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शिक्षा

बिना ‘आधार’ नंबर के कारण जेएनयू प्रशासन ने शेहला राशिद का पीएचडी थीसिस स्वीकार करने से किया इनकार

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नईदिल्ली(13 अगस्त 2017, दीपक कुमार): जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय छात्र संघ की पूर्व उपाध्यक्ष शेहला राशिद ने कल आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय ने उनका पीएचडी थीसिस स्वीकार नही किया क्योंकि उन्होंने सम्बंधित पत्र पर अपना आधार नम्बर नही लिखा था।

शेहला ने कहा कि जेएनयू प्रशासन ने मेरा थीसिस मेंरे केंद्र को भेज दिया क्योंकि मैंने सम्बंधित पत्र पर अपने आधार नम्बर का उल्लेख नही किया था। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय पिछले दरवाजे से आधार को आगे बढ़ा रहा है जबकि इसके लिए कोई दिशा-निर्देश नही है। राशिद की तरह हाल ही में कई अन्य स्टूडेंट्स का भी पीएचडी थीसिस वापस भेज दिया गया जिन्होंने अपना आधार नंबर नही दर्ज किया था। हालाँकि जेएनयू रजिस्ट्रार प्रमोद कुमार ने कहा कि यूजीसी की 21 मार्च की अधिसूचना के बाद आधार का उल्लेख अनिवार्य कर दिया गया है।

Jnu ने अब अलग अलग तरह से चाटों को परेशान करना शुरू कर दिया है। jnu को भी एक आम विश्वविद्यालय के कैम्पस जैसा बनाने की पूरी तैयारी की जा चुकी है। और इसी वजह से वहां पर अपने हक के लिए लड़ने वाले और मोदी सरकार के खिलाफ बोलने वाले चाटों को अलग अलग तरीके से परेशान किया जा रहा है। कभी किसाओ को होस्टल से बाहर कर दिया जाता है तो कभी किसाओ की पीएचडी जमा करने से मना कर दिया जाता है।

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शिक्षा

यूपीएससी के बहुजन विरोधी फ़रमान पर भङकी डीयू की प्रोफेसर कौशल पँवार

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एक ओर फ़रमान। पहले ScSt Act को पंगु बनाया और अब फ़रमान दे दिया कि UPSC उतीर्ण अभ्यर्थियों को UPSC द्वारा निर्धारित मेरिट लिस्ट के आधार पर आईएएस,आईपीएस का निर्धारण नहीं होकर प्रशिक्षण मे प्राप्त कृपा के अंक से आईएएस और आईपीएस अधिकारी का अब निर्धारण होगा।यह तो तय ही था क्योंकि दलितों बहुजन समाज उनकी मेरिट में भी बोलती बंद करने लग गए थे इसलिए मजबूरन ये रास्ता अपनाना पड़ा। आपको क्या लगता है कि अगर आपके साथ ट्रेनिंग में दिए गए अंकों में भेदभाव या अन्याय होता है तो आप SCST कमीशन में जाकर न्याय पा सकेंगे। वहाँ भी वही जातिवादी मानसिकता होगी। यह भेदभाव और अन्याय के रास्ते मेरिट को कुचलने की साजिश है । संविधानिका संस्थाओं को इतना कमज़ोर कर दो कि जनता ख़ुद माँग करने लगे कि इन कमीशनों में केवल पैसे की बर्बादी होती है।

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देश

तुम उलझे रहो जिन्ना सावरकर में, यहां विद्यार्थियों की अस्मिता के साथ हो रहा खिलवाड़:- कन्हैया कुमार

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जब देश जिन्ना-सावरकर की फ़र्ज़ी बहस में उलझा हुआ था, तब मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ में विद्यार्थियों की अस्मिता के साथ भद्दा खिलवाड़ किया जा रहा था। साथी संदीप गुप्ता को पूरी फ़ीस नहीं चुका पाने के कारण डिग्री की जगह कार्डबोर्ड थमा दिया गया, जिसमें फ़ीस नहीं देने की बात लिखी हुई थी। यही नहीं, इस संस्थान के एक अधिकारी ने यहाँ तक कह दिया कि जो विद्यार्थी फ़ीस नहीं देता वह अपनी डिग्री का सम्मान नहीं करता।

साफ़ शब्दों में कह रहा हूँ। जो लोग विद्यार्थियों के पढ़ने के अधिकार का मतलब नहीं समझते, उन्हें न तो ‘सम्मान’ शब्द का अर्थ मालूम है न ‘लोकतंत्र’ का। मुंबई या किसी भी बड़े शहर में रहना कितना महँगा है, यह हम सभी जानते हैं। सरकार अपनी जनविरोधी नीतियों से दलितों, मुसलमानों, आदिवासियों आदि को शिक्षा से दूर करने की कोशिश कर रही है। भारत सरकार की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप को लेकर टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के साथी महीनों से संघर्ष कर रहे हैं।

बिहार से मुंबई जाकर उच्च शिक्षा पाने के अपने संघर्ष के दौरान संदीप का जो अपमान हुआ है वह असल में देश के हर उस व्यक्ति का अपमान है जो शिक्षा को बाज़ार का माल नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मज़बूत बनाने का साधन मानता है।

इस देश के युवा ऐसा अपमान कभी नहीं सहेंगे। जिस देश में कई गुना ज़्यादा कीमत चुकाकर राफ़ेल जैसे लड़ाकू विमान खरीदे जाते हैं और जहाँ एक मूर्ति पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं, वहाँ उच्च शिक्षा के बजट में लगातार कटौती करना लोकतंत्र का अपमान नहीं तो और क्या है? अपने ही नागरिकों को शिक्षा का ग्राहक बनाने वाले लोग देश और लोकतंत्र को खोखला कर रहे हैं। अगर हमें अपने देश से प्यार है, तो हमें उन्हें रोकना ही होगा।

(साभार कन्हैया कुमार की फेसबुक वॉल से)

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शिक्षा

TISS प्रशासन का अमानवीय रवैया, महज कुछ फीस नहीं देने पर कॉलेज प्रसाशन ने छात्र की डिग्री रोकी

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मुंबई: शिक्षा का बढ़ता बाजारीकरण और निजीकरण एक वैश्विक समस्या बनती जा रही है ऐसे में मुंबई के टाटा सामाजिक विज्ञानं संस्थान (TISS) में एक बेहद चौंका देने वाला वाकया सामने आया है.

घटना 8 मई  की है जब TISS में दीक्षांत समारोह चल रहा था जिसमे छात्रों को उनकी डिग्री दी जा रही थी, और जिसके मुख्य अतिथि अनिल काकडलोड़कर थे, इसी बीच बिहार का बेहद गरीब परिवार का एक युवक जिसने TISS से L.L.M की पढाई की है , उसे प्रशासन द्वारा  दीक्षांत समारोह में बुला कर एक लिफाफा दिया गया जिसमे डिग्री की जगह एक कार्डबोर्ड था जिसके ऊपर लिखा था की आपने अपने हॉस्टल और मेस की फीस नहीं भरी है.

प्रशासन के इस रवैये से छात्र बहुत अपमानित महसूस कर रहे है, पीपल्स बीट से बात करते हुए संदीप ने कहा की मैं अकेला छात्र नहीं हूँ  जिसके साथ ऐसा हुआ है, L.L.M. और Masters in Philosophy में पढने वाले और भी छात्रों के साथ ऐसा मजाक किया गया है. हालत ये है की प्रशासन के इस रवैये के कारन ऐसे छात्र अपने दोस्तों के सामने लिफाफा खोलने में काफी शर्मिंदगी महसूस  कर रहे है.

एक अन्य छात्र ने बात करते हुए कहा है की उच्च शिक्षा का अत्यधिक महंगा हो जाने के कारन गरीब परिवार के बच्चों का पढना  लगभग नामुमकिन सा होता जा रहा है.

बता दें की संदीप बिहार के एक बेहद गरीब परिवार से आते है, इन्होने अपना L.L.B  BHU से करने के बाद L.L.M के लिए TISS में दाखिला लिया. प्रथम सेमेस्टर में भी संदीप ने बड़ी मुश्किल से अपना फीस दिया उसके बाद संदीप छात्रवृति की मदद से आगे की पढाई पूरी कर सके.

अपने L.L.M फीस का लगभग एक लाख जमा करने के बाद वो अब तक 20,000 रूपए नहीं चूका सके जिसके कारन उनकी डिग्री रोक दी गयी. संदीप ने अपनी पीड़ा अपने फेसबुक वाल पर भी लिख कर बयां की है, उन्होंने लिखा है की

“शिक्षा के बढ़ते बाज़ारीकरण और निजीकरण से सरकारी संसथान भी अछूते नहीं है। कल टाटा सामाजिक विज्ञानं संस्थान में दीक्षांत समारोह था और मुझे भी L.L.M डिग्री देने के लिए आमंत्रित किया गया था। मुझे भी मंच पे बुला के बोर्ड ऑफ़ गवर्ननेंस के अध्यक्ष श्री रामादोरई ने डिग्री दी। जब हमने डिग्री खोला तो पाया की मेरे लिफाफे में एक चार्ट पेपर पे लिखा है की आपने हॉस्टल और मेस की फी नहीं भरी है। इससे ज्यादा शोषित छात्रों के साथ अपमान क्या हो सकता है। बता दे की केवल बीस हज़ार रुपये जमा नहीं करने पर मेरे डिग्री को रोक दिया गया। मुझे डिग्री नहीं दिया जाता परन्तु मार्कशीट दे दिया जाता। लेकिन सबकुछ रोक दिया गया।“

TOI से बात करते हुए प्रशासन ने कहा है की “ हमने वही किया जो देश और दुनिया के तमाम विश्वविद्यालय करते है, अगर कोई छात्र फीस नहीं देता है इसका मतलब है की वो अपने डिग्री की इज्जत नहीं करता है” उन्होंने आगे कहा की जब ये छात्र अपने बकाया को जमा कर देंगे तो इनको इनकी डिग्री दे दी जाएगी.

बता दें की पिछले कुछ दिनों से TISS में छात्र संगठन हॉस्टल और मेस के फीस में वृद्धि को लेकर लगातार प्रशासन के खिलाफ धरना दे रहे थे.

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