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भारत के किसानों, जय हुई या पराजय हुई?:- रवीश कुमार

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किसान भाइयों आज आपकी आज़ादी का दिन है। सरकार ने इसकी घोषणा की है। 2017 में जीएसटी आई थी तो ऐसी ही एक आज़ादी का एलान हुआ था। 2016 मे जब नोटबंदी आई थी तब भी एक आज़ादी की घोषणा की गई थी। मुझे नहीं पता कि नोटबंदी और जीएसटी से मिली आज़ादी से आप हवा में उड़ रहे थे या ज़मीन पर दौड़ रहे थे, मुझे यह भी नहीं मालूम कि आज मिली आज़ादी के बाद आप आसमान में उड़ेंगे या अंतरिक्ष में उड़ेंगे? पहले तो यही बताइये कि जिन तीन अध्यादेशों को लेकर लोकसभा और राज्य सभा में चर्चा हुई, उन पर आपके अखबारों और चैनलों ने कितनी चर्चा की? आप जून के महीने से चैनलों पर सुशांत सिंह राजपूत के बहाने अश्लीलता की हदों को पार करते हुए मीडिया कवरेज़ में डूबे थे या कृषि अध्यादेश पर हो रही चर्चाओं से जागरुक किए जा रहे थे? किसी ने कहा कि अखबार और चैनलों से किसान ग़ायब हो चुके हैं फिर भी किसान अख़बार और चैनलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य हर महीने देते हैं। बधाई।

राज्य सभा में जो हुआ उसे छोड़ देते हैं। विपक्ष ने लोकतंत्र की हत्या के आरोप लगाए हैं। वोटिंग की जगह ध्वनिमत से पास कराना और राज्य सभा के टेलिविज़न चैनल पर प्रसारण रोकने के आरोप की सत्यता कभी सामने नहीं आ पाएगी। आ भी गई तो क्या हो जाएगा। मुझे यकीन है जब आप किसान 14 जून के बाद से सुशांत सिंह राजपूत का कवरेज़ देखने में लगे थे या मजबूर किए गए तो आज ऐसा क्या हो गया होगा कि उन चैनलों पर किसानों की ज़िंदगी से जुड़े बिल के पहलुओं पर चर्चा हो रही होगी। नरेंद्र मोदी जी ने आपको आज़ादी दी है तो सोच कर ही दी होगी। इसलिए आपको बधाई।

पर क्या ये तीनों अध्यादेश जो आज कानून बने हैं किसान आंदोलनों की मांगों के नतीजे में लाए गए थे? क्या आप भूल गए कि आपने मार्च 2018 में और नवंबर 2018 में महाराष्ट्र और दिल्ली में पदयात्रा और किसान मुक्ति संसद का आयोजन क्यों किया था? मैं याद दिलाने की कोशिश करता हूं।

मार्च 2018। नाशिक से हज़ारों किसानों का जत्था छह दिनों तक पैदल चल कर मुंबई पहुंचा था। 200 किमी की इस यात्रा में किसानों के अनुशासन ने मुंबई का भी दिल जीत लिया था। अखिल भारतीय किसान सभा के बीजू कृष्णन के नेतृत्व में इस मार्च का आयोजन हुआ था। किसान आज़ाद मैदान में जमा हुए थे और विधान सभा का घेराव करना चाहते थे। किसान सरकार से कह रहे थे कि लागत का डेढ़ गुना मांग रहे थे।महाराष्ट्र सरकार ने मांगों पर विचार करने के लिए एक कमेटी बनाई थी। 30 नवंबर 2018 को किसान फिर से दिल्ली में जमा हुए। 184 संगठनों के रंग-बिरंगे झंडे दिल्ली में लहरा रहे थे। देश के कई राज्यों से आए किसानों की एक दो ही मांग थी। कर्ज़ मुक्ति के लिए कानून बने। सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी दे। किसान मुक्ति संसद के हर भाषण में इन दो मांगों को प्रमुखता से उठाया गया था।

20 सितंबर 2020। मोदी सरकार किसानों के लिए तीन विधेयक को कानून का रुप देती है। उसमें किसान संगठनों की मुख्य मांगों की कोई झलक नहीं है। वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की गारंटी की बात तक नहीं करती है। इस कानून के बनने के बाद प्रधानमंत्री बार-बार ट्वीट कर रहे हैं कि सरकार किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदी करती रहेगी। जो भी कह रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म हो गया है वह अफवाह फैला रहा है। सवाल करने वाले कह रहे हैं कि यही बात कानून में क्यों नहीं है। किसानों की जो मांग थी उसके उलट सरकार कानून लेकर आ रही है।

किसानों ने कहा कि इतना भी कर दीजिए कि उस कानून में यह लिख दीजिए कि कोई भी चाहे मंडी का आढ़ती हो या बिजनेसमैन का एजेंट न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे पर ख़रीद नहीं करेगा। सरकार ने यह भी गारंटी नहीं दी। बिहार के किसान ही बता दें कि जहां मंडी सिस्टम नहीं है क्या खुले बाज़ार में उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक पर बिक्री की है? वहां सहकारिता समिति, जिसे पैक्स कहते हैं, के ज़रिए खरीदी होती है जिसके घोटाले को उजागर करने की बौद्धित कौशल आज के पत्रकारों में ही नहीं है। यही नहीं कांट्रेक्ट फार्मिग में अगर कंपनी से विवाद हुआ तो ज़िला प्रशासन का एस डी एम एक बोर्ड बनाएगा। क्या एसडीएम के कोर्ट से बड़े बड़े व्यापारिक घरानों के सामने किसानों को इंसाफ़ मिलेगा? क्या कंपनी के दबाव के बाद भी एस डी एम साहब बोर्ड बना देंगे? जब देश में कोर्ट है तब बोर्ड क्यों बन रहा है? क्या इसलिए कि आप चाहें भी तो कोर्ट तक न पहुंच सकें, पहुंचे भी तो कई साल लग जाएं? आज़ादी मिली है किसान भाइयों, आज तो गांवों में जश्न मनाइये।

भारत के किसान हमेशा से ही अपनी उपज खुले बाज़ार में बेचते रहे हैं। कई सरकारी रिकार्ड के अनुसार बहुत से बहुत छह प्रतिशत किसान ही मंडी सिस्टम में अपनी उपज बेच पाते थे। यानी उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिल रहा था मगर बाकी किसानों को नहीं मिल रहा था। अगर किसान एग्रीकल्टर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी के इतने खिलाफ थे तो यह मांग 184 किसान संगठनों की प्रमुख मांग क्यों नहीं थी? वो क्यों न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी मांग रहे थे? हिन्दुस्तान टाइम्स में रोशन किशोर ने लिखा है कि 2018 में किसानों और व्यापारियों पर हुए एक सर्वे में रिज़र्व बैंक ने पाया है कि 50 प्रतिशत से अधिक किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की योजना को लाभकारी मानते हैं। सोचिए किसानों ने कहा कि हमारी उपज की खरीद की गारंटी दीजिए सरकार कह रही है कि आप कहीं भी जाकर बेचिए, हमें क्या। हम आपको आज़ाद कर रहे हैं। आज़ादी मिली है तो हंसा भी कीजिए।

यह कहा गया कि मंडी में जो अनाज बिकता है उस पर सरकार और आढ़ती कमीशन लेते हैं। यह खत्म होगा। पता नहीं जो नया बिजनेसमैन आएगा वो जीएसटी के रूप में कमीशन लेगा देगा कि नहीं। अगर नहीं देगा तो सरकार को घाटा होगा। अगर कमीशन समस्या थी तो कानून बनाकर सरकार के कमीशन का हिस्सा किसानों को दिया जा सकता था। इसकी जगह मंडी सिस्टम को ही खत्म किया जा रहा है जिसमें सरकारें दशकों से निवेश करती रही थीं।
उसी के बाहर बिक्री की एक और व्यवस्था बनाने का आधार क्या है? क्या प्राइवेट पार्टियां आकर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक दाम देंगी? सरकार अपनी ज़िम्मेदारियों से घोषित रूप से पीछे हट रही है। 2022 सिर्फ 13 महीने दूर है। किसानों की आमदनी दुगनी होगी यह भारत का किसान अपनी आंखों से देखेगा। वो आमदनी किस आमदनी से दुगनी होगी यह सरकार कभी नहीं बताती है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अब कई चीज़ों का भंडारण असीमित हो सकेगा। पहले इसलिए रोक थी कि जमाखोरी न हो और किसान से सस्ते दाम पर खरीद कर व्यापारी बाद में बेच कर ज़्यादा मुनाफा न कमाए। दूसरा कानून मंडी सिस्टम के खत्म होने का है। उसके सामने एक और बाज़ार बनाने का दावा किया जा रहा है जो पहले से मौजूद है। तर्क दिया जा रहा है कि मंडी सिस्टम का एकाधिकार ख़त्म होगा। जहां आढ़ती दामों को कम कर देते थे। अगर फसलों की खरीद की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की गारंटी दी जाती तो कोई आढ़ती दाम कैसे कम कर देता। सरकार ने किसानों की इस मांग को क्यों नकार दिया?

कोरपोरेट की आमद हो रही है। आप स्वागत नहीं करेंगे? प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का हश्र आपने देखा है। हरियाणा में ही किसानों को प्रीमियम देने के बाद अपने मुआवज़े के लिए संघर्ष करना पड़ा। अपवाद को छोड़ किसानों को कहीं लाभ नहीं मिला है। तो किसान भाइयों इतना बता दीजिए, क्या आप कंपनी से लड़ लेंगे, समस्या होगी तो कोई अखबार कवर करेगा, कोई चैनल कवर करेगा, वो अपने विज्ञापन का देखेगा या आपके हित का?क्या आपको पता है कि अखबार और चैनल किसके हैं?

चलिए आज मोदी जी ने आज आपको आज़ादी है। उम्मीद है गांवों में दिनों-दिनों तक खीर-सेवइयां बनेंगी। होली मुबारक हो। आजादी मुबारक हो। यह तो बता दीजिए कि आज आपकी जय हुई है या पराजय हुई है?

आप जिस वक्त टीवी पर सुशांत सिंह राजपूत के कवरेज़ और हिन्दू मुसलमान में व्यस्त थे तब रवीश कुमार नाम के एक पत्रकार ने इन अध्यादेशों पर एक प्राइम टाइम किया था, तब नहीं देखा तो अब देख लीजिए। 21 घंटे पहले मैंने अपने पुराने पेज को यहां पोस्ट किया। डेढ़ हज़ार शेयर हुआ लेकिन यू ट्यूब का व्यूज़ जस का तस है। क्या मैं यू ट्यूब और गूगल से लड़ सकता हूं, उसी तरह से जैसे आप नी-नी कंपनी से लड़ सकते है? यदि हां, तो मुझे आज़ादी की खीर खिलाना न भूलिएगा।

रवीश कुमार

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बिहार चुनाव के बीच शाहनवाज़ हुसैन और राजीव प्रताप रूडी कोरोना संक्रमित पाए गए

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पटना: बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर जहां सभी दलों की तरफ से प्रचार अभियान जारी है. इसी बीच बिहार बीजेपी के दो बड़े नाम राजीव प्रताप रुडी (Rajiv Pratap Rudy) और शाहनवाज़ हुसैन (Shahnawaz Hussain) कोरोना संक्रमित हो गए हैं. साथ ही उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पाण्डेय की तबियत भी ठीक नहीं है . हालांकि सुशील मोदी की कोरोना रिपोर्ट निगेटिव है लेकिन ये दोनों नेताओं ने भी फ़िलहाल अपने आपको आइसोलेट कर लिया है.

 

बताते चले कि कोरोना संकट के बीच बिहार विधानसभा का चुनाव तीन चरणों में हो रहा है. पहले चरण के लिए  28 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे. वहीं नतीजों का ऐलान 10 नवंबर 2020 को किया जाएगा.  आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जहां पहले चरण में जहां 16 जिलों की 71 सीटों पर मतदान होगा तो वहीं दूसरे चरण में 17 जिलों की 94 सीटों पर मतदान किया जाएगा. इसके अलावा तीसरे और अंतिम चरण में 15 जिलों की 78 सीटों पर मतदाता अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे.

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रिया के बेल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी NCB, बढ़ सकती है मुश्किलें

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बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की अत्महत्या के मामले में ड्रग कनेक्शन को लेकर गिरफ्तार अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को ज़मानत दी। रिया को कोर्ट ने 28 दिन बाद एक लाख रुपये के मुचलके पर सशर्त जमानत दी है। वहीं रिया के भाई शोविक चक्रवर्ती की ज़मानत याचिका खारिज कर दी है।

जमानत मिलने के बाद भी रिया की मुश्किलें अभी खत्म नहीं ही है। जांच एजेंसी नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने जमानत का विरोध दिया है। अतिरिक्त महाधिवक्ता अनिल सिंह ने जमानत के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिया के अलावा सुशांत के स्टाफ दीपेश सावंत और सैमुअल मिरांडा को भी जमानत दी है। वहीं अब्दुल बासित की ज़मानत याचिका खारिज कर दी गई है।

न्यायमूर्ति एस.वी. कोतवाल, जिन्होंने पिछले सप्ताह जमानत अर्जी संबंधी सुनवाई पूरी की थी, उन्होंने बुधवार सुबह फैसला सुनाया। एनसीबी द्वारा 9 सितंबर को ड्रग से संबंधित मामले में गिरफ्तार किए जाने के बाद, रिया ने 28 दिन हिरासत में बिताए हैं। उन्हें मंगलवार को एक विशेष एनडीपीएस अदालत ने 20 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।

कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए, मानशिंदे ने कहा, “सच्चाई और न्याय की जीत हुई है।”उन्होंने कहा, रिया की गिरफ्तारी और हिरासत पूरी तरह से अनुचित थी। तीन केंद्रीय एजेंसियों – सीबीआई, ईडी और एनसीबी – रिया के पीछे पड़ गई थी और अब यह सब खत्म होना चाहिए। हम सच्चाई के लिए प्रतिबद्ध हैं। सत्य मेव जयते।

बता दें अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले की जांच के दौरान सामने आए ड्रग्स एंगल के मामले में एनसीबी द्वारा रिया, शोविक सहित 19 को अगस्त-सितंबर के दौरान गिरफ्तार किया गया था। उन लोगों में चक्रवर्ती भाई-बहन, सुशांत के कर्मचारी दीपेश सावंत, सैमुएल मिरांडा, कई ड्रग पेडलर, सप्लायर और फिल्म उद्योग से जुड़े व्यक्ति शामिल हैं।

सितंबर के अंत तक गिरफ्तार किए गए अन्य लोग हैं–अब्बास लखानी, करण अरोरा, जैद विलात्रा, अब्दुल बासित परिहार, कैजान इब्राहिम, अनुज केसवानी, अंकुश अरनेजा, कमरजीत सिंह आनंद, संकेत पटेल, संदीप गुप्ता, आफताब अंसारी, दिव्या फर्नांडिस, सूर्यदीप मल्होत्रा, क्रिस कोस्टा, राहिल विश्राम और क्षितिज आर. प्रसाद। अभियुक्तों में से कुछ को जमानत मिल गई है, अन्य अलग-अलग अवधि के लिए हिरासत में हैं क्योंकि एनसीबी की जांच कई अन्य अभिनेत्रियों से पूछताछ के साथ जारी है।

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बिहार: एक पैराग्राफ की कहानी का राज्य:- रवीश कुमार

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नोट- यह लेख एक पैराग्राफ का है। लंबा है। कृपया इसे अपनी साइट पर छापें तो इसमें पैराग्राफ चेंज न करें। मेरा फिर भी अनुरोध है कि चुनाव आए तो अखबार पढ़ना ही नहीं लेना भी बंद कर दें। चैनलों के कनेक्शन कटवा दें। इस एक महीने के कवरेज से कुछ होता नहीं है। ज़्यादातर कवरेज़ में फिक्सिंग होगी। क्या फायदा। लोगों से बात करें। आपस में बात करें। फिर वोट दें। पांच साल में जो देखा है उस पर भरोसा रखें। न्यूज़ वेबसाइट, चैनल और अखबार के पास कुछ भी नया नहीं है। कुछ भी खोज कर लाई गई सामग्री नहीं है। बस वाक्य को आकर्षक बनाया जाएगा, हेडलाइन कैची होगी और आपके निगाहों को लूट लिया जाएगा। जिसे आई बॉल्स या टी आर पी कहते हैं। पढ़ भी रहे हैं तो ग़ौर से पढ़िए कि इस लेख में है क्या। केवल पंचिंग लाइन का खेला है या कुछ ठोस भी है।
पाठक हैं तो बदल जाइये। दर्शक हैं तो चैनलों को घर से निकाल दीजिए।

बिहार: एक पैराग्राफ की कहानी का राज्य

साधारण कथाओं का यह असाधारण दौर है। बिहार उन्हीं साधारण कथाओं के फ्रेम में फंसा एक जहाज़ है। बिहार की राजनीति में जाति के कई टापू हैं। बिहार की राजनीति में गठबंधनों के सात महासागर हैं। कभी जहाज़ टापू पर होता है। कभी जहाज़ महासागर में तैर रहा होता है। चुनाव दर चुनाव बिहार उन्हीं धारणाओं की दीवारों पर सीलन की तरह नज़र आता है जो दिखता तो है मगर जाता नहीं है। सीलन की परतें उतरती हैं तो नईं परतें आ जाती हैं। बिहार को पुरानी धारणाओं से निकालने के लिए एक महीना कम समय है। सर्वे और समीकरण के नाम पर न्यूज़ चैनलों से बाकी देश ग़ायब हो जाएगा। पर्दे पर दिखेगा बिहार मगर बिहार भी ग़ायब रहेगा। बिहार में कुछ लोग अनैतिकता खोज रहे हैं और कुछ लोग नैतिकता। बिहार में जहां नैतिकता मिलती है वहीं अनैतिकता भी पाई जाती है। जहां अनैतिकता नहीं पाई जाती है वहां नैतिकता नहीं होती है। बिहार में दोनों को अकेले चलने में डर लगता है इसलिए आपस में गठबंधन कर लेती हैं। अनैतिक होना अनिवार्य है। अनैतिकता ही अमृत है। नैतिकता चरणामृत है। पी लेने के बाद सर में पोंछ लेने के लिए होती है। नेता और विश्लेषक पहले चुनाव में जाति खोजते थे। जाति से बोर हो गए तो जाति का समीकरण बनाने लगे। समीकरण से बोर हो गए तो गठबंधन बनाने लगे। गठबंधन से बोर हो गए तो महागठबंधन बनाने लगे। नेता जानता है इसके अलावा हर जात के ठेकेदार को पैसे देने पड़ते हैं। दरवाज़े पर बैठे लोग पैसे मांगते हैं। चीज़ सामान मांगते हैं। यह स्वीकार्य अनैतिकता है। पहले जनता नहीं बताती थी कि किसने दिया है। अब राजनीतिक दल नहीं बताते हैं कि करोड़ों का फंड किसने दिया है। इल्केटोरल फंड पर कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हुई है। बहरहाल, जाति, समीकरण, गठबंधन और महागठबंधन के बाद फैक्टर का चलन आया है। किसमें ज़ेड फैक्टर है और किसमें एक्स फैक्टर है। स्विंग का भी फैक्टर है। सब कुछ खोजेंगे ताकि जीतने वाले की भविष्यवाणी कर सकें। कोशिश होगी कि जल्दी से महीना गुज़र जाए। वास्तविक अनैतिक शक्तियों तक न पहुंचा जाए वर्ना विज्ञापन बंद हो जाएगा और जोखिम बढ़ जाएगा। आम जनता जिसने पांच साल में घटिया अख़बारों और चैनलों के अलावा न कुछ देखा और पढ़ा है उस पर दबाव होगा कि उसके बनाए ढांचे से निकल कर ज़मीनी अनुभव को सुना दे। अब तो वह जनता भी उसी फ्रेम में कैद है। वह ज़मीनी अनुभवों में तड़प रही है मगर आसमानी अनुभवों में ख़ुश है। सूचनाएं जब गईं नहीं तो जनता के मुखमंडल से लौट कर कैसे आएंगी। जनता समझदार है। यह बात जनता के लिए नहीं कही जाती बल्कि राजनीतिक दलों की अनैतिकताओं को सही ठहराने के लिए कही जाती है। जनता की मांग खारिज होगी। नेता जो मांग देंगे वही जनता को अपनी मांग बनानी होगी। नेता जनता को खोजते हैं और जनता नेता को खोजते हैं। चैनल वाले दोनों को मिला देंगे। ज़्यादा मिलन न हो जाए उससे पहले महासंग्राम जैसे कार्यक्रम में खेला-भंडोल हो जाएगा। खोजा-खोजी बिहार के चुनाव का अभिन्न अंग है। आँखों के सामने रखी हुई चीज़ भी खोजी जाती है। कोई नेता गठबंधन के पीछे लुकाया होगा तो कोई नेता उचित गठबंधन पाकर दहाड़ने लगा होगा। बिहार 15 साल आगे जाता है या फिर 15 साल पीछे जाता है। अभी 15 साल पीछे है मगर खुश है कि उसके 15 साल में जितना पीछे था उससे आगे है। उसके बगल से दौड़ कर कितने धावक निकल गए उसकी परवाह नहीं। इसकी होड़ है कि जिससे वह आगे निकला था उसी को देखते हुए बाकियों से पीछे रहे। बिहार की राजधानी पटना भारत का सबसे गंदा शहर है। जिस राज्य की राजधानी भारत का सबसे गंदा शहर हो वह राज्य 15 साल आगे गया है या 15 साल पीछे गया है, बहस का भी विषय नहीं है। सबको पता है किसे कहां वोट देना है। जब पता ही है तो पता क्या करना कि कहां वोट पड़ेगा। नीतीश कहते हैं वो सबके हैं। चिराग़ कहते हैं कि मेरे नहीं हैं। चिराग कहते हैं कि मेरे तो मोदी हैं, दूजा न कोए। मोदी की बीजेपी कहती है मेरे तो नीतीश हैं,दूजा न कोए। गठबंधन से एक बंधन खोल कर विरोधी तैयार किया जाता है ताकि मैच का मैदान कहीं और शिफ्ट हो जाए। मुकाबला महागठबंधन बनाम राजग का न ले। चिराग और नीतीश का लगे। चिराग कहते हैं नीतीश भ्रष्ट हैं। बीजेपी कहती है नीतीश ही विकल्प हैं। नीतीश से नाराज़ मतदाता नोटा में न जाएँ, महागठबंधन में न जाए इसलिए चिराग़ को नोटा बैंक बना कर उतारा गया है। चिराग का काम है महागठबंधन की तरफ आती गेंद को दौड़कर लोक लेना है। राजग को आउट होने से बचाना है। बाद में तीनों कहेंगे कि हम तीनों में एक कॉमन हैं। भले नीतीश मेरे नहीं हैं मगर मोदी तो सबके हैं। मोदी नाम केवलम। हम उनकी खातिर नीतीश को समर्थन देंगे। ज़रूरत नहीं पड़ी तो मस्त रहेंगे। दिल्ली में मंत्री बन जाएंगे। ज़रूरत पड़ गई तो हरियाणा की तरह दुष्यंत चौटाला बन जाएंगे। बस इतनी सी बात है। एक पैराग्राफ की बात है। बिहार की कहानी दूसरे पैराग्राफ तक पहुंच ही नहीं पाती है।

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