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बीट विशेष

हमारे समाज में हर घंटे हो रहे 4 बलात्कार से उपजी पीड़ा की लघुकथा :सेक्स फंड

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 “आंटी जी चंदा इकठ्ठा कर रहें हैं। आप भी कुछ अपनी इच्छा से दे दीजिए ।”

“अरे लड़कियों ये काॅलेज छोड़ कर किस बात का चंदा इकठ्ठा करती फिर रही हो ?”

“सैक्स फंड।”

“हैं! ये क्या होता है?”

मिसेज खन्ना के चेहरे पर घोर आश्चर्य के भाव थे । “आंटी जी हम में कुछ लड़कियाँ कल शहर के बाहर की तरफ बनी वेश्याओं की बस्ती में बात करने गए थे कि वो हर मोहल्ले में अपनी एक ब्रांच खोल लें । पर उन्होंने कहा कि उनके पास इतना पैसा नही है , तो हमने कहा फंड हम इकठ्ठा कर देंगी ।”

“हे राम! सत्यानाश जाए लड़कियों तुम्हारा । सब के घर परिवार उजाड़ने हैं क्या , जो बाहर की गंदगी लाकर यहाँ बसा रही हो ?”

“आंटी जी गंदगी नही ला रहे बल्कि हर गली मोहल्ले के बंद दरवाज़ों के पीछे बसी कुंठित गंदगी को खपाने की कोशिश कर रहे हैं वो भी उन देवियों की मदद से जिनकी वजह से आप जैसे घरों की छोटी बच्चियां सुरक्षित रह सकेंगी। हम वहाँ ऐसी बहुत औरतों से मिले जो स्वेच्छा से मोहल्लों में आकर बसने को तैयार हैं । बस सारी मुश्किल पैसे की है तो हमने कहा हम फंड से तुम्हारी महीने की सैलेरी बांध देंगे । और कोई अपनी इच्छा से ज्यादा देना चाहे तो और अच्छा ।”

“हाँ ,आंटीजी अब आदमजात की भूख का क्या भरोसा , कब, कैसे ,कहाँ मुँह फाड़ ले। सब पास में और हर जगह उपलब्ध होगा तो शायद कुछ बच्चियों को इन घृणित बलात्कारियों से बचाया जा सके।” दुसरी लड़की ने अपना तर्क दिया।

“तो क्या हर जगह ये कंजरखाने खुलवा दोगी?”

मिसेज खन्ना ने बेहद चिढ़ कर कहा।

“ठीक कहा आंटीजी आपने। कंजर ही तो खपाने हैं यहाँ । शरीफ तो वैसे भी जाने से रहे । आज इन कंजरो से न भूख संभल रही है ,न सरकार से कानून व्यवस्था । तो हमें तो अपनी इन बहनों से मदद मांगने के अलावा और कोई उपाय नज़र नही आ रहा । आप के पास कोई हल हो तो आप बता दो ?”

मिसेज खन्ना कुछ घड़ी अवाक् देखती रही ,उनके पास कोई जवाब न था। अंदर से दो हज़ार का नोट लाकर दे दिया और कहा “जब ज़रूरत हो और ले जाना ।”

“जी”

“बहनें …” बुदबुदाती हुई मिसेज़ खन्ना अंदर चली गई और रिमोट उठा टीवी बंद कर दिया जिस पर सुबह से हर चैनल पर बच्ची के साथ हुए गैंग रेप का ब्यौरा और तथाकथित समाजसेवी लोगों के बयान से सजा सर्कस आ रहा था। —-

सुषमा गुप्ता

(ये लेखिका के अपने विचार है, देश में हो रहे एक के बाद एक हृदयविदारक बलात्कार और हत्या पर लेखिका ने कुछ इस तरह अपनी संवेदना व्यक्त की है)

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बीट विशेष

जिस वजह से भीम राव अम्बेडकर ने दे दिया मंत्री पद से इस्तीफा

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डा.अम्बेडकर को याद करते हुए…
आज डा.भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिन है.अपने जीवन में डा.अम्बेडकर ने बहुत सारी भूमिकाएं अदा की.वे संगठक थे,प्रकाशक-सम्पादक थे,राजनीतिक नेता,सांसद,मंत्री रहे.लेकिन इन सब भूमिकाओं के मूल में एक साम्यता है कि उन्होंने जो भी काम किया,उसमें स्वयं के हित के बजाय उत्पीड़ित,दमित,दलित लोगों की आवाज को आगे बढाने के लिए किया.उन्होंने संगठन बनाये,पार्टी बनाई-बहिष्कृत हितकारिणी,इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी और फिर शिड्यूल कास्ट फेडरेशन.हर बार लक्ष्य एक ही था कि हाशिये के स्वरों को मुख्यधारा का स्वर बनाया जाए.जीवन पर्यंत भूमिकाएं बदलती रही पर लक्ष्य हमेशा एक ही रहा.

वे सिर्फ दलितों के नेता नहीं थे बल्कि समाज के हर उत्पीड़ित हिस्से की आवाज़ थे.इसीलिए बम्बई असेंबली में मजदूरों के हड़ताल के अधिकार के पक्ष में मुखर स्वर थे.उनकी पार्टी-इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के एजेंडे में ऐसे आर्थिक तंत्र को सुधारने या उलटने की बात थी,जो लोगों के किसी वर्ग के प्रति अन्यायपूर्ण हो.जमींदारों के जुल्म से बटाईदारों को बचाने की बात भी इस कार्यक्रम में थी.महिला अधिकारों वाले हिन्दू कोड बिल को पास न कराने के मसले पर तो अम्बेडकर ने मंत्री पद से ही त्याग पत्र दे दिया था.इस प्रकार, हर तरह की गैरबराबरी के खिलाफ वे थे.लेकिन निश्चित ही जातीय भेदभाव और उत्पीड़न(जिसे वे खुद भी भुगत चुके थे),भारतीय समाज में मौजूद उत्पीड़न का सर्वाधिक मारक रूप था(है),इसलिए उसकी समाप्ति के लिए वे जीवन पर्यंत लड़ते रहे.

आज के दौर के कई सबक, अम्बेडकर के लिखे में तलाशे जा सकते हैं.आज राजनीति का ऐसा स्वरूप खड़ा कर दिया गया है,जिसमें नेता, मनुष्य नहीं अराध्य है.उस पर किसी तरह का सवाल उठाना,उसके भक्तों द्वारा पाप की श्रेणी में गिना जा रहा है.अब देखिये, अम्बेडकर का इस बारे में क्या मत है.वे कहते हैं- “धर्म में भक्ति(नायक पूजा) हो सकता है कि आत्मा के मोक्ष का मार्ग हो,लेकिन राजनीति में भक्ति निश्चित ही पतन और निर्णायक तौर पर तानाशाही की ओर ले जाने वाला रास्ता है.” अम्बेडकर के लिखे,इस वाक्य में राजनीति के इस ‘भक्तिकाल’ की मंजिल देखी जा सकती है.

कानून मंत्री के रूप में संसद से हिन्दू कोड बिल पास न करवा पाने के चलते अम्बेडकर ने इस्तीफ़ा दे दिया.इस मसले पर उन्होंने कहा “……..वर्ग और वर्ग के बीच भेद,लिंग और लिंग के बीच भेद,जो हिन्दू समाज की आत्मा है,उसे अनछुआ छोड़ दिया जाए और आर्थिक समस्याओं से जुड़े कानून पास करते जाएँ तो यह हमारे संविधान का मखौल उड़ाना और गोबर के ढेर पर महल खड़ा करना है.”आज देखें तो लगता है कि वह गोबर का ढेर,महल से भी बड़ा हो गया है और फैलता ही जा रहा है.

वह देश जिसकी परिकल्पना भारत के संविधान की प्रस्तावना में है- “संप्रभु, समाजवादी,धर्मनिरपेक्ष,जनतांत्रिक गणराज्य”,वह भी धूरी-धूसरित होती प्रतीत हो रही है.इसलिए एक आधुनिक देश की परिकल्पना को साकार करने की चुनौती, अम्बेडकर को याद करते हुए हमारे सामने हैं.
इस लक्ष्य के लिए,अम्बेडकर का दिया सूत्र हमारे पास है-educate,agitate,organise (शिक्षित बनो,संघर्ष करो,संगठित हो)
जय भीम,लाल सलाम.
-इन्द्रेश मैखुरी

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बीट विशेष

आलेख:- दलितों के संवैधानिक अधिकारों और आरक्षण पे हंगामा क्यों?

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भारतीय समाज में वर्ण और जाति के आधार पर शोषण तथा अतिक्रमण हज़ारों सालों से होता चला आ रहा है! वर्ण आधारित जातिवादी व्यवस्था आज जो हम देख रहे हैं इसकी शुरुआत का सटीक अनुमान संभव नहीं है! विद्वानों का मानना है कि वैदिक काल से ही समाज किसी ना किसी रूप रूप में वर्ण-व्यवस्था पे आधारित रहा है! प्रचलित मान्यताओं के आधार पर चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र) में विभाजित समाज की स्थापना का श्रेय आर्यों को जाता है! सर्प्रथम आर्यों ने ही समाज के एकीकरण के नाम पर वर्ण आधारित जातिगत सोपान की शुरुआत की थी! अपने आपको सर्वश्रेष्ठ संस्कृति मानकर आर्यों ने ख़ुद को सर्वोपरि (ब्राह्मण) बना लिया तथा सांस्कृतिक रूप से अलग बहुसंख्यक लोगों को शुद्र की संज्ञा दे दी! अर्थात भारत में रह रहे मूल निवासियों को ही आर्यों ने समाज के सबसे पिछले पायदान पर रख दिया!

सभ्यता और संस्कृति के नाम पर बनाए गए वर्ण व्यवस्था में सबसे पिछले पायदान पर रखे गए लोगों के साथ तब से लेकर अब तक शोषण, अतिक्रमण और अत्याचार होता चला आ रहा है! आर्यों ने शुरु से ही समाज के एकीकरण के नाम पर वर्ण व्यवस्था का भरपूर दोहन किया है!आज भी सामाजिक अभिजात वर्ग “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” के नाम पर अपना खेल सतत जारी किए हुए हैं!

वर्ण व्यवस्था से ही जाति व्यवस्था का निर्माण किया गया, जिसकी कमान ब्राह्मणों ने अपने पास रखा! इसी क्रम में निचले पायदान पर उनको रखा जिनके पास ना तो खाने के लिए सही खाना, पीने को स्वच्छ पानी, तथा रहने को घर, और ना ही किसी भी तरह का सामाजिक अधिकार था! असल में समाज के वर्ग व्यवस्था को बचाए रखने के लिए शासक वर्ग द्वारा शोषित वर्गो पे शोषण को बकरार रखने के लिए ही लगातार दलितों पे अत्याचार करते आ रहे हैं!

दलितों पे हो रहे अत्याचार के विरूद्ध कई महापुरुषों ने संघर्ष किया है, उनमें से आधुनिक भारत में बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर का नाम अग्रणीय है! बाबा साहब का जन्म उस वक़्त के अछूत जाति (महार) में 14 अप्रैल 1891 को हुआ था! बचपन से ही शिक्षा के प्रति उनके लगन के कारण छुआछूत जैसी सामाजिक बाधाओं से संघर्ष करते हुए उन्होंने पी. एच. डी सहित कुल 26 उपाधियों की प्राप्ति की!

बहुमुखी प्रतिभा के धनी बाबा साहब ने छूआछूत एवं जात-पात सहित अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध कई आंदोलन किए! उनका मानना था कि शिक्षा प्राप्त कर दलित मनुवादियों के षड्यंत्र को समझ कर अपना अधिकार पाने में सफल हो सकते हैं! आगे चलकर बाबा साहब को उनकी योग्यता और क्षमता के आधार पर भारतीय संविधान के ड्राफ्ट समिति का अध्यक्ष बनाया गया! संविधान निर्माण के दौरान ही उन्हें इस बात का अहसास हो गया था कि मनुवादी लोग देश की स्वतंत्रता के पश्चात भी अपनी मनुवादी व्यवस्था क़ायम रखना चाहेंगे अतः उन्होंने दलितों को विशेष अधिकार देने का काम किया जिससे उनको समाज मे ससम्मान जीने का अधिकार मिल जाए! दलितों को संसद तथा विधानसभाओं, स्थानीय संस्थाओं, एवं शिक्षण संस्थानों में विशेष प्रावधान कर प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की!

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य किसी नगरिक के विरूध धर्म, वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी क्षेत्र में पक्षपात नहीं करेगा। अनुच्छेद 17 छुआछूत का अंत करती है, अनुच्छेद 21 जीवन का अधिकार देती है! अनुच्छेद 23 और 24 शोषण के विरूद्ध अधिकार देती है! इसी प्रकार कई ऐसे अधिकार संविधान हमें देती है जिस आधार पर स्वतंत्र भारत मे किसी को भी जाति, धर्म, संप्रदाय, लिंग, क्षेत्र या किसी अन्य व्यक्तिगत पहचान के आधार पर किसी के साथ पक्षपात, शोषण या अत्याचार नहीं किया जा सकता!

इन सबके बावजूद जब दलितों पे अत्याचार खत्म नहीं हुए तो 11 सितंबर 1989 को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989, पारित हुआ! इस एक्ट का उद्देश्य इन जातियों के साथ अपराध करने वाले को दंडित करना है। जिसमें तुरंत गिरफ़्तारी से लेकर विशेष अदालत द्वारा शीघ्र सजा का प्रावधान है!

यह कानून इस वर्ग के ससम्मान जीवन यापन तथा उनके खिलाफ हो रहे शोषण और अत्याचार को रोकने के लिए है। इस कानून के अंतर्गत सिर्फ़ वही अपराध आते हैं जिसे एक सभ्य समाज कभी सहन ना करे!
जैसे जबरन मल, मूत्र इत्यादि खिलाना,सामाजिक बहिष्कार करना, इनके सदस्यों को व्यापार और रोजग़ार करने से बंचित करना, शारीरिक चोट पहुंचाना, घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करने या क्षुब्ध करने की नीयत से कूड़ा-करकट, मल या मृत पशु का शव फेंक देना, बलपूर्वक कपड़ा उतारना या उसे नंगा करके या उसके चेहरें पर पेंट पोत कर सार्वजनिक रूप में घुमाना,गैर कानूनी ढंग से खेती काट लेना, खेती जोत लेना या उसकी भूमि पर कब्जा कर लेना,भीख मांगनें के लिए मजबूर करना या बंधुआ मजदूर के रूप में रहने को विवश करना,मतदान नहीं देने देना या किसी खास उम्मीदवार को मतदान के लिए मजबूर करना,महिला का उसके इच्छा के विरूद्ध या बलपूर्वक यौन शोषण करना, उपयोग में लाए जाने वालें जलाशय या जल स्त्रोतों को गंदा कर देना अथवा अनुपयोगी बना देना,सार्वजनिक स्थानों पर जाने से रोकना,अपना मकान अथवा निवास स्थान छोड़नें पर मजबूर करना इत्यादि!

अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989 के संवंध में यह कहा गया कि इसका दुरुपयोग होता है, अतः इसमें कुछ बदलाव हो! इसी दौरान कुछ मनुवादियों ने यह भी मांग करना प्रारंभ कर दिया कि दलितों को मिलने वाला हर प्रकार के आरक्षण को समाप्त कर दिया जाय!

इस पर हम यह मानते हैं कि आज भी जब अनुसूचित जाति और जनजाति पे अत्याचार इसी आधार पर होते हैं कि वो दलित हैं तो उनसे संबंधित कानून पे पुनर्विचार क्यों?

जहाँ तक कानून के दुरुपयोग की बात है तो आज पूँजीवाद तथा मनुवाद के इस युग में किस क़ानून का दुरुपयोग नहीं हो रहा है, तो क्या सब पे पुनर्विचार संभव है?

हम आरक्षण का समर्थन करते हैं और आरक्षण के विरोधियों से यह कहना चाहते हैं कि अगर आरक्षण से इतनी नफरत है तो बराबर से बांट दो ना अपनी ज़मीन, और करो ना आपस में एक दूसरे के घर शादी! ध्वस्त कर दो ना मनुवादी मानसिकता! कर दो ना देश में समान शिक्षा व्यवस्था लागू! स्वीकार कर लो ना हमें अपने साथ व्यापार और निजी कंपनियों के रोजग़ार में, और आने दो ना हमें संख्या के आधार पर हर जगह! दे दो ना हमें वो सामाजिक सम्मान और अधिकार जो हज़ारों सालों से भोगते आए हो!

हम सत्तासीन मठाधीसों से यह प्रश्न पूछना चाहते हैं कि क्यों नहीं देते दलितों को सम्मान?, क्या वो भारत माता की समान संतान नहीं? क्या उनका भारत निर्माण में तुम से ज़्यादा योगदान नहीं? इसमें दलितों का क्या कसूर है कि मनुवादियों ने उन्हें शुद्र बना दिया?, आख़िर दलित भी सभों की तरह भारत के समान नागरिक हैं! कोई किसी भी जाति में पैदा लिया हो, हम जातिवादी व्यवस्था में कतई नहीं मानते तथा जाति, धर्म या किसी भी प्रकार के पहचान पे समाज की स्थापना और राजनीति की कड़ी शब्दों में निंदा करती है!

एक और सवाल जो पूछा जाता है कि जब हर जाति में ग़रीब है तो सबको समान आरक्षण क्यों नहीं, ग़रीबी जाति देखकर तो नहीं आती!

हाँ इस बात में सत्यता है कि ग़रीबी जाति देखकर नहीं आती पर आजतक दलितों पे अत्याचार जाति देखकर ही हो रहा है! और आरक्षण का आधार सिर्फ़ आर्थिक कतई नहीं हैं! अनुसुचित जाति एवं जनजाति पे सदियों से हो रहा शोषण और समाज से उनको अलग थलग कर देने की व्यवस्थाओं को ख़त्म कर उनको मुख्यधारा में लाने के लिए एक सार्थक प्रयास का नाम है आरक्षण ना कि यह कोई कृपा है!

हमारे देश की यह सत्यता है कि लोकतांत्रिक ढांचे के इतने साल बाद भी हमारा समाज जातीय आधार पर बंटा हुआ है! और जब तक समाज में किसी भी तरह का ग़ैर बराबरी रहेगा, वो लोकतांत्रिक समाज की स्थापना और राष्ट्रनिर्माण में सबसे बड़ा बाधा बना रहेगा!जब तक समाज का हर तबक़ा ख़ुद को राष्ट्र का समान हिस्सेदार ना मानने लगें, बाबा साहेब के सपनों का राष्ट्र संभव नहीं!

लिखित रूप में हमारा संविधान दुनियाँ का सबसे अच्छा संविधान है, इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उनकी है जिनके हाथों वोट देकर हमने अपना भविष्य गिरवी रखा हुआ है! हमें अगर समतामूलक समाज चाहिए तो सर्वप्रथम हमें अपना संविधान बचाना चाहिए, धर्म एवं हमारे सारे अधिकार स्वतः ही बच जाएंगे! इस संदर्भ में बाबा साहब ने कहा था कि हम सबसे अच्छा संविधान लिख सकते हैं, लेकिन उसकी कामयाबी आख़िरकार उन लोगों पर निर्भर करेगी, जो देश को चलाएंगे!

आरक्षण के नाम पे आजकल जो चल रहा मनुवादियों का खेल है इसे हम अच्छे से समझते हैं, हमारी आवादी 85 प्रतिशत और हमें 49.5 प्रतिशत में समेटे रखने और खुद 15 प्रतिशत होकर 50.5 प्रतिशत हथियाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है! समाज के जातीय विविधताओं को हम स्वीकार करते हैं परन्तु ये जो मनुवादी आर्यों के तर्ज़ पर एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर ग़रीब को और ग़रीब एवं अमीर को और अमीर बनाने का खेल खेला जा रहा है जनता अब इसे अच्छे से समझने लगी है!

सदियों से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक रूप से उपेक्षित तथा वंचित लोगों को उनका अधिकार मिलता रहे इसमें किसी को क्या समस्या हो सकती है, जिन्हें भी आरक्षण से समस्या है उनके लिए बस यही कहना चाहूँगा की देश अब ग़ुलाम नहीं और ना कोई हमारा राजा है! हम अपने अधिकारों तथा संविधान की रक्षा के लिए सतत संघर्ष करते रहेंगे!

शाहनवाज़ भारतीय, पी.एच.डी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली!

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बीट विशेष

नजरिया: आरक्षण पर बवाल, यह गुस्सा नहीं जातिवाद का दंभ है।

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आजकल एक हवा चल रही है, आरक्षण के विरोध का। इस हवा के रुख को समझने की जरुरत है, इस हवा से जातिवाद की इतनी दुर्गन्ध आ रही की अब इसे झेल पाना मेरे लिए या हर उस व्यक्ति के लिए जो जातिवाद के दुर्गन्ध को पसंद नहीं करते उनके लिए नामुमकिन है।

हर दिन व्हाट्सप्प युनिवर्सिटी के माध्यम से नया-नया कुतर्क, इसे कूड़ा कहें तो बेहतर होगा ठेला जा रहा है। आप इसे यूँ ही आनेवाला मैसेज ना समझें यह बेहद ही सुनियोजित है।

आरक्षण के विरोध में इतना कूड़ा ठेला गया है कि आरक्षित वर्ग के लोग भी अब इसके विरोध में उतर आएं हैं। यह उनकी मज़बूरी ही है। अनारक्षित वर्ग के लोग कह रहे हैं यह हमारा गुस्सा है, एक बात कहे देता हूँ यह आपका गुस्सा नहीं जातिवाद का दंभ है.

 भारतीय समाज में क्यों जरूरी है आरक्षण ?

आरक्षण क्यों लागू किया गया था इस बात को बिना जाने इसका विरोध करना अपने-आप से बेमानी है, आरक्षण लागू करने का आधार जाति है ही नहीं।

आजादी से पहले और अभी तक भी सभी प्रकार के लाभकारी और उत्पादन के साधनों पर उच्च वर्ग का ही अधिकार रहता आया है, इस कारण आज़ादी के समय से लेकर आजादी के 70 साल बाद भी लगभग सभी प्राकृतिक और बौद्धिक संसाधन उच्च वर्ग के ही पास अत्यधिक घनत्व के साथ केंद्रित रहा है और दलित समुदाय, जनजाति समुदाय को सभी प्रकार के संसाधनों से वंचित रखा गया है।

भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के संविधान ने पहले के कुछ समूहों को अनुसूचित जाति (अजा.) और अनुसूचित जनजाति (अजजा.) के रूप में सूचीबद्ध किया। संविधान निर्माताओं का मानना था कि जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से पिछड़े रहे हैं और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान तथा समान अवसर नहीं दिया गया और इसीलिए राष्ट्र-निर्माण की गतिविधियों में उनकी हिस्सेदारी कम रही।

संविधान ने सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की खाली सीटों तथा सरकारी/सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातिके लिए 15% और 7.5% का आरक्षण रखा था, जो पांच वर्षों के लिए था। उसके बाद हालात की समीक्षा किया जाना तय था। यह अवधि नियमित रूप से अनुवर्ती सरकारों द्वारा बढ़ा दी जाती रही।

क्या देश में जाति के नाम पर भेदभाव समाप्त हो गया?

अब तर्क यह दिया जाएगा कि समाजिक परिस्थिति ठीक हो गई है, जाति के आधार पर भेदभाव समाज में नहीं होता, तो भाई साहब अपने 400 से 450 स्क्वैर फिट के दुनिया से निकलिए और जरा नजर दौड़ाइए क्या सही में जाति के आधार पर भेदभाव समाप्त हो गया है?

आपके ही शहर को लेता हूँ आपके शहर के सीवर में उतर कर आपके द्वारा पैदा किया गया कचड़ा कौन साफ़ करता है? आपको पता भी है कि सीवर साफ़ करने के दौरान कितने सफाई कर्मियों की मौत होती है?

अब यह तर्क मत दीजियेगा कि हम थोड़ी उनको मजबूर करते हैं. हाँ वह मजबूर हैं आपने ही किया है मजबूर उनको। एक सवाल पूछना चाहता हूँ क्या आप बिना मज़बूरी के उसका काम करेंगे? नाक मुंह तुरंत ऐंठने लगेंगे।

अब जरा भारत के सुदूर गांव में आते हैं। यहां के भी जाति का दंभ भरने वाले लोगों का यही तर्क है, तो भाई साहब आप भी अपने जातिवाद का रंगीन चश्मा उतार कर अपने ब्लैक एंड वाइट आँखों से नजर घुमाइए क्या सही में आपके आस-पास जाति के आधार पर भेदभाव बंद हो गया है? मैं जानता हूँ कि आपका उत्तर हाँ ही होगा।

हे जहरीली जातिवाद से भरे फन फुंफकारने वाले जरा यह बताइये कि आपके चौक-चौराहे पर आपका चप्पल-जूता कौन सिलता है? किस जाति के लोग हैं? आपका हजामत कौन करता है? आपके घर में हुए भोज के बाद बचा हुआ वासी खाना कौन ले जाता है? जले हुए मुर्दों के अवशेष को कौन उठाता है?….

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और भी बहुत कुछ हैं. क्या आपको अब भी लगता है कि आप ने उन्हें थोड़ी कहा है ये सब करने को। तो आप सही हैं आप ने उन्हें नहीं कहा करने पर एक बार सोचिये कि बिना मज़बूरी के ये सब कौन करेगा क्या आप करेंगे? दिल पर हाँथ रख के सोचियेगा।

आरक्षण आर्थिक आधार पर होनी चाहिए?

अब यह तर्क मत दीजियेगा कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए, आपके इस तर्क का जबाव भी नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन( NSSO) के द्वारा जारी किये गए आकंड़े में मिल जाएगा।

NSSO के वर्ष 1999-2000 के रिपोर्ट के अनुसार देश भर में गरीबी रेखा के नीचे अनुसूचित जनजाति की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में 45.8 प्रतिशत, शहरी क्षेत्र में 35.6 प्रतिशत। गरीबी रेखा के नीचे अनुसूचित जाति की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में 35.9 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्र में 38.3 प्रतिशत हैं. वहीँ गरीबी रेखा के नीचे उच्च जाति की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में 16.0 तथा शहरी क्षेत्र में 02.7 है।

हे आरक्षण के विरोध में खड़े महानुभावों इसमें आपकी कोई गलती नहीं है, वास्तव में आरक्षण का विरोध एक जातिवादी सोच है।

एक ऐसी मानसिकता है जो हर भारतीय में लगभग पाया जाता है, वह है दूसरों को आगे बढ़ते देख जलना। पड़ोसी ने स्कूटर खरीदा है उससे जलना, भले ही अपने पास फॉर्चूनर ही क्यों ना हो।

फलना के बेटे को नौकरी लग गई, भले ही अपने तीनों बेटों को नौकरी क्यों ना लगी हो, आपकी जातिवादी सोच और उफान मारती है जब आपका पड़ोसी किसी निम्न जाती का होता है और उसकी सैलरी आपसे अधिक होती है।

वास्तव में उसके टाई का नोंक आपके जातिवादी रंगीन चश्में में चुभती है और तब जातिवाद का जहर बाहर निकलता है ये कहते हुए कि हमारा हक़ मारा जा रहा है…!!!!

सुमित कुमार

( यह लेखक के अपने विचार है,लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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