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समाज

बैंकों में महिला कर्मियों की हालत बद्तर, पढ़े बैंक कर्मियों द्वारा लिखा गया पत्र:रविश कुमार

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Photo: NDTV

बैंकरों के पत्र आए हैं….अगर जोक्स शेयर से वक्त मिल जाए तो पढ़िएगा..

1) A very good morning sir
सर आपने जो बैंको में महिलाओं की समस्याओं को लेकर मुद्दा उठाया वो सब जायज है ।
मेरी एक अनुरोध है सर कृपया हमारे पीरियड्स को भी लेकर बोले कितने बार हमें इसके लिए तकलीफ होती है।
हम दर्द में होते है लेकिन फिर भी हम छुट्टी नही ले सकते हे जबकि सेंट्रल गवर्नमेंट में इसके लिए महिलाओं को 2 दिन की छुट्टी दी जाती है।
आपसे अनुरोध है सर की बैंको में भी हमे 2 दिन की छुट्टी दिलवाने की कोशिश की जाये इसके लिए मैं सदा आपकी आभारी रहूगी ।
One of the women banker’s
And hats off to you for your support to Bankers and thank you
Keep going sir we are with you

2)एक महिला बैंकर ने लिखा है कि ब्रांच मैनेजर सवाल करने पर गंदी गंदी गालियां देता है। मैं एक महिला बैंकर हूं। घर पर 8 महीने का बच्चा मेरी राह देखता है। रिज़र्व बैंक से शिकायत कर सकती हूं कि देर शाम तक रोक कर काम कराया जाता है मगर ब्रांच में सस्पेंड कर दी जाऊंगा या फिर तबादला।

3) रवीश जी, नमस्कार, आपकी वजह से हम बोलना सीख रहे हैं। हमारे सीनियर ब्रांच में आए थे। जिन खातों में बड़े बड़े रीजनल मैनेजर और रिकवरी एजेंट रिकवरी नहीं करा पाए, उन खातों की रिकवरी के लिए हमें बस से या अकेले जाने को बोलते हैं। मैंने अकेले जाने से मना कर दिया।
4) मैं एक महिला बैंकर हूं। बहुत मेहनत से पीओ बनी मगर ट्रक दुर्घटना की शिकार हो गई. व्हील चेयर पर आ गई। मेरा शरीर कमज़ोर हो चुका है जिसका असर काम के रफ्तार पर पड़ता है। मगर मेरी ईमानदारी और इरादे पर कोई शक नहीं कर सकता। चार महीने बाद मेरी तबीयत फिर बिगड़ने लगी है। डॉक्टर ने आराम के लिए बोला मगर मैं काम करती रही क्योंकि इलाज के लिए लिया गया लाखों का लोन भी चुकाना था। इसके बाद भी ब्रांच मैनेजर इस हालत में लोन रिकवरी के लिए घर घर जाने को भेज देते हैं। एक दिन पीरियड के टाइम में मैनेजर से कहा कि आज बाहर नहीं जा सकती तो उसने बोला कि अदालत चली जाओ मगर तुम्हीं जाओगी। उसके बाद मेरा तबादला घर से 2000 किमी दूर कर दिया। मुझे फिज़ियो की ज़रूरत है लेकिन सुबह 9 से शाम के 8 बजे तक बैंक में काम करना पड़ता है। मैं कब कराऊं। मेरी शरीर मेरे हाथ से छूट रहा है। इसके बाद भी मैं अपना काम 110 फीसदी करती हूं। रवीश सर, बैंकिंग में बहुत कुछ सहना पड़ता है जो खुलकर बोल नहीं पा रहे लेकिन आपकी वजह से आज एक छोटी सी बैंकर भी कुछ बोलना चाहती है। मुझे जीने का मन नहीं करता है। रोज़ मरने का मन करता है। मां बाप के लिए जी रही हूं। मेरे अलावा उनका कोई नहीं है।

5) रवीश जी, महिला दिवस पर प्राइम टाइम की बैंक सीरीज़ देख कर ऐसा लग रहा है जैसे कोई मेरी ही कहानी कह रहा हो। सभी फीमेल बैंकर एक ही नाव में हैं। सर, अपनी भी परेशानी शेयर करना चाहती हूं। मैं 6 साल से बैंकर हूं। आज भी क्लर्क हूं। मैं एम बी ए हूं, सारे इम्तहान पास किए हैं। मगर बैंकिंग सिस्टम ही हालत देखकर प्रमोशन लेने की हिम्मत नहीं होती है। बहुत सपने देखे थे आगे बढ़ने के। पर प्रमोशन से डर लगता है। तबादला हो जाएगा, टारगेट का दबाव बढ़ जाएगा, रात 9 बजे तक दफ्तर में रहना होगा। सर, ये मेरी नहीं हज़ारों प्रतिभाशाली महिला बैंकर की कहानी है।

6) रविश सर, मैं पंजाब नैशनल बैंक में कार्यरत हूँ | पंजाब नैशनल बैंक ने हरयाणा अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी) से एग्रीमेंट किया है की बैंक उनके पानी के बिल लेगा | रविश जी यहाँ मैं बताना चाहता हूँ की बैंकर का काम पानी बिल लेना नहीं हैं, खैर हम ले रहे हैं, बंधुआ मजदूर जो हैं| पर एक बिल को लेने में जो परेशानी आती है वो आपके साथ साँझा करना चाहता हूँ| सबसे पहले तो हमें एक बिल की डिटेल्स अपने फिनेक्ल सॉफ्टवेयर में लेने के लिए बिल की डिटेल्स को हुडा पोर्टल पर अपलोड करना पड़ता है| उसके पंद्रह मिनट बाद उस बिल को क्लर्क सॉफ्टवेयर में एंटर करेगा, कैश लेगा, उसके बाद अधिकारी एक एक बिल वेरीफाई करेगा| मतलब की अगर हमारे पास दिन के एक सौ पचास बिल भी लगा कर चलें तो तीन स्टेप के प्रोसेस के हिसाब से चार सौ पचास लोग हो जाते हैं, जो की बैंकिंग काम से अलग हैं. ऊपर से ब्रांच में ३ लोगों का ही स्टाफ है| इसमें क्या तो हम बिल लें, क्या बैंकिंग करें| और तनख्वाह तो आप जानते ही हैं| काम खत्म करते करते रात के नौ बज जाते हैं. खुल कर आवाज़ भी तो नहीं उठा सकते| प्लीज मदद कीजिये|

7) इलाहाबाद बैंक के बहुत सारे बैंकरों ने पत्र लिखा है कि उन्हें बैंक का शेयर ख़रीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसके लिए उन्हें लोन लेकर खरीदने के लिए बोला गया है। बैंक का शेयर गिर रहा है और हम सबको घाटा हो रहा है। जो पत्र आया है ज़ाहिर है उसमें ऐसी भाषा नहीं हो सकती मगर पत्र के अलावा दूसरे तरीके से दबाव डाला जा रहा है कि आप बैंक का शेयर ख़रीदें। ऐसे सैंकड़ों पत्र आए हैं।

8) एक ब्रांच में काग़ज़ पर 10 अधिकारियों को छुट्टी दी गई ताकि रिकार्ड से पता चले कि सबको छुट्टी मिलती है। मगर रीजनल मैनेजर के आदेश से वे वहां काम करते रहे। पत्र भेजने वाले का दावा है कि अगर सीसीटीवी फुटेज की जांच हो तो पता चल सकता है। कुछ और लोगों ने भी ऐसी शिकायतें भेजी हैं।

ऐसे पत्र भी आते हैं….

9) रवीश भाई मैं 6 साल से फॉलोवर था आपका सत्य लेकिन बायस्ड होने के कारण आपका प्रोग्राम देखता नही…23 साल फौज में रहने के बाद आज तीन साल से बैंकर हूँ… कुछ इनबॉक्स में भेजूंगा तो बिना नाम का संज्ञान लेना..हालांकि हम भक्त रोज गरियाएँगे.. बदनाम होंगे तो नाम भी होगा

अब हमारा छोटा सा भाषण-

हमने सिर्फ कुछ सैंपल पत्रों को आप तक रखा है। हज़ारों पत्रों को पढ़ते पढ़ते मेरी आंखों में दर्द हो गया है। चुभता रहता है। कई पत्रों को पढ़ कर रो देता हूं। कुछ पत्रों को प्राइम टाइम में पढ़ा भी है। एक बैंकर मां को सात महीने के बीमार बच्चे को देखने के लिए घर जाने नहीं दिया गया। उसका पति दूर ट्रांसफर कर दिया गया है। बुखार बढ़ा तो आया के सहारे नहीं छोड़ सकती। बच्चे को मेज़ के ऊपर रखकर काम करती रही। रोती रही। मैं उस तस्वीर को देखकर रोने लगा।

11 सीरीज़ के बाद भी बैंकों के चिरकुट चेयरमैनों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। लोग वाकई लोफर से भी बदतर हो चुके हैं। सबको सत्ता की सोहबत ही जीवन का सत्य लगता है। मंत्रियों के जूते चाटने वाले इन चेयरमैनों से इतना नहीं हुआ कि अपने लोगों की सुन लें, उनका दर्द बांट लें, कुछ हो सकता है तो कर दें। पता नहीं इनके घर वालों ने बैंक सीरीज़ देखी है या नहीं। कितना पाप ये पचा ले जाते हैं, मेरी समझ नहीं आता। और बैंकर कितने कायर हो चुके हैं कि ग़ुलामी बर्दाश्त कर लेते हैं।

अगर आप नागरिक वाकई कुछ कर सकते हैं तो बैंकों में काम कर रहीं इन महिला बैंकरों को बचा लीजिए। उनकी आवाज़ को दूर दूर तक पहुंचा दीजिए कि कैसे उन्हें ग़ुलाम बना कर रखा गया है। यही समस्या हु ब हू मर्दों की है लेकिन मर्दों को गर्भ धारण नहीं करना पड़ता है, उन्हें पीरीयड नहीं होते हैं। उन्हें छह महीने के बच्चे को दूध नहीं पिलाना पड़ता है।

मर्दों को भी तरह तरह की बीमारियां हो गई हैं। वे भी शिकार हैं मगर उनमें से कई महिलाओं पर क्यों ज़्यादती कर रहे हैं। अच्छा लगा कि कई मर्द बैंकर महिलाओं की व्यथा को अपनी व्यथा से आगे रख रहे हैं मगर महिलाओं को सताने वाली मानसिकता किसने बनाई। कई महिला रीजनल मैनजर भी उसी तरह ज़ुल्म करती हैं जैसे कोई मर्द रीज़नल मैनेजर करता है। यह सबसे घटिया लिंक है बैंक। सरकार से दबाव आता है, चेयरमैन उसे कार्यकारी निदेशक को थमा देता है और वहां से सारे रीजनल मैनजरों के ज़रिए कहर बरपाया जाता है।

पुरुष बैंकरों को सोचना होगा। यह कैसे मुमकिन है कि 13 लाख बैंकर ग़ुलाम की ज़िंदगी स्वीकार कर सकते हैं। मैंने होली के दिन पत्र लिखा कि आप कोई पर्व त्योहार न मनाए न इस दिन पर किसी को मुबारकबाद दें। पता नहीं कितनों ने उसका पालन किया। जब आप ग़ुलाम हो जाते हैं तो बाहर आने में सौ साल लग जाते हैं। शादी बारात में जाकर लोगों को पकड़ पकड़ कर बताएं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि आप झूठी शान भी जी लें और आज़ादी भी पा लें। झूठी शान भी ग़ुलामी है।

जब आपको पता है कि आपकी कोई औकात नहीं रही, तो आप लोगों से छिपाते क्यों हैं, बता दीजिए सबको। होली पर मैंने बैंकरो से कहा था कि आप अपना हाल लिख कर बोतल में बंद कर गंगा में बहा दें। लाखों बोतल रात को नदी में छोड़ आएं। मंदिर के बाहर रख आएं। पत्र लिख कर कम से कम सौ घरों में भेज दें ताकि भारत को पता चल जाए। पता है उनके पास वक्त नहीं है, लेकिन ग़ुलामी से मुक्ति के लिए रातों को जागना पड़ता है वैसे ही जैसे आप ग़ुलामी के लिए रात रात जागकर काम करते हैं।

जो लोग प्राइवेट बैंक में काम करते हैं और इस सीरीज़ को देखकर अपना धीरज खो रहे हैं उनसे यही कहना चाहता हूं कि अभी आप हिन्दू मुस्लिम कीजिए। आप अपनी लड़ाई किसी को आउट सोर्स नहीं कर सकते। खुद लड़ना सीखें। नाइंसाफी से लड़ नहीं सकते तो मुझे पर आरोप न लगाएं कि मैं केवल सरकारी बैंकरों की बात कर रहा हूं। मुझसे पूछ कर ग़ुलामी करने गए थे क्या। तकलीफ आपको है तो बोलेगा कौन। आप या हम? यह शिकायत उन दौ कौड़ी के नेताओं से क्यों नहीं करते जिनके लिए आप लाइन में लगकर मतदान के दिन सत्तर फीसदी बनते हैं, उंगली दिखाकर सेल्फी खींचाते हैं।

(यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक वाल पर प्रकाशित हुई है)

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(आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

देश

गांधी शांति प्रतिष्ठान में हत्यारे ब्रहमेश्वर मुखिया पर कार्यक्रम, सोशल मीडिया पर बवाल

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पिछले दिनों गांधी शांति प्रतिष्ठान में हत्यारे ब्राहमेश्वर मुखिया की स्मृति में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। लोग सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ लिख रहे हैं। हालांकि, संस्थान की तरफ से सफाई भी आ गयी है।

मुकेश ने लिखा है –

सरकारी गांधीवादी संस्था-गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली ने गांधी के हत्यारों को महिमामंडित करने वाले संगठन विश्व हिंदू परिषद को अपने परिसर में कार्यक्रम की इजाजत दी। और जितने दिनों तक परिषद का कार्यक्रम चलता रहा, उतने दिनों तक के लिए गांधी समाधि का गेट आमलोगों के लिए बंद कर दिया गया। इसका विरोध हुआ। विरोध जायज था। गांधी समाधि को दो दिनों तक बंद रखा जाना और गांधी के नाम पर बनी संस्था में साम्प्रदायिक नफरत फैलाने व गांधी के हत्यारे को महिमामंडित करने वाले संगठन को कार्यक्रम की अनुमति दिया जाना गांधी का अपमान करने जैसा है।

अभी यह मामला थमा भी न था कि मठाधीश गांधीवादी संस्था-गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली द्वारा कुख्यात रणवीर सेना के सरगना ब्रह्मेश्वर मुखिया को महिमामंडित करने वालों को कार्यक्रम की अनुमति देने का मामला सामने आ गया। यह वही ब्रह्मेश्वर मुखिया है, जिसके द्वारा बनाये गए संगठन -रणवीर सेना ने बिहार में एक दर्जन से ज्यादा नरसंहार मचाया था। जिसमें दो सौ से अधिक दलितों-वंचितों की निर्मम हत्या की गई थी। इस मामले के सामने आने पर संस्था की ओर से सफाई भी पेश की गई। सरकारी निधि पर चलने वाली संस्था ने फंड की कमी का रोना भी रोया।

सरकारी गांधीवादी और मठाधीश गांधीवादियों के कारनामों पर क्या कहा जाए??
ये संस्थाएं गांधी के कार्यक्रमों-प्रयोगों को आगे बढ़ाने के बजाय ऐसे संगठनों-कार्यक्रमों की आयोजन स्थली में आखिर क्यों तब्दील होती जा रही हैं??
डॉ. लोहिया ने गांधीवादियों को 3 श्रेणियों में विभक्त करते हुए अपने को कुजात गांधीवादी की श्रेणी में रखा था। आज अगर लोहिया जीवित होते तो सरकारी व मठी गांधीवादी संस्थाओं के इन कारनामों पर क्या स्टैंड लेते??

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बीट विशेष

भारत में धर्म का बोझ ओबीसी और दलित अपने कंधे पर ढो रहा है

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शीर्षक- कांवड़ यात्रा और जनेऊ का अंतर्संबंध: मेरठ के विशेष संदर्भ में

प्रस्तावना: मेरे एक मित्र की मेरठ जिले में ड्यूटी लगी थी कांवड़ रुट पर. मैंने उन्हें एक सोशल एक्सपेरिमेंट करने के लिए रिक्वेस्ट किया. यह शोध 2017 में किया गया.

हाइपोथिसिस : कांवड़ यात्रा में जाना सवर्णों ने छोड़ दिया है.

शोध प्रश्न – मेरठ के कांवड़ा यात्रा रूट से पैदल गुजरने वाले भक्त जनेऊधारी हैं या नहीं?

शोध विधि – 500 कांवड़ यात्रियों के सैंपल साइज में जनेऊधारी और गैरजनेऊधारी देखना था. उन्होंने एक जगह पर सिक्युरिटी चेक के नाम पर बैरियर लगाकर खुद चेकिंग की. इसके लिए उन्हें सिर्फ कंधे पर हाथ रखना था. सारा डाटा प्राइमरी है और इंपीरिकल तरीके से इकट्ठा किया गया.

शोध की सीमाएं- 1. डाटा संग्रह में गलती की संभावना इतनी है कि किसी व्यक्ति ने अगर उस खास दिन जनेऊ नहीं पहना है, तो इसका असर डाटा पर पड़ेगा.
2. यह सिर्फ मेरठ के कांवड़ रूट का आंकड़ा है. बाकी जगह अलग डाटा सामने आ सकता है.

निष्कर्ष – आप जानते हैं क्या पता चला? उस सैंपल में एक भी जनेऊधारी नहीं था. इस डाटा से हमारी हायपोथिसिस की पुष्टि होती है कि जनेऊधारी कांवड़ यात्रा पर नहीं जाते. यह धार्मिक कार्य सिर्फ अद्विज जातियां कर रही हैं.

विमर्शः भारत में धर्म का बोझ ओबीसी और दलित अपने कंधे पर ढो रहा है. उस धर्म को, जो उसे सवर्ण जातियों से नीच बताता है. जो उसकी ज्यादातर तकलीफों का कारण हैं. जिसने उसके साधारण नागरिक होने के मार्ग में बाधाएं खड़ी हो गई हैं.

इसे ग्राम्शी “हेजेमनी बाई कसेंट” यानी सहमति से चल रहा वर्चस्ववाद कहते हैं. यह जबरन या दबाव की वजह से काम नहीं करता. नीचे वाला ऊपर वाले को ऊपर वाला मानता, इसलिए जातिवाद चल रहा है.

एक बार दलितों और ओबीसी रीढ़ की हड्डी सीधी करके खड़ा हो गया, तो जातिवाद का खेल खत्म.

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देश

रामराज्य : सीएम की पत्‍नी 22 साल से देहरादून में तैनात और बुजुर्ग शिक्षिका को कर दिया सस्पैंड

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टीचर उत्तरा बहुगुणा पंत के बाद उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खुद विवादों में फंसते हुए नजर आ रहे हैं। दरअसल उत्तरा बहुगुणा के तबादले के बीच सीएम की पत्नी की तैनाती से जुड़ी एक जानकारी ने राज्य में अब नई चर्चा शुरू कर दी है। शुक्रवार (29 जून, 2019) को आरटीआई के जवाब में मांगी गई जानकारी के मुताबिक शिक्षा विभाग ने अपने जवाब में बताया है कि सीएम रावत की पत्नी सुनीता रावत भी टीचर हैं। नौकरी शुरू करने के चार साल के बाद उन्होंने अपना तबादला दुर्गम इलाके से देहरादून में करवा लिया। एनबीटी के अखबार में छपी जानकारी के मुताबिक इसके बाद से 22 तक उनका तबादला नहीं हुआ है। चौकाने वाली बात यह है कि साल 2008 में प्रमोशन भी हुआ, फिर तबादला नहीं हुआ।

बता दें कि मुख्यमंत्री के ‘जनता मिलन’ कार्यक्रम में टीचर उत्तरा बहुगुणा और मुख्यमंत्री रावत के बीच बहस का एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें टीचर के बात करने के तरीके से नाराज होकर मुख्यमंत्री उन्हें निलंबित करने और हिरासत में लेने का आदेश देते हुए देखे जा सकते हैं। उनके खिलाफ पुलिस ने शांति भंग के तहत चालान कर दिया था। हालांकि, उसी शाम को ही उन्हें सिटी मजिस्टेट की अदालत में पेश किया गया जहां से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। बाद में पूरे मामले में उत्तराखंड राजकीय राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ ने मामले का संज्ञान लेते हुए कहा कि शिक्षिका के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करने का अनुरोध अधिकारियों से किया जाएगा।

57 वर्षीय उत्तरा के पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि वह बहुत दुखी हैं और कल शाम से ही रो रही हैं। वर्ष 2015 में अपने पति की मृत्यु के बाद से ही वह परेशान चल रही थीं और अपने स्थानांतरण को लेकर शिक्षा विभाग के अधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्रियों तक अपनी गुहार लगा चुकी हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री के सामने भी यही सवाल उठाया था। उत्तरा उत्तरकाशी जिले के नौगांव में प्राथमिक विद्यालय में तैनात हैं।

उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षा संघ के महासचिव दिग्विजय सिंह चौहान ने कहा कि संघ इस प्रकरण को लेकर अधिकारियों से वार्ता करने का प्रयास करेगा और अनुरोध करेगा कि उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई न की जाये। चौहान ने कहा कि शिक्षिका 25 वर्षों से दुर्गम स्थान पर कार्यरत हैं और विधवा भी हैं, इसलिए उनकी स्थानांतरण की मांग जायज है जिसे सुना जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षिका द्वारा अपनी मांग के लिए मुख्यमंत्री के सामने प्रयोग की गयी ‘अमर्यादित भाषा’ का वह कतई समर्थन नहीं करते।

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