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चैनलों पर युद्ध का मंच सजा है, नायक विश्व शांति पुरस्कार लेकर लौटा है

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प्रतीकात्मक चित्र

न्यूज़ चैनलों में युद्ध का मोर्चा सजा है। नायक को बख़्तरबंद किए जाने की तैयारी हो रही है। तभी ख़बर आती है कि नायक दक्षिण कोरिया में विश्व शांति पुरस्कार लेने निकल पड़े हैं। मनमोहन सिंह ने ऐसा किया होता तो भाजपा मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस हो रही होती कि जब हमारे जवान मारे जा रहे हैं तो हमारे प्रधानमंत्री शांति पुरस्कार ले रहे हैं। चैनल युद्ध का माहौल बनाकर कवियों से दरबार सजवा रहे हैं और प्रधानमंत्री हैं कि शांति पुरस्कार लेकर घर आ रहे हैं। कहां तो ज्योति बने ज्वाला की बात थी, मां कसम बदला लूंगा का उफ़ान था लेकिन अंत में कहानी राम-लखन की हो गई है। वन टू का फोर वाली।

मोदी को पता है। गोदी मीडिया उनके इस्तमाल के लिए है न कि वे गोदी मीडिया के इस्तमाल के लिए। एक चैनल ने तो अपने कार्यक्रम में यहां तक लिख दिया कि इलेक्शन ज़रूरी है या एक्शन। जो बात अफवाह से शुरू हुई थी वो अब गोदी मीडिया में आधिकारिक होती जा रही है। मोदी के लिए माहौल बनाने और उन्हें उस माहौल में धकेल देने वाले चैनल डर के मारे पूछ नहीं पा रहे हैं कि मोदी हैं कहां। वे रैलियां क्यों कर रहे हैं, झांसी क्यों जा रहे हैं, वहां से आकर दक्षिण कोरिया क्यों जा रहे हैं, दक्षिण कोरिया से आकर गोरखपुर क्यों जा रहे हैं? युद्ध की दुकान सजी है, ललकार है मगर युद्ध न करन के लिए फटकार नहीं है!

प्रधानमंत्री को पता है कि गोदी मीडिया के पोसुआ पत्रकारों की औकात। जो एंकर उनसे दो सवाल पूछने की हिम्मत न रखता हो, उसकी ललकार पर मोर्चे पर जाने से अच्छा है वे दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल चले गए। चैनलों में हिम्मत होती तो यही पूछ लेते कि यहां हम चिल्ला चिल्ला कर गले से गोला दागे जा रहे हैं और आप हैं कि शांति पुरस्कार ले रहे हैं। आप कहीं रवीश कुमार का प्राइम टाइम तो नहीं देखने लगे।

स्क्रोल वेबसाइट पर रोहन वेंकटरामाकृष्णन की रिपोर्ट सभी को पढ़नी चाहिए। पाठक और पत्रकार दोनों को। रोहन ने इस मसले पर सरकारी सूत्रों के हवाले से अलग अलग अखबारों में छपी सफाई की ख़बरों को लेकर चार्ट बनाया है। जिससे आप देख सकते हैं कि किस किस बात के अलग-अलग वर्ज़न है। कौन-कौन सी बात सभी रिपोर्ट में एक है।

यह तय है कि प्रधानमंत्री ने पुलवामा हमले के दो घंटे बाद रुद्रपुर की रैली को फोन से संबोधित किया था और उसमें पुलवामा हमले का कोई ज़िक्र नहीं किया था। अपनी सरकार की कई योजनाओं को गिनाया। इस बात पर मीडिया में छपी सभी रिपोर्ट में सहमति है। रोहन ने दूरदर्शन की क्लिपिंग का सहारा लेते हुए बताया है कि प्रधानमंत्री ने 5 बज कर 10 मिनट पर फोन से रैली को संबोधित किया था। इतना बड़ा होने पर प्रधानमंत्री ही रैली कर सकते थे। उस भाषण में मौसम के कारण न आ पाने का दुख तो है मगर पुलवामा में मारे गए जवानों के लिए दुख नहीं है। स्क्रोल ने लिखा है कि इस एक बात के अलावा सभी मीडिया में हर बात के अलग-अलग दावे हैं।

स्थानीय अख़बारों में छपी रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस ने आरोप लगाए हैं। टेलिग्राफ अखबार से उत्तराखंड के एक अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया है और दिल्ली में कई पत्रकारों को सरकारी सूत्रों ने ब्रीफ किया है। उनकी ख़बरों का ब्यौरा है। चौथा इकोनोमिक्स टाइम्स में शुक्रवार को छपी एक खबर है। तो चार तरह के वर्ज़न हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि हमला होने के बाद मोदी 6 बज कर 45 मिनट तक डिस्कवरी चैनल और अपने प्रचार के लिए शूटिंग करते रहे। मोटर-बोट पर सैर करते रहे। उत्तराखंड के अनाम अधिकारी ने कहा है कि मोदी ने हमले से पहले बोट की सवारी की। लेकिन हमले के घंटे भर बाद वे जंगल सफारी पर गए। अपने फोन से काले हिरण की तस्वीर ली। वहां से वे खिन्नौली गेस्ट हाउस गए जहां 4 बज कर 30 मिनट तक शूटिंग होती रही। हमले का समय 3:10 बताया जाता है। अज्ञात सरकारी सूत्रों ने बताया कि रूद्रपुर रैली रद्द कर दी। वहां नहीं गए और फोन से संबोधित किया। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, गृहमंत्री, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल से बात की। कुछ नहीं खाया। एक वरिष्ठ अधिकारी हवाले से खबर छपी है कि मोदी ने रुदपुर की रैली रद्द कर दी क्योंकि वे फोन पर जानकारी लेकर समीक्षा कर रहे थे। उसके बाद रैली को फोन से संबोधित किया।

स्क्रोल ने लिखा है कि अलग-अलग वर्ज़न हैं। कौन सा बिल्कुल सही है बताना मुश्किल है। सवाल का जवाब नहीं मिलता है कि प्रधानमंत्री हमले के बाद तक डिस्कवरी चैनल की शूटिंग करते रहे या नहीं। जानकारी मिलने के बाद भी शूटिंग की या हमले से पहले शूटिंग हो चुकी थी।

मुझे अच्छी तरह याद है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि ख़राब मौसम के कारण प्रधानमंत्री तक सही समय पर सूचना नहीं पहुंची। यह बात न पचती है और न जंचती है। रैली करने लायक फोन का सिग्नल था तो उसी सिग्नल से उनतक बात पहुंच सकती है। समंदर के ऊपर उड़ रहे बीच आसामान में उनके जहाज़ पर सूचना पहुंच सकती है तो दिल्ली के पास रूद्रपुर में सूचना नहीं पहुंचेगी यह बात बच्चों जैसी लगती है।

प्रधानमंत्री का कार्यक्रम तय होता है। इसलिए उनके कार्यक्रम के इतने वर्ज़न नहीं होने चाहिए। लीपा-पोती की कोशिश हो रही है। दूसरा बीजेपी ने ही माहौल रचा है कि शोक का समय है। सबको अपना राष्ट्रवाद ज़ोर-ज़ोर से बोलकर ज़ाहिर करना होगा। तब इस संदर्भ में सवाल उठने लगेगा कि हमले की घटना के बाद तक शूटिंग कैसे हो सकती है। प्रधानमंत्री रैली कैसे कर सकते हैं। आगे के लिए आप स्क्रोल साइट पर रोहन की पूरी रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

गोदी मीडिया के लिए पीएम का शूटिंग करना कोई सवाल नहीं। अब उसने नितिन गडकरी का बयान थाम लिया है। वही पाकिस्तान को पान रोकने का बयान। उन्होंने भी रणनीति के तहत पुरानी खबर ट्वीट कर दी। 2016 के फैसले को ट्वीट किया तो यही बता देते कि कितना पानी रोका। लेकिन तथ्य से किसी को क्या मतलब। पाकिस्तान पर जल-प्रहार, पानी-पानी को तरसेगा पाकिस्तान जैसे मुखड़ों से चैनलों पर वीर-रस के गीत बजने लगे हैं। तथ्य यही है कि भारत पानी नहीं रोकेगा। अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने के लिए उसे कई डैम बनाने हैं। एक का निर्माण शुरू हुआ है। दो के बनने पर फैसला लेना है। जब बनेगा तभी पानी रोक पाएगा। तो पाकिस्तान पर जल-प्रहार नहीं हुआ है। भारत अपने हिस्से का ही पानी रोक रहा है न कि पाकिस्तान को पानी रोक रहा है।

चैनलों ने पाकिस्तान के नाम पर भारत के दर्शकों पर ही झूठ के गोले दाग रखे हैं। हमले में दर्शक घायल है। अच्छा किया प्रधानमंत्री ने विश्व शांति पुरस्कार जनता के नाम कर दिया। इस जनता में वो जनता भी है जो दिन रात पुलवामा के बाद राष्ट्रवाद की आड़ में सियासी माहौल बना रही है। शांति पुरस्कार लेकर जनता कंफ्यूज़ है। माहौल बनाने वाले कार्यकर्ताओं को रात में बुलवाया गया कि चलो, आओ और एय़रपोर्ट पर प्रधानमंत्री का स्वागत करो। वे शांति पुरस्कार जीत कर आ रहे हैं। एयरपोर्ट के रास्ते पोस्टर भी लगा दिए गए।

ये भी पढ़ें: हम महज कश्मीर चाहते हैं, कश्मीरी तो हमारे लिए आतंकवादी हैं?’

24 फरवरी को गोरखपुर में प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना का उद्घाटन करने वाले हैं। उत्तराखंड सरकार ने सभी ज़िलों में आदेश जारी किया है कि ज़िला और ब्लाक स्तर पर किसानों को सभागार में बिठाकर लाइव टेलिकास्ट दिखाना है। जनप्रतिनिधि भी शामिल होंगे। इसके लिए ज़िला स्तर पर 25,000 और ब्लाक लेवल पर 10,000 खर्च की मंज़ूरी दी गई है। आप हिसाब लगाए कि अकेले उत्तराखंड में जनता का 10-12 लाख पैसा पानी में बह जाएगा। भारत में 640 ज़िले हैं और 5500 के करीब ब्लाक हैं। सिर्फ इसी पर 7 करोड़ से अधिक की राशि खर्च हो जाएगी। हम नहीं जानते कि गोरखपुर की सभा के लिए कितना पैसा ख़र्च किया गया है। उसी गोरखपुर के ओबीसी और अनुसूचित जाति के छात्र रोज़ मेसेज करते हैं कि उन्हें छात्रवृत्ति नहीं मिल रही है। ग़रीब छात्रों को पढ़ने में दिक्कतें आ रही हैं।

न्यूज़ चैनलों की देशभक्ति से सावधान रहिए। अपनी देशभक्ति पर भरोसा कीजिए। जो चैनल देश की सरकार से सवाल नहीं पूछ सकते वे पाकिस्तान से पूछ रहे हैं। सेना के अच्छे भले अधिकारी भी इन कार्यक्रमों में जाकर प्रोपेगैंडा का शिकार हो रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि सेना अपनी रणनीति और अपने समय से कार्रवाई का फैसला लेगी। सेना अपने जवानों से कहे कि न्यूज़ चैनल न देखें। वर्ना गोली चलाने की जगह हंसी आने लगेगी। चैनलों के जोकरों को देखकर मोर्चे पर नहीं निकलना चाहिए। जय हिन्द।

(यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है)

(पीपल्स बीट हिन्दी को आप फ़ेसबुकट्विटरऔर यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

देश

भारत की सेमीफाइनल में हार पर शमी का झलका दर्द,निकली दिल की भड़ास,बोले-इस वज़ह से हारे!!!

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People’s BEAT Media – भारतीय टीम वर्ल्ड कप से बाहर हो चुकी है और अब टीम घर वापसी की तैयारी कर रही है,बोर्ड की तरफ से बयान भी आ गया है कि खिलाड़ियों के टिकट बुक किए जा रहे हैं और 14 जुलाई तक खिलाड़ी वतन वापस आ जाएँगे।भारत को सेमीफाइनल में न्यूज़ीलैंड के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा था, सेमीफाइनल में न्यूज़ीलैंड ने 239 रन बनाए थे!

लेकिन इस लक्ष्य को पाने के लिए उतरी टीम इंडिया के बल्लेबाज़ कमाल नहीं दिखा पाये,और 18 रन से यह मैच हार गए,जिसके बाद टीम इंडिया को वर्ल्ड कप से बाहर होना पड़ा।वर्ल्ड कप से बाहर होने के बाद अब टीम इंडिया लोगों के निशाने पर है,सबसे जियादा आलोचना महेंद्र सिंह धोनी की हो रही है, उसकी वजह यह है की महेंद्र सिंह धोनी सब से अहम मोड पर आउट हो गए थे और वह रन आउट हुये थे!

दो रन के लालच में जब महेंद्र सिंह धोनी दौड़ लगा रहे थे,उसी वक़्त मोटिंग गुप्टिल ने शानदार थ्रो करते हुए महेंद्र सिंह धोनी को आउट कर दिया था,इसके बाद टीम इंडिया बिखर गई थी,और हार का सामना करना पड़ा था।हार के बाद कप्तान विराट कोहली से ज़्यादा महेंद्र सिंह धोनी को जिम्मेदार बना दिया गया। उसी के साथ महनेद्र सिंह धोनी के रिटायरमेंट की भी खबर सामेन आ गई थी और कहा जाने लगा है कि अब महेंद्र सिंह धोनी को मैच की दुनिया को अलविदा कहना पड़ेगा!

वर्ल्ड कप से बाहर होने के बाद अब टीम इंडिया के तेज़ गेंदबाज और वर्ल्ड कप में अपनी गेंदबाजी से कोहराम मचाने वाले मोहम्मद शामी ने भी बयान दिया है।उन्होने कहा है कि वर्ड कप में हम सब से ज़्यादा मजबूत थे लेकिन इस तरह से देश वापस लौटेंगे,इस बात की उम्मीद नहीं थी,उन्होने कहा कि हम से कुछ गलती हुई है, नहीं तो हम ज़रूर आज फाइनल में होते!

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जुर्म

मात्र 10 साल में दिल्ली के जाफराबाद इलाके का साधारण लड़का अब्दुल नासिर कैसे बना दिल्ली अंडरवर्ल्ड का डॉन ?

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चौधरी हैदर अली
नई दिल्ली : मे पिछले 5 साल के लंबे समय से Crime Correspondent होने के नाते अपराध और अपराधियों के खिलाफ लिखता आ रहा हूं।अपने इस पत्रकारिता जीवन के चलते मेरी सैंकड़ों गैंगस्टर, माफिया, बाहुबलियों जैसे काफी बड़े-बड़े अपराधियों से विस्तार से मुलाकातें होती हैं!लेकिन जो मुझे नासिर में दिखा वह और किसी बाहुबली या गैंगस्टर में नहीं दिखा!जिस नजरिए से मैं नासिर को देखता हूं हो सकता है कोई और इंसान नासिर को उस नजरिए से ना देखता हो क्योंकि इस दुनिया में हर इंसान कि अपनी सोच है! जितना मैंने नासिर को जानने की कोशिश की वह सोच मैं आपके सामने पेश कर रहा हूं! नासिर के एक विरोधी ने हमसे कहा आप ने सुना होगा किस्मत हमेशा बहादुरो का साथ देती है नासिर भी उन बहादुरों मै से एक है! नासिर जैसा प्यार करने वाला जिंदा दिल इंसान मैंने आज तक नहीं देखा क्योंकि नासिर हर शख्स पर भरोसा कर लेता है!नासिर के एक साथी ने बताया नासिर को सिर्फ एक चीज से नफरत है और वह है धोका नासिर को धोका देने का मतलब है नासिर के गुस्से को जगाना मेरा जहां तक खयाल है नासिर जितनी जल्दी लोगों पर भरोसा करता है उतनी ही जल्दी धोकेबाजों सजा देने मैं करता है!

अब्दुल नासिर की जिंदगी पर एक नजर!
अब्दुल नासिर का जन्म 12 मार्च 1987 को मकान नं 1363, गली नं 48, ज़ाफराबाद में मरहूम जनाब सदाकत हुसैन साहब के घर हुआ उनके 4 बेटों में सबसे बड़े बेटे का नाम आदिल हयात, नादिर हयात, अब्दुल नासिर, और बदर हयात है अब्दुल नासिर अपने चारों भाईयों में तीसरे नम्बर पर है! सदाकत हुसैन साहब का शुमार ज़ाफराबाद इलाके के Upper Middle Class लोगों में होता था!अब्दुल नासिर ने ज़ाफराबाद के Gandhi Harijan Memorial School से सिर्फ 7वी जमात तक ही तालीम हासिल की क्युंकी नासिर बहुत छोटी उम्र से अपना Business करना चाहता था! स्कूल छोड़ते ही नासिर ने Jean’s बनाने की Factory लगा अपना काम पूरे दम-खम के साथ शुरू कर दिया!लेकिन कहते हैं ना किस्मत के लिखे को कोई नहीं मिटा सकता अब्दुल नासिर के साथ भी ऐसा ही हुआ नासिर जिस लगन और मेहनत से अपने कारोबार को बढ़ाने में लगा था उस मेहनत और लगन पर किस्मत गालिब आई! सन 2009 में नासिर पर भारतीय दंड संहिता की धारा – 147/148/149 /440/34 के तहत थाना सीलमपुर में मुकदमा दर्ज हुआ जिसका F.I.R No -304/09 था!

आखिर क्या थी F.I.R No – 304/09 की हकीकत?
अब्दुल नासिर के कुछ दोस्तों का छोटा-मोटा झगड़ा सीलमपुर के घोषित अपराधी आकिल मलिक उर्फ़ मामा के भाई जाहिद से हुआ था!आकिल मामा का दिल्ली पुलिस के कई विभागों में काफी अच्छा रसूख था!दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों ने मुझे बताया था की आकिल मामा मुंबई,जयपुर,बेंगलुरु,चेन्नई मैं अपने जिन गुर्गो से चोरी की वारदातों को अंजाम दिलवाता था कुछ समय बाद उन्हीं को दिल्ली पुलिस से गिरफ्तार करवा देता था!इस वजह से दिल्ली पुलिस उसकी बातों को नजर-अंदाज नहीं करती थी!यही वजह थी जो मामा अपने भाई जाहिद के साथ हुए इस छोटे-मोटे झगड़े को अपने अहम पर ले गया और जाफराबाद में अपना दबदबा कायम रखने के लिए ही आकिल मामा ने अब्दुल नासिर के घर गोलियां चला दी और दर्जन भर बेगुनाह लड़कों पर झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया उन लड़कों में अब्दुल नासिर का नाम भी शामिल था!

People’s BEAT को स्टोरी के दौरान काफी लोगों ने बताया 2009 में आकिल मामा ने नासिर पर बलवे का झूठा मुकदमा सीलमपुर थाने में जब दर्ज कराया तभी नासिर अपने घर से फरार हो गया फरारी के दौरान नासिर की मुलाकात अपने गांव के आसपास रहने वाले कुछ बदमाशों से हुई दो या तीन मुलाकातों के बाद नासिर उनके साथ रहने लगा जिन बदमाशों के साथ नासिर रह रहा था उन्होंने दिल्ली में 55 लाख की लूट को अंजाम दे रखा था जिसकी वजह से दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल लुटेरों को पकड़ने के लिए दिन रात एक कर रही थी कुछ महीनों की मशक्कत के बाद टेक्निकल सर्विलांस की मदद से स्पेशल सेल ने बदमाशों के ठिकाने का पता लगा सभी बदमाशों को गिरफ्तार कर लिया! जिस वक़्त स्पेशल सेल की टीम लुटेरों को गिरफ्तार करने उनके ठिकाने पर पहुंची उस वक़्त लुटेरों के साथ अब्दुल नासिर और एक अन्य युवक भी वहां मौजूद था स्पेशल सेल की टीम ने सभी लुटेरों के साथ नासिर और अन्य युवक को भी गिरफ्तार कर लिया! गिरफ्तारी के बाद स्पेशल सेल ने लुटेरों से पूछताछ की जिसमें लूट को अंजाम देने वाले बदमाशों ने बताया वारदात को अंजाम देने में नासिर और अन्य युवक शामिल नहीं थे और ना ही हमने इन दोनों को 55 लाख की लूट किए जाने के बारे में कुछ बताया था स्पेशल सेल ने किसी की एक न सुनी और नासिर पर लूट की प्लानिंग रचे जाने का इल्जाम लगा सलाखों के पीछे भेज दिया!

अब्दुल नासिर और छैनू पहलवान क्यों बने एक दूसरे के खून के प्यासे!
इन दोनों के बीच दुश्मनी का अंदाजा 23 दिसंबर 2015 के दिन कड़कड़डूमा कोर्ट में हुए शूटआउट से लगाया जा सकता है जिसमें दिल्ली पुलिस का एक जवान शहीद हुआ और सेशन जज संजय गुप्ता बाल बाल बचे यह शूटआउट भारत के इतिहास में दर्ज पहला इसलिए है क्योंकि इस शूटआउट को कोर्ट रूम में सुनवाई के दौरान अंजाम दिया गया था!

इस बात को लेकर विवाद था अब्दुल नासिर और छैनू पहलवान के बीच!
2010 में जब अब्दुल नासिर को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने लूट की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा उस दौरान आकिल मामा ने पहले से जेल में बंद अपने शार्प शूटर छैनू पहलवान को अब्दुल नासिर पर ब्लेड से हमला कराने के लिए पैसे दिए और हमला ठीक से कराने की हिदायत भी दी! छैनू पहलवान ने अब्दुल नासिर पर ब्लेड से हमला कराने का काम तिहार जेल में ही बंद त्रिलोकपुरी के 4 नशेड़ीयो (Drug Addict’s) को सौंपा अगले दिन अब्दुल नासिर को तिहार जेल से पेशी के लिए पुलिस वैन कड़कड़डूमा कोर्ट ला रही थी जिसमें और भी कैदी सवार थे अचानक पुलिस वैन में बैठे चार नशेड़ीयो ने सर्जरी ब्लेड से अब्दुल नासिर पर हमला कर दिया जिस से नासिर काफी जख्मी हो गया जेल प्रशासन ने ब्लेड से हमला करने वाले चारों लड़कों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की जांच में पता चला नासिर पर हमला आकिल मामा और छैनू पहलवान ने कराया था!खुद पर हुए जानलेवा हमले के बाद नासिर ने जेल से अपने बड़े भाई और अपने करीबी दोस्त आतिफ को सूचना भेजी के आकिल मामा हमारी हत्या की साजिश रच रहा है इससे पहले वह हमारी हत्या को अंजाम दे तुम आकिल मामा की हत्या कर दो यह खबर आतिफ और नादिर से पहले आकिल मामा तक पहुंच गई खबर सुनते ही आकिल मामा ने तुरंत आतिफ के ससुर हाजी मतीन से मुलाकात की जो पहले से ही अपनी बेटी और आतिफ के बीच हुई शादी से नाखुश था और आतिफ को अपने रास्ते से हटाना चाहता था ताकि अपनी बेटी की शादी अपनी मर्जी के लड़के से कर सके हाजी मतीन और आकिल मामा के बीच हुई इस मुलाकात में दोनों के बीच हत्याकांड को अंजाम देने में किसकी क्या भूमिका रहेगी जैसी सभी अन्य बातों को तय कर लिया!और 15 मई 2011 के दिन आकिल मामा ने अपने साथी वसीम बलुचा के साथ मिलकर आतिफ की हत्या कर दी!

(आगे की कहानी जल्द ही आपके बीच लाई जाएगी)

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गुजरात इंफ़ैंट्री बनाम अहीर बख़्तरबंद के बीच है मुक़ाबला यूपी में !

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गुजरात इंफ़ैंट्री रेजीमेंट। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह दोनों समाजवादी पार्टी का घोषणापत्र पढ़कर चौंक गए होंगे।

दोनों भाजपाई सोच रहे होंगे कि ये सपाई क्यों उनके राज्य के नाम पर रेजीमेंट बना रहा है? बनाना था तो गुजरात बख़्तरबंद रेजीमेंट बनाते और अहीर इंफ़ैंट्री रेजीमेंट! सैनिक स्कूल में पढ़े अखिलेश यादव का गेम प्लान है क्या। अमित शाह ने तो चचा शिवराज से पूछा होगा कि अखिलेश क्यों अहीर बख़्तरबंद रेजीमेंट और गुजरात इंफ़ैंट्री रेजीमेंट बना रहे हैं?

यूपी जब गुजरात के मोदी को पीएम बना सकता है तो उनके राज्य के नाम पर रेजीमेंट नहीं दे सकता? यूपी का दिल बड़ा भी तो है! कहीं इसके विरोध में गुजरात में आंदोलन न हो जाए कि आप हमारे राज्य के नाम पर रेजीमेंट क्यों बना रहे हैं? क्यों सेना में भेजना चाहते हैं? सब लड़ाई में चले जाएँगे तो कारोबार कौन करेगा! मोदी जी की सेना ठीक नहीं है तो गुजरात के नाम पर सेना बनाने की बात कैसे ठीक है!

मज़ाक़ छोड़िए। पिछले दिनों कई नेताओं ने कहा कि गुजरात के लोग शहीद नहीं होते। यह बात सही नहीं है। 2017 में scoop whoop ने इस पर अलग अलग जगहों पर छपी रिपोर्ट को संकलित किया है। ऋतु सिंह ने बताया था कि 31 मार्च 2017 तक गुजरात में 26,656 पूर्व सैनिक थे। गुजरात के 39 सैनिकों को बहादुरी का पुरस्कार मिला है। आतंकवाद से लड़ते हुए 20 जवानों ने बलिदान दिया है। 24 जवानों ने सीमा पर शहादत दी है। कब से कब तक का ज़िक्र नहीं है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और उत्तराखंड से सेना में ख़ूब लोग जाते हैं। कुछ राज्य से नहीं जाते। राज्यों के बीच शहीदों की संख्या को लेकर तुलना नहीं की जा सकती। वैसे यूपी से शहीदों की संख्या का पता नहीं चल पाया।

रेडिफ पर आकार पटेल की रिपोर्ट है कि नेपाल आकार गुजरात से आधा है वो सेना में गुजरात से ज़्यादा सैनिक भेजता है। गुजरात में 2009 में विशेष अभियान के बाद 719 सैनिक भर्ती हुए थे। उसके पहले 230 सैनिक भर्ती हुए थे। सेना को ही सभी राज्यों की सूची निकाल देनी चाहिए। शहीदों की भी। इससे एक लाभ यह होगा कि कोई मदद करना चाहे तो वह सीधे परिवार से संपर्क कर सकता है।

कई जगहों पर ख़ास नौकरी में जाने का ट्रेंड बन जाता है। सेना का भी बन जाता है। एक वक़्त में गुजरात के लोगों ने लंबी समुद्री यात्राएँ कर दुनिया भर में कारोबार किया। वो कम साहसिक नहीं रहा होगा। मैं तो लहरों की ऊँचाई देख कर लकड़ी की नाव से उतर ही जाता! अनजान जगहों पर जाकर कारोबार करना साहसिक और दुस्साहसिक होता है। 2014 में दो गुजरातियों का यूपी के धुरंधरों को ज़ीरो पर पहुँचा देना भी कम साहसिक नहीं था!

जिस तरह से सेना का राजनीतिकरण हो रहा है। करने वाला किसी लोक लिहाज़ की परवाह नहीं करता है। उसके जवाब में तो ये सब होगा। कोई पूछेगा कि गुजरात अर्ध सैनिक बलों के शहीदों के परिवारों को चार लाख क्यों देता है और यूपी पचीस लाख क्यों? सभी राज्यों में एक नीति होनी चाहिए। एक नीति यह भी हो कि सेना को लेकर राजनीति न हो।

वैसे अखिलेश यादव को पता होना चाहिए कि मोदी और शाह अपने आप में गुजरात इंफ़ैंट्री रेजीमेंट हैं, यूपी वालों को जवाब में बख़्तरबंद रेजीमेंट बनाना पड़ गया है! फ़ायर ! ढ ढ ढ ढ ढ ।

सपा के घोषणापत्र में अमीरों पर टैक्स बढ़ाने की बात है। ढाई करोड़ से अधिक की संपत्ति पर दो परसेंट अलग से टैक्स की बात है। मिडिल क्लास राष्ट्रवादियों और अर्थशास्त्रियों का क्या कहना है इस पर !

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