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राजनीति

कन्हैया,बेगूसराय और लोकसभा चुनाव-2019. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और विपक्षी पार्टियों की भूमिका।

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आज होली है।घर में  हूँ ।टीवी चैनलों को बदल -बदल कर कुछ ढूँढ रहा हूँ, लेकिन वह मिल नही रहा है।मन बैचेन है।जब से यह बात साफ हुई है कि बिहार में महागठबंधन ने सभी सीटें आपस में  ही बाँट ली हैं। बेगूसराय की लोकसभा सीट जिस पर काॅ कन्हैया कुमार भाकपा के उम्मीदवार  हैं, उस पर भी महागठबंधन का मुख्य घटक राष्ट्रीय जनता दल अपना उम्मीदवार उतारने का फैसला कर चुकी है।
इस खबर ने और ज्यादा बैचेन कर दिया है।राजनीति के दाॅव-पेंच और नीचता की प्रकाष्ठा देख -सुनकर हतप्रभ हूँ।बिहार भाकपा का नेतृत्व हैरान है।मैं निराश बिल्कुल नही हूॅ।अपने छात्र जीवन से ही मेरी एक समझ पक्की रही है कि कम्युनिस्ट पार्टियों को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति से बराबर रूप से लड़ना  और टकराना होगा।अपना संघर्ष वर्गीय आधार पर खडा करना होगा,अपनी राजनीति मजबूत करनी होगी।अवसरवादी और तात्कालिक राजनीति से बचकर दूरगामी और देश व आम जनता के मूल सवालों को लेकर दूरगामी राजनीति का पुनः आगाज करना होगा।
इस संसदीय राजनीति की तमाम खूबियों और खामियों को ध्यान में  रखकर व्यापक गोलबंदी के आधार पर सत्ता के शिखर तक पहुँचने का भरोसा पैदा करना होगा। नकारात्मक और विरोध के नाम पर अंधविरोध की राजनीति से बचना होगा। अपना और जनता के एजेंडे को रेखांकित कर अपनी साख और विश्वसनीयता कायम करने की दिशा में फूॅक-फूॅक कर कदम उठाना होगा। किसी जातिवादी और अवसरवादी दलों के भरोसे संसदीय राजनीति की नैया पार कर जाने की मानसिकता से निजात पाना होगा।बयानवीर नेताओं और कार्यकर्ताओं से पार्टी को बचाना होगा।
बिहार की कम्युनिस्ट पार्टी का एक गौरवशाली इतिहास रहा है।बेगूसराय की पार्टी की भूमिका अति महत्वपूर्ण रही है।बेगूसराय की पार्टी बिहार भाकपा को सांगठनिक और राजनीतिक ताकत हमेशा से देती रही है।आज भी दे रही है।काॅ कन्हैया कुमार की बेगूसराय से उम्मीदवारी भाकपा का शतप्रतिशत सटीक फैसला है।
जंग छिड चुका है,बिहार में  ही नही बल्कि देश भर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा संचालित भाजापा की सरकार के विरूद्ध सबसे बड़ा आईकोन काॅ कन्हैया है। सांप्रदायिक राजनीति के विरूद्ध  उसकी प्रतिबद्धता और उसका तार्किक वक्तव्य और संवादपूर्ण भाषण की कला ने देश भर के धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को कन्हैया की ओर आकर्षित किया है।
जो लोग जेएनयू की घटना को नजदीक से जानते हैं, उनकी पक्की समझ है कि निर्दोष कन्हैया को मोदी सरकार अपने जाल में फॅसाने की लगातार घृणित राजनीति करती रही है। मिडिया ट्राइल के आधार पर उसे दोषी करार देने की भरपूर कोशिश आज भी  जारी है।मोदी सरकार की पुलिस,जाॅच एजेंसी सब चाहकर भी कन्हैया को दोषी  साबित करने में फेल हो चुके हैं ।
मोदी विरोधी सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय  पार्टियाँ और उनके शीर्ष नेतागण काॅ कन्हैया के भारी प्रशंसक और समर्थक रहे हैं ।कन्हैया का मोदी विरोधी अभियान के सभी मुरीद रहे हैं ।आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद भी कन्हैया के बड़े प्रशंसकों में  एक रहे हैं।
भाकपा में शामिल होने और लगातार देशभर में  रोज-रोज लोकप्रियता की उचाईयों छू रहे कन्हैया से अब लालूजी को बड़ा खतरा महसूस होने लगा है।जो लालू यह कहते नही थकते थे कि कन्हैया और तेजस्वी साथ साथ लोकसभा चुनाव में, बिहार चुनाव में अभियान चलायेगें।अब उनको और उनके पूरे कुनबे को कन्हैया से डर लगता है।
 तेजस्वी के भविष्य के लिए कन्हैया को खतरा मानकर लालूजी और दिल्ली  से लेकर पटना तक  सक्रिय उनके कुनबे कन्हैया विरोध पर उतर चुका है। वैसे राजद के अंदर भी कन्हैया को लेकर पक्ष-विपक्ष है ।  शायद उन्हें भ्रम है कि कन्हैया एक उम्मीदवार मात्र है। उनके समर्थन के बिना वह नही जीत सकता। यह लोकसभा चुनाव बिहार की राजनीति के कई मिथक को इसबार तोडेगा और भाकपा जैसे पार्टी को जातिवादी पार्टी के भरोसे अपनी राजनीति चमकाने की आसान प्रवृत्ति से छुटकारा भी दिलायगा।
अभी शायद यह आॅकने में आरजेडी और लालूजी का पूरा महकमा फेल है कि कन्हैया का बेगूसराय लोकसभा सीट पर समर्थन नही करना उनके लिए भी कितना महंगा साबित होने वाला है। पूरे देश में गरीब,दलितों, पिछडों और अल्पसंख्यकों का आईकोन कन्हैया लालू जी के पुत्र मोह में आज भूमिहार और सामंतवादी ताकतों का प्रतिनिधि लगने लगा है।देश की आवाज और देश का धर्मनिरपेक्ष मानस  कन्हैया से बेपनाह मोहब्बत करता है। वेशर्त समर्थन करता है।
राष्ट्रीय जनता दल की निर्लज्ज और स्वार्थ की राजनीति की पराकाष्ठा से बिहार भाकपा और उसके कुछ चुनावी नेताओं को भी सोचने और सॅभलने का मौका  देगा जो केवल और केवल चुनावी नजरिये से अपने स्वार्थ में पार्टी को हाँकते और चलाने की कोशिश में लगातार लगे रहते हैं और पूरी पार्टी को दिगभ्रमित करने के एकमात्र एजेंडे पर काम करते हैं।
भाकपा आज भी यह नही भूल पायी है कि यह वही लालू प्रसाद जी हैं जिन्होंने नब्बे के दशक में भाकपा के आठ विधायकों को तोड़कर राजद में  मिला लिया था।लालूजी भी नही भूल पाते होंगे कि चारा घोटाले में गिरफ्तारी वारंट के बाद भाकपा ने अपना समर्थन वापस लेकर गिरफ्तारी की माॅग की थी।फिर भी राजनीति ऐसी करवट ले रही थी कि राजद और भाकपा परस्पर भरोसा करने लगे थे।मोदी का डर और विरोध की राजनीति इसका मूल आधार बना। लेकिन लालूजी ने भाकपा को धोखा दिया है।पीठ में  छूरा भोंकने का काम किया है।
अब कन्हैया का बेगूसराय में चुनाव एक असाधारण लोकसभा का चुनाव होगा।अपनी इच्छा और खुशी से बेगूसराय सीट से एनडीए का कोई दिग्गज भी चुनाव मैदान  में  नही आना चाहता है। कारण स्पष्ट है कन्हैया की लोकप्रियता, उसकी सहजता और समाज के हर तबके से उसका लगाव और संवाद की कला।नौजवानों और युवाओं की कन्हैया के प्रति दिवानगी।आमजनगण के उसके प्रति आकर्षण। केवल अंधभक्तों को छोड़कर विपक्ष के नेता से लेकर कार्यकर्ता तक कन्हैया के प्रशंसक हैं।
शायद लालू जी पुत्रमोह में धृतराष्ट्र बन चुके हैं और कन्हैया क्यों  (?) इसकी आहट उन्हें सुनाई नही देती है।कन्हैया विरोध इस चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल को मॅहगा पड़ने वाला है।आरजेडी को छोड़कर महागठबंधन के अन्य घटकदल कन्हैया को ही चाहते हैं।शरद यादव,राहुल गाँधी से लेकर चुनाव से पहले तक लालू -नीतीश भी कनहैया को धर्मनिरपेक्षता और युवाओं  का आईकोन मानते रहे हैं ।आज सबों  का पानी उतर चुका है। लेकिन लालूजी की जिद्द और ख्वाब पालने वाले तेजस्वी यादव की अदूरदर्शिता महागठबंधन में कन्हैया के लिए गाँठ बनी हुई  है।
बिहार भाकपा और उसकी बेगूसराय इकाई के लिए कन्हैया को लोकसभा पहुँचाना एक चुनौती भी है और अवसर भी।उस चुनौती को भाकपा का राष्ट्रीय और राज्य नेतृत्व भी बखूबी समझता है और अनेको चुनाव को अंजाम दे चुकी ,मॅजी और सधी हुई बेगूसराय पार्टी का प्रौढ  और अनुभवी नेतृत्व तथा कार्यकर्ताओं को राजनीतिक चुनौती स्वीकार करना होगा।बेगूसराय के  लोकसभा चुनाव पर  देशभर की नजर है।क्योंकि  कन्हैया उम्मीदवार  है।
भविष्य की धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील राजनीति के लिए आज कन्हैया क्यों जरूरी  है,इसे भाकपा को खुदभी समझना पड़ेगा और जनता को भी समझाना पडेगा।
कन्हैया भले ही भाकपा का उम्मीदवार है ,परन्तु अन्य दलों को भी समझना पड़ेगा कि वह मात्र भाकपा का उम्मीदवार नही है।उसने जेएनयू छात्रसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद फाॅसीवादी ताकतों  के विरूद्ध संघर्ष एक इतिहास लिखा है।देश में मुसलमानों के खिलाफ फैलाये जा रहे नफरत की राजनीति और सामाजिक सौहार्द को खत्म करने और सत्ता की नफरत फैलाने की  राजनीति के विरूद्ध  संघर्ष का प्रतीक बन चुका है।सभी तरह के अन्याय,भेदभाव  और जुर्म के खिलाफ देश का आइकोन बन चुका है।
मोदी के सत्तासीन होने के बाद जब विपक्ष की आवाज दबाई जा रही थी और चतुर्दिक अन्याय और जुल्म का आलम था,देशव्यापी डर का वातावरण था,उस दौड़ में कन्हैया ने बिना डरे  न्याय की आवाज बुलंद किया।विश्वविद्यालय परिसर से कोर्ट तक और वहाँ  से जेल तक अपनी न्याय की आवाज को मजबूत किया।सभी तरह के शोषण और जुल्म से मुक्ति और धर्मनिरपेक्षता  की आवाज को राष्ट्रीय पटल पर बुलंद किया।
कन्हैया अब एक व्यक्ति का नाम नही ,एक आंन्दोलन का नाम हो चुका है।वह सभी प्रगतिशील और उदार विचारों  का राजनीतिक प्रतीक बन चुका है। मोदीराज के अंधकारमय और क्रूरतम दौर में आम जनता और खासकर युवाओं के बीच राजनीतिक जागरूकता का पर्याय बन चुका है।देश के युवाओं, वुद्धिजीवियों,लेखकों, स्वतंत्र पत्रकारों, विचारकों और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की एक बहुत बड़ी जमात पूरे देश में कन्हैया से इत्तिफाक रखता है।
जो लोग नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के रास्ते पर देश को ले चलना चाहते हैं, वे कन्हैया को अपना मानते हैं।समय आ गया है कि जो भारतीय संविधान के मूलमंत्र ” एकता में  अनेकता ” के समर्थक हैं और देश की संवैधानिक संस्थानों के प्रजातांत्रिक स्वरूप के पक्ष में  खड़े हैं और सामासिक संस्कृति को मजबूत करना चाहते हैं, वे कन्हैया से बेपनाह मोहब्बत  करते हैं ।लालूजी सहित उन तमाम लोगों को वेबजह कन्हैया से और भविष्य में  उसकी राजनीति से भयभीत होने की जरूरत नही है।बल्कि धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता का खाल ओढकर निजी स्वार्थ और जातिवाद की राजनीति को हवा देने वाले फर्जी लोगों  को कन्हैया से घबराना स्वाभाविक है।यह देश की विपक्षी राजनीति का दुर्भाग्य ही है कि आज वही पक्ष कन्हैया को देश की आवाज नही बनने देना चाहता।
वैसे तमाम लोग जो गरीबी, बेरोजगारी, माॅबलिनचिंग,घृणा, आरएसएस, बलात्कार से मुक्ति चाहते हैं, कन्हैया उनकी आवाज बन चुका है।जिन्हें इस देश में चुनाव के समय फुलवामा जैसी साजिश से मुक्ति चाहिए,सर्जिकल स्ट्राइक और देश की सेना के राजनीतिकरण से मुक्ति चाहिए, जिन्हें काॅरपोरेट शोषण और मोदी मिडिया और बिकाऊ प्रेस से आजादी चाहिये, जिन्हें न्यायालय, सीबीआई, ईडी, चुनाव आयोग,रिजर्व बैंक, यूजीसी से लेकर विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता चाहिए ,जिन्हें दलितों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों को बराबर का अधिकार चाहिए  और देश में नागपुर के संविधान से आजादी चाहिए,उन्हे कन्हैया के पक्ष मे  खड़ा होना ही पडेगा।बेगूसराय में  कन्हैया का चुनाव झूठ फरेब और जातिवाद की राजनीति करने वालों  से इस बार पर्दा उठायेगा।
कन्हैया को जातिवाद के चश्मे से नही देखा जा सकता है।उसे न भूमिहार,न ओबीसी और न ही दलित माना जा सकता है।जिन मूल्यों के लिए वह लगातार संघर्ष करता रहा है और कर रहा है,उस नजरिये से कन्हैया और उसकी उम्मीदवारी को देखने की जरूरत है।राष्ट्रीय जनता दल जो खुद को धर्मनिरपेक्षता का चैम्पियन मानता है,और भाजपा को हराने के लिए प्रतिबद्ध है,उसे अपने गिरेवान में  सौ बार झाॅकना चाहिए और अपने क्षुद्र स्वार्थ की राजनीति से ऊपर उठकर पुनर्विचार करना चाहिए ।बिहार और देश की प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष ताकतें सब कुछ देख रही हैं ।वे मानती है कि कन्हैया का विरोध कही न कही धर्मनिरपेक्षता की राजनीति को धोखा है,अप्रत्यक्ष भाजपा और आरएसएस की राजनीति को बल देना है।दीवार पर लिखी ईबारत को जो आज झुठला रहे हैं, कल वे सबसे ज्यादा पछतायेगें।तब उन्हे कन्हैया बहुत याद आएगा और रूलायेगा भी।इंतजार कीजिए।बेगूसराय की जागरूक,प्रगतिशील और स्वाभिमानी  जनता और मतदाता इस बार इतिहास रचेंगे कन्हैया को लोकसभा भेजकर और अहंकारी धृतराष्ट्र को शिकस्त देकर।
प्रो.अरूण कुमार,
महासचिव, एआइफुक्टो

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केजरीवाल का कथित पूर्वांचल विरोधी बयान के खिलाफ पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष का कड़ा विरोध

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आप सभी को ज्ञातव्य होगा कि दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में निवास करने वाले पूर्वांचल वासियों के खिलाफ लगातार अनर्गल बयान एवं उनकी कार्य निष्ठा पर सवाल उठाए थे, nrc दिल्ली में लागू, होने पर दिल्ली से पूर्वांचल को बाहर भगाने का एवं भ्रम वश विनाशकारी एवं विभाजनकारी सोच को उजागर कर रहा है।

इसी के निमित्त आज दिल्ली विश्वविद्यालय में शक्ति सिंह  ( पूर्व अध्यक्ष छात्र संघ ) के नेतृत्व में विश्वविद्यालय में पढ रहे अप्रवासी विद्यार्थियों ने आज केजरीवाल के खिलाफ नारेबाजी कर पुतला फूंका। सभी ने एक स्वर में केजरीवाल के इस कृत्य की भर्त्सना की, शक्ति सिंह ने अपने भाषण में पूर्वांचल की धरती को नमन करते हुए दिल्ली सीएम की पूर्वांचलियों के प्रति घृणित सोच को दर्शाता है उनके इस तरह के बयान और साथ ही साथ दिल्ली का युवा अपनी वोट की ताकत से इस फर्जीवाल के खिलाफ चोट पहुंचाएगा, इस विरोध प्रदर्शन में विभिन्न कॉलेज से विद्यार्थियों का आना हुआ !!!

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राजनीति

भूमिहार पहचान में ही कैद क्यों रखना चाहते हैं कन्हैया को?

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कन्हैया के ख़िलाफ़ घृणा अभियान शुरू हो गया है। यह ख़ुद को वामपंथी कहनेवाले और दलित या पिछड़े सामाजिक समुदायों की ओर से क्यों है? इससे एक सवाल उठता है कि क्या एक ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति दलितों के संघर्ष में शामिल ही नहीं हो सकता? जो कन्हैया की भूमिहार पहचान में ही उन्हें कैद रखना चाहते हैं क्या वे दलितों के संघर्ष को व्यापक कर रहे हैं या कमज़ोर?
कन्हैया चुनाव लड़ेंगे, यह घोषणा होते ही कन्हैया के ख़िलाफ़ घृणा अभियान शुरू हो गया है। इस बार यह राष्ट्रवादियों की ओर से नहीं, ख़ुद को वामपंथी कहनेवाले और दलित या पिछड़े सामाजिक समुदायों के प्रवक्ता कहे जानेवालों की ओर से चलाया जा  रहा है। प्रायः ऐसा सोशल मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है। कन्हैया पर कई प्रकार के आरोप हैं। सबसे पहला यह कि वह भूमिहार हैं, ‘ऊँची’ जाति के हैं और इसलिए  सामजिक न्याय, आदि के बारे में बात करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं। या अगर वे ऐसा कर रहे हैं तो वे नाटक कर रहे हैं। जिस जगह वे हैं, वह दरअसल किसी दलित या पिछड़े को मिलनी चाहिए थी और वे उनका हक़ मारकर वहाँ बैठ गए हैं, या खड़े हो गए हैं!
आज के दौर में यह सबसे मारक आरोप है और कन्हैया या उनके समर्थकों के पास इसका कोई जवाब नहीं। आख़िर वह एक ऐसे माता-पिता की संतान हैं जिन्हें भूमिहार माना जाता है। क्या कन्हैया यह तय कर सकते थे कि वह भूमिहार पैदा न हों? या, क्या कन्हैया के पास कोई ऐसा उपाय है कि वह अपनी जाति का त्याग कर सकें? क्या ऐसा चाह कर भी किया जा सकता है? हम सब जानते हैं कि हमारे निजी तौर पर ऐसा चाहने के बावजूद यह संभव नहीं क्योंकि जाति एक परस्परात्मकता में पैदा होती है और वह एक सामाजिक परिघटना है। मेरे बिना चाहे, मेरी तथाकथित जाति का पता करके मुझसे अयाचित और अकारण रिश्ता महसूस करनेवालों की कमी नहीं। ऐसे लोगों को सुनकर उलझन या अस्वस्ति का अनुभव होता है। ‘अरे! हम भी तो वही हैं!’ सुनकर आपके कान भले लाल हो जाएँ,  कहने वाले के मुदित मुख को आप किस निष्ठुरता से धूमिल करें! सुनकर प्रायः चुप रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। इसका अर्थ यह है कि आपकी जाति आपके बिना चाहे भी आपको लाभ दिला सकती है या हानि पहुँचा सकती है। आप उन दलितों के अनुभव सुनें, जिन्हें दलित ‘न लगने’ पर भी उनके कुलनाम का पता चलते ही मकान बड़ी शालीनता या कई बार निर्विकार सादगी से किराए पर दिए जाने से मना कर दिया जाता है। मेरे एक छात्र ने मुझे लिखा कि वह अपने उस कुलनाम के सहारे ही मकान ले पाया जिससे उसके दलित होने का पता नहीं चलता था क्योंकि वह कुछ उच्च जातियों के द्वारा भी इस्तेमाल होता है!
‘जनेऊ तोड़ो, जाति छोड़ो’ कभी लगाया जाने वाला नारा था, आज वह धोखा बताया जाएगा। इसमें कोई शक नहीं कि इसके लिए ‘उच्च जाति’ के लोग ही प्रायः जवाबदेह हैं, क्योंकि चतुराई से जाति के ऊपरी चिह्नों को त्यागकर उन्होंने जातिगत भेदभाव जारी रखा। जाति भारत में एकमात्र ऐसी संस्था है जो धर्मनिरपेक्ष है। यह हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों में समान रूप से व्याप्त है।
दलित संघर्ष में ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति
फिर क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि ‘उच्च जाति’ में पैदा होने वाले कभी उसकी सीमा का अतिक्रमण नहीं कर सकते? एक ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति दलितों के संघर्ष में शामिल ही नहीं हो सकता? जो कन्हैया की भूमिहार पहचान में ही उन्हें कैद रखना चाहते हैं और इसे उनकी नाक़ाबिलियत बताते हैं कि इसके चलते वे दलितों के हक़ की बात नहीं कर सकते, वे दलितों के संघर्ष को व्यापक कर रहे हैं या कमज़ोर, यह वे भी जानते हैं।
जातिगत भेदभाव तभी ख़त्म हो सकता है जब इसे सिर्फ़ दलित नहीं सभी इसे कबूल करें! या, फिर जाति की अर्हता ही अगर सर्वोपरि होगी तो ख़ुद पिछड़ी और दलित जातियों के बीच के तनाव और परस्पर विरोध का समाधान कैसे किया जाएगा?
क्या एक ‘जाटव’ एक ‘वाल्मीकि’ की लड़ाई लड़ सकता है?  इस तर्क को इस दिशा में आगे बढ़ाने पर यह निष्कर्ष निकलेगा कि जातिगत भेदभाव से कभी मुक्ति नहीं है क्योंकि एक ‘जाति’ के व्यक्ति को दूसरी ‘जाति’ के व्यक्ति से समवेदना का अधिकार ही नहीं है।
पूरी दुनिया का इतिहास इसे झुठलाता है। अश्वेतों के संघर्ष में श्वेतों ने कुर्बानी दी, औरतों के हक़ के लिए पुरुषों ने संघर्ष किया, भारत की आज़ादी के आंदोलन में अँगरेज़ और कई यूरोपीय सीधे और अनेक परोक्ष रूप से शामिल हुए, फ़िलीस्तीनियों के अधिकार के संघर्ष में अनेक यहूदी और इस्राइली शामिल हैं, भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की राजनीति का प्रतिरोध अनेक हिंदू कर रहे हैं, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ वहाँ के मुसलमान लड़ रहे हैं! क्या हम सलमान तासीर की क़ुर्बानी को भूल जाएँ?
क्या कन्हैया मीडिया की पैदाइश?
कन्हैया पर दूसरा इल्ज़ाम वामपंथियों के एक हिस्से की तरफ़ से लगाया जा रहा है। यह कि वह मीडिया की पैदाइश हैं, उन्होंने अभी जनता के बीच काम नहीं किया है, कि वह असली वामपंथी नहीं हैं। उन्हें जबरन शोहरत दी गई है। एक मित्र ने एक वामपंथी दल के नेता का नाम लेकर लिखा कि आख़िर उन बेचारे ने गाँव-गाँव घूम कर वामपंथ की अलख जगाई, उनका नाम तो कोई कभी लेता नहीं, अभी जनमकर खड़े हुए कन्हैया को लोग कँधे पर घुमा रहे हैं!
यह आरोप लगानेवाले एक भूल कर रहे हैं। वह यह नहीं देख रहे कि कन्हैया एक दूसरे संकट के कारण ही पैदा हुआ। वह जनतंत्र का संकट है। जनतंत्र में उदार मूल्य, यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की आज़ादी बनी रहेगी या वह मात्र बहुमत निर्माण की तिकड़म के आधार पर चलता रहेगा? फिर भारत का जनतंत्र तुर्की या रूस के जनतंत्र से या स्तालिनकालीन सोवियत जनतंत्र से कैसे अलग होगा?
कन्हैया और उनके साथियों, उमर ख़ालिद, शेहला राशिद, अनिर्बान पर उनके वामपंथी विचार के कारण नहीं, बल्कि बुनियादी या आरंभिक जनतांत्रिक सिद्धांतों पर अमल के चलते हमला हुआ। यही वजह रोहित वेमुला पर हुए हमले की थी। वह दलित होने के कारण नहीं, अपना विस्तार दलित पहचान से आगे करने के कारण ही ख़तरनाक माना गया।
कन्हैया की भाषा
कन्हैया ने अपनी गिरफ़्तारी और अपने ऊपर जानलेवा हमला नहीं चुना था। हाँ! उसका उत्तर कैसे दिया जाए,  कन्हैया ने ज़रूर उस रास्ते के बारे में सोचा और एक ऐसी भाषा चुनी जिसने सूखे से तकड़ती ज़मीन पर बारिश की बूंदों जैसा असर किया। यह भाषा कोई वामपंथी नेता बोल नहीं पाया था। इस भाषा में हर किसी ने, वह मुसलमान हो या हिन्दू, दलित हो या पिछड़ा अपनी आवाज़ सुनी। यह रोज़मर्रा की ज़ुबान थी, वामपंथ के इतिहास के बोध से संवलित लेकिन उससे दबी हुई नहीं। यह राष्ट्रवादी संकुचन के आगे व्यक्ति के विस्तार की संभावना की घोषणा थी।
कन्हैया या उमर ख़ालिद जैसे युवा वामपंथ में जनतांत्रिक ताज़गी ला सकते हैं। यह वाम विरोधियों के लिए तो चिंता का विषय होना चाहिए लेकिन वामपंथी ही इस कारण कन्हैया पर टूट पड़ें?
यह भाषा साज़िशन नहीं हासिल की जाती। न यह प्रशिक्षण से मिलती है। यह कन्हैया की प्रतिभा की देन है। लेकिन क्या इस वजह से कन्हैया से ईर्ष्या की जानी चाहिए?
इस चुनाव में कन्हैया की जीत या हार से उस संभावना की यात्रा पूरी नहीं हो जाएगी जो 2016 में शुरू हुई। उसकी ओर अभी भी उम्मीद से देखा जाना चाहिए। मैं कहाँ से आया, यह जानने में आपकी दिलचस्पी हो, उससे ज़्यादा उत्सुकता यह देखने में होनी चाहिए कि मैं जा किधर रहा हूँ! इससे आपकी जगह का भी पता चलेगा।
लेख –  प्रो.अपूर्वानंद
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राजनीति

हमारी लड़ाई सीधे तौर पर गिरिराज सिंह से है ,तनवीर हसन से नहीं है: कन्हैया कुमार

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पटना: आरोप प्रत्यारोप और अटकलों के बीच आज कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने पटना में प्रेस कांफ्रेंस कर के साफ़ कर दिया की बहुचर्चित युवा नेता कन्हैया कुमार ही बेगुसराय से यूनाइटेड लेफ्ट के प्रत्याशी होंगे, यहाँ से साफ़ हो जाता है की बिहार का बेगुसराय सीट लोकसभा चुनाव के लिए बहुत ख़ास होने वाला है. बता दें की भाजपा ने वहां से अपने फायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह  को बेगुसराय का टिकट दिया है.

कन्हैया कुमार ने कहा की जहाँ हमारी पार्टी चुनाव नहीं लड़ेगी वह हम महागठबंधन का साथ देंगे. उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में ये भी कहा की देश बचाने  के लिए हम हमेशा विपक्ष के साथ संसद से लेकर सड़क तक रहेंगे लेकिन इसका ये मतलब नहीं है की हम किसी के इगो की पूर्ती करने के लिए भाजपा विरोधी मतों को बटने देंगे.

कन्हैया कुमार ने अपने प्रतिद्वंदी गिरिराज सिंह पर हल्ला बोलते हुए कहा की हमें तो पता ही नहीं चला की वो देश में किसी मंत्री पद पर भी थे, मुझे तो लगा वो पाकिस्तान के वीजा मंत्री हैं. उन्होंने आगे कहा की गिरिराज सिंह खुद बेगुसराय नहीं आना चाहते है इसीलिए उनके नखरे दिल्ली में चल रहे है ऐसे नेता को बेगुसराय की जनता क्या अपनाएगी जो खुद बेगुसराय को नहीं अपनाना चाह रहे हों.

भाजपा पर हमला करते हुए श्री कन्हैया ने कहा की हमारा मुकाबला किसी पार्टी या किसी नेता से नहीं है हम लोकतंत्र को बचाने  के लिए, देश के संविधान को बचाने के लिए साथ आयें, क्योँ की भाजपा के नेता खुद बोल चुके हैं की अगर इस बार नरेन्द्र मोदी जीत कर आये तो चुनाव ही नहीं होगा.

पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कन्हैया ने कहा की हमारी लड़ाई तेजस्वी से नहीं, हम सामाजिक न्याय के लिए कई बार मंच साझा कर चुके हैं, और आगे भी जब भी जरूरत होगी साथ आएंगे और मिल कर लड़ेंगे. उन्होंने ये भी कहा की महागठबंधन के साथ उनका गठबंधन हो या न हो बेगुसराय की जनता के साथ उनका गठबंधन हो चूका है.

तनवीर हसन पर सवाल पूछे जाने पर कन्हैया कुमार ने कहा की उनका मुकाबला तनवीर हसन से है ही नहीं उनका मुकाबला भाजपा के नफरत और हिन्दू मुस्लिम वाले बयां देने के लिए प्रख्यात गिरिराज सिंह से है.

ये भी पढ़ें: कन्हैया,बेगूसराय और लोकसभा चुनाव-2019. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और विपक्षी पार्टियों की भूमिका।

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