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विशेष: पूंजी और पितृसत्ता की कैद में केन्या की राजनीतिक दुनिया

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केन्या में होने वाले 2022 के आम चुनाव में अब एक साल से भी कम का समय बाकी रह गया है। ऐसे में कोई भी अनुमान लगाना जल्दबाज़ी होगा कि चुनाव के बाद देश का राजनीतिक परिदृश्य क्या होगा। पर यह तय है कि जीत उन्ही की होगी जो केन्या के सामाजिक मानको   को पूरा कर सकने और संभावित खर्चे को वहन कर पाने में सक्षम होंगे।

केन्या में अभियान वित्तपोषण कानूनों से संबन्धित रेगुलेशन को शायद ही कभी सुचारु रूप से लागू किया गया है, अभी हाल ही के दिनों में कुछ नियम तो प्रस्तावित किए गए हैं, लेकिन राजनेताओं का ऐसा कोई इरादा नही दिखता कि वे इस पर चर्चा करना चाहते है, सीधे तौर पर ये लोग इस मुद्दे से संबन्धित किसी भी तरह की सूचना को बाहर नही आने देना चाहते हैं।

क्योंकि वे भली प्रकार समझते हैं कि चुनाव जीतना और इसमे खर्च होने वाले पैसे और फिर पैसे की कमाई करना ये सारे वो घटक है जो बड़े ही सम्मोहक तरीके से एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। ये सम्मोहन देश की भलाई और जनता के हित से बहुत ऊपर की चीज है।

अभी हाल ही में समूहिक रूप से वेस्टमिंस्टर फाउंडेशन फॉर डेमोक्रेसी, नीदरलैंड्स इंस्टीट्यूट फॉर मल्टीपार्टी डेमोक्रेसी, और मजलेण्डो शो के सहयोग से किए गए रिसर्च के रिपोर्ट के मुताबिक जो रिज़ल्ट सामने आया है, उसके हिसाब से केन्या में चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक जुनून, मजबूत विचारधारा के बजाय किसी व्यक्ति का पूर्णत: धनवान होना ज्यादा जरूरी है। जिससे की चुनाव में होने वाले खर्चे का वो वहन कर सके।

केन्या के समाज में लैंगिक असमानता की जड़े भी बहुत गहरी हैं। चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने वाली महिलाओं की संख्या अनुपात से कम है। वोट देने वाली महिलाओं की संख्या भी कम है और साथ ही महिलाएं यदि राजनीतिक रूप से सक्रिय भी होना चाहती है, तो ऐसे में भी जीत की लिस्ट में महिलाओं की संख्या बेहद कम होती है। इसकी एक वजह ये भी है कि महिलाएं आर्थिक रूप से पुरुषों के मुक़ाबले कमजोर होती है।

संविधान के अनुसार दो-तिहाई लिंग सिद्धांत के आधार पर सभी निर्वाचित या नियुक्त निकायों में किसी दो लिंग के दो-तिहाई से अधिक व्यक्ति नही होने चाहिए। जिसके अंतर्गत पुरुष दो-तिहाई और महिलाओं की संख्या एक-तिहाई तक पूरा करना आवश्यक है। महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी करने के जो सुझाव और तंत्र निर्देशित किए गए हैं, उन्हे दो-तिहाई लिंग सिद्धांत के अंतिम मसौदे से हटा दिया गया था। इस प्रकार संसदीय कानून से जुड़े मुद्दे अभी भी पुरुष नेशनल असेंबली की राजनीतिक इच्छा पर निर्भर होती है। नतीजतन, राष्ट्रीय स्तर पर महिलाएं अभी तक सीनेट या नेशनल असेंबली के एक-एक तिहाई तक नही पहुँच पाई हैं। ऐसी राजनीतिक स्थिति इसलिए बनी हुई है क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व में पुरुषों और पितृसत्तात्मक धारणाओं की गहरी जड़े मौजूद हैं। जिसके तहत महिलाओं को नेतृत्व की दृष्टिकोण से उपयुक्त नही समझा जाता है। यह पितृसत्ता और पूंजी की कैद में गिरफ्त केन्या की राजनीति, महिलाओं के प्रति द्वेष से भारी हुई है, जहाँ योग्य और सक्षम महिलाओं की भूमिका को पूंजी और पितृसत्ता के मानको के आधार पर कमतर साबित कर दिया जाता है और महिलाओं के अधिकार  से जुड़े एजेंडों की पूरी तरह से अनदेखी की जाती है जिससे पुरुषो के सत्ता के खिलाफ कोई खतरा ना संभावित हो सके।

ऐसी महिलाएं जो राजनीतिक रूप से महत्वकांक्षी होती है, उनके लिए जरूरी हो जाता है कि वो किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े और ऐसे में उन्हे पार्टी के एजेंडे के प्रति खुद को वफादार साबित करना ही होता है, जिसमे महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की होती है। महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता से संबन्धित संवैधानिक प्रावधान और महिलाओं के प्रति समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक धारणाओं के बीच यह तनाव निरंतर रूप से केन्या के सामाजिक और राजनीतिक पटल पर मौजूद है कि किसी भी रूप से महिलाएं सामाजिक और राजनीतिक रूप से पुरुषों की तुलना में ऊपर नही हो सकती हैं। दूसरे शब्दों में महिलाओं की मजबूत राजनीतिक स्थिति और उनके निर्णय लेने की क्षमता को पुरुष अपनी अधीनता के रूप में देखते हैं।

उदाहरण के लिए, उत्तरी केन्या के कुछ समुदायों में कोई भी महिला सार्वजनिक मँचो पर तब तक बात नही कर सकती जब तक की उसका हाथ किसी पुरुष के हाथ में ना हो। इसी प्रकार केन्या के मार्सबिट में, पारंपरिक रूप से आयोजित शांति बैठको के दौरान एक महिला को पुरुषों की उपस्थिति में बात करने की अनुमति नही होती है, और यदि अपनी बात रखना जरूरी है तो, महिला समूह में लोगों के बीच अपनी पीठ की तरफ होकर अपनी बात रख सकती है। महिलाओं की क्षमता और योग्यता को कामुकता और नैतिकता के आधार पर निर्धारित किया जाना केन्या के समाज में बहुत आम बात है। ऐसे में राजनीतिक रूप से सक्रिय होने के लिए महिलाओं के सामने चुनौतियों का पहाड़ होता है।

इन सभी चुनौतियों के साथ ही महिला उम्मीदवारों को केन्या में चुनाव जीतने के लिए आर्थिक चुनौतियों के साथ पितृसत्ता के जटिल मानदंडो को पूरा करने के लिए तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यहाँ महिलाओं के ऊपर लगभग घर के देखभाल की पूरी ज़िम्मेदारी होती है और ऐसे में राजनीतिक गतिविधियों में पूरी तरह से संलिप्त होना महिलाओं के लिए संभव नही हो पता है। इन सब के साथ कई प्रकार की सामाजिक बन्दिशों  की गिरफ्त में भी महिलाओं की जिंदगी होती है, जैसे देर रात तक घर से बाहर रहना सामाजिक रूप से महिलाओं के लिए अनुचित समझा जाता है। क्योंकि राजनीति में सक्रिय होने के लिए महिलाओं के अंदर निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए ऐसे में केन्या के पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की मजबूत स्थिति को बर्दाश्त कर पाना आसान नही है। केन्या के समाज में आज भी परम्परागत रूप से यही माना जात है कि महिलाओं के लिए सबसे उचित स्थान रसोई घर ही है। और प्रतिनिधित्व की भूमिका में  सिर्फ पुरुषों को होना चाहिए। राजनीतिक और सांस्कृतिक चुनौतियों का सामना महिलाओं की तुलना में पुरुष बेहतर तरीके से कर सकते हैं।

केन्या के संविधान को केंद्र में रखते हुए यहाँ राजनीतिक रूप से महिलाओं को सक्रिय करने के लिए और उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए कोशिशें की गई हैं। उदाहरण के लिए, 2010 के संविधान ने एक नई काउंटी महिला प्रतिनिधि की स्थिति को मजबूत करने के लिए बनाई, जिसने नेशनल असेंबली में 47 सीटों को अलग रखा, जिसमें केवल महिला उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकती थीं। इसने संसद में महिलाओं के अनुपात में वृद्धि की है, लेकिन इसका अवांछनीय दुष्प्रभाव भी हुआ है कि इन क्षेत्रों में पुरुषों के भीतर महिलाओं के लिए आक्रोश की भावना विकसित हुई है।

इसके साथ ही केन्या की राजनीतिक दुनिया को अमीर लोगों का संरक्षण प्राप्त है, इस दुनिया में बदलाव लाने के लिए एक अलग प्रकार की संरचना का विकास करना बेहद जरूरी है, इस दिशा में बदलवा लाने के लिए सबसे पहले जरूरी है कि 2014 चुनाव अभियान वित्त अधिनियम को सुचारु रूप से लागू किया जाए। जिसके कि चुनाव में होने वाले खर्चे का अनुमान लग सके और इस पूंजी के बहाव पर एक निर्धारित सीमा के बाद रोक लगाना तय किया जा सके, और राजनीति की दुनिया में पूंजी प्रयोजन जैसे मसले को चुनौती दी जा सके।

सोनम झा

रिसर्च स्कॉलर

सेंटर फॉर अफ्रीकन स्टडीस,

स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीस,

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

मेल आईडी : snmjha@gmail.com

 मोबाइल न॰: +91-8447902327

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दुनिया के 100 प्रभावशाली लोगों में शामिल हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, टाइम मैगजीन के एडिटर ने कहा “बीजेपी ने मुसलमानों को खारिज कर दिया”

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अमेरिका की मशहूर पत्रिका टाइम ने दुनिया के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी शामिल किया है। इस सूची में शामिल अन्‍य भारतीय लोगों में गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, अभिनेता आयुष्‍मान खुराना, एचआईवी पर शोध करने वाले रविंदर गुप्‍ता और शाहीन बाग धरने में शामिल बिल्किस भी शामिल हैं। टाइम मैगजीन ने प्रधानमंत्री मोदी के बारे में लिखे अपने लेख में कई तल्‍ख टिप्‍पण‍ियां की हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के अलावा इस लिस्‍ट में शी जिनपिंग, ताइवान की राष्‍ट्रपति त्‍साई इंग वेन, डोनाल्‍ड ट्रंप, कमला हैरिस, जो बाइडन, जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल समेत दुनियाभर के कई नेता शामिल हैं। टाइम मैगजीन ने पीएम मोदी के बारे में लिखा, ‘लोकतंत्र के लिए सबसे जरूरी स्‍वतंत्र चुनाव नहीं है। इसमें केवल यह पता चलता है कि किसे सबसे अधिक वोट मिला है। इससे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण उन लोगों का अधिकार है जिन्‍होंने विजेता के लिए वोट नहीं दिया। भारत 7 दशकों से अधिक समय से दुनिया का सबसे बड़ा लोक‍तंत्र रहा है। भारत की 1.3 अरब की आबादी में ईसाई, मुस्लिम, सिख, बौद्ध, जैन और अन्‍य धर्मों के लोग शामिल हैं।’

‘BJP ने भारत के मुसलमानों को खारिज कर दिया’

टाइम मैगजीन के एडिटर कार्ल विक ने लिखा, ‘यह सब भारत में है जिसे अपने जीवन का ज्‍यादातर समय शरणार्थी के रूप में गुजारने वाले दलाई लामा ने सद्भाव और स्थिरता का उदाहरण बताया है। नरेंद्र मोदी ने इन सभी को संदेह में ला दिया है। भारत के ज्‍यादातर प्रधानमंत्री करीब 80 फीसदी आबादी वाले हिंदू समुदाय से आए हैं लेकिन केवल मोदी ही ऐसे हैं जिन्‍होंने ऐसे शासन किया जैसे उनके लिए कोई और मायने नहीं रखता है।’

कार्ल विक ने लिखा, ‘नरेंद्र मोदी सशक्तिकरण के लोकप्रिय वादे के साथ सत्‍ता में आए लेकिन उनकी हिंदू राष्‍ट्रवादी पार्टी बीजेपी ने न केवल उत्कृष्टता को बल्कि बहुलवाद खासतौर पर भारत के मुसलमानों को खारिज कर दिया। बीजेपी के लिए अत्‍यंत गंभीर महामारी असंतोष को दबाने का जरिया बन गया। और दुनिया का सबसे जीवंत लोकतंत्र अंधेरे में घिर गया है।’ बता दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान टाइम मैगजीन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘भारत का डिवाइडर इन चीफ’ यानी ‘प्रमुख विभाजनकारी’ बताया था।

हालांकि टाइम ने नतीजों के बाद उन पर एक और आर्टिकल छापा था। दूसरे आर्टिकल का शीर्षक था- ‘मोदी हैज यूनाइटेड इंडिया लाइक नो प्राइम मिनिस्टर इन डेकेड्स’ यानी ‘मोदी ने भारत को इस तरह एकजुट किया है जितना दशकों में किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया’। इस आर्टिकल को मनोज लडवा ने लिखा है जिन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ‘नरेंद्र मोदी फॉर पीएम’ अभियान चलाया था। आर्टिकल में लिखा गया है, ‘उनकी (मोदी) सामाजिक रूप से प्रगतिशील नीतियों ने तमाम भारतीयों को जिनमें हिंदू और धार्मिक अल्पसंख्यक भी शामिल हैं, को गरीबी से बाहर निकाला है। यह किसी भी पिछली पीढ़ी के मुकाबले तेज गति से हुआ है।’

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चीन की साजिश का पर्दाफाश, सेना को पीछे हटाने के बहाने LAC पर तैनात की अतिरिक्त टुकड़ी

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भारत और चीन के बीच लद्दाख स्थित एलएसी पर पिछले चार महीनों से तनाव जारी है। इस बीच चीन का दोहरा रवैया एक बार फिर उजागर हो गया है। जहां एक तरफ चीन लगातार अपने सैनिकों को पीछे हटाने की बात कहने के साथ भारत से भी परस्पर पीछे हटने की मांग कर रहा है। वहीं, दूसरी तरफ चीनी सेना लगातार एलएसी पर खुद को मजबूत करती जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने 29-30 अगस्त को भारत द्वारा रेजांग ला की पहाड़ियों पर चढ़ाई करने के बाद से अब तक सैनिकों की तीन बटालियन एलएसी पर तैनात कर ली हैं। चीन ने एक बटालियन रेकिन ला पर रखी है, जबकि दो बटालियन स्पांगुर लेकर पर रखी हैं। यह सभी 63 कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड का हिस्सा हैं, जो शिकवान में मौजूद हैं।

जून मध्य में गलवान में हुई झड़प के बाद से दोनों देशों के बीच विवाद गहरा गया है। पिछले दो महीने में चीनी सेना ने सिर्फ पूर्वी लद्दाख के हिस्से पर ही घुसपैठ की कोशिश नहीं की, बल्कि अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तराखंड से लगी सीमाओं से भी भारत में दाखिल होने की कोशिश की। कुछ इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स में इस बात का खुलासा भी किया गया है।

इससे पहले लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच ताजा टकराव के बाद बीजिंग ने पारस्परिक चर्चा के माध्यम से आने वाली भीषण ठंड के चलते सैनिकों की जल्द से जल्द वापसी की मंगलवार को उम्मीद जताई थी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजान ने भारत और चीन द्वारा एक-दूसरे पर सोमवार को पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग झील के पास हवा में गोलियां चलाने का आरोप लगाए जाने के कुछ घंटे बाद सैनिकों की वापसी की यह उम्मीद जताई।

 

 

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भारत में अपना असेंबली प्लांट बंद करेगी प्रीमियम मोटरसाइकिल ब्रांड Harley Davidson

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प्रीमियम अमेरिकन मोटरसाइकिल ब्रांड Harley Davidson के चाहने वालों के लिए बुरी खबर है. दरअसल कंपनी ने भारत में कारोबार बंद करने की बात कहकर सबको चौंका दिया है. कंपनी का कहना है कि भारत में बाइक्स ( harley bikes) का कारोबार उसके लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है और यही वजह है कि अब कंपनी ने भारत में अपना असेंबली प्लान बंद करने की तैयारी में है. Harley Davidson की कीमत की वजह से इसे खरीदार नहीं मिल पाते जिसकी वजह से कंपनी को घाटा उठाना पड़ रहा है. हालांकि, वो भारतीय बाजार में बाइक की बिक्री जारी रखेगी.

40 से 50 हजार रुपए बढ़ सकती है कीमत- असेंबली बंद करने का फैसला उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया प्रशांत के उन हिस्सों में लिया गया है, जहां पर कंपनी की गाड़ियों के सेल्स डाउन हुई है. कंपनी से जुड़े एक सोर्स ने बताया कि कंपनी सिर्फ अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को बंद कर रही है. बाइक की मार्केटिंग और सेल्स जारी रहेगी. अब भारत में बाइक को थाइलैंड से इम्पोर्ट किया जाएगा. ऐसे में बाइक की कीमत 40 से 50 हजार रुपए बढ़ सकती है. कंपनी के सीईओ जोशन जेट्ज ने कहा है कि हार्ले केवल उन्ही देशों में कारोबार को जारी रखेगी जहां कंपनी को मुनाफा बढ़ने के आसार हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी ऐसे किसी भी देश में व्यापार नहीं करेगी जहां उसे नुकसान हो रहा है.

फाइनेंशियल ईयर (2019-2020) में कंपनी ने भारत में केवल 2,500 बाइक बेचे हैं, जबकि इस साल अप्रैल से जून की अवधि के बीच कंपनी केवल 100 बाइक ही बेच पाई है. जुलाई में दूसरी तिमाही के रिजल्ट के साथ एक बयान में हार्ले- डेविडसन ने कहा था कि कंपनी अंतरराष्ट्रीय बाजारों से बाहर निकलने की योजना का मूल्यांकन कर रही है.

Harley Davidson स्ट्रीट 750, Street ROD हैं. कंपनी ने भारत में हार्ले-डेविडसन स्ट्रीट 650 जैसे किफायती मॉडलों को बाजार में उतारा है, लेकिन यह बाइक रॉयल एनफील्ड के 650 cc मॉडल से कहीं अधिक महंगी है. कम कीमत में बेहतरीन फीचर्स देने वाली अन्य कंपनियों ने भारत में हार्ले-डेविडसन की बिक्री को खासा प्रभावित किया है. हार्ले डेविडसन ने अपनी एंट्री-लेवल Street 750 मोटरसाइकिल की कीमत भी घटा दी है. भारतीय बाजार में अब इस बाइक (विविड ब्लैक कलर ऑप्शन) की एक्स-शोरूम कीमत 4.69 लाख रुपये है. यानी कंपनी ने इसकी कीमतों में 65,000 रुपये की भारी कटौती की है.

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