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समाज

अगर भारत सीरिया बना तो क्या आप सुरक्षित रहेंगे माननीय रविशंकर जी ?

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देश के जाने माने आध्यात्मिक गुरु, और आर्ट ऑफ़ लिविंग के जनक श्री श्री रविशंकर के हालिया बयान ने देश भर में हलचल पैदा कर दी है, जहाँ एक तरफ दक्षिणपंथ को मानने वाले और देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने वाले लोग बरबस ही इनके समर्थन में आ गए वही देश का दूसरा तबका उनके इस बयान को दुभाग्यपूर्ण बता रहा है|

रविशंकर ने हाल ही में एक टेलीविजन साक्षात्कार में कहा की अगर राम मंदिर का फैसला अदालत द्वारा हुआ तो भारत दुनिया का दूसरा सरिया बन जाएगा|

रविशंकर के इस बयान को समाज के लोग अपने अपने तरीके से देख रहे है, इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर हलचल बढ़ गयी, जहाँ एक तरफ लोग इनका साथ दे रहे है वही दूसरी तरफ लोगों का कहना है की किसी आध्यात्मिक गुरु द्वारा ऐसी बयानबाजी अशोभनीय है, उनकी संस्था आर्ट ऑफ़ लिविंग जीने की कला सिखाते सिखाते मंदिर बनाने की कला कैसे सिखाने लगी|

अयोध्या विवाद नहीं सुलझा तो सीरिया बन जाएगा भारत.

Anjana Om Kashyap के साथ #Exclusive बातचीत में आध्यात्मिक गुरु Sri Sri Ravi Shankar बोले – अयोध्या विवाद नहीं सुलझा तो सीरिया बन जाएगा भारत.#ATVideo अन्य वीडियो: http://bit.ly/at_videos

Posted by Aaj Tak on Sunday, 4 March 2018

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देखा जाये तो किसी आध्यात्मिक गुरु का काम जाती और धर्म से ऊपर उठ कर मानवतावादी सिद्धांत पर काम करता है पर हमारे देश में ऐसा कम ही देखने को मिलता है अगर गुरु हिंदी है तो वो कट्टर हिन्दुवों के साथ नजर आते है और गुरु मुश्लिम या अन्य कौम के है तो अपने कौम के कट्टरवादी सोच के लोगों के साथ ही खड़े नजर आते है जो अति दुभाग्यपूर्ण है|

रविशंकर जी के साक्षात्कार को देख कर ऐसा नहीं कहा जा सकता है की वो देश का अहित चाह रहे है लेकिन एक प्रतिष्ठित पद पर बैठा इंसान अगर देश के संविधान में भरोसा न दिखा कर देश के हितों का फैसला जनता के भावनाओं को देख कर करने जैसी बात करते है तो ये स्पष्ट होता नजर अत है की इन्हें संविधान से ज्यादा उन लोगों की चिंता है जो इस देश में बहुतायत है, ऐसे में देश में रह रहे उन लोगों का के हितों का फैसला कैसे और किस आधार पर होगा जो यहाँ अल्पसंख्यक है माननीय रविशंकर जी ये बताना भूल गए|

रविशंकर जी को ये भी याद रखना चाहिए की उनके लाखो नहीं करोड़ों अनुयायी है जो उनकी बात को सुनते है और बिना सोचे उनकी बात को भगवान् की बात समझ कर अमल करते है ऐसे में न्यायलय विरोधी और संविधान विरोधी बात करना देश की उन तमाम अनुयायी के मन में क्या सोच पैदा करेगी और इसका परिणाम कितना भयानक हो सकता है?

उनके इस बयां से देश में कट्टरपंथ को भी बढ़ावा मिलेगा और देश में नफरत और हिंसा का मार्ग और भी प्रसस्त हो सकता है|

अच तो यह होता की माननीय अपे तमाम अनुयायी समेत देश के लोगों से अपील करते की देश की सर्वोच्च संस्था न्यायालय है और राम मंदिर पर आने वाले फैसले को देश की जनता को सहर्ष स्वीकार होना चाहिए, पर अफ़सोस बाकी बाबों की तरह माननीय रविशंकर भी बहुसंख्यक समुदाय के तुस्टीकरण की और कदम बढ़ा चुके है|

बीट विशेष

मैं अभिनंदन,चमार…आरक्षण छोड़ना चाहता हूं, सीएम को लिखी चिट्ठी वायरल

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“सेवा में, नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार.

मैं अभिनंदन कुमार, मैं चमार जाति से हूं। मैं आरक्षण छोड़ना चाहता हूं, क्योंकि हमसे ‘बड़े-बड़े’ जाति के लोग अब आरक्षण पाने को दलित बनने के लिए तैयार हैं तो मैं सवर्ण बनने के लिए तैयार हूं। क्योंकि मैं सदियों से हरिजन, चमरवा का प्रताड़ना झेलते आ रहा हूं। इन सभी से निजात पाने के लिए मैं सवर्ण बनना चाहता हूं। जब आप किसी भी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने में सक्षम हैं तो मुझे ब्राह्मण जाति बनाइए, ताकि मैं भी ब्राह्मणों की तरह शान से लोगों पर राज कर सकूं।”

ये अभिनंदन कुमार की ओर से जारी पत्र का सारांश है।

अंदाजा लगा सकिए तो लगाइए कि ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलित प्रतिरोध की इमारत की बुनियाद कितनी ठोस बन रही है। दो-चार नेताओं के बिकने का हवाला नहीं दीजिए। अभिनंदन कुमार की चिट्ठी एक प्रतिनिधि उदाहरण है। जमीन पर उतर कर देखिए कि कैसे एक साधारण दिखने वाला दलित भी अब अपनी सामाजिक त्रासदी की सबसे मुख्य वजह को कैसे पहचान रहा है और कैसे उसके खिलाफ एक चुनौती बन कर खड़ा है।

अभिनंदन कुमार की चुनौती केवल नीतीश कुमार या मोदी के लिए नहीं है। यह इस ब्राह्मणवादी समाज और सत्ता-तंत्र के हर पहरुए के लिए है। इस चिट्ठी से जिस शानदार जमीन और ताकत का अहसास होता है, आरएसएस-भाजपा और इस देश की सारी पंडावादी ताकतें उसी से डरी हुई है। इसीलिए सबसे ज्यादा तोड़ने की कोशिश इसी तबके की हो रही है। आर्थिक तौर पर और फिर सामाजिक तौर पर!

(अरविंद शेष की फेसबुक वाल से)

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देश

विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत 100 वें नंबर पर, “ना खाऊंगा , ना खाने दूंगा” का सपना पूरा

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अभी हाल में ही विश्व में सबसे ज्यादा और कम भूखे देशों की सूची जारी की गयी है। जिसमें भारत की रैंकिंग लगातार बिगङती जा रही है। आपको याद होगा की पीएम मोदी ने कहा था कि ना खाऊंग, ना खाने दूँगा । लोग सोशल मीडिया पर इसी बाबत पीएम पर तंज कस रहे हैं।

विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत की रैंकिंग :

2014: Rank 55
2015: Rank 80
2016: Rank 97
2017: Rank 100

मोदी जी सही कहते थे कि, “न खाऊँगा, न खाने दूँगा”।

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देश

अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक की पब्लिक स्क्रूटनी हो – रवीश कुमार

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नोटबंदी के दौरान पूरे देश में अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक में ही सबसे अधिक पैसा जमा होता है। पाँच दिनों में 750 करोड़। जितने भी कैशियर से बात किया सबने कहा कि पाँच दिनों में पुराने नोटों की गिनती मुमकिन नहीं है। नोटबंदी के दौरान किसी के पास सबूत नहीं था मगर जब हल्ला हुआ कि ज़मीन खाते में पैसे जमा हो रहे हैं तब काफ़ी चेतावनी जारी होती थी। जाँच की बात होने लगी जिसका कोई नतीजा आज तक सामने नहीं आया। अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक मामले की भी जाँच हो सकती थी। वैसे जाँच में मिलना ही क्या है, लीपापोती के अलावा। फिर भी रस्म तो निभा सकते थे।

शर्मनाक और चिन्ता की बात है कि इस ख़बर को कई अख़बारों ने नहीं छापा। जिन्होंने छापा उन्होंने छापने के बाद हटा लिया। क्या आप इतना कमज़ोर भारत चाहते हैं और क्या आप सिर्फ अमित शाह के लिए उस भारत को कमज़ोर बना देना चाहते हैं जो इस बैंक के चेयरमैन हैं? अगर अमित शाह के नाम से इतना ही डर लगता है तो वो जहाँ भी रहते हैं उसके आस पास के इलाक़े को साइलेंस ज़ोन घोषित कर देना चाहिए। न कोई हॉर्न बजाएगा न बोलेगा।

ये तो अभी कहीं आया भी नहीं है कि वे पैसे अमित शाह के थे, फिर उनके नाम का डर कैसा। बैंक में तो कोई भी जमा कर सकता है। प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार इसे लेकर रूटीन सवाल नहीं कर पाए। इस देश में हो क्या रहा है? क्या हम दूसरों को और ख़ुद को डराने के लिए किसी नेता के पीछे मदांध हो चुके हैं? जज लोया के केस का हाल देखा। जय शाह के मामले में आपने देखा और अब अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक के मामले में आप देख रहे हैं।

क्या हमने 2014 में बुज़दिल भारत का चुनाव किया था? यह सब चुपचाप देखते हुए भारतीय नागरिकों की नागरिकता मिट रही है। आपकी चुप्पी आपको ही मिटा रही है। इतना भी क्या डरना कि बात बात में जाँच हो जाने वाले इस देश में अमित शाह का नाम आते ही जाँच की बात ज़ुबान पर नहीं आती। यही मामला किसी विरोधी दल के नेता से संबंधित होता तो दिन भर सोशल मीडिया में उत्पात मचा रहता।

नाबार्ड ने भी कैसी लीपापोती की है। बयान जारी किया कि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। एक लाख साठ हज़ार खाता धारक हैं। एक खाते में औसत 46000 से कुछ अधिक जमा हुए। क्या नाबार्ड के लोग देश को उल्लू समझते हैं? अगर किसी ने दस खाते में बीस करोड़ जमा किए तो उसका हिसाब वे सभी एक लाख साठ हज़ार खाते के औसत से देंगे या उन दस खातों की जाँच के बाद देंगे?

क्या पाँच दिनों में सभी एक लाख साठ हज़ार खाताधारकों ने अपने पुराने नोट जमा कर दिए? कमाल है। तब तो पाँच दिनों में सौ फ़ीसदी खाताधारकों के पुराने नोट जमा करने वाला अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक भारत का एकमात्र बैंक होगा। क्या ऐसा ही हुआ ? अगर नहीं हुआ तो नाबार्ड ने किस आधार पर यह हिसाब दिया कि 750 करोड़ कोई बड़ी रक़म नहीं है। क्या एक लाख साठ हज़ार खाताधारकों में 750 करोड़ का समान वितरण इसलिए किया ताकि राशि छोटी लगे? नाबार्ड को अब यह भी बताना चाहिए कि कितने खाताधारक अपने पैसे नहीं लौटा सके ? कितने खातों में पैसे लौटे?

नाबार्ड की सफ़ाई से साफ़ है कि इस संस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। इसलिए इस मामले की जनसमीक्षा होनी चाहिए। जब सरकारी संस्था और मीडिया डर जाए तब लोक को ही तंत्र बचाने के लिए आगे आना होगा। नोटबंदी का क़दम एक राष्ट्रीय अपराध था। भारत की आर्थिक संप्रभुता पर भीतर से किया गया हमला था। इसलिए इसकी सच्चाई पर इतना पर्दा डाला जाता है।

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