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Exclusive: ये इमरजेन्सी नहीं,लोकतंत्र का मित्र बनकर लोकतंत्र की हत्या का खेल है

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क्या ये संभव है कि आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम ना लें । आप चाहें तो उनके मंत्रियो का नाम ले लीजिये । सरकार की पॉलिसी में जो भी गड़बड़ी दिखाना चाहते है, दिखा सकते हैं । मंत्रालय के हिसाब के मंत्री का नाम लीजिए पर प्रधानमंभी मोदी का जिक्र कहीं ना कीजिए। लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी खुद ही हर योजना का एलान करते हैं, हर मंत्रालय के कामकाज से खुद को जोड़े हुए हैं और हर मंत्री भी जब प्रधानमंत्री मोदी का ही नाम लेकर योजना या सरकारी पॉलिसी का जिक्र कर रहा है , तो आप कैसे मोदी का नाम ही नहीं लेंगे।

अरे छोड़ दीजिए। कुछ दिनो तक देखते हैं क्या होता है । वैसे आप कर ठीक रहे हैं। पर अभी छोड़ दीजिए।

भारत के आनंद बजार पत्रिका समूह के राष्ट्रीय न्यूज चैनल एबीपी न्यूज के प्रोपराइटर जो एडिटर-इन चीफ भी है, उनके साथ ये संवाद 14 जुलाई को हुआ। यूं इस निर्देश को देने से पहले खासी लंबी बातचीत खबरों को दिखाने, उसके असर और चैनल को लेकर बदलती धारणाओं के साथ हो रहे लाभ पर भी हुआ। एडिटर-इन -चीफ ने माना कि मास्टरस्ट्रोक प्रोगाम ने चैनल की साख बढ़ा दी है। खुद उनके शब्दो में कहें तो , “मास्टरस्ट्रोक में जिस तरह का रिसर्च होता है। जिस तरह खबरों को लेकर ग्रउंड जीरो से रिपोर्टिंग होती है। रिपोर्ट के जरिए सरकार की नीतियों का पूरा खाका रखा जाता है। ग्राफिक्स और स्किप्ट जिस तरह लिखी जाती है, वह चैनल के इतिहास में पहली बार देखा है।”

तो चैनल के बदलते स्वरुप या खबरों को परोसने के अंदाज ने प्रोपराइटर व एडिटर -इन -चीफ को उत्साहित तो किया। पर खबरों को दिखाने-बताने के अंदाज की तारीफ करते हुये भी लगातार वह ये कह भी रहे थे और बता भी रहे थे कि क्या सबकुछ चलता रहे और प्रधानमंत्री मोदी का नाम ना हो तो कैसा रहेगा। खैर एक लंबी चर्चा के बाद सामने निर्देश यही आया कि प्रधानमंत्री मोदी का नाम अब चैनल की स्क्रीन पर लेना ही नहीं है।


तमाम राजनीतिक खबरों के बीच या कहें सरकार की हर योजना के मद्देनजर ये बेहद मुश्किल काम था कि भारत की बेरोजगारी का जिक्र करते हुये कोई रिपोर्ट तैयार की जा रही हो और उसमें सरकार के रोजगार पैदा करने के दावे जो कौशल विकास योजना या मुद्रा योजना से जुड़ी हों, उन योजनाओ की जमीनी हकीकत को बताने के बावजूद ये ना लिख पाये कि प्रधानमंत्री मोदी ने योजनाओं की सफलता को लेकर जो दावा किया वह है क्या। यानी एक तरफ प्रधानमंत्री कहते हैं कि कौशल विकास के जरीये जो स्किल डेवलेंपमेंट शुरु किया गया, उसमें 2022 तक का टारगेट तो 40 करोड युवाओं को ट्रेनिंग देने का रखा गया है पर 2018 में इनकी तादाद दो करोड़ भी छू नहीं पायी है। और ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि जितनी जगहों पर कौशल विकास योजना के तहत सेंटर खोले गये उनमें से हर दस सेंटरों में से 8 सेंटर पर कुछ नहीं होता या कहें 8 सेंटर अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पाए। लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट दिखाते हुये कहीं प्रधानमंत्री का नाम आना ही नहीं चाहिए। तो सवाल था मास्टरस्ट्रोक की पूरी टीम की कलम पर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शब्द गायब हो जाना चाहिए।

पर अगला सवाल तो ये भी था कि मामला किसी अखबार का नहीं बल्कि न्यूज चैनल का था । यानी स्क्रिप्ट लिखते वक्त कलम चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ना लिखे। लेकिन जब सरकार का मतलब ही बीते चार बरस में सिर्फ नरेन्द्र मोदी है तो फिर सरकार का जिक्र करते हुये एडिटिंग मशीन ही नहीं बल्कि लाइब्ररी में भी सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी के ही वीडियो होंगे। और 26 मई 2014 से लेकर 26 जुलाई 2018 तक किसी भी एडिटिंग मशीन पर मोदी सरकार ही नहीं बल्कि मोदी सरकार की किसी भी योजना को लिखते ही जो वीडियो या तस्वीरो का कच्चा चिट्ठा उभरता, उसमें 80 फीसदी में प्रधानमंत्री मोदी ही थे ।

यानी किसी भी एडिटर के सामने जो तस्वीर स्क्रिप्ट के अनुरुप लगाने की जरुरत होती उसमें बिना मोदी का कोई वीडियो या कोई तस्वीर उभरती ही नहीं । और हर मिनट जब काम एडिटर कर रहा है तो उसके सामने स्क्रिप्ट में लिखे , मौजूदा सरकार शब्द आते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ही तस्वीर उभरती और आन एयर “मास्टरस्ट्रोक” में चाहे कहीं ना भी प्रधानमंत्री मोदी शब्द बोला-सुना ना जा रहा हो पर स्क्रीन पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर आ ही जाती।

तो ‘मास्टरस्ट्रोक ‘ में प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर भी नहीं जानी चाहिये, उसका फरमान भी 100 घंटे बीतने से पहले आ जायेगा ये सोचा तो नहीं गया पर सामने आ ही गया। और इस बार एडिटर-इन चीफ के साथ जो चर्चा शुरु हुई वह इस बात से हुई कि क्या वाकई सरकार का मतलब प्रधानमंत्री मोदी ही हैं। यानी हम कैसे प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर दिखाये बिना कोई भी रिपोर्ट दिखा सकते है। उस पर हमारा सवाल था कि मोदी सरकार ने चार बरस के दौर में 106 योजनाओं का एलान किया है। संयोग से हर योजना का एलान खुद प्रधानमंत्री ने ही किया है। हर योजना के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी चाहे अलग अलग मंत्रालय पर हो । अलग अलग मंत्री पर हो । लेकिन जब हर योजना के प्रचार प्रसार में हर तरफ से जिक्र प्रधानमंत्री मोदी का ही हो रहा है तो योजना की सफलता-असफलता पर ग्राउंड रिपोर्ट में भी जिक्र प्रधानमंत्री का चाहे रिपोर्टर – एंकर ना ले लेकिन योजना से प्रभावित लोगों की जुबां पर नाम तो प्रधानमंत्री मोदी का ही होगा और लगातार है भी । चाहे किसान हो या गर्भवती महिला। बेरोजगार हो या व्यापारी । जब उनसे फसल बीमा पर सवाल पूछें या मातृत्व वंदना योजना या जीएसटी पर पूछें या मुद्रा योजना पर पूछें या तो योजनाओं के दायरे में आने वाले हर कोई प्रधानमंत्री मोदी का नाम जरुर लेते । अधिकांश कहते कि कोई लाभ नहीं मिल रहा है तो उनकी बातो को कैसे एडिट किया जाए। तो जवाब यही मिला कि कुछ भी हो पर ‘प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर-वीडियो भी मास्टरस्ट्रोक में दिखायी नहीं देनी चाहिये।” वैसे ये सवाल अब भी अनसुलझा सा था कि आखिर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर या उनका नाम भी जुबां पर ना आये तो उससे होगा क्या ? क्योंकि जब 2014 में सत्ता में आई बीजेपी के लिये सरकार का मतलब नरेन्द्र मोदी है । बीजेपी के स्टार प्रचारक के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी ही है । संघ के चेहरे के तौर पर भी प्रचारक रहे नरेन्द्र मोदी हैं। दुनिया भर में भारत के विदेश नीति के ब्रांड एंबेसडर नरेन्द्र मोदी हैं। देश की हर नीति हर पॉलिसी के
केन्द्र में नरेन्द्र मोदी हैं तो फिर दर्जन भर हिन्दी राष्ट्रीय न्यूज चैनलों की भीड़ में पांचवे नंबर के ऱाष्ट्रीय न्यूज चैनल एबीपी के प्राइम टाइम में सिर्फ घंटेभर के कार्यक्रम ” मास्टरस्ट्रोक ” को लेकर सरकार के भीतर इतने सवाल क्यों हैं। या कहें वह कौन सी मुश्किल है जिसे लेकर एपीपी न्यूज चैनलों के मालिको पर दवाब बनाया जा रहा है कि वह प्रधानमंत्री मोदी का नाम ना लें या फिर तस्वीर भी ना दिखायें ।

दरअसल मोदी सरकार में चार बरस तक जिस तरह सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी को ही केन्द्र में रखा गया और भारत जैसे देश में टीवी न्यूज चैनलों ने जिस तरह सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी को ही दिखाया और धीरे धीरे प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर, उनका वीडियो और उनका भाषण किसी नशे की तरह न्यूज चैनलों को देखने वाले के भीतर समाते गया, उसका असर ये हुआ कि प्रधानमंत्री मोदी ही चैनलों की टीआरपी की जरुरत बन गये। और प्रधानमंत्री के चेहरे का साथ सबकुछ अच्छा है या कहें अच्छे दिन की ही दिशा में देश बढ़ रहा है, ये बताया जाने लगा तो चैनलों के लिये भी यह नशा बन गया और ये नशा ना उतरे, इसके लिये बकायदा मोदी सरकार के सूचना मंत्रालय ने 200 लोगों की एक मॉनिटरिंग टीम को लगा दिया । बकायदा पूरा काम सूचना मंत्रालय के एडिशनल डायरेक्टर जनरल के मातहत होने लगा, जो सीधी रिपोर्ट सूचना प्रसारण मंत्री को देते। और जो दो सौ लोग देश के तमाम राष्ट्रीय न्यूज चैनलों की मॉनिटरिंग करते, वह तीन स्तर पर होता है । 150 लोगों की टीम
सिर्फ मॉनिटरिंग करती । 25 मानेटरिंग की गई रिपोर्ट को सरकार अनुकूल एक शक्ल देते। और बाकि 25 फाइनल मॉनिटरिंग के कंटेंट की समीक्षा करते । उनकी इस रिपोर्ट पर सूचना मंत्रालय के तीन डिप्टी सचिव स्तर के अधिकारी रिपोर्ट तैयार करते । और फाइनल रिपोर्ट सूचना मंत्री के पास भेजी जाती। जिनके जरिए पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी सक्रिय होते और न्यूज चैनलों के संपादको को दिशा निर्देश देते रहते कि क्या करना है कैसे करना है।

और कोई संपादक जब सिर्फ खबरों के लिहाज से चैनल को चलाने की बात कहता तो चैनल के प्रोपराइटर से सूचना मंत्रालय या पीएमओ के अधिकारी संवाद बनाते । दवाब बनाने के लिये मॉनिटरिंग की रिपोर्ट को नत्ती कर फाइल भेजते । और फाइल में इसका जिक्र होता कि आखिर कैसे प्रधानमंत्री मोदी की 2014 में किये गये चुनावी वादे से लेकर नोटबंदी या सर्जिकल स्ट्राइक या जीएसटी को लागू करते वक्त दावो भरे बयानो को दुबारा दिखाया जा सकता है। या फिर कैसे मौजूदा दौर की किसी योजना पर होने वाली रिपोर्ट में प्रधानमंत्री के पुराने दावे का जिक्र किया जा सकता है। दरअसल मोदी सत्ता की सफलता का नजरिया ही हर तरीके से रखा जाता रहा जाये इसके लिये खासतौर से सूचना प्रसारण मंत्रालय से लेकर पीएमओ के दर्जन भर अधिकारी पहले स्तर पर काम करते है । और दूसरे स्तर पर सूचना प्रसारण मंत्री का सुझाव होता है । जो एक तरह का निर्देश होता है । और तीसरे स्तर पर बीजेपी का लहजा । जो कई स्तर पर काम करता है । मसलन अगर कोई चैनल सिर्फ मोदी सत्ता की सकारात्मकता को नहीं दिखाता है । या कभी कभी नकारात्मक खबर करता है। या फिर तथ्यों के आसरे मोदी सरकार के सच को झूठ करार देता है तो फिर बीजेपी के प्रवक्तताओ को चैनल में भेजने पर पांबदी लग जाती है। यानी न्यूज चैनल पर होने वाली राजनीतिक चर्चाओ में बीजेपी के प्रवक्ता नहीं आते हैं। एवीपी पर ये शुरुआत जून के आखिरी हफ्ते से ही शुरु हो गई।

यानी बीजेपी प्रवक्ताओं ने चर्चा में आना बंद किया। दो दिन बाद से बीजेपी नेताओ ने बाइट देना बंद कर दिया। और जिस दिन प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात का सच मास्टरस्ट्रोक में दिखाया गया उसके बाद से बीजेपी के साथ साथ आरएसएस से जुड़े उनके विचारको को भी एवीपी चैनल पर आने से रोक दिया गया । तो मन की बात के सच और उसके बाद के घटनाक्रम को समझ उससे पहले ये भी जान लें कि मोदी सत्ता पर कैसे बीजेपी का पेरेंट संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ [ आरएसएस } भी निर्भर हो चला है , उसका सबसे बडा उदाहरण 9 जुलाई 2018 को तब नजर आया जब शाम चार बजे की चर्चा के एक कार्यक्रम के बीच में ही संघ के विचारक के तौर पर बैठे एक प्रोफेसर को मोबाइल पर फोन आया और कहा गया कि तुरंत स्टुडियो से बाहर निकलें। और वह शख्स आन एयर कार्यक्रम के बीच ही उठ कर चल पड़ा। फोन आने के बाद उसके चेहरे का हावभाव ऐसा था, मानो उसके कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है या कहें बेहद डरे हुये शख्स का जो चेहरा हो सकता है, वह सेकेंड में नजर आ गया। पर बात इससे भी बनी नहीं। क्योंकि इससे पहले जो लगातार खबरे चैनल पर दिखायी जा रही थी, उसका असर देखने वालों पर क्या हो रहा है और बीजेपी के प्रवक्ता चाहे चैनल पर ना आ रहा हो पर खबरों को लेकर चैनल की टीआरपी बढ़ने लगी। और इस दौर में टीआरपी की जो रिपोर्ट 5 और 12 जुलाई को आई उसमें एबीपी देश के दूसरे नंबर का चैनल बन गया। और खास बात तो ये भी है कि इस दौर में “मास्टरस्ट्रोक” में एक्सक्लूसिव रिपोर्ट झारखंड के गोड्डा में लगने वाले थर्मल पावर प्रोजेक्ट पर की गई। चूकि ये थर्मल पावर तमाम नियम कायदो को ताक पर रखकर ही नहीं बन रहा है बल्कि ये अडानी ग्रुप का है और पहली बार उन किसानों का दर्द इस रिपोर्ट के जरीये उभरा कि अडानी कैसे प्रधानमंत्री मोदी के करीब हैं तो झारखंड सरकार ने नियम बदल दिये और किसानो को धमकी दी जाने लगी कि अगर उन्होंने अपनी जमीन थर्मल पावर के लिये दी तो उनकी हत्या कर दी जाएगी । बकायदा एक किसान ने कैमरे पर कहा, ‘ अडानी ग्रुप के अधिकारी ने धमकी दी है जमीन नहीं दिये तो जमीन में गाड़ देंगे। पुलिस को शिकायत किए तो पुलिस बोली बेकार है शिकायत करना । ये बड़े लोग हैं। प्रधानमंत्री के करीबी हैं “। और फिर खून के आंसू रोते किसान उनकी पत्नी।

और इस दिन के कार्यक्रम की टीआरपी बाकी के औसत मास्टरस्ट्रोक से चार-पांच प्वाइंट ज्यादा थी । यानी एबीपी के प्राइम टाइम [ रात 9-10 बजे ] में चलने वाले मास्ट्रस्ट्रोक की औसत टीआरपी जो 12 थी, उस अडानी वाले कार्यक्रम वाले दिन 17 हो गई । यानी 3 अगस्त को जब संसद में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने मीडिया पर बंदिश और एवीपी चैनल को धमकाने- और पत्रकारो को नौकरी से निकलवाने का जिक्र किया तो सूचना प्रसारण मंत्री ने कह दिया कि , ” चैनल की टीआरपी ही मास्टरस्ट्रोक कार्यक्रम से नहीं आ रही थी और उसे कोई देखना ही नहीं चाहता था तो चैनल ने उसे बंद कर दिया”। तो असल हालात यहीं से निकलते है क्योंकि एबीपी की टीआरपी अगर बढ़ रही थी । उसका कार्यक्रम मास्टरस्ट्रोक धीरे धीरे लोकप्रिय भी हो रहा था और पहले की तुलना में टीआरपी भी अच्छी-खासी शुरुआती चार महीनो में ही देने लगा था [ ‘मास्टरस्ट्रोक’ से पहले ‘जन मन ‘ कार्यक्रम चला करता था, जिसकी औसत टीआरपी 7 थी। मास्ट्रस्ट्रोक की औसत टीआरपी 12 हो गई। } यानी मास्टर स्ट्रोक की खबरों का मिजाज मोदी सरकार की उन योजनाओं या कहें दावो को ही परखने वाला था, जो देश के अलग अलग क्षेत्रो से निकल कर रिपोर्टरो के जरीये आती थी। और लगातार मास्टरस्ट्रोक के जरीये ये भी साफ हो रहा था कि सरकार के दावों के भीतर कितना खोखलापन है । और इसके लिये बकायदा सरकारी आंकडों के अंतर्विरोध को ही अधार बनाया जाता था। तो सरकार के सामने ये संकट भी उभरा कि जब उनके दावो को परखते हुये उनके खिलाफ हो रही रिपोर्ट को भी जनता पसंद करने लगी है और चैनल की टीआरपी भी बढ़ रही है तो फिर आने वाले वक्त में दूसरे चैनल क्या करेंगे। क्योंकि भारत में न्यूज चैनलो के बिजनेस का सबसे बडा आधार विज्ञापन है। और विज्ञापन को मांपने के लिये संस्था बार्क की टीआरपी रिपोर्ट है। और अगर टीआरपी ये दिखलाने लगे कि मोदी सरकार की सफलता को खारिज करती रिपोर्ट जनता पंसद कर रही है तो फिर वह न्यूजचैनल जो मोदी सरकार के गुणगान में खोये हुये हैं, उनके सामने साख और बिजनेस यानी विज्ञापन दोनो का संकट होगा। तो बेहद समझदारी के साथ चैनल पर दवाब बढ़ाने के लिये दो कदम सत्ताधारी बीजेपी के तरफ से उठे। पहला देशभर में एबीपी न्यूज चैनल का बायकॉट हुआ । और दूसरा एबीपी का जो भी सालाना कार्यक्रम होता है, जिससे चैनल की साख भी बढ़ती है और विज्ञापन के जरीये कमाई भी होती है। मसलन एबीपी न्यूज चैनल के शिखर सम्मेलन कार्यक्रम में सत्ता विपक्ष के नेता मंत्री पहुंचते और जनता के सवालों का जवाब देते तो उस कार्यक्रम से बीजेपी और मोदी सरकार दोनों ने हाथ पीछ कर लिये । यानी कार्यक्रम में कोई मंत्री नहीं जायेगा । जाहिर है जब सत्ता ही नहीं होगी तो सिर्फ विपक्ष के आसरे कोई कार्यक्रम कैसे हो सकता है। यानी हर न्यूज चैनल को साफ मैसेज दे दिया गया कि विरोध करेंगे तो चैनल के बिजनेस पर प्रभाव पड़ेगा। यानी चाहे अनचाहे मोदी सरकार ने साफ संकेत दिये की सत्ता अपने आप में बिजनेस है। और चैनल भी बिना बिजनेस ज्यादा चल नहीं पायेगा। कुछ संपादक कह सकते हैं कि उन पर कहीं कोई दबाव रहता नहीं तो फिर सच ये भी है कि अगर वे पहले से सत्तानकूल हैं या आलोचना करने भर के लिए आलोचना करते दिखते हैं तो सरकार को क्या दिक्कत।

पर पहली बार एबीपी न्यूज चैनल पर असर डालने के लिये या कहें कहीं सारे चैनल मोदी सरकार के गुणगान को छोड कर ग्राउंड जीरो से खबरे दिखाने की दिशा में बढ़ ना जाये, उसके लिये शायद दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र का मित्र बनकर लोकतंत्र का ही गला घोंटने की कार्यवाही सत्ता ने शुरु की। यानी इमरजेन्सी थी तब मीडिया को एहसास था कि संवैधानिक अधिकार समाप्त है । पर यहां तो लोकतंत्र का राग है और 20 जून को प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरीये किसान लाभार्थियों से की। उस बातचीत में सबसे आगे छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कन्हारपुरी गांव में रहने वाली चंद्रमणि कौषी थीं। उनसे जब प्रधानमंत्री ने कमाई के बारे में पूछा तो बेहद सरल तरीके से चद्रमणि ने बताया कि उसकी आय कैसे दुगुनी हो गई। तो आय दुगुनी हो जाने की बात सुन कर प्रधानमंत्री खुश हो गये । खिलखिलाने लगे । क्योंकि किसानो की आय दुगुनी होने का टारगेट प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 का रखा है। और लाइव टेलीकास्ट में कोई किसान कहे कि उसकी आय दुगुनी हो गई तो प्रधानमंत्री का खुश होना तो बनता है। पर रिपोर्टर-संपादक के दृष्टिकोण से हमे ये सच पचा नहीं । क्योंकि छत्तीसगढ़ यूं भी देश के सबसे पिछड़े इलाको में से एक है और फिर कांकेर जिला, जिसके बारे में सरकारी रिपोर्ट ही कहती है और जो अब भी काकंरे के बारे में सरकारी बेबसाइट पर दर्ज है कि ये दुनिया के सबसे पिछड़े इलाके यानी अफ्रीका या अफगानिस्तान की तरह है । तो फिर यहां की कोई महिला किसान आय दोगुनी होने की बात कह रही है तो रिपोर्टर को खासकर इसी रिपोर्ट के लिये भेजा। और 14 दिन बाद 6 जुलाई को जब ये रिपोर्ट दिखायी गई कि कैसे महिला को दिल्ली से गये अधिकारियों ने ट्रेनिंग दी कि उसे प्रधानमंत्री के सामने क्या बोलना है। कैसे बोलना है। धान के बजाय पल्प के धंधे से होने वाली आय की बात को कैसे गड्डमड्ड कर अपनी आय दुगुनी होने की बात कहनी है । तो झटके में रिपोर्ट दिखाये जाने के बाद छत्तीसगढ में ही ये सवाल होने लगे कि कैसे चुनाव जीतने के लिये छत्तीसगढ की महिला को ट्रेनिंग दी गई । [ छत्तीसगढ में 5 महीने बाद विधानसभा चुनाव है ] यानी इस रिपोर्ट ने तीन सवालों को जन्म दे दिया । पहला , क्या अधिकारी प्रधानमंत्री को खुश करने के लिये ये सब करते है । दूसरा , क्या प्रधानमंत्री चाहते हैं कि सिर्फ उनकी वाहवाही हो तो झूठ बोलने की ट्रेनिंग भी दी जाती है । तीसरा, क्या प्रचार प्रसार का तंत्र ही है जो चुनाव जिता सकता है।

हो जो भी पर इस रिपोर्ट से आहत मोदी सरकार ने एबीपी न्यूज चैनल पर सीधा हमला ये कहकर शुरु किया कि जानबूझकर गलत और झूठी रिपोर्ट दिखायी गई। और बाकायदा सूचना प्रसारण मंत्री समेत तीन केन्द्रीय मंत्रियों ने एक सरीखे ट्वीट किये । और चैनल की साख पर ही सवाल उठा दिये। जाहिर है ये दबाव था । सब समझ रहे थे । तो ऐसे में तथ्यो के साथ दुबारा रिपोर्ट फाइल करने के लिये जब रिपोर्टर ज्ञानेन्द्र तिवारी को भेजा गया तो गांव का नजारा ही कुछ अलग हो गया । मसलन गांव में पुलिस पहुंच चुकी थी। राज्य सरकार के बड़े अधिकारी इस भरोसे के साथ भेजे गये थे कि रिपोर्टर दोबारा उस महिला तक पहुंच ना सके । पर रिपोर्टर की सक्रियता और भ्रष्टाचार को छुपाने पहुंचे अधिकारी या पुलिसकर्मियो में इतना नैतिक बल ना था या वह इतने अनुशासन में रहने वाले नहीं थे कि रात तक डटे रहते। दिन के उजाले में खानापूर्ति कर लौट आये । तो शाम ढलने से पहले ही गांव के लोगों ने और दुगुनी आय कहने वाली महिला समेत महिला के साथ काम करने वाली 12 महिलाओ के ग्रुप ने चुप्पी तोड़कर सच बता दिया तो हालत और खस्ता हो गई है । और 9 जुलाई को इस रिपोर्ट के ‘ सच ” शीर्षक के प्रसारण के बाद सत्ता – सरकार की खामोशी ने संकेत तो दिये कि वह कुछ करेगी। और उसी रात सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाले न्यू चैनल मॉनिटरिंग की टीम में से एक शख्स ने फोन से जानकारी दी कि आपके मास्टरस्ट्रोक चलने के बाद से सरकार में हडकंप मचा हुआ है । बाकायदा एडीजी को सूचना प्रसारण मंत्री ने हड़काया है कि क्या आपको अंदेशा नहीं था कि एवीपी हमारे ट्वीट के बाद भी रिपोर्ट फाइल कर सकता है । अगर ऐसा हो सकता है तो हम पहले ही नोटिस भेज देते । जिससे रिपोर्ट के प्रसारण से पहले उन्हें हमें दिखाना पड़ता। जाहिर है जब ये सारी जानकारी 9 जुलाई को सरकारी मॉनिटरिंग करने वाले सीनियर मॉनिटरिंग के पद को संभाले शख्स ने दी । तो मुझे पूछना पड़ा कि क्या आपको कोई नौकरी का खतरा नहीं है जो आप हमें सारी जानकरी दे रहे हैं । तो उस शख्स ने साफ तौर पर कहा कि दो सौ लोगों की टीम है । जिसकी भर्ती ब्रॉडकास्ट इंजीनियरिंग कारपोरेशन इंडिया लिं. करती है । छह महीने के कान्ट्रेक्ट पर ऱखती है चाहे आपको कितने भी बरस काम करते हुये हो जाये। छुट्टी की कोई सुविधा है नहीं। मॉनिटिरंग करने वालों को 28635 रुपये मिलते हैं तो सीनियर मानेटरिंग करने वालों को 37,350 रुपये और
कन्टेट पर नजर रखने वालो को 49,500 रुपये। तो इतने वेतन की नौकरी जाये या रहे फर्क क्या पडता है। पर सच तो यही है कि प्राइम टाइम के बुलेटिन पर नजर रखने वालो को यही रिपोर्ट तैयार करनी होती है कितना वक्त आपने प्रधानमंत्री मोदी को दिखाया। जो चैनल मोदी को सबसे ज्यादा दिखाता है उसे सबसे ज्यादा अच्छा माना जाता है । तो हम मास्टरस्ट्रोक में प्रदानमंत्री मोदी को तो खूब देखते हैं। लगभग हंसते हुये उस शख्स ने कहा आपके कंटेन्ट पर एक अलग से रिपोर्ट तैयार होती है। और आज जो आपने दिखाया है उसके बाद तो कुछ भी हो सकता है। बस सचेत रहियेगा।

यह कहकर उसने तो फोन काट दिया। वैसे, मॉनिटरिंग करने वाले की शैक्षिक योग्यता है ग्रेजुएशन और एक अदद डिप्लोमा। पर मैं भी सोचने लगा होगा । इसकी चर्चा चैनल के भीतर हुई भी पर ये किसी ने नहीं
सोचा था कि हमला तीन स्तर पर होगा। और ऐसा हमला होगा कि लोकतंत्र टुकुर टुकुर देखता रह जायेगा । क्योंकि लोकतंत्र के नाम ही लोकतंत्र का गला घोंटा जायेगा। तो अगले ही दिन से जैसे ही रात के नौ बजे एबीपी न्यूज चैनल का सैटेलाइट लिंक अटकने लगता । और फिर रोज नौ बजे से लेकर रात दस बजे तक कुछ इस तरह से सिग्नल की डिस्टरबेंस रहती कि कोई भी मास्टरस्ट्रोक देख ही ना पाये । या देखने वाला चैनल बदल ही ले। और दस बजते ही चैनल फिर ठीक हो जाता। जाहिर है ये चैनल चलाने वालों के लिये किसी झटके से कम नहीं था । तो ऐसे में चैनल के प्रोपराइटर व एडिटर-इन चीफ ने तमाम टैक्नीशियन्स को लगाया । ये क्यों हो रहा है । पर सेकेंड भर के लिये किसी टेलीपोर्ट से एबीपी सैटेलाईट लिंक पर फायर होता और जब तक एबीपी के टेकनिश्न्यन्स एबीपी का टेलीपोर्ट बंद कर पता करते कि कहां से फायर हो रहा है, तब तक उस टेलीपोर्ट
के मूवमेंट होते और वह फिर चंद मिनट में सेकेंड भर के लिये दुबारा टेलीपोर्ट से फायर करता। यानी औसत तीस से चालीस बार एबीपी के सैटेलाइट सिग्नल को ही प्रभावित कर विघ्न पैदा किया जाता । और तीसरे दिन सहमति यही बनी की दर्शको को जानकारी दी जाये। तो 19 जुलाई को सुबह से ही चैनल पर जरुरी सूचना कहकर चलाना शुरु किया गया , ” पिछले कुछ दिनो से आपने हमारे प्राइम टाइम प्रसारण के दौरान सिग्नल को लेकर कुछ रुकावटे देखी होगी । हम अचानक आई इन दिक्कतों का पता लगा रहे है और उन्हे दूर करने की कोशिश में लगे है । तब तक आप एबीपी न्यूज से जुड़े रहें। ” ये सूचना प्रबंधन के मशविरे से आन एयर हुआ । पर इसे आन एयर करने के दो घंटे बाद ही यानी सुबह 11 बजते बजते हटा लिया गया और हटाने का निर्णय भी प्रबंधन का ही रहा। यानी
दवाब सिर्फ ये नहीं कि चैनल डिस्टर्ब होगा । बल्कि इसकी जानकारी भी बाहर जानी नहीं चाहिये। यानी मैनेजमेंट कहीं खड़े ना हो। और इसी के सामानांतर कुछ विज्ञापनदाताओ ने विज्ञापन हटा लिये या कहें रोक लिये। मसलन सबसे बड़ा विज्ञापनदाता जो विदेशी ताकतों से स्वदेशी ब्रांड के नाम पर लड़ता है और अपने सामान को बेचता है, उसका विज्ञापन झटके में चैनल के स्क्रीन से गायब हो गया । फिर अगली जानकारी ये भी आने लगी कि विज्ञापनदाताओ को भी अदृश्य शक्तियां धमका रही हैं कि वह विज्ञापन बंद कर दें। यानी लगातार 15 दिन तक सैटेलाइट लिंक में दखल । और सैटेलाइट लिंक में डिस्टरबेंस का मतलब सिर्फ एबीपी का राष्ट्रीय हिन्दी न्यूज चैनल भर ही नहीं बल्कि चार क्षेत्रीय भाषा के चैनल भी डिस्टर्ब होने लगे। और रात नौ से दस बजे कोई आपका चैनल ना देख पाये तो मतलब है जिस वक्त सबसे ज्यादा लोग देखते हैं, उसी वक्त आपको कोई नही देखेगा। यानी टीआरपी कम होगी ही। यानी मोदी सरकार के गुणगान करने वाले चैनलों के लिये राहत कि अगर वह सत्तानुकूल खबरों में खोये हुये हैं तो उनकी टीआरपी बनी रहेगी । और जनता के लिये सत्ता ये मैसेज दे देगी कि लोग तो मोदी को मोदी के अंदाज में सफल देखना चाहते है । जो सवाल खड़ा करते है उसे जनता देखना ही नहीं चाहती। यानी सूचना प्रसारण मंत्री को भी पता है कि खेल क्या है तभी तो संसद में जवाब देते वक्त वह टीआरपी का जिक्र करने से चूके । पर स्क्रीन ब्लैक होने से पहले टीआरपी क्यों बढ़ रही थी, इसपर कुछ नहीं बोले । खैर ये पूरी प्रक्रिया है जो चलती रही। और इस दौर में कई बार ये सवाल भी उठे कि एवीपी को ये तमाम मुद्दे उठाने चाहिये। मास्टर स्ट्रोक के वक्त अगर सेटेलाइट लिंक खराब किया जाता है तो कार्यक्रम को सुबह या रात में ही रिपीट टेलिकास्ट करना चाहिये। पर हर रास्ता उसी दिशा में जा रहा था जहां सत्ता से टकराना है या नहीं । और खामोशी हर सवाल का जवाब खुद ब खुद दे रही थी। तो पूरी लंबी प्रक्रिया का अंत भी कम दिलचस्प नहीं है । क्योंकि एडिटर-इन -चीफ यानी प्रोपराइटर या कहें प्रबंधन जब आपके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो जाये कि बताइये करें क्या? और इन हालातों में आप खुद क्या कर सकते है छुट्टी पर जा सकते हैं। इस्तीफा दे सकते है । और कमाल तो ये है कि इस्तीफा देकर निकले नहीं कि पतंजलि का विज्ञापन लौट आया। मास्टरस्ट्रोक में भी विज्ञापन बढ़ गया। 15 मिनट का विज्ञापन जो घटते घटते तीन मिनट पर आ गया था वह बढ़कर 20 मिनट हो गया। 2 अगस्त को इस्तीफा हुआ और 2 अगस्त की रात सैटेलाइट सिग्नल भी संभल गया । और काम करने के दौर में जिस दिन संसद के सेन्ट्रल हाल में कुछ पत्रकारो के बीच एबीपी चैनल को मजा सिखाने की धमकी देते हुये ‘पुण्य प्रसून खुद को क्या समझता है’ कहा गया । उससे दो दिन पहले का सच और एक दिन बाद का सच ये भी है कि रांची और पटना में बीजेपी का सोशल मीडिया संभालने वालों को बीजेपी अध्यक्ष निर्देश देकर आये थे ….” पुण्य प्रसून को बख्शना नही है । सोशल मीडिया से निशाने पर रखें। और यही बात जयपुर में भी सोशल मीडिया संभालने वालो को गई । पर सत्ता की मुश्किल यह है कि धमकी, पैसे और ताकत की बदौलत सत्ता से लोग जुड़ तो जाते है पर सत्ताधारी के इस अंदाज में खुद को ढाल नहीं पाते। तो रांची-पटना-जयपुर से बीजेपी के सोशल मीडियावाले ही जानकारी देते रहे आपके खिलाफ अभी और जोऱ शोर से हमला होगा । तो फिर आखिरी सवाल जब खुले तौर पर सत्ता का खेल हो रहा है तो फिर किस एडिटर गिल्ड को लिखकर दें या किस पत्रकार संगठन से कहें संभल जाओ । सत्तानुकूल होकर मत कहो शिकायत तो करो फिर लडेंगे । जैसे एडिटर गिल्ड नहीं बल्कि सचिवालय है और संभालने वाले पत्रकार नहीं सरकारी बाबू है । तो गुहार यही है लड़ो मत पर दिखायी देते हुये सच को देखते वक्त आंखों पर पट्टी तो ना बांधो।

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपाई ने अपने फेसबुक वाल पर साझा किया है)

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देश

आज़ादी के 71 साल बाद भी क्या हैं “आज़ादी के मायने”

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भारत विश्व का एक महान लोकतंत्र हैl इसकी आज़ादी को 71 साल हो गयेl हर साल आज़ादी का यह पर्व आता है और कुछ रश्म-आदायगी जैसे तिरंगा फहराने, कुछ भाषण-भूषण, सांस्कृतिक आयोजन व् संकल्प के साथ समाप्त हो जाता हैl ‘हिंदुस्तान’(मुग़ल काल) से आगे बढ़ता हुआ ‘इंडिया’(ब्रिटिश काल) दैट ईज़ “भारत” हो गया लेकिन युवाओं के मन में बार-बार यही सवाल उभरता है कि :-

“नबाब वही राजे वही कोहराम वही है
पदवी बदल गई किन्तु निज़ाम वही है
थका हुआ मजदूर वही दहकान वही है
कहने को तो भारत पर हिंदुस्तान वही है”

इसलिए महत्वपूर्ण यह जानना भी है कि आज़ादी के इन 71 सालों में इसमें क्या बदलाव आया? हम कितना आगे बढे! क्या हम उन आदर्शों पर चल पायें जिसकी बाट हमारे पूर्वजों ने जोही थी? क्या हमारा देश उस बुलंदी पर पहुँच पाया जो सपना आज़ादी के दीवानों ने देखा था? इन सवालों के जबाब जानना जितना आवश्यक है उतना ही ज़रूरी है यह जानना कि आखिर आज़ादी का मतलब क्या है? इसकी सैधान्तिकी क्या है तथा आधुनिक दौर में इसमें क्या तब्दीली आई? इन 71 सालों में आज़ादी की अवधारणा में क्या बदलाव आया है? क्या असीम आज़ादी की मांग को आज़ादी कहा जा सकता है? क्या किसी व्यक्ति या समाज के लिए बुनियादी ज़रूरतों को पाने की चाहत, आज़ादी की मान्यता के विपरीत है? क्या हमारी आज़ादी अपने मूल उद्देश्य में सफल हो पायी है? कुल मिलाकर यदि कहें तो आज़ादी के मायने क्या हैं तथा युवाओं के लिए आज़ादी का सही आदर्श क्या हो सकता है, यही जानना हमारा मकसद है?

‘आज़ादी’ की एक सर्वसम्मत परिभाषा तय करना काफी मुश्किल है, क्योंकि हर किसी के लिए आज़ादी के मायने अलग-अलग हैंl किसी के लिए विदेशी दासता से राष्ट्र की मुक्ति आज़ादी है तो कोई अपने मनमाफिक विचारों की अबाध अभिव्यक्ति को आज़ादी मानता हैl कोई बेलौस जीवन जीने की चाहत में आज़ादी महसूस करता है तो कोई असामनता, जाति-भेद और छुआछूत से मुक्ति की आकांक्षा को आज़ादी मानता हैl आज़ादी मुक्ति की चाहत का प्रतीक है, आज़ादी खुद को पूर्णतया अभिव्यक्त करने का एक एहसास है और आज़ादी हर प्रकार के गुलामी का प्रतिकार हैl सपाट शब्दों में यदि कहें तो व्यक्ति के बाहरी प्रतिबंधों का अभाव ही आज़ादी हैl हालाँकि प्रतिबंधों का न होना आज़ादी का सिर्फ एक पहलू हो सकता है, सम्पूर्ण अर्थ- विस्तार नहींl फिर भी आज़ादी व्यक्ति की आत्माभिव्यक्ति की योग्यता का विस्तार और उसके आंतरिक संभावनाओं का प्रसार ज़रूर हैl एक स्वतंत्र समाज वह होगा जो अपने सदस्यों को न्यूनतम समाजिक अवरोधों के साथ अपनी संभावनाओं के विकास में समर्थ बनाता हैl स्वतंत्रता, आज़ादी, स्वाधीनता आदि शब्द पर्यायवाची प्रतीत होते हैंl स्वतंत्रता का अर्थ है स्वयं के बनाए हुए तंत्र या system में रहनाl लेकिन यहाँ समझने वाली बात यह है कि स्वतंत्रता और स्वछंदता एक नहीं है बल्कि उसमें कुछ अंतर हैl स्वच्छंदता में तंत्र, सिस्टम या व्यवस्था का अभाव होता है जबकि स्वतंत्रता में सिस्टम या व्यवस्था उपस्थित रहता हैl उदाहरणस्वरुप, घर के बंद कमरे में व्यक्ति स्वछन्दता को धारण करता है क्योंकि वहां व्यवस्था के नाम पर सिर्फ वही है लेकिन लेकिन घर के बाहर वह स्वतंत्रता ही धारण कर सकता है क्योंकि वहां व्यवस्था के नाम पर समाज भी उपस्थित होता हैl बहरहाल ‘मैक्कनी’ के अनुसार ‘दूसरों को परेशान किए बिना स्वयं की इच्छानुसार निर्णय करना स्वतंत्रता हैl’ कहने का अर्थ यह कि जो आशय आज़ादी से है वही स्वतंत्रता से है लेकिन आज़ादी या स्वतंत्रता का मतलब स्वछन्दता नहीं होताl यानि स्वतंत्रता और आज़ादी में अर्थगत-भावगत समानता हैl इस प्रकार आज़ादी का विचार मानवीय चिंतन के समस्त आयामों को छूता हैl

यहाँ एक बात जो समझने वाली है वह यह कि आज़ादी के केंद्र में व्यक्ति है और व्यक्तिवादी अवधारणा का विकास यूरोप में रेनाशा या पुनर्जागरण के दौरान हुआl इसी व्यक्तिवादी सोच के फलस्वरूप लिबर्टी की अवधारणा का आगमन भी हुआl 1789 में फ़्रांस की राज्य क्रांति में स्वतंत्रता, समानता और विश्व बंधुत्व का जो विचार प्रगट हुआ, वही आगे चलकर स्वतंत्रता का आधार बनाl हालाँकि यहाँ यह जानना दिलचस्प है कि फ़्रांस की राज्य क्रांति में जो स्वतंत्रता का लक्ष्य था वह किसी विदेशी शासन के खिलाफ नहीं थाl वह तो खुद अपने ही देश के शासक और सामंत के खिलाफ थाl यानी स्वतंत्रता एक आत्मचेतना हैl इसके लिए विदेशी दुश्मन का होना ज़रूरी नहीं बल्कि सत्ता, सामंत, व्यवस्था या किसी व्यक्ति द्वारा लगाया प्रतिबन्ध ज़रूरी हैl दरअसल स्वतंत्रता बंधन-विरुद्ध भाव हैl एक ऐसा भाव जिसमें इंसान हँसते-हँसते सूली भी चढ़ता है तो उसे दुःख नहीं होताl यदि एक व्यक्ति की आज़ादी का इतना मोल है तो फिर राष्ट्र की आज़ादी कितनी अनमोल होगी समझा जा सकता हैl यह अफ्रीका की आज़ादी का ही भाव था जिस कारण ‘नेल्सन मंडेला’ ने 28 सालों तक जेल की यातनाएं सहीl यह म्यांमार की स्वतंत्रता की ही चाह थी कि ‘आंग-सांग-सू-की’ दशकों तक घर में नज़रबंद रहींl यही वह देश प्रेम का असीम भाव था जिस कारण भारत में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और खुदीराम बोस जैसे हजारों क्रांतिकारियों ने हँसते-हँसते अपनी जान कुर्बान कर दीl यही वह आज़ादी का स्वप्न था जिस कारण सुभाषचन्द्र बोस ने आज़ाद हिन्द फौज का गठन किया और लड़ते-लड़ते खुद को राष्ट्र की बलि बेदी पर होम कर दियाl यही वह देश को बंधनमुक्त देखने का एहसास था जिस कारण ‘महात्मा गाँधी’ जैसे महामानव ने अपना सम्पूर्ण जीवन बलिदान कर दियाl कहने का मतलब यह कि आज़ादी बंधनों का प्रतिकार है और प्रतिबंधों का नकार हैl फिर भी यह सवाल उठता है कि असीम आज़ादी क्या जायज़ कही जा सकती है?

स्वतंत्रता असीमित नही हो सकतीl असीम आज़ादी की चाहत, असीम विध्वंस को भी आमंत्रण देता हैl यह समाज के ढांचें में संभव नहीं हैl अगर धरती पर कोई अकेला मनुष्य होता तब यह संभव था पर जहाँ अरबों की संख्या में इन्सान बसते हैं, वहां एक आदमी का हित दूसरे आदमी से टकराएगा हीl अतः एक व्यक्ति की असीम आज़ादी दूसरे व्यक्ति के लिए बाधा उत्पन्न करती हैl यह एक प्रकार की हिंसा हैl चाहे यह हिंसा विचारों की हो, कार्यों की हो अथवा सोच की होl असीम आज़ादी का इस्तेमाल करते हुए किसी को नुकसान पहुँचाना अपनी आज़ादी में कटौती को भी आमंत्रित करना हैl ‘जॉन स्टुअर्ट मिल’ ने अपनी किताब ‘On Liberty’ में स्वतंत्रता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि “आपको लाठी घुमाने का अधिकार वहीं तक है जहाँ तक वह किसी और से ना टकराएl’’ (Your freedom ends where my nose begins). भारतीय संविधान में भी स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त निर्बंधन यानी जायज़ प्रतिबंध लगाये गये हैं जैसे देश की एकता अखंडता, लोकव्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य आदि के आधारों परl समाज में रहने वाला हर व्यक्ति हर किसी की सीमा और प्रतिबंधों की पूर्ण अनुपस्थिति की उम्मीद नहीं कर सकताl हम ऐसी दुनिया में नहीं रह सकते जहाँ कोई दूसरा मनुष्य उपस्थित ही न होl मनुष्य अंततः एक सामाजिक प्राणी हैl इसलिए हम ऐसी दुनिया में भी नहीं रह सकते जहाँ कोई प्रतिबन्ध ही न होl हमें कुछ प्रतिबंधों की ज़रूरत है वरना समाज अव्यवस्था और अराजकता के गर्त में डूब जायेगाl उदहारण के बतौर यदि हर देश कार्बन उत्सर्जन के मामले में मनमानी करने लगे तो वैश्विक जलवायु का क्या हश्र होगा यह समझा जा सकता हैl एक परीक्षार्थी उत्तर लिखने में स्वतंत्र हो जाए और परीक्षक नम्बर देने में स्वतंत्र हो जाये तो क्या होगा? यदि चोर को आज़ादी मिल जाए तब क्या होगा और पुलिस को आज़ादी मिल जाये तब क्या होगा? कहने का भाव यह कि घोड़े और घास को एक जैसी छूट सबकी आज़ादी में बाधक सिद्ध होगाl

देखा जाये तो बेबाक आज़ादी के सन्दर्भ में राजनैतिक चिंतकों ने दो विभाजन किये हैं – सकारात्मक स्वतंत्रता ( positive liberty) और नकारात्मक स्वतंत्रता यानी Negetive liberty l जहाँ बाहरी प्रतिबंधों का पूर्णतया नकार होगा वह नकारात्मक स्वतंत्रता है जबकि जहाँ अवसरों के विस्तार को पाने की चाहत हो वह सकरात्मक स्वतंत्रता हैl नकारात्मक स्वतंत्रता एक तरह से असीम आज़ादी सरीखी है जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता युक्तियुक्त निर्बन्धन के साथ अधिकतम अवसर का लाभ उठा सकने की चाहत हैl नकारात्मक स्वतंत्रता में अपनी आज़ादी को ही सर्वोच्च माना जाता है और हर प्रकार के बंधनों का नकार होता हैl जबकि सकारात्मक स्वतंत्रता में दूसरों की आज़ादी की भी परवाह का भाव है और युक्तियुक्त बंधनों का स्वीकार हैl सकारात्मक स्वतंत्रता के विमर्श की एक लम्बी परम्परा रही है जिससे रूसो, हेगेल, मार्क्स, गाँधी, अरविंदो और इन विचारकों से प्रेरणा लेने वाले लोगों के रूप में देखा जा सकता हैl इस परम्परा का सरोकार व्यक्ति और समाज के संबंधों की प्रकृति और स्थिति से हैl सकारात्मक स्वतंत्रता के पक्षधरों का मानना है कि व्यक्ति केवल समाज में ही स्वतंत्र रह सकता है समाज से बाहर नहींl इसलिए हमें समाज को ऐसा बनाने का प्रयास करना चाहिये जो व्यक्ति के विकास का रास्ता साफ़ करेl यहाँ समाज का अर्थ समूह, समुदाय अथवा राज्य कोई भी हो सकता हैl

इस आधार पर यदि हम देखें तो हमें जो वाक् और अभिव्यक्ति की आज़ादी दी गई है उसका उपयोग यदि हम भावनाएं भड़काने, अबाध गाली-गलौज करने तथा निरंतर शोर मचाने में करने लगे तो क्या यह सही कहा जा सकता है? शांतिपूर्ण सम्मलेन में यदि आप रास्ता जाम करा दें, परिवहन व्यवस्था ध्वस्त कर दें, कचरा फैलाकर गंध मचा दें तो क्या यह अच्छा कहा जायेगा? हमें संगठन का अधिकार है पर संगठन बनाकर हम नक्सलियों, आतंकवादियों की तरह लोगों के जीवन में दखल देना शुरू कर दें तो क्या यह अराजकता को निमंत्रण देना नहीं होगा? हमें प्राण व् दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार है, पर दूसरों की जान लेकर नहींl हमें देश में कहीं विचरण करने या घूमने की आज़ादी है पर ऐसा करके दूसरों के विचरण या वास में बाधा डालने वाले के रूप में नहींl हमें अपने धर्म के पालन का अधिकार है पर यह दूसरे को धर्मपालन से रोकने या उन्हें धर्मपालन को बाध्य करने की आज़ादी नहीं देताl इसलिए हमारा संविधान हमें जो अधिकार, समानता एवं स्वतंत्रता प्रदान करता है वह असीम व अबाध नहीं हैं क्योंकि आपकी स्वतंत्रता से अनिवार्य रूप से दूसरे की स्वतंत्रता भी जुड़ी हुई हैl हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज़ादी के पंख जिम्मेदारी की जड़ से जुड़ी रहें तो बेहतर है वरना खतरनाकl और यही बात सकारात्मक और नकारात्मक स्वतंत्रता के राजनैतिक सिधांत से भी दृष्टिगोचर होती हैl इसलिए सबको संविधान की सीमा में रहकर ही आज़ादी का उपयोग करना चाहियेl

जिस प्रकार हमें आज़ादी की ज़रूरत है वैसे ही कुछ प्रतिबंधों की भी ज़रूरत हैl यह ऐसी ही कोई उक्ति नहीं है बल्कि लिबर्टी की बात कहने वाले राजनैतिक चिन्तक ‘स्टुअर्ट मिल’ के विचारों से भी ज़ाहिर होता हैl राजनैतिक सिधांत के विमर्श में इसे हानि सिधांत या harm principle कहते हैंl सिधांत यह है कि किसी के कार्य करने की आज़ादी में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से दखल देने का एकलौता लक्ष्य आत्मरक्षा या Self Defence हैl सभ्य समाज के किसी सदस्य की इच्छा के खिलाफ शक्ति के औचित्यपूर्ण प्रयोग का एक मात्र उद्देश्य किसी अन्य को हानि से बचाना हो सकता हैl ‘स्टुअर्ट मिल’ ने इसे यहाँ स्वयंसंबद्ध (Self Regarding Action) और परसंबद्ध यानी Other Regarding Action के द्वारा समझायाl स्वयंसम्बद्ध वे कार्य हैं जिनके प्रभाव केवल इन कार्य को करने वाले व्यक्तियों पर पड़ते हैं जबकि परसम्बद्ध कार्य वे हैं जो कर्ता के अलावा बांकी लोगों पर भी प्रभाव डालते हैंl इसलिए ‘मिल’ का तर्क है कि स्वयंसम्बद्ध कार्य और निर्णयों के मामले में राज्य या किसी बाहरी सत्ता को कोई हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं हैl इसके विपरीत ऐसे कार्यों में जो दूसरों पर असर डालते हैं या जिनसे बाकी लोगों को हानि हो सकती उन पर बाहरी प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैंl

स्वतंत्रता के संबंध में उदारवाद और स्वराज जैसे शब्दों के अर्थ विस्तार को भी समझना ज़रूरी हैl एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में उदारवाद को सहनशीलता के मूल्य के साथ जोड़कर देखा जाता हैl उदारवादी चाहे किसी के विचार से असहमत हों तब भी वे उसके विचार और विश्वास रखने और व्यक्त करने देने का पक्ष लेते हैंl आधुनिक उदारवाद की विशेषता यह है कि इसके केंद्र में व्यक्ति हैl उदारवादी व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समानता जैसे मूल्य से भी अधिक वरीयता देते हैंl हालाँकि अब वे कल्याणकारी राज्य के महत्व को भी स्वीकार करते हैं और समानता के विचार को भी प्रश्रय देते हैंl इस प्रकार उदारवाद स्वतंत्रता की एक वैचारिक निष्पत्ति हैl जहाँ तक स्वराज की बात है तो भारतीय राजनैतिक विचारों में स्वतंत्रता की सामानधर्मी अवधारणा स्वराज हैl स्वराज का अर्थ स्व का शासन भी हो सकता है और स्व के ऊपर शासन भीl भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में स्वराज राजनैतिक और संवैधानिक स्तर पर स्वतंत्रता की मांग थी और सामाजिक सामूहिक स्तर पर एक मूल्य हैl स्वराज की यही समझ गाँधी जी के ‘हिन्द स्वराज’ नामक पुस्तक में भी प्रकट हुई हैl स्वराज सिर्फ स्वतंत्रता नहीं बल्कि ऐसी संस्थाओं से मुक्ति भी है जो मनुष्यों को उसकी मनुष्यता से वंचित करती हैl जब तक समाज में गरीबी, अशिक्षा, विषमता, बेरोजगारी, जातिवाद, सम्प्रदायवाद आदि है स्वतंत्रता बेमानी हैl पूंजीपति संसाधनों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और कहते हैं कि व्यापार की स्वतंत्रता हैl अपराधी नेता बन जाते हैं और कहते हैं कि राजनैतिक स्वतंत्रता हैl लोग सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, गंदगी फैलाते हैं, कानून का अनादर करते हैं और तर्क देते हैं कि वह स्वतंत्र हैंl यह स्वतंत्रता और समानता का चिर-परिचित विवाद हैl जहाँ एक ओर स्वतंत्रता अधिक होने से समानता कम हो जाती, विषमता बढ़ जाती है वहीँ दूसरी ओर समानता को आदर्श बनाने से स्वतंत्रता के मूल्यों का भी क्षरण होता हैl इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि सबको बराबर करने लिए किसी से छिनना पड़ेगा और किसी को देना पड़ेगाl इससे एक की स्वतंत्रता का हनन होगा जबकि दूसरे के समानता के अधिकार की रक्षा होगीl इस कारण उनमें संघर्ष बढ़ेगाl यही वजह है आरक्षण के मुद्दों पर अक्सर विवाद उभरता रहता हैl मूलतः यह समानता और स्वतंत्रता का द्वन्द हैl लेकिन यहाँ विवाद के बजाय आवश्यकता इस बात के समझने की है कि न ही एबसैल्यूट लिबर्टी हो सकती है न ही एबसैल्यूट इक्वलिटीl इसलिए दोनों में बैलेंस बनाने की ज़रूरत होती हैl अतः आरक्षण भी 50% से ज्यादा नहीं दिया जाता हैl फिर भी देखा जाए तो स्वतंत्रता को बनाये रखते हुए किया जाने वाला विकास ही बेहतर हैl भले ही यह धीमा हो लेकिन इसमें मानव गरिमा का सम्मान हैl

समस्त चर्चा का सार यही है कि आज़ादी के तर्क को नकारना किसी व्यक्ति के लिए संभव नहीं है, लेकिन यह असीमित नहीं हो सकतीl यहाँ एक बात और समझने की है कि लिबर्टी का कांसेप्ट व्यक्तिक स्वतंत्रता के रूप में ही विकसित, पल्लवित और पुष्पित हुआ हैl देश की आज़ादी का भाव भी सामूहिक आज़ादी की इच्छा की ही परिणति हैl आज फर्क सिर्फ यह पड़ा है कि पहले देश की आज़ादी में ही व्यक्ति की आज़ादी समाहित थी लेकिन आज जब हम विदेशी दासता से मुक्त हैं तो देश की आज़ादी के साथ-साथ व्यक्ति की आज़ादी भी प्रमुख हो गई हैl नेशन स्टेट की अवधारणा में एक लोकतांत्रिक सरकार के गठन का लक्ष्य जनता की आज़ादी को महफूज़ बनाये रखना हैl लेकिन कई बार ऐसा देखा जाता है कि स्टेट ही लोगों की आज़ादी का अपहरणकर्ता बन जाता है जो कि गलत हैl आज भारत को आज़ाद हुए 71 साल बीत गये हैंl इन 71 सालों में हमने अपने जीडीपी को 30.6 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर कर लिया; अपनी साक्षरता दर को 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 फीसदी कर लिया; देश की औसत आयु को 32 से बढाकर 67 वर्ष कर लिया तथा कुपोषण की दर को 87 फीसदी से घटाकर 44% कर लिया, लेकिन हम आज भी गरीबी और अशिक्षा से पूर्णतया मुक्त नहीं हो पाए हैं और जो इसकी बात करता है उसे देशद्रोही करार दे दिया जाता हैl हमने इन 71 सालों में अपनी अर्थव्यवस्था को क्रय-शक्ति-समता के आधार पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की कतार में ला खड़ा किया है, चाँद और मंगल की दूरियां नाप लीं लेकिन अंग्रेजो द्वारा बनाये गये काले कानून 124A को खत्म नहीं कर पाएl स्पेस रिसर्च और आईटी सेक्टर में हम अग्रिम पंक्ति में खड़े हैं लेकिन मानव विकास सूचकांक में पिछले पायदान पर रहते हैंl इन इकहत्तर सालों में हमने प्लेग, कालाजार, चेचक और पोलियो जैसी बिमारियों पर काबू पा लिया लेकिन जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्म, भाषा और सम्प्रदायवाद के नाम पर होने वाली हिंसा आज भी बेकाबू हैl यानी एक तरफ हमारी संवृद्धि बढ़ रही है तो दूसरी तरफ आज भी कुछ कमियां हैं जिनसे हम उबर नहीं पाए हैंl यह सच है कि भारत वर्ष में जितनी आज़ादी है उतनी संभवतः दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में नहीं है पर यह भी सच है कि समय-समय पर आज़ादी के बाद भी उसमें राज्यसत्ता द्वारा कटौती की कोशिश की जाती रही हैl हालाँकि भारतीय समाज की आस्थाएं सामुदायिकतावादी रही हैं इसलिए हम सबकी आज़ादी का सम्मान करते हैं फिर भी बाह्य दुश्मन या आंतरिक शत्रु से यदि हमारी आज़ादी को खतरा हो तो उसके लिए हमें हमेशा तैयार रहने की ज़रूरत भी हैl साथ ही सरकार को भी यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि सत्ता को मान्यता जनता से इसलिए मिलती है ताकि वह जनता के अधिकारों की रक्षक बन सके न कि उनके अधिकारों में कटौती करने करने लगेl

क्या हमारे आज़ादी का मतलब इन इकहत्तर सालों में इतना पंगु हो गया है कि कोई नौजवान यदि गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, पूंजीवाद आदि से आज़ादी की बात करे तो उसे देशद्रोही करार दे दें, उसे जेल में डाल दें, उसकी लिंचिंग करवा देंl यदि ऐसा है तो सही ही कहा गया है कि :-

“भगत सिंह नहीं काया लेना फिर से भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फांसी की”

क्या हम आज़ाद भारत को एक ऐसा मुल्क बनाना चाहते हैं जहाँ सरकार की आलोचना देश की आलोचना समझ ली जाए? क्या हम इंडिया को ऐसा देश बनाना चाहते हैं जहाँ प्रधानमंत्री की आलोचना राष्ट्र की आलोचना मान ली जाए? क्या हम हिंदुस्तान को एक ऐसा वतन बनते देखना चाहते हैं जहाँ आम आवाम का हक़ सत्ता की बलि वेदी पर कुर्बान होता रहे? सता ने आम जनता के ऊपर जो फर्जी राष्ट्रवाद की की चादर डाल रखी है हमें उससे बाहर निकलकर देखना पड़ेगा तभी, आज़ादी का सही मायने समझ में आएगाl

आज़ादी के इस पावन पर्व पर हमें यह समझना होगा कि न सरकार और राज्य(Nation state) एक है, न ही सरकार और देशl सरकारें आती-जातीं रहतीं हैं लेकिन देश बना रहता हैl राज्य संविधान, कानून, प्रशासन तथा सेना से चलता है जबकि राष्ट्र एक भावना है जिसके मूल में राष्ट्रीयता का भाव निहित होता हैl इसलिए कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि राजद्रोह राष्ट्रभक्ति के आवश्यक हो जायेl ऐसी परिस्थिति में सरकार की आलोचना नागरिकों का पुनीत कर्तव्य हैl वस्तुतः उत्तरदायी शासन के लिए सरकार की आलोचना आवश्यक हैl इसके अभाव में सरकारें सर्वसत्तावादी बन सकती हैंl फांसीवादी और तानाशाही शासन इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैंl इसलिए दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देशों में विपक्ष की परिपाटी रही है, स्वतंत्र मीडिया रही है साथ ही नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की आज़ादी भी दी गई हैl तमाम रिजनेबुल रिस्क्रिक्टशन के बाबजूद यह मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उन्हें भी होनी चाहिए जिनके विचार आज की परिस्थितियों में गलत या भ्रामक लगेl हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्य हमेशा विरोधी विचारों के टकराव से ही पैदा होता हैl यदि हम सत्ता विरोधी आवाजें कुचल देंगे तो जनहितैषी संभावनाशील ज्ञान के लाभ से भी वंचित हो जायेंगे और अपनी तथा देश की आज़ादी को भी गंवा बैठेंगेl इसलिए व्यक्ति और सत्ता का सम्बन्ध आज़ादी के सकारात्मक सिधांतों के अनुरूप ही रहना चाहिएl राज्य, सत्ता, व्यक्ति और समाज जब पॉजिटिव way में आज़ादी को ग्रहण करते हुए विकास के पथ पर अग्रसर होगें तभी नये भारत का सपना साकार होगा और गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी से आज़ादी मिलेगीl अतः आज़ादी पर्व के इस सुअवसर पर आज़ादी के वास्तविक मायने को समझते हुए इस दिशा में आगे बढ़ने की ज़रूरत हैl

“दबे पैरों से उजाला आ रहा है, फिर कथाओं को खंगाला जा
प्रश्न का उत्तर कठिन है इसलिए भी, प्रश्न सौ सौ बार टाला जा रहा है”

धन्यवाद…

हेमंत कुमार

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देश

वे हमें डरा नहीं सकते:- उमर ख़ालिद

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कल बंदूक से उमर खालिद पर हुए हमले के बाद उमर खालिद ने अपने फेसबुक पर अंग्रेजी में एक स्टेटस डाला जिस का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है।

वे हमें डरा नहीं सकते!…………………उमर ख़ालिद

कल, मेरे जीवन को लेने की कोशिश पर मेरा बयान

मुझे पता है कि किसी भी दिन मेरे खिलाफ एक बंदूक हो सकती है ।

Dhabolkar, kalburgi, जुमेदार, गौरी लंकेश..लिस्ट बढ़ रही है । लेकिन क्या मैं यह कह सकता हूँ कि मैं इसके लिए तैयार था? क्या कभी कोई कह सकता है कि वे ऐसी स्थिती के लिए तैयार हैं? नहीं. और दो दिन पहले 15 अगस्त से भी सवाल यह भी है कि ” आजादी ” का भी क्या मतलब है कि इस देश के नागरिकों को सिर्फ अन्याय के खिलाफ मुखर होने के लिए अपने ” अपराध ” के लिए मरने के लिए तैयार रहना होगा?

सबसे ज्यादा उलटा क्या है कि मैं “डर से आजादी” नामक घटना में भाग लेने के लिए चला गया था, जब एक अज्ञात ने ने मुझे हमला किया और संविधान क्लब के सामने मुझे मारने की कोशिश की ।

यह तथ्य है कि स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले, राष्ट्रीय राजधानी के सबसे अधिक “उच्च सुरक्षा” क्षेत्र में एक सशस्त्र बच ने मुझे व्यापक रूप से हमला करने की हिम्मत कर सकती है, केवल पर दण्ड दिखाने के लिए जाता है कि कुछ लोगों को लगता है कि वे इस के तहत आनंद लेते हैं वर्तमान शासन । मुझे नहीं पता कि वह कौन था या उसके पीछे की ताकतें कौन हैं । कि पुलिस के लिए जांच करने के लिए है. लेकिन मैं यहाँ राज्य करना चाहता हूँ कि अगर कुछ shameful कल हुआ होता, या अगर कल होना होता, तो बस उस “अज्ञात ने” को जिम्मेदार मत रखना । असली गुनहगार वे हैं जो सत्ता की अपनी सीटों से, खूनखराबे और डर का माहौल बना रहे हैं. असली गुनहगार वे हैं जिन्होंने हत्यारे और mob जप्त के लिए पूरी सजा का माहौल प्रदान किया है. असली गुनहगार तो सत्ताधारी पार्टी और प्राइम टाइम एंकर और टीवी चैनलों के कोविन्द हैं जिन्होंने मेरे बारे में आसार फैला दिया है, ब्रांडेड मैं झूठ पर आधारित राष्ट्र विरोधी और वस्तुतः मेरे खिलाफ एक लिंच-भिड क़ौम है. इसने विशेष रूप से मेरे जीवन को अत्यधिक कमजोर बना दिया है ।

आज भी पुलिस ने धारा 307 और हथियार एक्ट के तहत एक अपराध दर्ज किया है, ऐसा क्यों है कि भाजपा से एक सांसद, मीनाक्षी लेखी और अन्य भगवा एजेंट ऑनलाइन हैं, यह सुझाव देने की कोशिश कर रहे हैं कि हमला कभी नहीं हुआ, या बदतर है कि मैं इसे अपने दम पर तैयार किया? जैसे मैंने किसी पर उंगलियों का इशारा नहीं किया है, वह कथा को मोड़ देने के लिए इतने बेताब क्यों हैं? इस छटपटाहट को किस की निशानी के रूप में लिया जाना चाहिए? उनका अपना मजबूर? खैर, अगर कोई गौरी लंकेश की हत्या को एक उदाहरण के रूप में देख रहा है, तो अन्य स्पष्ट रूप से हिंदुत्व आतंक के कपड़ों के हाथों को उजागर करता है. तो जब हम “अज्ञात बंदूकधारियों” कहते हैं, तो क्या महत्वपूर्ण है कि इन आतंक हमलों के पीछे असली खिलाड़ियों की पहचान करना है ।

मेरे खिलाफ ये नफरत अभियान पिछले दो साल से चल रहा है । कोई सबूत नहीं, सिर्फ झूठ है । कोई चार्ज-शीट नहीं हुआ है, केवल मीडिया-ट्रायल । कोई तर्क नहीं है, केवल घुमाना है । कोई बहस नहीं हुई, सिर्फ मौत की धमकियां । और आज यह सब एक बंदूक के लिए नीचे आ गया है. क्यों कि ” tukde tukde ” जैसे हैशटैग सचमुच मेरे नाम के लिए एक उपसर्ग बन गए हैं, जबकि भाजपा के नेताओं ने खुलकर समर्थन किया जो कहते हैं कि वे देश के ” tukde tukde ” करेंगे अगर एक निश्चित फिल्म जारी है? ऐसा क्यों है कि मुझे राष्ट्र विरोधी कहा जाता है और कभी भी मीडिया मुकदमा खत्म करने का काम नहीं कर रहा है, लेकिन राजधानी के दिल में संविधान को जलाने वालों के खिलाफ कोई आक्रोश नहीं है, दिल्ली पुलिस की उपस्थिति में बस कुछ दिन पीछे? ऐसा क्यों है कि जो लोग अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत-उकसा कर देश को polarizing कर रहे हैं और mob-जप्त को सम्मानित करके सम्मानित, श्रद्धेय और मचा हैं? और हम नफरत के खिलाफ बोलने वाले villainized हैं? ऐसा क्यों है कि जो लोग जाति के नाम पर समाज को बांटने की बात करते हैं और दलितों पर हमला करते हैं – shambhaji भिडे की पसंद, जिसे पीएम मोदी एक महापुरुष कहते हैं-देश को टुकड़े करने का आरोप नहीं लगा रहे हैं? ऐसा क्यों हो रहा है कि सत्ता में जो लोग इस देश के टुकड़े को इस देश के टुकड़े को टुकड़े करके बड़े बड़े स्कॉरपिओ के साथ बेचना चाहते हैं, उन्हें deshbhakts के रूप में मनाया जाता है और उनके आलोचकों को ” राष्ट्र विरोधी ” माना जाता है “? ये सभी प्रासंगिक प्रश्न हैं .

और अगर ये लोग इस बात पर ईमान रखते हैं कि इस तरह के हमलों के साथ हमें (अज़ाब से) डराने वाला है तो (आख़िर) ये लोग (ख़ुदा के अज़ाब से) गौरी लंकेश के विचार, विचार ” ने उन्हें outlived किया है । वे हमें मौन में नहीं ले सकते, न उनकी जेलों के साथ, और न ही उनकी गोलियों के साथ. हमने इसे कल ही साबित कर दिया । मुझ पर हमले के बावजूद, कार्यक्रम khauf से आजादी (डर से आजादी), नफरत के खिलाफ एकजुट होकर संविधान क्लब में सफलतापूर्वक आयोजित किया गया । नजीब की माँ फातिमा nafes, alimuddin की पत्नी (जिनके हत्यारे केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने हाल ही में) मरियम, जुनैद की माँ (16 साल पुरानी मार को पिछले साल एक ट्रेन पर) फातिमा, rakbar खान के भाई अकबर, डॉ कफ़ील खान साथ में प्रशांत भूषण, प्रो. परेशान, सीनियर darapuri, मनोज झा और कई अन्य लोगों ने अपनी आवाज को नफरत, अगर और आतंक के खिलाफ अपनी आवाज उठाने को संबोधित किया । यही हमारे प्रतिरोध की भावना है.

मैं भी इस मांग को दोहराना चाहता हूं कि दिल्ली पुलिस मुझे सुरक्षा के साथ प्रदान करें क्योंकि मेरे जीवन को लगातार खतरा है । पिछले दो सालों में मैंने दिल्ली पुलिस से दो बार पुलिस सुरक्षा की मांग की है, लेकिन केवल एक कठोर प्रतिक्रिया से मुलाकात की जा रही है । मुझे पिछले में कई बार मौत की धमकी दी गई है और सोशल मीडिया पर हर रोज कई खतरे और inciteful संदेश प्राप्त करते हैं. कल की घटना के बाद दिल्ली पुलिस का इंतजार क्या है? मैं सभी लोकतांत्रिक ताकतों से अपील करता हूँ कि दिल्ली पुलिस को सुरक्षा के साथ मुझे प्रदान करें, क्योंकि अब मैं सुरक्षा के बिना कहीं भी जाने के लिए संभव नहीं है.

मैं न्याय के अनगिनत शुभचिंतकों और सह-सेनानियों का धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने मेरे द्वारा खड़े होकर इस कायराना हरकत के खिलाफ बात की । यह लोकतंत्र के लिए सामूहिक लड़ाई है कि हम सभी का हिस्सा है और हम सावरकर और गोडसे के अनुयायियों को अवश्य परास्त करेंगे । कल जब एक बार फिर से उच्च ग्रुप के लाल किले के चबूतरे से हाई वोल्टेज झूठ और चीनी-कोटेड: की बौछार, असली आजादी और मर्यादा के लिए हमारी लड़ाई, और भगत सिंह और बाबासाहेब आंबेडकर के सपनों को हकीकत में बना रहे हैं अधिक समाधान के साथ जारी रहेगा.

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युवाओं की आवाज़ जेल और गोलियों के डर से ना पहले कभी दबी थी, ना आगे कभी दबेगी:- कन्हैया कुमार

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उमर खालिद पर  हुए जानलेवा हमले के खिलाफ देशभर के युवा एक जुट होने लगे। जहां एक तरफ छात्र नेता शेहला रशीद ने उमर के पक्ष में ट्वीट करते हुए सत्ता के नशे में चूर सत्ताधारियों को लताड़ा वहीं जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने देश मे बढ़ रहे जंगलराज पर सरकार को आड़े हाथों लेटवहुये मीडिया को भी नही छोड़ा। उन्होंने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा कि:-

देश में जंगल राज का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि संसद भवन से थोड़ी दूर कभी संविधान की प्रतियाँ जला दी जाती हैं तो कभी उमर ख़ालिद पर गोली चलाने जैसे अपराध को अंजाम दिया जाता है। स्वतंत्रता दिवस से पहले संसद भवन के पास किसी नागरिक पर इस तरह हमला करना यह दर्शाता है कि इस देश में अपराधियों का मनोबल कितना बढ़ गया है। इसके लिए अपराधियों को मिलने वाला सरकारी संरक्षण और दरबारी मीडिया का प्रोत्साहन जिम्मेदार है। लेकिन युवाओं की आवाज़ जेल और गोलियों के डर से ना पहले कभी दबी थी, ना आगे कभी दबेगी।

इस शर्मनाक और कायराना हमले की सिर्फ़ आलोचना करने से काम नहीं चलेगा। हमें अभी डर का माहौल बनाकर देश को लूटने वालों के ख़िलाफ़ एक बड़ा मोर्चा बनाकर बार-बार सड़कों पर निकलना होगा। भाजपा की मीनाक्षी लेखी ने आज की इस कायराना हरकत को सनसनी फैलाने वाला तमाशा बताया है। यह बयान उस पार्टी की तरफ़ से आया है जिसने लोकतंत्र को ख़ुद तमाशा बना दिया है।

कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कहते हैं-

“भेड़िया गुर्राता है
तुम मशाल जलाओ।
उसमें और तुममें
यही बुनियादी फर्क है
भेड़िया मशाल नहीं जला सकता।

अब तुम मशाल उठा
भेड़िये के करीब जाओ
भेड़िया भागेगा।”

संघ-भाजपा की नफरतवादी विचारधारा के खिलाफ सभी प्रगतिशील ताकतों को एकजुट होकर प्रेम, सद्भावना और संघर्ष की मशाल जलानी होगी क्योंकि आज अगर खामोश रहे तो कल सन्नाटा छा जाएगा।

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