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राजनीति

भूमिहार पहचान में ही कैद क्यों रखना चाहते हैं कन्हैया को?

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कन्हैया के ख़िलाफ़ घृणा अभियान शुरू हो गया है। यह ख़ुद को वामपंथी कहनेवाले और दलित या पिछड़े सामाजिक समुदायों की ओर से क्यों है? इससे एक सवाल उठता है कि क्या एक ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति दलितों के संघर्ष में शामिल ही नहीं हो सकता? जो कन्हैया की भूमिहार पहचान में ही उन्हें कैद रखना चाहते हैं क्या वे दलितों के संघर्ष को व्यापक कर रहे हैं या कमज़ोर?
कन्हैया चुनाव लड़ेंगे, यह घोषणा होते ही कन्हैया के ख़िलाफ़ घृणा अभियान शुरू हो गया है। इस बार यह राष्ट्रवादियों की ओर से नहीं, ख़ुद को वामपंथी कहनेवाले और दलित या पिछड़े सामाजिक समुदायों के प्रवक्ता कहे जानेवालों की ओर से चलाया जा  रहा है। प्रायः ऐसा सोशल मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है। कन्हैया पर कई प्रकार के आरोप हैं। सबसे पहला यह कि वह भूमिहार हैं, ‘ऊँची’ जाति के हैं और इसलिए  सामजिक न्याय, आदि के बारे में बात करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं। या अगर वे ऐसा कर रहे हैं तो वे नाटक कर रहे हैं। जिस जगह वे हैं, वह दरअसल किसी दलित या पिछड़े को मिलनी चाहिए थी और वे उनका हक़ मारकर वहाँ बैठ गए हैं, या खड़े हो गए हैं!
आज के दौर में यह सबसे मारक आरोप है और कन्हैया या उनके समर्थकों के पास इसका कोई जवाब नहीं। आख़िर वह एक ऐसे माता-पिता की संतान हैं जिन्हें भूमिहार माना जाता है। क्या कन्हैया यह तय कर सकते थे कि वह भूमिहार पैदा न हों? या, क्या कन्हैया के पास कोई ऐसा उपाय है कि वह अपनी जाति का त्याग कर सकें? क्या ऐसा चाह कर भी किया जा सकता है? हम सब जानते हैं कि हमारे निजी तौर पर ऐसा चाहने के बावजूद यह संभव नहीं क्योंकि जाति एक परस्परात्मकता में पैदा होती है और वह एक सामाजिक परिघटना है। मेरे बिना चाहे, मेरी तथाकथित जाति का पता करके मुझसे अयाचित और अकारण रिश्ता महसूस करनेवालों की कमी नहीं। ऐसे लोगों को सुनकर उलझन या अस्वस्ति का अनुभव होता है। ‘अरे! हम भी तो वही हैं!’ सुनकर आपके कान भले लाल हो जाएँ,  कहने वाले के मुदित मुख को आप किस निष्ठुरता से धूमिल करें! सुनकर प्रायः चुप रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। इसका अर्थ यह है कि आपकी जाति आपके बिना चाहे भी आपको लाभ दिला सकती है या हानि पहुँचा सकती है। आप उन दलितों के अनुभव सुनें, जिन्हें दलित ‘न लगने’ पर भी उनके कुलनाम का पता चलते ही मकान बड़ी शालीनता या कई बार निर्विकार सादगी से किराए पर दिए जाने से मना कर दिया जाता है। मेरे एक छात्र ने मुझे लिखा कि वह अपने उस कुलनाम के सहारे ही मकान ले पाया जिससे उसके दलित होने का पता नहीं चलता था क्योंकि वह कुछ उच्च जातियों के द्वारा भी इस्तेमाल होता है!
‘जनेऊ तोड़ो, जाति छोड़ो’ कभी लगाया जाने वाला नारा था, आज वह धोखा बताया जाएगा। इसमें कोई शक नहीं कि इसके लिए ‘उच्च जाति’ के लोग ही प्रायः जवाबदेह हैं, क्योंकि चतुराई से जाति के ऊपरी चिह्नों को त्यागकर उन्होंने जातिगत भेदभाव जारी रखा। जाति भारत में एकमात्र ऐसी संस्था है जो धर्मनिरपेक्ष है। यह हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों में समान रूप से व्याप्त है।
दलित संघर्ष में ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति
फिर क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि ‘उच्च जाति’ में पैदा होने वाले कभी उसकी सीमा का अतिक्रमण नहीं कर सकते? एक ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति दलितों के संघर्ष में शामिल ही नहीं हो सकता? जो कन्हैया की भूमिहार पहचान में ही उन्हें कैद रखना चाहते हैं और इसे उनकी नाक़ाबिलियत बताते हैं कि इसके चलते वे दलितों के हक़ की बात नहीं कर सकते, वे दलितों के संघर्ष को व्यापक कर रहे हैं या कमज़ोर, यह वे भी जानते हैं।
जातिगत भेदभाव तभी ख़त्म हो सकता है जब इसे सिर्फ़ दलित नहीं सभी इसे कबूल करें! या, फिर जाति की अर्हता ही अगर सर्वोपरि होगी तो ख़ुद पिछड़ी और दलित जातियों के बीच के तनाव और परस्पर विरोध का समाधान कैसे किया जाएगा?
क्या एक ‘जाटव’ एक ‘वाल्मीकि’ की लड़ाई लड़ सकता है?  इस तर्क को इस दिशा में आगे बढ़ाने पर यह निष्कर्ष निकलेगा कि जातिगत भेदभाव से कभी मुक्ति नहीं है क्योंकि एक ‘जाति’ के व्यक्ति को दूसरी ‘जाति’ के व्यक्ति से समवेदना का अधिकार ही नहीं है।
पूरी दुनिया का इतिहास इसे झुठलाता है। अश्वेतों के संघर्ष में श्वेतों ने कुर्बानी दी, औरतों के हक़ के लिए पुरुषों ने संघर्ष किया, भारत की आज़ादी के आंदोलन में अँगरेज़ और कई यूरोपीय सीधे और अनेक परोक्ष रूप से शामिल हुए, फ़िलीस्तीनियों के अधिकार के संघर्ष में अनेक यहूदी और इस्राइली शामिल हैं, भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की राजनीति का प्रतिरोध अनेक हिंदू कर रहे हैं, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ वहाँ के मुसलमान लड़ रहे हैं! क्या हम सलमान तासीर की क़ुर्बानी को भूल जाएँ?
क्या कन्हैया मीडिया की पैदाइश?
कन्हैया पर दूसरा इल्ज़ाम वामपंथियों के एक हिस्से की तरफ़ से लगाया जा रहा है। यह कि वह मीडिया की पैदाइश हैं, उन्होंने अभी जनता के बीच काम नहीं किया है, कि वह असली वामपंथी नहीं हैं। उन्हें जबरन शोहरत दी गई है। एक मित्र ने एक वामपंथी दल के नेता का नाम लेकर लिखा कि आख़िर उन बेचारे ने गाँव-गाँव घूम कर वामपंथ की अलख जगाई, उनका नाम तो कोई कभी लेता नहीं, अभी जनमकर खड़े हुए कन्हैया को लोग कँधे पर घुमा रहे हैं!
यह आरोप लगानेवाले एक भूल कर रहे हैं। वह यह नहीं देख रहे कि कन्हैया एक दूसरे संकट के कारण ही पैदा हुआ। वह जनतंत्र का संकट है। जनतंत्र में उदार मूल्य, यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की आज़ादी बनी रहेगी या वह मात्र बहुमत निर्माण की तिकड़म के आधार पर चलता रहेगा? फिर भारत का जनतंत्र तुर्की या रूस के जनतंत्र से या स्तालिनकालीन सोवियत जनतंत्र से कैसे अलग होगा?
कन्हैया और उनके साथियों, उमर ख़ालिद, शेहला राशिद, अनिर्बान पर उनके वामपंथी विचार के कारण नहीं, बल्कि बुनियादी या आरंभिक जनतांत्रिक सिद्धांतों पर अमल के चलते हमला हुआ। यही वजह रोहित वेमुला पर हुए हमले की थी। वह दलित होने के कारण नहीं, अपना विस्तार दलित पहचान से आगे करने के कारण ही ख़तरनाक माना गया।
कन्हैया की भाषा
कन्हैया ने अपनी गिरफ़्तारी और अपने ऊपर जानलेवा हमला नहीं चुना था। हाँ! उसका उत्तर कैसे दिया जाए,  कन्हैया ने ज़रूर उस रास्ते के बारे में सोचा और एक ऐसी भाषा चुनी जिसने सूखे से तकड़ती ज़मीन पर बारिश की बूंदों जैसा असर किया। यह भाषा कोई वामपंथी नेता बोल नहीं पाया था। इस भाषा में हर किसी ने, वह मुसलमान हो या हिन्दू, दलित हो या पिछड़ा अपनी आवाज़ सुनी। यह रोज़मर्रा की ज़ुबान थी, वामपंथ के इतिहास के बोध से संवलित लेकिन उससे दबी हुई नहीं। यह राष्ट्रवादी संकुचन के आगे व्यक्ति के विस्तार की संभावना की घोषणा थी।
कन्हैया या उमर ख़ालिद जैसे युवा वामपंथ में जनतांत्रिक ताज़गी ला सकते हैं। यह वाम विरोधियों के लिए तो चिंता का विषय होना चाहिए लेकिन वामपंथी ही इस कारण कन्हैया पर टूट पड़ें?
यह भाषा साज़िशन नहीं हासिल की जाती। न यह प्रशिक्षण से मिलती है। यह कन्हैया की प्रतिभा की देन है। लेकिन क्या इस वजह से कन्हैया से ईर्ष्या की जानी चाहिए?
इस चुनाव में कन्हैया की जीत या हार से उस संभावना की यात्रा पूरी नहीं हो जाएगी जो 2016 में शुरू हुई। उसकी ओर अभी भी उम्मीद से देखा जाना चाहिए। मैं कहाँ से आया, यह जानने में आपकी दिलचस्पी हो, उससे ज़्यादा उत्सुकता यह देखने में होनी चाहिए कि मैं जा किधर रहा हूँ! इससे आपकी जगह का भी पता चलेगा।
लेख –  प्रो.अपूर्वानंद
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राजनीति

भाजपा कांग्रेस ने जनता को सिर्फ ठगा है:- आम आदमी पार्टी नेता रजिया बेग,

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सहसपुर विधानसभा के गणेशपुर में आम आदमी पार्टी की बैठक का आयोजन किया गया। बैठक को संबोधित करते हुए पार्टी की प्रदेश उपाध्यक्ष रजिया बेग ने कहा कि प्रदेश में सत्ता रहने वाली भाजपा और कांग्रेस पार्टी ने बारी-बारी से यहां के निवासियों को ठगने का काम किया है। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी की सरकार बनने पर प्रदेश की जनता की सभी समस्याओं का समाधान किया जाएगा।

बैठक में गणेशपुर और आसपास के क्षेत्रवासियों ने काफी संख्या में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। नए सदस्यों का स्वागत करते हुए आप की प्रदेश उपाध्यक्ष व बार काउंसिल की पूर्व चेयरमैन रजिया बेग ने पार्टी की नीतियों पर विस्तार से चर्चा किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड बनने के बाद से लेकर अभी तक प्रदेश में कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस की सरकार रही, लेकिन इन दोनों पार्टियों ने सत्ता में रहते हुए प्रदेश की जनता को कोई सुविधा नहीं दिया।

सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं तक सरकार जनता को उपलब्ध नहीं करा पाई हैं। उन्होंने दिल्ली सरकार का उदहारण देते हुए कहा कि दिल्ली सरकार के कामकाज की आज देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी तारीफ हो रही है। वहां की जनता को बिजली पानी मुफ्त में मिल रहा है। उन्होंने कहा कि अगर प्रदेश की सरकारें ईमानदारी से काम करती तो पहाड़ के निवासियों को पलायन नहीं करना पड़ता।

समस्याओं का निस्तारण कर रही सरकार

 

सहसपुर विधानसभा क्षेत्र के ग्राम झाझरा में आयोजित बहुद्देश्यीय शिविर में विधायक सहदेव सिंह पुंडीर ने विभिन्न समस्याओं के निस्तारण का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा कि सरकार जनता की समस्याओं के निराकरण व सरकार की योजनाओं से पात्र व्यक्तियों को लाभान्वित करने की दिशा में निरंतर काम कर रही है। शिविर में क्षेत्रवासियों की विभिन्न समस्याओं को निस्तारित किया गया।

शिविर में विभिन्न विभागों से संबंधित कुल 23 मामलों में आवेदन प्राप्त हुए इसमें कुल नौ शिकायतों का मौके पर ही निस्तारण कर दिया गया। अन्य 14 शिकायतों के निस्तारण के लिए संबंधित विभागों के अधिकारियों ने आवेदनकर्ताओं से एक माह का समय लिया है। शिविर में कृषि विभाग से आशाराम वर्मा, प्रमोद कुमार, श्रीदेव सिंह, विकासखंड अधिकारी शकुंतला शाह, आंचल, आनंद सिंह, उद्यान विभाग से जेडी वर्मा, जिला पूर्ति विभाग से विजय नैथानी, कमला रावत, पंकज शर्मा, दर्शन सिंह सजवाण उपस्थित रहे।

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राजनीति

मैं हमेशा ही नितीश कुमार के खिलाफ रहा हूँ: चिराग पासवान

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लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए (NDA) से राहें जुदा कर ली हैं. हालांकि, वह बीजेपी के साथ हैं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) से नाराज हैं. एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में चिराग पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू (JDU) को हर सीट पर हराना हमारा मकसद है. उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार सहयोगियों की सुनते नहीं हैं. साथ ही पासवान ने यह भी कहा कि  हम JDU के साथ मजबूरी में थे. अब जनता दल यूनाइटेड (JDU) को हर सीट पर हराना ही हमारा मक़सद है.

चिराग पासवान ने रविवार को बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए (NDA) का हिस्सा बने रहते हुए ही अलग चुनाव लड़ने का ऐलान किया. उन्होंने जेडीयू के खिलाफ सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने, लेकिन बीजेपी (BJP) प्रत्याशियों के खिलाफ नहीं लड़ने की बात कही थी. हालांकि, अब चिराग पासवान ने कहा कि कुछ सीटों पर बीजेपी के खिलाफ भी उम्मीदवार उतारने की तैयारी है.

एलजेपी अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा, “मैं हमेशा नीतीश कुमार के खिलाफ रहा. नीतीश का पत्ता हम नहीं जनता काटेगी.” गठबंधन को लेकर पूछ गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि गठबंधन में रहने के लिए बीजेपी का कोई दबाव नहीं था. हम पीएम मोदी के प्रति समर्पित हैं. चुनाव नतीजों के बाद जेडीयू के साथ जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इस पर अभी बात नहीं की जानी चाहिए.

पासवान ने दावा किया है कि बिहार चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और लोक जनशक्ति पार्टी की डबल इंजन वाली सरकार बनेगी. उन्होंने कहा कि कुछ सीटों पर BJP के ख़िलाफ़ उम्मीदवार भी उतारने की तैयारी है

NDTV के इंटरव्यू में चिराग पासवान की 10 बड़ी बातें-
1.    नीतीश सहयोगियों की नहीं सुनते
2.    हम JDU के साथ मजबूरी में थे
3.    JDU को हर सीट पर हराना मक़सद
4.    मैं हमेशा नीतीश के ख़िलाफ़ रहा
5.    गठबंधन में रहने के लिए BJP का कोई दबाव नहीं
6.    हम पीएम मोदी के प्रति समर्पित
7.    नतीजे के बाद JDU के साथ की अभी बात नहीं
8.    BJP-LJP की डबल इंजन की सरकार बनेगी
9.    कुछ सीटों पर BJP के ख़िलाफ़ उम्मीदवार भी
10.    नीतीश का पत्ता हम नहीं जनता काटेगी.

(साभार: khabar.ndtv.com)

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देश

रामविलास पासवान का हुआ दिल का आपरेशन, शनिवार को बिगड़ी तबियत

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लोक जनशक्ति पार्टी (Lok Janshakti Party) के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) के स्वास्थ्य को लेकर अपडेट सामने आया है। बेटे चिराग पासवान (Chirag paswan) ने बताया कि शनिवार को अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद देर रात उनके दिल का ऑपरेशन किया गया है। संभव है कि अगले कुछ हफ्तों में एक और ऑपरेशन करना पड़े। चिराग पासवान ने ट्वीट करके अपने पिता के स्वास्थ्य की जानकारी दी है।

शनिवार शाम अचानक बिगड़ गई रामविलास पासवान की तबीयत

केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान की तबीयत काफी समय से ठीक नहीं चल रही है। उनका इलाज दिल्ली के एक अस्पताल में चल रहा है। इस बीच शनिवार को उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ने की जानकारी सामने आई। जिसके बाद चिराग पासवान तुरंत ही अपने पिता को देखने के लिए अस्पताल पहुंचे। इस बीच बिहार चुनाव को लेकर शनिवार को एलजेपी संसदीय बोर्ड की अहम बैठक भी थी, जिसे टाल दिया गया।

 

चिराग पासवान बोले- कुछ हफ्तों में एक और सर्जरी संभव

इसके बाद एलजेपी अध्यक्ष चिराग पासवान ने रविवार सुबह करीब 5 बजे एक ट्वीट किया, इसमें उन्होंने केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की तबीयत के बारे में बताया। उन्होंने लिखा, ‘पिछले कई दिनों से पापा का अस्पताल में इलाज चल रहा है। कल शाम अचानक उत्पन हुई परिस्थितियों की वजह से देर रात उनके दिल का ऑपरेशन करना पड़ा। जरूरत पड़ने पर सम्भवतः कुछ हफ्तों बाद एक और ऑपरेशन करना पड़े। संकट की इस घड़ी में मेरे और मेरे परिवार के साथ खड़े होने के लिए आप सभी का धन्यवाद।’

दिल्ली के अस्पताल में चल रहा पासवान का इलाज

रामविलास पासवान की बीमारी को लेकर बेटे चिराग ने पहले भी अपनी बात रखी थी। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को एक बेहद भावपूर्ण चिट्ठी भी लिखी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि आज मेरे पिता को जब मेरी जरूरत है तो मुझे उनके साथ रहना चाहिए नहीं तो मैं अपने आपको माफ नहीं कर पाऊंगा। दूसरी ओर बिहार चुनाव को लेकर भी चिराग पासवान को कई जरूरी फैसले लेने हैं। खास तौर से एनडीए में रहने को लेकर एलजेपी का क्या रुख है इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। हालांकि चिराग पासवान ने शनिवार को एक ट्वीट के जरिए अपनी आगे की रणनीति की ओर इशारा जरूर कर दिया।

बिहार चुनाव में 143 सीट पर उम्मीदवारी की तैयारी में LJP

एलजेपी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष चिराग पासवान ने शनिवार को अपने ट्वीट से ये संकेत दे दिए एलजेपी बिहार में 143 सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है। चिराग पासवान ने ट्विटर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर शेयर की है। जिसके साथ उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के सभी उम्मीदवार प्रधानमंत्री के हाथ मजबूत करेंगे। साथ ही ये भी साफ कर दिया कि उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पार्टी जेडीयू से शिकायत है। उन्होंने मोदी के संग अपनी एक तस्वीर के साथ ट्विटर पर एक संदेश पोस्ट किया, ‘मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूरा विश्वास है कि बिहार को फर्स्ट बनाने के लिए और बिहार की खोई अस्मिता को लौटाने के लिए आप सभी मुझे अपना आशीर्वाद देंगे, ताकि मेरे सभी प्रत्याशी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों को मजबूत कर सकें।’

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