बैठे हैं. इसमें BR है और बाबा साहब के परिनिर्वाण का साल 1956 भी. महाराष्ट्र तो है ही. फिल्म कबाली में भी आप बाबा साहेब के पोस्टर देख सकते हैं. जन्म के आधार पर भेदभाव का कबाली में निषेध है.

कबाली का वह डायलॉग तो आपको याद ही होगा. – मेरी यह शानदार ड्रेस मेरी राजनीति है.

कबाली फिल्म के पहले ही दृश्य में रजनीकांत जेल में एक दलित आत्मकथा पढ़ते दिखाए गए हैं. किताब का नाम है – माई फादर बालैया.

कबाली से पहले अपनी फिल्म “मद्रास” में भी रंजीत जाति का सवाल उठाते हैं. उसमें उनके पात्र बाबा साहेब को पढ़ते दिखाए गए हैं.

रंजीत का असर इतना है कि लोग उनके नाम से फिल्म देखने जाते हैं. वे भारत के पहले फिल्म डायरेक्टर हैं, जिनकी फोटो के पोस्टर लगते हैं. यह और भी बड़ी बात है, जब फिल्म के हीरो रजनीकांत हों.

ये पीए रंजीत के ये पोस्टर मुंबई समेत कई शहरों में देखे जा सकते है.

ब्रदर रंजीत को ऑल द बेस्ट.

देख आइए रंजीत की फिल्म काला.

(श्रोत-दिलीप मंडल की फेसबुक वाल)

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बॉलीवुड की हवा हवाई श्रीदेवी का दुबई में निधन

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फाइल फोटो

जी हां बॉलीवुड का एक और बेशकीमती नगीना इस दुनिया को अलविदा कह के चली गयी जिसका नाम है श्रीदेवी|  एक ऐसा नाम जिससे हर कोई वाकिफ होगा, बेहतरीन अदाकारी के जानी जाने वाली श्रीदेवी का आज रात दुबई में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया|

श्री देवी एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए दुबई गयी थी और वहीँ उन्हें दिल का दौरा पर गया, दौरा इतना ज्यादा खतरनाक था की उन्हें बचाया भी नहीं जा सका|

फ़िल्मी सफ़र:

13 अगस्त 1963 को शिवकाशी(तमिलनाडू) में पैदा हुई श्रीदेवी 1990 के दशक की सबसे बेहतरीन अदाकारा रही हैं| श्रीदेवी के फ़िल्मी सफ़र की शुरुवात महज 4 साल की उम्र से ही हो गयी थी, उसके बाद उन्होंने बाल कलाकार के रूप में कई तमिल, तेलगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में काम किया|

बॉलीवुड में इन्होने सबसे पहले बाल कलाकार के रूप में फिल्म जूली में काम किया| श्रीदेवी की मुख्य अदाकारा के रूप में पहली फिल्म सोलवा सावन था जिसमे इनके काम को खूब सराहा गया|

इसके बाद इन्होने कभी पीछे पलट कर नहीं देखा औए फिल्म जगत के लिए मवाली,तोहफा,मिस्टर इंडिया,चांदनी,चालबाज जैसी कई हिट फ़िल्में दी|

श्रीदेवी के पिता का नाम अय्यपन था और माता का नाम राजेश्वरी था, उनके पिताजी पेशे से एक वकील थे| श्रीदेवी की शादी सन 1996 में अभिनेता अनिल कपूर के बड़े भाई और मशहूर निर्माता बोनी कपूर से हुई, इनकी दो बेटियां जाह्नवी और खुसी हैं|

5 से भी ज्यादा भाषाओँ में फिल्म करने वाली अदाकारा श्रीदेवी यूँ तो विवादों से बहुत दूर रही लेकिन एक विवाद जो बहुत सुर्ख़ियों में रहा वो है उनके और अभिनेता मिथुन चक्रबर्ती के रिश्ते का| कहा जाता है की राकेश रोशन की फिल्म जाग उठा इंसान के सेट पर मिथुन और श्रीदेवी को एक दुसरे से प्यार हो गया था|

मिथुन चक्रबर्ती की मानें तो उनकी और श्रीदेवी की गुपचुप तरीके से शादी भी हो चुकी थी ये बाद खुद मिथुन चक्रबर्ती ने खुद प्रेस को बताया|

बोनी कपूर से शादी के बाद श्रीदेवी फिल्मों से दूर चली गयी, बॉलीवुड में उन्होंने 15 साल बाद दोबारा तब धमाल मचा दिया जब उनकी फिल्म इंग्लिश विग्लिश ने लोगों का दिल जीत लिया|

श्रीदेवी के निधन से भारतीय फिल्म जगत ने बहुत बड़ा नगीना खो दिया जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पायेगी|

बॉलीवुड की इस बेहतरीन अदाकारा को पीपल्स बीट भावभीनी श्रधांजलि देता है|

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मनोरंजन

पहाड़ी क्षेत्रों में भी नही है प्रतिभा की कमी, रास्क क्रू निकालने वाला है अपनी एलबम सीरीज

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उत्तराखंड चमोली:- जहां एक ओर हर क्षेत्र में देश तरक्की कर रहा है वहीं हमारे पहाड़ों की प्रतिभा कहीं खोती सी जा रही है। चाहे यहां की पारम्पतिक संस्कृति ढोल दमाऊ हो या फिर जागर। जहां एक ओर इन सब की कुछ सीमायें है और इन सीमाओं से बाहर इन का महत्व खत्म सा हो गया है। लेकिन डांस एक ऐसी विधा है जिस का ना कोई आदि है एयर ना ही कोई अंत है। डांस को आप किसी भी तरीके से कर लो वह मनमोहक ही लगता है।

हमारे खूबसूरत पहाड़ों की गोद मे बसा एक छोटा सा शहर है गोपेश्वर और इस गोपेश्वर में इतने प्रकार की प्रतिभाएं छुपी हुई है कि अगर कोई प्रतिभाखोजी इन प्रतिभाओं को खोजने निकले तो वह यहीं का हो कर रह जाए और हमारे गोपेश्वर को एक नई पहचान मिल जाये।

गोपेश्वर किबेक नाट्य संस्था जो कि प्रतिभाओं को निखारने का वक्त दे रही है उस का नाम है अक्षत नाट्य संस्था और इस संस्था के अध्यक्ष श्री विजय वशिष्ठ जी हर संभव कोशिश में लगे है कि गोपेश्वर की प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके।

वशिष्ठ जी की मेहनत का एक खूबसूरत सा नमूना है रास्क क्रू डांस ग्रुप। या डांस ग्रुप अपनी एक एलबम सीरीज लांच करने जा रहा है बहुत जल्दी आप सब के सामने रास्क क्रू के बहुत सारे बहुत खूबसूरत से डांस स्टेप होंगे जिन्हें आप चाह कर भी बिना देखे नही रह पाएंगे।

डांस कर रहे ये लड़के कॉलेज में पढ़ने वाले है और डांस में ही अपना भविष्य तलाश रहे है। सुदूर पहाड़ों के इन छात्रों के लिए जरूरत है तो बस एक मौके की। बाकी तो अपनी प्रतिभा की बदौलत ये अपना भविष्य खुद ही तय कर लेंगे।

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