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बीट विशेष

एक देश जिसे आज़ाद करवाने में बिहारी मजदूरों ने निभाया अहम् योगदान,आज मना रहा है 50वां स्वतंत्रता दिवस

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प्रतीकात्मक चित्र

अफ्रीका महाद्वीप का देश मॉरीशस आज अपनी आजादी की स्वर्ण जयंती मना रहा है। मॉरीशस के नेताओं ने अपनी आजादी का दिन 12 मार्च का इसलिए चुना, क्योंकि उनके जेहन में अपनी आजादी के संघषों के प्रेरणास्नोत महात्मा गांधी और उनके द्वारा 12 मार्च 1930 को निकाला गया दांडी मार्च था।

गन्ना खेती मॉरीशस की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है और जब 1834 में दास प्रथा की समाप्ति के बाद वहां गन्ना खेती के लिए मजदूरों की किल्लत हुई तब वहां की अंग्रेजी हुकूमत सस्ती मजदूरी के लिए भारत के गिरमिटिया मजदूरों को मॉरीशस ले गई।

1834 से शुरू हुई यह प्रथा 12 मार्च 1917 को कानूनन बंद हो गई। गिरमिटिया असल में अंग्रेजी शब्द अग्रीमेंट का अपभ्रंश है। अंग्रेज मजदूरों की भर्ती के समय एक अग्रीमेंट करते थे जिसमे उनकी सेवा अवधि 5 वर्ष, मजदूरी की राशि के साथ-साथ वापसी के लिए जहाज के टिकट आदि का प्रावधान था। जो लोग भारत से ऐसे अनुबंधों के जरिये मॉरीशस और अन्य देशों में मजदूरी करने गए उन्हें ही गिरमिटिया मजदूर कहा गया।

तब मॉरीशस जाने के लिए बंगाल और मद्रास के बंदरगाह का इस्तेमाल हुआ, लेकिन अधिकांश लोग कलकत्ता बंदरगाह से गए। बिहार तब बंगाल प्रेसीडेंसी का अंग था। गिरमिटिया मजदूरों की भर्ती आरा, भोजपुर, रोहतास, कैमूर, बक्सर, गाजीपुर, मुजफ्फरपुर, चंपारण, शाहाबाद, पटना और गया से मुख्य रूप से हुई। यूनाइटेड प्रोविंस यानी तबके उत्तर प्रदेश से भी आजमगढ़, फैजाबाद, बस्ती, गोंडा, गोरखपुर, बनारस, मिर्जापुर और जौनपुर जिलों से भर्ती हुई। मॉरीशस आने वाले गिरमिटिया अपने प्रशासनिक भू-भाग से ज्यादा भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से बिहार वासी के रूप में ही पहचाने जाते थे।

भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन, मॉरीशस की अध्यक्ष सरिता बुदू लिखती हैं, ‘साधारणतया अप्रवासियों ने अपने सुदूरवर्ती उत्पत्ति की पहचान को खो दिया और खुद को बिहार से आए हुए के रूप में प्रस्तुत करने लगे। यह एक सामान्य अनिश्चितता है, लेकिन यह एक स्थायी सामूहिक चेतना है कि वे बिहार से संबंधित हैं। हालांकि वास्तव में ये सभी अन्य दूसरे सूबों से आए हुए थे।’

2 नवम्बर 1835 को पहला जहाज मॉरीशस के अप्रवासी घाट पर रुका। तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आज जो बिहारी गिरमिटिया मजदूर के रूप में आए हैं, वे एक दिन अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ फेंकेंगे, लेकिन यह पड़ाव आसान नहीं रहा। अंग्रेजो के एजेंट भोले-भाले लोगों को बेहतर और समृद्ध जीवन का सपना दिखाकर अग्रीमेंट के लिए राजी करते थे। यहां तक कि उन्हें खेतों में सोना मिलने का भी सपना दिखलाया जाता था, लेकिन जहाज पर बैठने के साथ ही उन पर जुल्मों का पहाड़ टूटने लगता। मॉरीशस में तो उनकी जिंदगी किसी नरक से कम नहीं थी। पूरे-पूरे दिन खेतों में बेतहाशा काम करना पड़ता था। मकान के नाम पर झोंपड़ियां। बच्चों के लिए कोई सुविधा नहीं। यहां तक कि उनके बच्चों की शादी कम उम्र में करवाने के लिए गन्ना खेत मालिक दबाब देते थे ताकि काम करने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ सके। मामूली गलतियों पर जेल आम बात थी। उनके दम पर गन्ना उत्पादन में अप्रत्याशित वृद्धि कराई।

हालांकि गिरमिटिया मजदूर अपने साथ अपनी भाषा, धर्म और संस्कृति को भी साथ ले गए और बड़े जतन से उसे सहेजकर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते गए जिसमें ‘बैठका’ की अहम भूमिका थी। बैठका हर गांव में सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र था जो बाद में राजनीतिक गतिविधियों का भी केंद्र बना और मॉरीशस के स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी अहम भूमिका रही।

अगर इतिहास की बात करें तो ब्रिटेन ने 1810 में फ्रांस को हराकर मॉरीशस पर कब्जा किया था। वहां 1825 से ही संवैधानिक सुधार होने लगे, लेकिन 1948 तक बिहारियों के लिए मताधिकार अत्यंत ही सीमित था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रस्ताव पारित कर औपनिवेशिक शासन को खत्म करने की बात कही। दूसरी तरफ वैश्विक राजनीतिक पटल पर नई शक्तियों का उभार हुआ।

अंतरराष्ट्रीय दबाव और स्वतंत्रता आंदोलन के दबाव में आकर ब्रिटिश शासन ने 1948 के संवैधानिक सुधार के प्रावधानों के तहत नागरिकों को मताधिकार दिया, लेकिन यह उन्हीं लोगों तक ही सीमित था जो अंग्रेजी, हिंदू, फ्रेंच, तमिल, तेलुगु, उर्दू या चीनी भाषा में साधारण वाक्य लिख-बोल सकते थे।

इन प्रावधानों के लागू होने के बाद भारतीयों को साक्षर करने की मुहिम स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों ने अपने कंधों पर ली। पढ़े-लिखे लोगों ने स्वेच्छा से बैठका में जाकर मजदूरों को साक्षर बनाना शुरू किया। यह मुहिम रंग लाई और चुनावों के बाद बनी सरकार में बिहारी प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ने लगी। 1965 तक आते आते स्वशासन की मांग शिखर तक पहुंच गई।

1965 में ब्रिटिश शासन द्वारा फिर चुनाव के प्रावधानों में सुधार किया गया। तब 18 वर्ष की आयु के सभी लोगों को मताधिकार प्राप्त हुआ। मॉरीशस के समाज को चार समुदायों हिंदू, मुस्लिम, चीनी और सामान्य की श्रेणियों में बांटा गया।1चूंकि इन चारों समुदायों की जनसंख्या में असमानता थी इसलिए सभी समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली के साथ-साथ वंचित समुदाय के लिए एक अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली को भी लागू किया गया। साथ ही साथ अंग्रेजों ने 1967 के चुनाव में जीतने वाली पार्टी की मांग के आधार पर मॉरीशस को स्वतंत्र करने या ब्रिटेन के साथ रहने का विकल्प दिया।

एक तरह से यह चुनाव मॉरीशस की स्वतंत्रता के लिए जनमत संग्रह की तरह था। फिर आखिरकार मॉरीशस की आजादी का रास्ता साफ हो गया। महात्मा गांधी से प्रभावित शिव सागर रामगुलाम ने मॉरीशस की आजादी की तारीख 12 मार्च 1968 चुनी।

12 मार्च वही तारीख थी जिस दिन गांधी जी ने दांडी यात्र की शुरुआत की थी और इसी दिन मॉरीशस की स्वतंत्रता के साथ ही बिहारी जो मजदूर बनकर मॉरीशस गए थे, सत्ता के शिखर तक पहुंच गए। आज वहां भारतीय संस्कृति के प्रतीक चिन्ह भी मजबूती के साथ नजर आते हैं।

(लेखक जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज अन्तर्गत सेंटर फॉर अफ्रीकन स्टडीज के रिसर्च स्कॉलर है।)

बीट विशेष

मैं अभिनंदन,चमार…आरक्षण छोड़ना चाहता हूं, सीएम को लिखी चिट्ठी वायरल

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“सेवा में, नीतीश कुमार, मुख्यमंत्री, बिहार.

मैं अभिनंदन कुमार, मैं चमार जाति से हूं। मैं आरक्षण छोड़ना चाहता हूं, क्योंकि हमसे ‘बड़े-बड़े’ जाति के लोग अब आरक्षण पाने को दलित बनने के लिए तैयार हैं तो मैं सवर्ण बनने के लिए तैयार हूं। क्योंकि मैं सदियों से हरिजन, चमरवा का प्रताड़ना झेलते आ रहा हूं। इन सभी से निजात पाने के लिए मैं सवर्ण बनना चाहता हूं। जब आप किसी भी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने में सक्षम हैं तो मुझे ब्राह्मण जाति बनाइए, ताकि मैं भी ब्राह्मणों की तरह शान से लोगों पर राज कर सकूं।”

ये अभिनंदन कुमार की ओर से जारी पत्र का सारांश है।

अंदाजा लगा सकिए तो लगाइए कि ब्राह्मणवाद के खिलाफ दलित प्रतिरोध की इमारत की बुनियाद कितनी ठोस बन रही है। दो-चार नेताओं के बिकने का हवाला नहीं दीजिए। अभिनंदन कुमार की चिट्ठी एक प्रतिनिधि उदाहरण है। जमीन पर उतर कर देखिए कि कैसे एक साधारण दिखने वाला दलित भी अब अपनी सामाजिक त्रासदी की सबसे मुख्य वजह को कैसे पहचान रहा है और कैसे उसके खिलाफ एक चुनौती बन कर खड़ा है।

अभिनंदन कुमार की चुनौती केवल नीतीश कुमार या मोदी के लिए नहीं है। यह इस ब्राह्मणवादी समाज और सत्ता-तंत्र के हर पहरुए के लिए है। इस चिट्ठी से जिस शानदार जमीन और ताकत का अहसास होता है, आरएसएस-भाजपा और इस देश की सारी पंडावादी ताकतें उसी से डरी हुई है। इसीलिए सबसे ज्यादा तोड़ने की कोशिश इसी तबके की हो रही है। आर्थिक तौर पर और फिर सामाजिक तौर पर!

(अरविंद शेष की फेसबुक वाल से)

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देश

विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत 100 वें नंबर पर, “ना खाऊंगा , ना खाने दूंगा” का सपना पूरा

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अभी हाल में ही विश्व में सबसे ज्यादा और कम भूखे देशों की सूची जारी की गयी है। जिसमें भारत की रैंकिंग लगातार बिगङती जा रही है। आपको याद होगा की पीएम मोदी ने कहा था कि ना खाऊंग, ना खाने दूँगा । लोग सोशल मीडिया पर इसी बाबत पीएम पर तंज कस रहे हैं।

विश्व भुखमरी सूचकांक में भारत की रैंकिंग :

2014: Rank 55
2015: Rank 80
2016: Rank 97
2017: Rank 100

मोदी जी सही कहते थे कि, “न खाऊँगा, न खाने दूँगा”।

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देश

अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक की पब्लिक स्क्रूटनी हो – रवीश कुमार

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नोटबंदी के दौरान पूरे देश में अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक में ही सबसे अधिक पैसा जमा होता है। पाँच दिनों में 750 करोड़। जितने भी कैशियर से बात किया सबने कहा कि पाँच दिनों में पुराने नोटों की गिनती मुमकिन नहीं है। नोटबंदी के दौरान किसी के पास सबूत नहीं था मगर जब हल्ला हुआ कि ज़मीन खाते में पैसे जमा हो रहे हैं तब काफ़ी चेतावनी जारी होती थी। जाँच की बात होने लगी जिसका कोई नतीजा आज तक सामने नहीं आया। अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक मामले की भी जाँच हो सकती थी। वैसे जाँच में मिलना ही क्या है, लीपापोती के अलावा। फिर भी रस्म तो निभा सकते थे।

शर्मनाक और चिन्ता की बात है कि इस ख़बर को कई अख़बारों ने नहीं छापा। जिन्होंने छापा उन्होंने छापने के बाद हटा लिया। क्या आप इतना कमज़ोर भारत चाहते हैं और क्या आप सिर्फ अमित शाह के लिए उस भारत को कमज़ोर बना देना चाहते हैं जो इस बैंक के चेयरमैन हैं? अगर अमित शाह के नाम से इतना ही डर लगता है तो वो जहाँ भी रहते हैं उसके आस पास के इलाक़े को साइलेंस ज़ोन घोषित कर देना चाहिए। न कोई हॉर्न बजाएगा न बोलेगा।

ये तो अभी कहीं आया भी नहीं है कि वे पैसे अमित शाह के थे, फिर उनके नाम का डर कैसा। बैंक में तो कोई भी जमा कर सकता है। प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकार इसे लेकर रूटीन सवाल नहीं कर पाए। इस देश में हो क्या रहा है? क्या हम दूसरों को और ख़ुद को डराने के लिए किसी नेता के पीछे मदांध हो चुके हैं? जज लोया के केस का हाल देखा। जय शाह के मामले में आपने देखा और अब अहमदाबाद ज़िला सहकारी बैंक के मामले में आप देख रहे हैं।

क्या हमने 2014 में बुज़दिल भारत का चुनाव किया था? यह सब चुपचाप देखते हुए भारतीय नागरिकों की नागरिकता मिट रही है। आपकी चुप्पी आपको ही मिटा रही है। इतना भी क्या डरना कि बात बात में जाँच हो जाने वाले इस देश में अमित शाह का नाम आते ही जाँच की बात ज़ुबान पर नहीं आती। यही मामला किसी विरोधी दल के नेता से संबंधित होता तो दिन भर सोशल मीडिया में उत्पात मचा रहता।

नाबार्ड ने भी कैसी लीपापोती की है। बयान जारी किया कि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। एक लाख साठ हज़ार खाता धारक हैं। एक खाते में औसत 46000 से कुछ अधिक जमा हुए। क्या नाबार्ड के लोग देश को उल्लू समझते हैं? अगर किसी ने दस खाते में बीस करोड़ जमा किए तो उसका हिसाब वे सभी एक लाख साठ हज़ार खाते के औसत से देंगे या उन दस खातों की जाँच के बाद देंगे?

क्या पाँच दिनों में सभी एक लाख साठ हज़ार खाताधारकों ने अपने पुराने नोट जमा कर दिए? कमाल है। तब तो पाँच दिनों में सौ फ़ीसदी खाताधारकों के पुराने नोट जमा करने वाला अहमदाबाद ज़िला सहकारिता बैंक भारत का एकमात्र बैंक होगा। क्या ऐसा ही हुआ ? अगर नहीं हुआ तो नाबार्ड ने किस आधार पर यह हिसाब दिया कि 750 करोड़ कोई बड़ी रक़म नहीं है। क्या एक लाख साठ हज़ार खाताधारकों में 750 करोड़ का समान वितरण इसलिए किया ताकि राशि छोटी लगे? नाबार्ड को अब यह भी बताना चाहिए कि कितने खाताधारक अपने पैसे नहीं लौटा सके ? कितने खातों में पैसे लौटे?

नाबार्ड की सफ़ाई से साफ़ है कि इस संस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता है। इसलिए इस मामले की जनसमीक्षा होनी चाहिए। जब सरकारी संस्था और मीडिया डर जाए तब लोक को ही तंत्र बचाने के लिए आगे आना होगा। नोटबंदी का क़दम एक राष्ट्रीय अपराध था। भारत की आर्थिक संप्रभुता पर भीतर से किया गया हमला था। इसलिए इसकी सच्चाई पर इतना पर्दा डाला जाता है।

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