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बीट विशेष

त्रिपुरा में कम्युनिस्टों की हार, क्या खत्म होने की कगार पर है कम्युनिस्ट विचारधारा?

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प्रतीकात्मक चित्र

त्रिपुरा कम्युनिस्टों का एक मजबूत गढ़ जहां पर कम्युनिस्ट पिछले 25 सालों से राज कर रहे है, जहां कम्युनिस्टों पर किसी भी तरह का भ्रष्टाचार का आरोप नही है, जहां के मुख्यमंत्री माणिक सरकार अपने आप मे वक मिसाल के तौर पर देखे जाते है तो आखिर ऐसी क्या वजह है कि कम्युनिस्टों के ऐसे गढ़ में भाजपा ने सेंधमारी कर दी और वहां पर सरकार बना कर कम्युनिस्टों को किनारे कर दिया।

कहने को तो त्रिपुरा सरकार पर किसी भी तरह का भ्रष्टाचार और स्कैम का आरोप नही है लेकिन रोज वेली स्कैम त्रिपुरा पर चांद पर दाग के समान ही है। रोज वैली स्कैम भारत का सबसे बड़ा पोंजी फ्रॉड है। इसमें हजारों छोटे निवेशकों से धोखाधड़ी की गई। मनोज कुमार ने मई में सरेंडर किया था। उन्हें 10 दिन के लिए पुलिस रिमांड पर भेजा गया था। बांकशाल कोर्ट ने उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी थी। इसके बाद कुमार को पुलिस रिमांड पर भेजा गया था। उन पर भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के तहत आपराधिक षडयंत्र और पैसा वसूलने के आरोप हैं।

त्रिपुरा ने शिक्षा के क्षेत्र में केरल को भी पछाड़ दिया है और अब देश का सब से साक्षर राज्य बन गया है पर क्या यहां पर रोजगार भी उसी गति से बढ़ा है जिस गति से शिक्षा बढ़ी है? बिल्कुल नही बढ़ी है रोजगार के मामले में त्रिपुरा फिसड्डी साबित हो रहा है। जहां एक तरफ वामपंथी शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार की बात करते है वहीं उन्ही राज्यों में रोजगार दिलाने में नाकाम है जहां की वह कई वर्षों से राज करते आ रहे है। हालात आज भी यह है कि त्रिपुरा बेरोजगारी के मामले में काफी बदतर हालात में हैं। यहां पर बेरोजगारी दर 19.7 फीसदी है

ये सच है है माणिक सरकार पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नही है और वह देश के सब से गरीब मुख्यमंत्रियों में गिने जाते है जिन के पास अपने कार्यालय जाने के लिए भी मात्र एक साइकल है पर इस का मतलब ये तो नही है कि वह राज्य के युवाओं को भी बिना रोजगार का रखे और रोजगार के नए रास्ते ना तलाशें। मानते है कि वामपंथ और दक्षिणपंथ की लड़ाई बहुत पुरानी है और हमेशा चलती रहेगी पर इस का मतलब ये तो नही है कि ये दोनों मिल कर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ ही शुरू कर दें।

कहीं ऐसा तो नही है कि अब वामपंथी विचारधारा समाप्ति की ओर है? क्या अब वामपंथ पर से आम जनता का भरोसा उठ गया है। अगर ऐसा है तो ये दक्षिणपंथ और पूंजीवाद की बहुत बड़ी जीत साबित हो रहा है और एक बार फिर से पूरा देश सामंती ताकतों की ओर बढ़ रहा है।

वामपंथी विचारधारा की सब से बड़ी कमजोरी है इस का टुकड़ों में बंट जाना। और दक्षिण पंथ की सब से बड़ी ताकत है उन का एक जुट होना। अगर यहां कहावत कही जाय कि बंदरों की लड़ाई में बिल्ली बाजी मार ले गई तो कुछ गलत नही होगा। आखिर कम्युनिस्ट आपा में लड़ भी तो बंदरों की तरह ही रहे है। एक तो सब वामपंथियों ने मिल कर 100 पार्टीयां बना ली है और ये 100 पार्टीयां आपस मे ही लड़ती भिड़ती रहती है।

ऐसा भी नही कह सकते है कि त्रिपुरा में भाजपा विकास के नाम पर सत्ता में आई है क्यों कि विकास का क्या हाल है ये पूरा देश देख रहा है। विकास हर बार पैदा होते होते रख जा रहा है और विकास के पापा पैसा ले कर विदेश फरार हो जा रहे है। लेकिन त्रिपुरा में भाजपा का आना बहुत बड़ा संकेत है कि कहीं ना कहीं भाजपा लोकतंत्र को खत्म करने के लिए बहुत बड़ा खेल खेल रही है।

अगर वामपंथी पार्टीयों को अपनी विचारधारा बचानी है अपना अस्तित्व बचना है तो सब को मिल कर एक होना होगा और अगर एक नही होंगे तो पहले पश्चिम बंगाल फिर त्रिपुरा उस के बाद बाकी राज्यों का नंबर और आखिर में देश से ही विचारधारा की समाप्ति हो जाएगी।

 सिंधु खंतवाल

ये लेखक के स्वयं के विचार है

बीट विशेष

जो ऊपर हैं वो मग़रूर हैं, जो नीचे हैं वो मजबूर हैं

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Pic Credit: Cartoonstock.com
 हमारी पस्ती का सिर्फ़ एक ही कारण है कि, “जो ऊपर हैं वो मग़रूर हैं, जो नीचे वो मजबूर! ऊपर के लोग अपने से नीचे के लोगों की राय लेना आपनी तौहीन समझते हैं! कोई व्यक्ति अपनी ख़ूबी दिखा ही नहीं सकता अगर आप उसकी अवहेलना ही करते रहेंगे!
उसूल और पाबन्दी, पाबन्दी और सख़्ती, सख्ती और ज़ुल्म के बीच की लाईन बड़ी महीन है जिसकी पहचान होना हुक्मरानों के लिए बहुत ज़रूरी है! एक अच्छे हुक्मरान के लिए यह ज़रूरी है कि उठाए गए सवालों की गहराई में जाएं, ना कि सवाल करने वालों को ही बदनाम करने की कोशिश में लग जाएं!
सीधे पहाड़ की चोटी पर उतरने से पहाड़ पर चढ़ने का तज़र्बा नहीं मिलता! ज़िन्दगी की सीख पहाड़ की चढ़ानो पर मिलती है चोटी पर नहीं! चढानों पर ही तज़ुर्बे मिलते हैं और ज़िन्दगी मँझती है! आप किसी भी सख्स को चोटी पर तो चढ़ा सकते हैं लेकिन अगर उसे चढ़ाई का तज़र्बा नहीं तो यह उसके और आपके मिशन, दोनों के लिए ख़तरनाक होगा!
कोई भी शख़्स अपनी ज़िम्मेवारी में तभी क़ामयाब हो सकता है, अगर वो विश्वासी तथा उत्तरदायी हो और अपने फ़ैसलों के लिए उसे सही हद तक आज़ादी हो! आज़ादी हासिल करने के लिए भी उसी हद तक शिक्षित हो! शिक्षा एक बहुत ही महत्वपूर्ण हथियार है, शिक्षा जितनी ज़्यादा होगा उतनी ही आज़ादी मिल पाना संभव होगा!
लोकतंत्र में आज़ादी पाने के लिए सच्चे रहनुमाओं की ज़रूरत है!और सच्चे रहनुमा वही हो सकते हैं जिनकी जानकारी मुक़म्मल हो! जानकारी तभी मुक़म्मल होगी जब आप शिक्षण तथा प्रशिक्षण को बढ़ावा देंगे! अपने काम को अपना फ़ख्र समझेंगे, जिस काम में यक़ीन हो वही करें वरना दूसरों के विश्वासघात का शिकार बनते रहेंगे!
लेकिन, हमारी सच्चाई यही है कि हम अपने प्रशिक्षित, ईमानदार तथा उपयोगी लोगों को हद दर्जे तक निचोड़ कर छोड़ देते हैं, जिससे वो नाकाम और निकम्मे लोगों से चिढ़ने लगते हैं! अलग-अलग हुक्मरानों से वफ़ा करते-करते हमने अपनी हैसियत खो दी है! मौजूदा हालात ऐसे हो गए हैं कि हमे अपने ही समाज से चिढ़ होने लगी है और हम तकलीफ़ में रहने लगे हैं, लेकिन फिरसे उठ खड़े होने को जी चाहता है जब बेंजामिन फ्रेंक्लिन की यह बात नज़र पे आती है!
“जिन बातों से तकलीफ़ होती है, उनसे ही तालीम भी मिलती है”!
लेखक:शाहनवाज़ भारतीय, शोधकर्ता, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली!
नोट:ऊपर लिखी गई बातों में अधिकांश बातें डॉ. ए. पी. जे अबुल कलाम की हैं जो आज के नेताओं को भी आईना दिखाती हैं अगर वो देखना चाहें तो!
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बीट विशेष

कॉमरेड ज्ञानेद्र खंतवाल के नेतृत्व में उत्तराखंड के सीमान्त जिले चमोली में सी पी एम् ने किया केरल आपदा पीड़ितों के लिए चन्दा

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केरल में आई भीषण आपदा ने केरल को तहस नहस कर दिया है. पूरा भारत केरल के लिए आपदा रहत कोष जुटाने में लगा हुआ है. इसी दौरान भारतीय कमुनिस्ट पार्टी माक्सवादी, भारत ज्ञान विज्ञानं समिति और तमाम सामाजिक संगठनो द्वारा भारत के तमाम कोनो से राहत कार्य के लिए चन्दा एकत्र कर मानवता के हित में अपना योगदान देने की कोशिश कर रहे हैं. इसी कड़ी में उतराखंड के सुदूर पिछड़े एवं सीमांत इलाके में स्थित चमोली जिले के घाट ब्लाक में भी सी पी आई एम् के कार्यकर्ताओं ने केरल राहत कोष के लिए चन्दा इकठ्ठा किया.

घाट में किये जा रहे चंदा कार्यक्रम का नेतृत्व ज्ञानेंद्र खंतवाल द्वारा किया गया. ज्ञानेंद्र खंतवाल से हुई बातचीत में उन्होंने कहा की केरल में आई आपदा कोई छोटी आपदा नहीं है इस आपदा के लिए पुरे देश को एक जुट होकर के सामने आना होगा. केरल प्रगतिशील राज्य है और भारत सरकार को भी चाहिए की केरल की खूबसूरती को एक बार फिर से वापस लाने में केंद्र सरकार को भी अहम् भूमिका निभानी चाहिए.

उन्होंने आगे कहा सन 2013 में आई केदारनाथ आपदा में केरल से आई भारत ज्ञान विज्ञान समिति की डाक्टरों की टीम ने कई महीनो तक दवाइयों के साथ केदारनाथ में ही  डेरा डाल कर रखा हुआ था और उन्होंने आपदा पीड़ितों के लिए मुफ्त चिकित्सीय सहायता प्रदान किया था.

जब केरल आपदा के वक्त हमारे काम आ सकता है तो हमारा भी यह फर्ज बनता है कि जब केरल आपदा से जूझ रहा है तो हमें केरल के साथ तन मन और धन के साथ जुटना चाहिए.

घाट में हुए चन्दा कार्यक्रम में कामरेड मदन मिश्रा, कमलेश गौड़, मोहन सिंह रावत, नरेंद्र रावत, कुंवर राम, कान्ति, प्रताप सिंह, विक्रम, सोहन लाल आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

(प्रेस रिलीज द्वारा प्राप्त )

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RSS संचालित स्कूल में मासूम बच्चों से पूछा जा रही उसकी जाति, पिता ने किया फेसबुक पोस्ट

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कागज़ के फूलों से पूछी जा रही उसकी खुशबू की जाति !

गुरूजी, आखिर क्यों पूछते हो बच्चो से उनकी जाति ?

मासूम बच्चो के कोमल मनमस्तिष्क में भरी जा रही जाति का जहर

आनंदराम ढांढनिया सरस्वती विद्या मंदिर भागलपुर में अनोखा कारनामा

भागलपुर के आनंदराम ढांढनिया सरस्वती विद्या मंदिर में छोटे छोटे बच्चो से उसकी जाति पूछी जा रही है . यह कारनामा और कोई नहीं खुद स्कूल के क्लास टीचर कर रहे है… जिसे स्कूल में बच्चे आचार्य जी कह कर सम्बोधित करते है, शनिवार को अंतिम पीरियड में क्लास में बच्चो से क्रमवार तरीके से उसकी जाति पूछी गयी …कई बच्चो ने ठीक से जबाब से दे दिया लेकिन जब पांचवी में पढ़ने वाली मेरी बिटिया तनिष्का सिंह से जब यह सवाल पूछा गया तो वह सही जबाब नहीं दे सकी ,,उसने अपना नाम बताया तनिष्का सिंह तो क्लास टीचर ने कहा भूमिहार हो ? मेरी बेटी ने कहा ये क्या होता है ,, मैं नहीं जानती , क्लास टीचर ने कहा ,,, स्कूल आईडी दिखाओ-जहा नाम लिखा था – तनिष्का सिंह गहलौत . क्लास टीचर ने कहा – बाबू साहब हो ,,,मेरी बिटिया ने कहा – नहीं जानते सर.. राजपूत हो … बिटिया ने कहा नहीं जानते सर,, मेरे पापा को pata होगा,? क्लास टीचर ने आईडी कार्ड पर मेरा नाम लिखा देखा, कहा – सोमनाथ आर्य,, जाति समझ में नहीं आया ,,, तो बोले क्या करते है पापा ? बिटिया बोली – जौर्नालिस्ट है? क्लास टीचर ने कहा सोमवार को जाति पता कर आना,…
बिटिया जब घर आयी तो बोली – पापा मैं कौन सा कास्ट हूँ .मैंने कहा क्यों ? उसने कहा क्लास टीचर ने पूछा है… मैंने सिलसिलेवार तरीके से पूरी जानकारी ली. फिर स्कूल फ़ोन लगाया ,,,मैंने सवाल किया – छोटे बच्चो से उनकी जाति क्यों पूछी जा रही है, जबाब मिला,पटना से एक फॉर्म आया है,उसके लिए जाति पूछना अनिवार्य है … मैं अपने बच्चो को उसकी जाति बता दू या स्कूल जाकर उसके क्लास टीचर से मिलू ? मार्गदर्शन करे ? …… बच्चों से उसकी जाति पूछने वाले क्लास टीचर का नाम है ,,गोपाल आचार्य जो गणित पढाते है.

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