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महागठबंधन द्वारा भाकपा माले को एक सीट का लोलीपॉप देना पड़ा महंगा, लड़ेंगे इन सीटों पर चुनाव

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बिहार में महागठबंधन द्वारा द्वारा सीटों के बटवारे पर फैसला लिए जाने के बाद अचानक ही बिहार के राजनीति में खलबली मच गयी, कयास लगाये जा रहे थे की महागठबंधन में कांग्रेस, राजद, हम और रालोसपा सही वामपंथी पार्टी को भी सीट दिया जा सकता है, पर कल मनोज झा ने प्रेस कांफ्रेंस कर ये जानकारी दी की वामपंथी पार्टी महागठबंधन में नहीं है.

हालाँकि उन्होंने ये भी कहा की राजद अपने सीट में से एक सीट  भाकपा माले को देगी, हो सकता है की उनका ये दाव भाकपा माले का कुछ हिस्सों में मजबूत जन आधार हो पर आज भाकपा माले ने प्रेस विज्ञप्ति निकाल कर महागठबंधन में जाने से साफ़ इनकार कर दिया.

भाकपा माले के प्रेस रिलीज़ कुछ इस प्रकार है:

भाजपा आज देश के लोकतंत्र, संविधान, जनता के अधिकार और देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के खिलाफ बड़ा खतरा बन कर सामने आई है। परिस्थिति की मांग है कि उपरोक्त खतरे के मद्देनजर आसन्न लोकसभा चुनावों में विपक्ष का एक-एक वोट संगठित हो और भाजपा को कड़ी शिकस्त दे। लेकिन कांग्रेस-राजद सहित अन्य दलों के जरिए कल जिस तरह वामपंथ को बाहर रखते हुए भाजपा विरोधी गठबंधन का स्वरूप सामने लाया गया है, वह भाजपा विरोधी वोटों के व्यापक ध्रुवीकरण और बिहार की जमीनी हकीकत के अनुकूल नहीं है। ऐसा लगता है कि 2015 के जनादेश के साथ हुए विश्वासघात और गठबंधन की विफलता से कोई सबक नहीं लिया गया है।
भाकपा माले व वामपंथ बिहार में भाजपा के खिलाफ निरंतर लड़नेवाली मजबूत व उसूली ताकत के रूप में स्थापित है। वामपंथ बिहार की जनता के संघर्षों की आवाज भी है। गठबंधन में वामपंथ की मजबूत उपस्थिति से न सिर्फ गठबंधन की विश्वसनीयता को बल मिलता बल्कि उसे व्यापक मजदूर-किसान, छात्र-नौजवान व लोकतांत्रिक ताकतों का समर्थन भी मिलता। महागठबंधन ने जिस तरह सीटों का आपस मे बंटवारा किया है और वामदलों व उनकी स्वाभाविक दावेदारी वाली सीटों को नजरअंदाज किया है, वह न्यायसंगत नही है। बिहार विधानसभा के भीतर पार्टियों की दलगत स्थिति और राज्य में पिछले दो वर्षों से चले जनांदोलनों की अभिव्यक्ति भी इस गठबंधन में नहीं दिखती। इन तमाम चीजों ने बिहार में भाजपा विरोधी मतों के ध्रुवीकरण की संभावना को कमजोर किया है। इसने बिहार के व्यापक वाम, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समूहों को निराश किया है। भाकपा माले उनकी चिंता और आग्रह के साथ खड़ी है और आगे भी खड़ी रहेगी।
पहले ही हमने कम सीटों पर लड़ने का फैसला किया था ताकि भाजपा विरोधी मतों में बिखराव न हो. विदित हो कि माले ने 6 सीटों पर लड़ने का फैसला किया था जिसमे से बाद में हमने वाल्मीकिनगर सीट भी छोड़ दी। शेष पांच सीटें आरा, सीवान, काराकाट, जहानाबाद और पाटलिपुत्र हैं! राजद की ओर से अपने कोटे से एक सीट का आफर माले को किया गया है। हम भी अपनी उपरोक्त पांच लड़ी जाने वाली सीटों में से एक सीट राजद के लिए छोड़ देंगे। इसके साथ ही माले सीपीआई को बेगूसराय में और सीपीएम को उजियारपुर में अपना समर्थन देगी और बिहार की शेष सीटों पर भाजपा-राजग को हराने के लिए अभियान चलाएगी।
भाकपा माले भगत सिंह के शहादत दिवस 23 मार्च से शुरू कर कामरेड चंदू के शहादत दिवस 31 मार्च, 13 अप्रैल जलियांवाला कांड की शतवार्षिकी और 14 अप्रैल बाबा साहेब अंबेदकर जयंती तक पुरे राज्य में ‘भाजपा हराओ-देश बचाओ, ’भगत सिंह-अम्बेडकर का देश बनाओ’ नारे के साथ पूरे राज्य में अभियान चलाएगी।
कुणाल, राज्य सचिव, भाकपा-माले
धीरेन्द्र झा, पोलित ब्यूरो सदस्य, भाकपा-माले
अमर, पोलित ब्यूरो सदस्य, भाकपा-माले
केडी यादव, भाकपा-माले
राजाराम, भाकपा-माले

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भूमिहार पहचान में ही कैद क्यों रखना चाहते हैं कन्हैया को?

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कन्हैया के ख़िलाफ़ घृणा अभियान शुरू हो गया है। यह ख़ुद को वामपंथी कहनेवाले और दलित या पिछड़े सामाजिक समुदायों की ओर से क्यों है? इससे एक सवाल उठता है कि क्या एक ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति दलितों के संघर्ष में शामिल ही नहीं हो सकता? जो कन्हैया की भूमिहार पहचान में ही उन्हें कैद रखना चाहते हैं क्या वे दलितों के संघर्ष को व्यापक कर रहे हैं या कमज़ोर?
कन्हैया चुनाव लड़ेंगे, यह घोषणा होते ही कन्हैया के ख़िलाफ़ घृणा अभियान शुरू हो गया है। इस बार यह राष्ट्रवादियों की ओर से नहीं, ख़ुद को वामपंथी कहनेवाले और दलित या पिछड़े सामाजिक समुदायों के प्रवक्ता कहे जानेवालों की ओर से चलाया जा  रहा है। प्रायः ऐसा सोशल मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है। कन्हैया पर कई प्रकार के आरोप हैं। सबसे पहला यह कि वह भूमिहार हैं, ‘ऊँची’ जाति के हैं और इसलिए  सामजिक न्याय, आदि के बारे में बात करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं। या अगर वे ऐसा कर रहे हैं तो वे नाटक कर रहे हैं। जिस जगह वे हैं, वह दरअसल किसी दलित या पिछड़े को मिलनी चाहिए थी और वे उनका हक़ मारकर वहाँ बैठ गए हैं, या खड़े हो गए हैं!
आज के दौर में यह सबसे मारक आरोप है और कन्हैया या उनके समर्थकों के पास इसका कोई जवाब नहीं। आख़िर वह एक ऐसे माता-पिता की संतान हैं जिन्हें भूमिहार माना जाता है। क्या कन्हैया यह तय कर सकते थे कि वह भूमिहार पैदा न हों? या, क्या कन्हैया के पास कोई ऐसा उपाय है कि वह अपनी जाति का त्याग कर सकें? क्या ऐसा चाह कर भी किया जा सकता है? हम सब जानते हैं कि हमारे निजी तौर पर ऐसा चाहने के बावजूद यह संभव नहीं क्योंकि जाति एक परस्परात्मकता में पैदा होती है और वह एक सामाजिक परिघटना है। मेरे बिना चाहे, मेरी तथाकथित जाति का पता करके मुझसे अयाचित और अकारण रिश्ता महसूस करनेवालों की कमी नहीं। ऐसे लोगों को सुनकर उलझन या अस्वस्ति का अनुभव होता है। ‘अरे! हम भी तो वही हैं!’ सुनकर आपके कान भले लाल हो जाएँ,  कहने वाले के मुदित मुख को आप किस निष्ठुरता से धूमिल करें! सुनकर प्रायः चुप रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। इसका अर्थ यह है कि आपकी जाति आपके बिना चाहे भी आपको लाभ दिला सकती है या हानि पहुँचा सकती है। आप उन दलितों के अनुभव सुनें, जिन्हें दलित ‘न लगने’ पर भी उनके कुलनाम का पता चलते ही मकान बड़ी शालीनता या कई बार निर्विकार सादगी से किराए पर दिए जाने से मना कर दिया जाता है। मेरे एक छात्र ने मुझे लिखा कि वह अपने उस कुलनाम के सहारे ही मकान ले पाया जिससे उसके दलित होने का पता नहीं चलता था क्योंकि वह कुछ उच्च जातियों के द्वारा भी इस्तेमाल होता है!
‘जनेऊ तोड़ो, जाति छोड़ो’ कभी लगाया जाने वाला नारा था, आज वह धोखा बताया जाएगा। इसमें कोई शक नहीं कि इसके लिए ‘उच्च जाति’ के लोग ही प्रायः जवाबदेह हैं, क्योंकि चतुराई से जाति के ऊपरी चिह्नों को त्यागकर उन्होंने जातिगत भेदभाव जारी रखा। जाति भारत में एकमात्र ऐसी संस्था है जो धर्मनिरपेक्ष है। यह हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों में समान रूप से व्याप्त है।
दलित संघर्ष में ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति
फिर क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि ‘उच्च जाति’ में पैदा होने वाले कभी उसकी सीमा का अतिक्रमण नहीं कर सकते? एक ‘उच्च जाति’ का व्यक्ति दलितों के संघर्ष में शामिल ही नहीं हो सकता? जो कन्हैया की भूमिहार पहचान में ही उन्हें कैद रखना चाहते हैं और इसे उनकी नाक़ाबिलियत बताते हैं कि इसके चलते वे दलितों के हक़ की बात नहीं कर सकते, वे दलितों के संघर्ष को व्यापक कर रहे हैं या कमज़ोर, यह वे भी जानते हैं।
जातिगत भेदभाव तभी ख़त्म हो सकता है जब इसे सिर्फ़ दलित नहीं सभी इसे कबूल करें! या, फिर जाति की अर्हता ही अगर सर्वोपरि होगी तो ख़ुद पिछड़ी और दलित जातियों के बीच के तनाव और परस्पर विरोध का समाधान कैसे किया जाएगा?
क्या एक ‘जाटव’ एक ‘वाल्मीकि’ की लड़ाई लड़ सकता है?  इस तर्क को इस दिशा में आगे बढ़ाने पर यह निष्कर्ष निकलेगा कि जातिगत भेदभाव से कभी मुक्ति नहीं है क्योंकि एक ‘जाति’ के व्यक्ति को दूसरी ‘जाति’ के व्यक्ति से समवेदना का अधिकार ही नहीं है।
पूरी दुनिया का इतिहास इसे झुठलाता है। अश्वेतों के संघर्ष में श्वेतों ने कुर्बानी दी, औरतों के हक़ के लिए पुरुषों ने संघर्ष किया, भारत की आज़ादी के आंदोलन में अँगरेज़ और कई यूरोपीय सीधे और अनेक परोक्ष रूप से शामिल हुए, फ़िलीस्तीनियों के अधिकार के संघर्ष में अनेक यहूदी और इस्राइली शामिल हैं, भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की राजनीति का प्रतिरोध अनेक हिंदू कर रहे हैं, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ वहाँ के मुसलमान लड़ रहे हैं! क्या हम सलमान तासीर की क़ुर्बानी को भूल जाएँ?
क्या कन्हैया मीडिया की पैदाइश?
कन्हैया पर दूसरा इल्ज़ाम वामपंथियों के एक हिस्से की तरफ़ से लगाया जा रहा है। यह कि वह मीडिया की पैदाइश हैं, उन्होंने अभी जनता के बीच काम नहीं किया है, कि वह असली वामपंथी नहीं हैं। उन्हें जबरन शोहरत दी गई है। एक मित्र ने एक वामपंथी दल के नेता का नाम लेकर लिखा कि आख़िर उन बेचारे ने गाँव-गाँव घूम कर वामपंथ की अलख जगाई, उनका नाम तो कोई कभी लेता नहीं, अभी जनमकर खड़े हुए कन्हैया को लोग कँधे पर घुमा रहे हैं!
यह आरोप लगानेवाले एक भूल कर रहे हैं। वह यह नहीं देख रहे कि कन्हैया एक दूसरे संकट के कारण ही पैदा हुआ। वह जनतंत्र का संकट है। जनतंत्र में उदार मूल्य, यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की आज़ादी बनी रहेगी या वह मात्र बहुमत निर्माण की तिकड़म के आधार पर चलता रहेगा? फिर भारत का जनतंत्र तुर्की या रूस के जनतंत्र से या स्तालिनकालीन सोवियत जनतंत्र से कैसे अलग होगा?
कन्हैया और उनके साथियों, उमर ख़ालिद, शेहला राशिद, अनिर्बान पर उनके वामपंथी विचार के कारण नहीं, बल्कि बुनियादी या आरंभिक जनतांत्रिक सिद्धांतों पर अमल के चलते हमला हुआ। यही वजह रोहित वेमुला पर हुए हमले की थी। वह दलित होने के कारण नहीं, अपना विस्तार दलित पहचान से आगे करने के कारण ही ख़तरनाक माना गया।
कन्हैया की भाषा
कन्हैया ने अपनी गिरफ़्तारी और अपने ऊपर जानलेवा हमला नहीं चुना था। हाँ! उसका उत्तर कैसे दिया जाए,  कन्हैया ने ज़रूर उस रास्ते के बारे में सोचा और एक ऐसी भाषा चुनी जिसने सूखे से तकड़ती ज़मीन पर बारिश की बूंदों जैसा असर किया। यह भाषा कोई वामपंथी नेता बोल नहीं पाया था। इस भाषा में हर किसी ने, वह मुसलमान हो या हिन्दू, दलित हो या पिछड़ा अपनी आवाज़ सुनी। यह रोज़मर्रा की ज़ुबान थी, वामपंथ के इतिहास के बोध से संवलित लेकिन उससे दबी हुई नहीं। यह राष्ट्रवादी संकुचन के आगे व्यक्ति के विस्तार की संभावना की घोषणा थी।
कन्हैया या उमर ख़ालिद जैसे युवा वामपंथ में जनतांत्रिक ताज़गी ला सकते हैं। यह वाम विरोधियों के लिए तो चिंता का विषय होना चाहिए लेकिन वामपंथी ही इस कारण कन्हैया पर टूट पड़ें?
यह भाषा साज़िशन नहीं हासिल की जाती। न यह प्रशिक्षण से मिलती है। यह कन्हैया की प्रतिभा की देन है। लेकिन क्या इस वजह से कन्हैया से ईर्ष्या की जानी चाहिए?
इस चुनाव में कन्हैया की जीत या हार से उस संभावना की यात्रा पूरी नहीं हो जाएगी जो 2016 में शुरू हुई। उसकी ओर अभी भी उम्मीद से देखा जाना चाहिए। मैं कहाँ से आया, यह जानने में आपकी दिलचस्पी हो, उससे ज़्यादा उत्सुकता यह देखने में होनी चाहिए कि मैं जा किधर रहा हूँ! इससे आपकी जगह का भी पता चलेगा।
लेख –  प्रो.अपूर्वानंद
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हमारी लड़ाई सीधे तौर पर गिरिराज सिंह से है ,तनवीर हसन से नहीं है: कन्हैया कुमार

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पटना: आरोप प्रत्यारोप और अटकलों के बीच आज कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने पटना में प्रेस कांफ्रेंस कर के साफ़ कर दिया की बहुचर्चित युवा नेता कन्हैया कुमार ही बेगुसराय से यूनाइटेड लेफ्ट के प्रत्याशी होंगे, यहाँ से साफ़ हो जाता है की बिहार का बेगुसराय सीट लोकसभा चुनाव के लिए बहुत ख़ास होने वाला है. बता दें की भाजपा ने वहां से अपने फायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह  को बेगुसराय का टिकट दिया है.

कन्हैया कुमार ने कहा की जहाँ हमारी पार्टी चुनाव नहीं लड़ेगी वह हम महागठबंधन का साथ देंगे. उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस में ये भी कहा की देश बचाने  के लिए हम हमेशा विपक्ष के साथ संसद से लेकर सड़क तक रहेंगे लेकिन इसका ये मतलब नहीं है की हम किसी के इगो की पूर्ती करने के लिए भाजपा विरोधी मतों को बटने देंगे.

कन्हैया कुमार ने अपने प्रतिद्वंदी गिरिराज सिंह पर हल्ला बोलते हुए कहा की हमें तो पता ही नहीं चला की वो देश में किसी मंत्री पद पर भी थे, मुझे तो लगा वो पाकिस्तान के वीजा मंत्री हैं. उन्होंने आगे कहा की गिरिराज सिंह खुद बेगुसराय नहीं आना चाहते है इसीलिए उनके नखरे दिल्ली में चल रहे है ऐसे नेता को बेगुसराय की जनता क्या अपनाएगी जो खुद बेगुसराय को नहीं अपनाना चाह रहे हों.

भाजपा पर हमला करते हुए श्री कन्हैया ने कहा की हमारा मुकाबला किसी पार्टी या किसी नेता से नहीं है हम लोकतंत्र को बचाने  के लिए, देश के संविधान को बचाने के लिए साथ आयें, क्योँ की भाजपा के नेता खुद बोल चुके हैं की अगर इस बार नरेन्द्र मोदी जीत कर आये तो चुनाव ही नहीं होगा.

पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कन्हैया ने कहा की हमारी लड़ाई तेजस्वी से नहीं, हम सामाजिक न्याय के लिए कई बार मंच साझा कर चुके हैं, और आगे भी जब भी जरूरत होगी साथ आएंगे और मिल कर लड़ेंगे. उन्होंने ये भी कहा की महागठबंधन के साथ उनका गठबंधन हो या न हो बेगुसराय की जनता के साथ उनका गठबंधन हो चूका है.

तनवीर हसन पर सवाल पूछे जाने पर कन्हैया कुमार ने कहा की उनका मुकाबला तनवीर हसन से है ही नहीं उनका मुकाबला भाजपा के नफरत और हिन्दू मुस्लिम वाले बयां देने के लिए प्रख्यात गिरिराज सिंह से है.

ये भी पढ़ें: कन्हैया,बेगूसराय और लोकसभा चुनाव-2019. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और विपक्षी पार्टियों की भूमिका।

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खूंखार एवं खौफनाक भाजपा के पंजों को तोड़ने पर गंभीर नहीं महागठबंधन!

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2019_लोकसभा_चुनाव के दहलीज पर खड़े देश और अपने सूबे बिहार में चुनावी गहमागहमी के बीच आज नेताओं के महागठबंधन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस किया. बिहार दिवस,22 मार्च को हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस से जाहिर नेताओं का फैसला अपरिपक्व, अगंभीर एवं अप्रत्याशित बताते हुए एक बहस चल पड़ी है. कारण कि राज्य का मुख्य विपक्षी दल राजद ने महागठबंधन को व्यापक रूप देने में गंभीरता नहीं बरती है.

सूबे के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने अभी हाल हीं में संविधान बचाने के लिए चिंता करते हुए ट्वीट किया था की देश के मौजूदा हालात में यह कहना वाजिब होगा कि 2019 के लोकसभा का चुनाव कोई आम चुनाव नहीं है  सचमुच में संविधान पर खतरे मंडरा रहे हैं.

तेजस्वी जी से पूर्व देश के बुद्धिजीवी तबके ने भी कई मौके पर इसे कहा था  खुद भाजपा  नेता साक्षी महाराज ने भी कहा कि शायद यह अंतिम चुनाव होगा.अगर इस मसले पर वाकई RJD गठबंधन गंभीर होता तो इस बात को सुनिश्चित करना था कि हर हाल में गैर BJP गठबंधन के वोटों का बिखराव नहीं हो.

   एक बड़ा समुदाय इस बात को मानने को तैयार ही नहीं है कि अभी के समय में कोई बड़ी लड़ाई वामपंथ और लाल झंडे को दरकिनार कर लड़ी जा सकती है. दरअसल इसके पर्याप्त आधार हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद सत्ता में आई मोदी सरकार के क्रूरतम एवं खूंखार कारनामों से तबाह देश की जनता के महागठबंधन ने सड़कों पर लोहा लिया है. किसान,मजदूर,छात्र,नौजवान एवं महिलाओं की लड़ाई जब जारी थी तब लाल झंडे ने तमाम झंडों की एकता बना लड़ाई को निर्णायक बनाया था.

  मोदी सरकार ने सत्ता में आते हीं शैक्षणिक संस्थानों को युद्ध के मैदान में तब्दील कर दिया था. शिक्षा बजट में भारी कटौती के खिलाफ  2015  के उत्तरार्द्ध में देश के छात्र समुदाय ने सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आक्यूपाई यूजीसी आंदोलन के माध्यम से अपने गुस्से का इजहार किया.

2016 की जनवरी में हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या की गई. जिसमें BJP के कई नेता, खुद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मैडम मनु स्मृति ईरानी की सहभागिता थी. दोनों हीं आंदोलन में JNU ने हर बार की तरह अपनी निर्णायक भूमिका निभाई. माननीय सूट-बूट एवं कड़ी निंदा जी की आंखों का किरकिरी JNU को बनना हीं था, JNU की स्टूडेंट कम्यूनिटी ने मोदी सरकार से लोहा लिया.

उस  समय JNU छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार थे जिन्होंने 2015 के सितंबर में JNU छात्र संघ के चुनाव के प्रेसिडेंसियल डिबेट में हीं कन्हैया ने एक व्यापक एकता बना सरकार के फासीवादी फन को कुचलने की जरूरत बताया था.

     राजद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगा मीडिया ट्रायल में घेरने की नाकाम कोशिश की गई. कन्हैया ने इस बात को साबित किया कि विचारधारा का ठोस परवरिश में क्या मायने हैं. AISF जिसने छात्र समुदाय को संगठित कर अंग्रेजों को खदेड़ने का काम किया. कन्हैया उसी देश के पहले छात्र संगठन AISF से जुड़े हैं.

जब आज़ादी का आंदोलन चल रहा था उसी वक़्त RSS और उसके अनुषंगी संगठन के लोग अंग्रेजों की चाकरी, सजा से बचने के लिये क्रांतिकारियों की मुखाबिरी और अंग्रेजों को माफीनामा लिख रहे थे. AISF के साधारण कार्यकर्ता के सामने अंग्रेजों के दलाल टिक पाएं, इसकी थोड़ी भी गुंजाइश नहीं.

 जब  देश के अंदर शोषित,वंचित,दलित,अल्पसंख्यक,महिला एवं हाशिये पर खड़ा हर व्यक्ति मोदी सरकार में त्रस्त है ऐसे में  निर्विवाद तौर पर कन्हैया को विपक्ष का उम्मीदवार घोषित करना था. भाजपा हराओ अभियान को मुख्य लक्ष्य बना CPI ने कन्हैया को उम्मीदवार घोषित किया था. क्योंकि RSS और मोदी सरकार के खिलाफ पूरे देश में घूम-घूम कर उसके कारनामों की पोल-पट्टी खोलने का काम जिस सहज भाषा में कन्हैया के द्वारा किया गया. उससे मोदी सरकार के विरुद्ध कन्हैया यूथ आईकान के रूप में उभर कर सामने आए और जनता का महागठबंधन कन्हैया के साथ बनना तय था.

 वर्तमान लोकसभा चुनाव कोई आम एवं साधारण चुनाव नहीं है. मौजूदा हालात में एक परिपक्व फैसले की जरूरत थी. जिसे नेताओं के महागठबंधन ने गंभीरता से नहीं लिया है.

   वामपंथ (कम्युनिस्ट पार्टियों) की मजबूत भागीदारी के कोई मजबूत मोर्चेबन्दी भाजपा का मुखौटा लिए RSS से किया जा सके यह तर्कसंगत नहीं लगता है. नेताओं के गठबंधन वाले मोर्चे में कई ऐसे नेता हैं जो कि कल भाजपा के साथ जाकर सरकार बना लें. इस बात में कोई संदेह नहीं, वैसे भी कुछ तो वहीं से आए हीं है.

      “सबसे हास्यास्पद तो तब रहा जब RJD के बिहार के अध्यक्ष रामचन्द्र पूर्वे ने कहा कि RJD 20 सीट लड़ेगी. जिसमें से RJD कोटे की एक सीट माले को दी जाएगी”. लाल झंडे को अपमानित करना हीं कहा जाएगा. जिस मोर्चे में CPI, CPI(ML) और CPM नहीं हों और सम्मान जनक स्थान नहीं मिले. कैसे आप भाजपा और RSS के खिलाफ लड़ाई लड़ पाएंगे.

       सवाल कुछ सीटों का नहीं है. वाम पंथ ने इस बार देश की मौजूदा परिस्थिति में खुद हीं गैर भाजपा वोटों को बिखरने से रोकने के लिए निर्णायक भूमिका अदा करने की कोशिश की थी.लेकिन नेताओं के गठबंधन ने अगर सबकुछ तय कर लिया है. तब अब जनता का महागठबंधन देश और बिहार के धरातल पर तय करेगा. बेगूसराय में CPI के चुनावी अभियान एवं कन्हैया के पक्ष में जनता के महागठबंधन ने बहुत कुछ जता दिया है. जो विगत दिनों बेगूसराय में दिखाई पड़ा. आगाज जब ऐसा तो अंजाम का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है.

(लेखक पेशे से वकील हैं और ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के सक्रीय सदस्य भी हैं)

कन्हैया,बेगूसराय और लोकसभा चुनाव-2019. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और विपक्षी पार्टियों की भूमिका।

बिहार में कन्हैया कुमार नहीं होंगे महागठबंधन के उम्मीदवार

फासीवादी ताकतों से लड़ने के बजाय बिहार में स्वार्थसिद्धि करने वालों को पीढियां माफ़ नहीं करेगी

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