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शिक्षा

जेएनयू में हंगामा:- यौन उत्पीड़न के आरोपी प्रोफेसर को गिरफ्तार करने की मांग को लेकर छात्रों के किया थाने का घेराव

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जेएनयू में यौन उत्पीड़न के मामले और मुद्दा थमने का नाम नही ले रहा है। इस बार यौन उत्पीड़न करने वाला कोई और नही बल्कि जेएनयू का प्रोफेसर है जिस की शिकायत दर्ज कराने के बाद भी अभी तक पुलिस उसे गिरफ्तार नही कर पाई है।

यौन उत्पीड़न के आरोपी जेएनयू प्रो. अतुल जौहरी की गिरफ्तारी की मांग को लेकर छात्रसंघ ने सोमवार को दिन भर हंगामा किया। छात्र-छात्राओं ने वसंत कुंज थाने के बाहर भी उग्र प्रदर्शन किया। इस दौरान पुलिसकर्मियों और छात्रों के बीच धक्कामुक्की और हाथापाई भी हुई।

प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने पुलिस के बैरिकेड को गिरा दिया। छात्रों की मांग है कि सभी नौ शिकायतों में अलग-अलग एफआईआर दर्ज की जाए। जब उनकी मांग नहीं मानी गई तो वे धरने पर बैठ गए। जेएनयू कैंपस में दिनभर स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के छात्र विश्वविद्यालय प्रबंधन के समक्ष आरोपी प्रो. को सस्पेंड करने की मांग करते रहे।

उधर पुलिस प्रशासन का कहना है कि पुलिस और छात्रों के बीच झड़प जरूर हुई, लेकिन हाथापाई नहीं हुई। आइसा की नेता शेहला राशिद ने कहा कि यौन उत्पीड़न के आरोपी को तुरंत गिरफ्तार किया जाए। यह मामला वामपंथी और दक्षिणपंथी नहीं, बल्कि सही और गलत का है।

छात्र संघ की अध्यक्ष गीता कुमारी के मुताबिक, अतुल जौहरी पर नौ छात्राओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है, इसके बावजूद जेएनयू प्रशासन ने प्रोफेसर को निलंबित नहीं किया है।

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उत्तराखंड में आर्थिक ग़ुलामी की दस्तक, मेडिकल की फीस में 400 प्रतिशत की वृद्धि

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प्रतीकात्मक चित्र

उत्तराखंड के प्राइवेट मेडिकल कालेज ने 400 प्रतिशत फीस बढ़ा दी है। यहां के तीन प्राइवेट मेडिकल कालेज में करीब 650 छात्र छात्राएं पढ़ती हैं। आधे उत्तराखंड के ही हैं। राज्य सरकार ने मेडिकल कालेज को फीस बढ़ाने की छूट दे दी है। इस खेल का असर आप जानेंगे तो रातों की नींद उड़ जाएगी। उसके बाद हिन्दू मुस्लिम के नाम पर किसी धार्मिक जुलूस में ख़ुद को स्वाहा कर लेने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

अभी तक यहां के मेडिकल छात्र प्रथम वर्ष एम बी बी एस की फीस 6 लाख 70 हज़ार थी जो अब 23 लाख हो गई है। दूसरे साल की फीस 7 लाख 25 हज़ार थी जो अब 20 लाख हो गई है और तीसरे साल की फीस 7 लाख 36 हज़ार से बढ़कर 26 लाख हो गई है। जो छात्र दूसरे वर्ष में हैं उन्हें बैक डेट से प्रथम वर्ष की फीस का बढ़ा हुआ हिस्सा भी देना होगा यानी दूसरे वर्ष के छात्र को करीब 40 लाख रुपये देनी होगी।

अब यह आर्थिक ग़ुलामी नहीं तो और क्या है। सरकार ने जनता को ग़ुलाम बनाने का तरीका खोज रखा है। इनके पास अब कोई विकल्प नहीं बचा है। या तो सरकार इस अमानवीय फीस वृद्दि को 24 घंटे में वापस कराए या फिर ये छात्र आर्थिक ग़ुलामी को स्वीकार कर लें। क्या कोई भी कालेज फीस के नाम पर इस हद तक रियायत ले सकता है कि आपका सब कुछ बिकवा दे। ठीक है कि 6 लाख भी फीस कम नहीं मगर कैरियर के लिए छात्र लोन ले लेते हैं, उन पर 50 लाख का और बोझ, किस हिसाब से डाला जा रहा है। यही समझ कर ना, अब वे फंस चुके हैं, लोन लेंगे ही। इसे ही आर्थिक ग़ुलामी कहते हैं। क्योंकि अब इनमे से कोई पढ़ाई छोड़ना चाहेगा तो उसे निकलने के लिए 60 लाख रुपये देने होंगे। अर्थशास्त्र की किसी भी समझ के अनुसार ये ग़ुलामी है।

मुख्यमंत्री ने टीवी 18 से कहा है कि एक प्राइवेट मेडिकल कालेज बनाने में 700-800 करोड़ लगते हैं। वाकई किसी ने इतना पैसा लगाकर मेडिकल कालेज बनाया है? किसने आडिट किया है कि 800 करोड़ का एक मेडिकल कालेज है। आर्थिक चेतना न होने का लाभ उठाकर ये सब तर्क दिए जा रहे हैं। आप धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ते रहें, इसकी आड़ में स्कूलों कालेजों में लोग आर्थिक दासता के शिकार हो रहे हैं।

मैंने कई परिवारों से सीधा पूछा कि क्या आप में से कोई ब्लैक मनी वाले परिवार से है, बहुत पैसे वाले हैं, जो जवाब मिला उल्टा शर्मिंदा हो गया। ज़्यादातर छात्र मध्यम और साधारण श्रेणी के परिवारों से हैं। ये डोनेशन वाले नहीं हैं। ये सभी नीट प्रतियोगिता परीक्षा पास कर आए हैं। 450 अंक लाकर। इन कालेजों का चुनाव इसिलए किया कि प्राइवेट कालेज महंगे होते हैं मगर लोन के सहारे एक बार डाक्टर तो बन जाएंगे। अब इनकी इसी मजबूरी का फायदा उठाते हुए यह बोझ डाला गया है । इनके सर पर परमाणु बम फोड़ दिया गया है। यह क्या हो रहा है, हमारे आस पास। क्या वाकई नेताओं ने जनता को ग़ुलाम समझ लिया और जनता भी ख़ुद को ग़ुलाम समझने लगी है।

(यह पोस्ट मुख्यतः वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पे प्रकाशित हुआ है)

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शिक्षा

शहादत दिवस पर याद किये गए प्रोफेसर अब्दुल बारी

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28 मार्च 1947 को राजनीतिक प्रतिद्वंदियों द्वारा शहीद कर दिए गए महान स्वतंत्रता सेनानी, बड़े मजदूर नेता, बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी के तात्कालीन अध्यक्ष प्रोफेसर अब्दुल बारी की शहादत दिवस के अवसर पर आज बिहार इंडस्ट्रियल एसोसिएशन के सेमिनार हॉल में मनाई गई ।

प्रोफेसर अब्दुल बारी साहब पर किताब लिखने वाले अस्थानवी साहब ने कहा कि सरकारों ने उनकी विरासत को नजरअंदाज किया। सरकारों के साथ साथ इतिहासकारों ने भी प्रोफेसर बारी साहब के साथ नाइंसाफी की है। अशरफ साहब ने विस्तार से प्रोफेसर बारी की शख्सियत से परिचित कराया।

साहित्यकार व जगजीवन राम शोध संस्था के निदेशक श्रीकांत ने ‘साहित्य, समाज और साझी संस्कृति ‘ पर बोलते हुए नई पीढ़ी को बताया कि आने वक़्त ने युवाओं को किन क्षेत्रों पर विशेष तौर पर काम करना है जहां पहले कम काम हुआ है। उन्होंने बताया कि शिक्षा के व्यापारीकरण से हमारे समाज का ताना बाना भी बिगड़ा है । बिहार के वर्तमान साम्प्रदायिक माहौल पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि एक अच्छे समाज के लिए आपस मे सौहाद्र होना चाहिए ।

मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए प्रोफेसर अब्दुल बिस्मिल्लाह ने एक भुला दिए गए नायक पर आयोजित इस कार्यक्रम में शामिल होने पर प्रसन्नता जाहिर की । उन्होंने संस्कृत, संस्कृति और राष्ट्र पर विस्तार से बात रखी और वर्तमान राजनीतिक, सामाजिक परिस्थिती में इससे संबंधित गलतफहमियों पर विस्तार से बताते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बुराइयों को लोगों के सामने रखा उन्होंने कहा कि भारत देश को uniformity नही unity की जरूरत है। उन्होंने भाषा विज्ञान और भाषा तथा संस्कृति के बीच के संबंधों पर व्याख्यान दिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार सरूर अहमद ने और संचालन शोधार्थी मो दानिश ने की। अध्यक्षीय भाषण में पत्रकार सरूर अहमद ने युवाओं में सेंस ऑफ हिस्ट्री पर चिंता जाहिर की। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अब्दुल बिस्मिल्लाह प्रमुख वक्ताओं में प्रख्यात पत्रकार अशरफ अस्थानवी, साहित्यकार श्रीकांत , सामाजिक कार्यकर्ता काशिफ यूनुस, प्रोफेसर तनवीर अहमद इत्यादि मौजूद थे। कार्यक्रम का आयोजन सम्पूर्ण क्रांति द्वारा कराया गया था जिसके उमर अशरफ , अबरार रज़ा, मो इंतेखाब आलम, मो सैफुल्लाह, अब्दुल सलाम इत्यादि के सक्रिय भागीदारी से सम्पन्न हुआ।

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TISS में छात्रों की हड़ताल जारी, कई केन्द्रीय विश्वविद्यालय आये समर्थन में

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टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस में पिछले तीन दिनों से चल रही हड़ताल आज भी जारी रही, छात्रों ने प्रशासन द्वारा छात्रों की मांग न माने जाने पर हड़ताल को जारी रखने का फैसला लिया है|

क्या है पूरा मामला:

बता दें की 21 जनवरी को टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के छात्र संगठन ने 100% यूनिवर्सिटी हड़ताल की बात कही थी जिसके बाद लगभग २०० छात्र हड़ताल पर चले गए|

छात्र संगठन यूनिवर्सिटी में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC छात्रों को हॉस्टल फी और मेस फी में मिलने वाले छुट को बंद करने के बाद काफी दिनों से इसे फिर से बहाल करने की मांग कर रहे थे, प्रशासन द्वारा मांग न माने जाने के कारन छात्र संगठन हड़ताल पर जाने का फैसला किया|

22 फरबरी को छात्र संगठन और प्रशासन के बीच बातचीत हुई पर इनके बातों पर सहमती नहीं बन सकी, छात्र संगठन का कहना है की प्रसाशन हमारी मांगों को मानने के लिए तैयार नहीं है, हालाँकि प्रशासन ने कहा की 2016-18 के सत्र वाले छात्रों को यह सुविधा मुहैया करवाई जा सकेगी लेकिन केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को, इस सत्र के में भी OBC छात्रों को कोई सुविधा नहीं दी जाएगी|

छात्र संगठन ने प्रशासन के इस मांग को ठुकराते हुए कहा की देश के सभी विश्वविद्यालयों में गरीब छात्रों के ऊपर महंगाई की गाज गिराई जा रही है जिसे वो स्वीकार नहीं करेंगे|

बहरहाल हड़ताल अभी जारी है देखना है प्रशासन छात्रों की मानों पर कब तक अमल करती है|

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