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जानकर आप भी रह जाएंगे भौचक: स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ वाजपेयी की गवाही

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दीपक कुमार@peoplesbeat

राम जेठमलानी ने एक पत्रकारवार्ता में लीलाधर वाजपेयी को ला खड़ा किया जिनका दावा है कि अटल बिहारी वाजपेयी की गवाही पर चार स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सज़ा सुनाई गई थी.
लीलाधर वाजपेयी आगरा के पास बटेश्वर गाँव के ही रहने वाले हैं जो प्रधानमंत्री वाजपेयी का भी गाँव है.

उनका कहना है कि 27 अगस्त 1942 को कोई डेढ़ दो सौ लोग जंगल विभाग की एक बिल्डिंग पर तिरंगा झंडा फहरा रहे थे. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी और उनके भाई प्रेम बिहारी वाजपेयी भीड़ से दूर खड़े हुए थे.
उन्होंने पत्रकारवार्ता में बताया कि पुलिस ने उसी समय बहुत से लोगों को गिरफ़्तार कर लिया. उनमें अटल बिहारी वाजपेयी और उनके भाई भी थे.

उनका कहना है, ”वाजपेयी जी के पिता ने अंग्रेज़ अफ़सरों से कहकर दोनों भाइयों को छुड़वा लिया और इन दोनों भाइयों ने बाद में स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ अदालत में गवाही दी थी.”
अदालत के कागज़ात बाँटते हुए लीलाधर वाजपेयी ने कहा कि दोनों भाइयों की गवाही से चार स्वतंत्रता सेनानियों को जेल भी जाना पड़ा.
उनका आरोप है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने बाद में अपने भाई को ताम्रपत्र भी दिलवा दिया.
उन्होंने कहा कि अदालत में आरोप लगाया गया था कि सरकारी इमारत को जलाया गया और गिरा दिया गया लेकिन सच यह है कि वहाँ सिर्फ़ झंडा फहराया गया था.

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सबसे दिलचस्प यह है कि ये वही अटल बिहारी वाजपेयी हैं जिन्होंने स्वयं इस बात को कबूला है कि उन्होंने वर्ष 1942 में अंग्रेजों की मुखबिरी की। मुखबिरी यानी देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे देशभक्तों के साथ गद्दारी।

वाजपेयी के गद्दार होने की बात वर्ष 1998 में एक अंग्रेजी पत्रिका “फ़्रंटलाइन” ने प्रमाण के साथ प्रकाशित किया था। इस पत्रिका के मुताबिक 1 सितंबर 1942 को वाजपेयी ने एक दंडाधिकारी के समक्ष एक बयान दिया था। इस बयान में वाजपेयी का बयान उर्दू और हस्ताक्षर अंग्रेजी में था। इसके अलावा मजिस्ट्रेट ने अपनी टिप्प्णी अंग्रेजी में लिखा था। उस समय वाजपेयी 16 साल के थे और आरएसएस के सक्रिय सदस्य थे। यह उल्लेखनीय है कि आरएसएस का स्वतंत्रता संग्राम से कोई लेना देना नहीं था। वह केवल देश में हिन्दूओं को प्रधानता मिले, इसका पक्षधर थी। यहां तक कि वाजपेयी ने भी स्वयं स्वीकार किया है कि उन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग नहीं लिया। फ़्रंटलाइन के संपादक को दिये साक्षात्कार में वाजपेयी ने स्वीकार किया कि 27 अगस्त 1942 को आगरा मे अपने गांव बटेश्वर में एक प्रदर्शन के दौरान वे एक दर्शक की भूमिका में थे।
1 सितंबर 1942 को अटल बिहारी वाजपेयी ने क्लास-2 मजिस्ट्रेट एस हसन के समक्ष अपना बयान दिया था। उनके इसी बयान पर उनके मित्र लीलाधर वाजपेयी को सजा मिली थी। वाजपेयी के जैसे उनके बड़े भाई प्रेम बिहारी वाजपेयी ने भी देश के साथ गद्दारी की थी। उन्होंने भी समान बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया था। मजिस्ट्रेट ने अटल बिहारी वाजपेयी से पूछा था कि क्या तुमने किसी हिंसक गतिविधि में भाग लिया है? अपने बयान में तब वाजपेयी ने कहा था कि

मेरा नाम : अटल बिहारी, पित का नाम : गौरी शंकर, मेरी जाति : ब्राह्म्ण, उम्र : 20 वर्ष, पेशा : छात्र, ग्वालियर कालेज, मेरा पता : बटेश्वर, थाना : बाह, जिला , आगरा है।

27 अगस्त 1942 को प्रदर्शनकारी बटेश्वर बाजार में एकजुट हुए थे। तब 2 बजे के करीब ककुआ ऊर्फ़ लीलाधर और महुआन वहां आये और भाषण दिया। भाषण देने के क्रम में इन दोनों ने लोगों को कानून तोड़ने को प्रेरित किया। करीब 200 लोगों ने बटेश्वर में वन विभाग के कार्यालय को घेर लिया। मैं और मेरे भाई दोनों अलग थे। सभी लोग कार्यालय का दरवाजा तोड़कर अंदर घुस गये। मैं केवल ककुआ और महुआन दो लोगों का नाम जानता हूं और किसी का नहीं। मुझे लगा कि ईंटें गिरने लगी हैं। मैं नहीं जानता कि ईंटें कौन फ़ेंक रहा था लेकिन ईंटें जरुर गिर रही थीं।

यह देखकर मैं और मेरे भाई वहां से निकल मयपुरा की ओर जाने लगे। हमारे पीछे भीड़ थी। उस समय फ़ारेस्ट आफ़िसर के कार्यालय को लोग तोड़ रहे थे। इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं थी। मैं 100 गज दूर खड़ा था।

अटल बिहारी वाजपेयी के इस बयान को मजिस्ट्रेट एस हसन के समक्ष रिकार्ड किया था। मजिस्ट्रेट ने उनके बयान में अपनी ओर से यह टिप्पणी अंग्रेजी में दर्ज की।
I have explained to Atal Behari son of Gauri Shankar that he is not bound to make a confession and that if he does so, any confession he may make may be used as evidence against him. I believe that this confession was voluntarily made. It was taken in my presence and hearing and was read over to Atal Behari who made it; it was admitted by him to be correct and it contains a full and true account of the statement made by him.
Signed: S. Hassan

Magistrate II Class

1.9.1942.

(लेखक इंजीनियर है और समाज से जुड़े मुद्दों पर लिखते रहते है)

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जम्मू-कश्मीर आंतरिक कलह या अंतरराष्ट्रीय विवादित क्षेत्र

जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन करके उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के भारत सरकार के क़दम को लेकर कई हलकों से बहुत गंभीर प्रतिक्रियाएं आई हैं.

सबसे अहम प्रतिक्रिया भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन से आई, जो जम्मू-कश्मीर प्रांत के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण रखते हैं. भारत इन हिस्सों पर अपना दावा करता है.

इसे याद रखना महत्वपूर्ण है कि ये दोनों ही पड़ोसी मुल्क परमाणु शक्ति संपन्न हैं और इनके बीच आपसी ताल्लुकात भी विशेष हैं. ये दोनों भारत के साथ युद्ध भी लड़ चुके हैं.

सीमा विवाद और अन्य तनावों के कारण इन दोनों देशों के साथ भारत के संबंध लंबे वक़्त से प्रतिकूल रहे हैं.

यह पृष्ठभूमि ही इतना बताने के लिए काफ़ी है कि आख़िर क्यों पाकिस्तानी नेतृत्व ने पहले तो अपने कमांडरों और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के साथ गहन विचार-विमर्श किया और फिर अपनी संसद का संयुक्त सत्र बुलाया.

 

संसद में यह प्रस्ताव रखा गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से भारत की ओर से उठाए गए क़दम पर आपातकालीन सत्र बुलाने का आग्रह किया जाए.

पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा ने कश्मीरियों की मदद के लिए सेना के ‘किसी भी हद तक जाने’ के लिए तैयार होने की बात कही है.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत के इस फ़ैसले पर दो तरह की संभावनाओं की ओर इशारा किया. उन्होंने दोबारा ‘पुलवामा’ जैसे आत्मघाती हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध की बात की.

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की दूसरी बैठक के बाद पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर कुछ नीतिगत फै़सलों का ऐलान किया- उच्चायुक्तों को वापस बुलाना, द्विपक्षीय व्यापार रोकना और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर निए सिरे से विचार करना.

हालांकि, इनके बयानों को दुनिया के अधिकांश देश उनकी अपनी जनता के बीच की गई बयानबाज़ी के रूप में देख रहे हैं. उनका मानना है कि पाकिस्तान किसी भी तरह की भारत विरोधी गंभीर कार्रवाई शुरू करने की स्थिति में ही नहीं है.

अगर चीन के साथ उसके अहम रिश्ते को केंद्र में रखकर देखें तो पाकिस्तान की ये प्रतिक्रियाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं. विशेषज्ञ पाकिस्तान को चीन के संरक्षण में रहते हुए उसी की भाषा बोलने वाला बताते हैं.

जैसा कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान होता आया है, इस बार भी चीन की प्रतिक्रिया ने ही पाकिस्तान का रुख़ तय किया.

भारत के मामले में चीन छद्म रूप से पाकिस्तान का इस्तेमाल करता आया है जबकि ख़ुद हमेशा नपे-तुले क़दम चलता है. ऐसे में चीन की प्रतिक्रिया, जिसके गहरे मायने हैं, उसका गंभीर विश्लेषण और व्याख्या करने की ज़रूरत है.

सबसे पहले तो वैश्विक स्तर पर चीन आज एक बड़ा कद्दावर देश है जहां उसका एक छोटा से छोटा क़दम भी काफी वज़नदार लगता है. ख़ासकर बात जब एशियाई मामलों की आती है तो निश्चित तौर पर यहां वह हर मामले में सबसे बड़े देश के रूप में अपनी पहचान रखता है

हाल के दिनों में दुनिया ने चीन की विस्तारवादी नीतियों को देखा है जो अपने पड़ोसी मुल्कों में भारत को उभरते समकक्ष प्रतियोगी के रूप में पाता है.

अमरीका और उसके जो मित्र देश चीन की इन विस्तारवादी नीतियों का विरोध करते हैं, उनकी भारत से बढ़ती क़रीबी चीन के लिए चिंता का विषय रहा है. भारत द्वारा अपने जम्मू-कश्मीर प्रांत का पुनर्गठन किए जाने को लेकर चीन की ‘चिंता’ का कारण यह भी है.

जम्मू-कश्मीर प्रांत के अक्साई चिन के 38,000 वर्ग किलोमीटर और शक्सगाम घाटी के 5,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक इलाक़े पर चीन का नियंत्रण है.

जम्मू-कश्मीर के इस पुनर्गठन के बाद आई चीन की प्रतिक्रिया ने दोनों देशों के बीच पहले से चले आ रहे सीमा विवाद को एक बार फिर उभार दिया है, जिसका प्रभाव चीन और भारत के आपसी संबंधों से परे भी है.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, “चीन अपनी पश्चिमी सीमा के इलाक़े को भारत के प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल किए जाने का हमेशा ही विरोध करता रहा है.”

यह समझना आसान है कि चीन ने यह बात क्यों दोहराई. मगर चीन की चिंताएं उसके इस कथन से प्रकट होती हैं- “हाल ही में भारत ने अपने एकतरफ़ा क़ानून बदलकर चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को कम आंकना जारी रखा है. यह अस्वीकार्य है और यह प्रभाव में नहीं आएगा.”

ज़ाहिर है, यह अचानक इस तरह का बयान आया तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी और इसे ‘भारत का आंतरिक मामला’ बताते हुए कहा कि ‘भारत अन्य देशों के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी नहीं करता और उम्मीद करता है कि दूसरे देश भी ऐसा ही करेंगे.’

दूसरा, चीन हमेशा की तरह भारत-पाकिस्तान तनाव पर ध्यान केंद्रित करते एक बार फिर ख़ुद को थर्ड अंपायर की तरह पेश करने का मौक़ा तलाश रहा है.

अपने लिखित जवाब में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ छुनइंग ने कहा, “संबंधित पक्षों को संयम और एहतियात बरतते हुए विवेकपूर्ण तरीक़े से कार्य करने की आवश्यकता है. उन्हें ऐसे कार्य करने से बचना चाहिए जो एकतरफ़ा रूप से यथास्थिति को बदलकर तनाव बढ़ा सकते हैं. हम दोनों पक्षों से संबंधित विवाद पर संवाद और परामर्श के ज़रिए शांतिपूर्वक हल करने और क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बनाए रखने का आग्रह करते हैं.”

चीन की ये प्रतिक्रिया निश्चित ही शिमला समझौते की भावनाओं और लगातार दी गई भारत की उस सफ़ाई के ख़िलाफ़ जाती है कि भारत-पाकिस्तान तनाव में चीन मध्यस्थ या किसी और तरह की कोई भूमिका नहीं चाहता.

यही नहीं, यह चीन के मसले पर समय-समय पर चीनी नेताओं की ओर से दिए गए नीति आधारित बयानों के भी ख़िलाफ़ है. चीन के प्रसिद्ध विदेश मंत्री छिएँन छीचेन के 1989 में नेपाल में दिए बयान से लेकर राष्ट्रपति चियांग चेमिन के 1996 में पाकिस्तानी सेनट में दिए भाषण का ही नतीजा था कि उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के कश्मीर के मुद्दे को सुरक्षा परिषद में उठाने से दो टूक मना कर दिया था.

कारगिल युद्ध तो वह दौर था जब भारत-पाकिस्तान तनाव को लेकर चीन की तटस्थता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण देखने को मिला था.

अंतरराष्ट्रीय दख़ल

तीसरा, जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन को भारत-पाकिस्तान के बीच का मुद्दा बताने के पीछे चीन की मंशा यह है कि वह बताना चाहता है कि यह भारत का आंतरिक मामला नहीं है. वह यह दिखाना चाहता है कि तटस्थ खिलाड़ी के तौर पर वह भारत-पाकिस्तान तनाव में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से समाधान का कोई परोक्ष मक़सद नहीं रखता है.

हाल ही में जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर विवाद में मध्यस्थता की भूमिका निभाने को कहा है, तब चीन ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि कश्मीर विवाद के निपटारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय एक रचनात्मक किरदार निभा सकता है.

यह पाकिस्तान के साथ उसके विशेष रिश्ते और जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से पर उसके कब्ज़े को देखते हुए मज़ाक की तरह लग रहा है.

India-Pakistan LoC-5

चीन का पाकिस्तान के साथ समझौता?

चौथा, चीन ने इस पर अपनी गंभीर चिंता जताई है कि भारत ने यथास्थिति में एकतरफ़ा बदलाव किया है जो इस क्षेत्र में तनाव को इतना बढ़ा सकता है कि चीन भारत के आंतरिक मामलों में दख़ल देने लगे.

साथ ही, अगर चीन मानता कि यह विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच का ही है तो उसका पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ जाने का बयान देना पूरी तरह अनुचित है.

मार्च 1963 को चीन-पाकिस्तान के बीच हुए सीमा समझौते में पाकिस्तान ने अपने कब्ज़े वाली शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी थी.

उसी समझौते के अनुच्छेद-6 में यह लिखा गया है कि “पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर विवाद के निपटारे के बाद, सीमा को लेकर संप्रभुता की वार्ता पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार के साथ फिर शुरू होगी.”

क्या इसका यह मतलब नहीं निकलता कि चीन को तब तक शांत रहना चाहिए जब तक कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर द्विपक्षीय समाधान नहीं कर लेते?

तो क्या बढ़ेगी भारत की सीमाई सुरक्षा?

बौद्ध बहुल लद्दाख को नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने के भारत के फ़ैसले से भी चीन हैरान दिख रहा है, जिसकी सीमा तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र से लगी हुई है.

अब यह इलाक़ा सीधे भारत की केंद्र सरकार के अधीन हो रहा है जहां दलाई लामा समेत सैकड़ों की संख्या में तिब्बती शरणार्थी रह रहे हैं.

शायद इसी कारण नई दिल्ली में चीन के राजदूत याओ जिंग ने भारतीय मीडिया से कहा कि कश्मीर “अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र है” और सुरक्षा परिषद का स्थानीय सदस्य होने के नाते उसकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वह क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करे.

विवादित जम्मू-कश्मीर से अलग होने पर लद्दाख में मनाई जा रही खुशी भारत के इस हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र में चीन के प्रभाव का मुक़ाबला करने में मदद कर सकती है जहां बौद्धों की पर्याप्त उपस्थिति है.

वास्तव में, चीन और पाकिस्तान से सटे जम्मू-कश्मीर के पुर्नगठन से नई दिल्ली अपनी सीमाओं के बेहतर नियंत्रण और प्रबंधन की उम्मीद कर रहा है.

पुनर्गठन की प्रक्रिया के गुणों और इसकी आंतरिक जटिलताओं को एक तरफ़ रखा जाए तो जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन से भारत की सरहदी सुरक्षा बेहतर होगी और इसी वजह से चीन और पाकिस्तान दोनों बेचैन हैं.

साभार: डॉक्टर स्वर्ण सिंह, (प्रोफ़ेसर) जेएनयू, दिल्ली

 

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दिल्ली का डॉन कहे जाने वाले अब्दुल नासिर पर दिल्ली क्राइम ब्रांच ने 9 जुलाई को कर दिया था MCOCA के तहत मुकदमा दर्ज!

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चौधरी हैदर अली

नई दिल्ली:दिल्ली क्राइम ब्रांच ने दिल्ली का डॉन कहे जाने वाले अब्दुल नासिर (31) के खिलाफ 9 जुलाई 2019 को मकोका के तहत मुकदमा दर्ज किया हुआ है!दिल्ली क्राइम ब्रांच के अनुसार अब्दुल नासिर के गैंग पर ऑर्गेनाइज क्राइम सिंडिकेट चलाने के साथ-साथ ठेके पर हत्या, जबरन वसूली करने का आरोप है!

“अब्दुल नासिर पर ऑर्गेनाइज क्राइम सिंडिकेट चलाने का लगाया है आरोप”

दिल्ली क्राइम ब्रांच का दावा है कि अब्दुल नासिर ने अपराध की दुनिया से कम से कम 50 करोड रुपए की प्रॉपर्टी बना रखी है इतना ही नहीं जिस कार से अब्दुल नासिर घूमता है उस कार की कीमत भी 1 करोड़ से ज्यादा है!दिल्ली क्राइम ब्रांच के मुताबिक डिपार्टमेंट से नासिर पर मकोका लगाए जाने की खबर लीक हो जाने की वजह से नासिर और उसके साथी 6 जुलाई 2019 से ही हो गए अंडरग्राउंड!

दिल्ली क्राइम ब्रांच के उपायुक्त श्री राजेश देव ने कहा हमने सक्षम अथॉरिटी से अप्रूवल लेकर अब्दुल नासिर पर मकोका के तहत मुकदमा दर्ज किया है उसकी सभी प्रॉपर्टी और गैंग मेंबरों के बारे में जानकारी जुटाई जा रही है जल्द से जल्द इन लोगों पर सख्त एक्शन लिया जाएगा!

People’s BEAT एक जिम्मेदार न्यूज़ पोर्टल है इसलिए हमने दिल्ली क्राइम ब्रांच के साथ-साथ (MCOCA) के आरोपी अब्दुल नासिर के परिवार वालों का भी पक्ष लिया है!

हम जाफराबाद की गली नंबर 48 में स्थित अब्दुल नासिर के घर गए अब्दुल नासिर के घर पर हमारी मुलाकात अब्दुल नासिर की वाल्दा 63 वर्षीय श्रीमती इशरत जहां से हुई हमने अब्दुल नासिर की वाल्दा से पूछा के दिल्ली क्राइम ब्रांच का आप के बेटे अब्दुल नासिर पर आरोप है कि उसने अपराध जगत से अपनी संपत्ति 50 करोड़ रुपए से भी ज्यादा की बना रखी है?
63 वर्षीय बुजुर्ग अब्दुल नासिर की अम्मी ने हमारे सवाल का जवाब देते हुए कहा हमारे पास सिर्फ यही एक घर है जो आज से 45-46 साल पहले नासिर के दादा जी ने खरीदा था! नासिर की वाल्दा ने कहा नासिर और उसके भाइयों के पास अगर पैसा होता तो सबसे पहले वह अपना यह घर बनवाते जोकि झर-झर हालत में है और इस घर से इन सभी बच्चों की यादें जुड़ी हुई हैं! उन्होंने कहा अगर इस पुश्तैनी मकान के अलावा 50 करोड़ तो दूर कोई नासिर पर 5 लाख की संपत्ति ही साबित कर दे उसके बाद जो सजा नासिर को दी जाएगी वह उसे कबूल होगी!

“दिल्ली अंडरवर्ल्ड की तीसरी किस्त जल्द ही आपके साथ सांझा की जाएगी!

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क्या है UAPA संशोधन बिल 2019, और क्यों हो रहा है इसका विरोध…

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UAPA बिल 2019 राज्यसभा से भी पास हो गया है आइए जानते हैं क्या है UAPA बिल और उसका इतना विरोध क्यों हो रहा है?

NIA को मिले असीमित अधिकार..

UAPA, Unlawful Activities Prevention Act 2019 (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून)बिल 2019 को संसद में काफी गर्मागर्म बहस के बाद पास कर दिया गया है. विपक्ष ने इस बिल को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई जिस पर  गृहमंत्री अमित शाह ने सिलसिलेवार तरीके से विपक्ष के सवालों का जवाब दिया है.

शाह ने कहा कि, ”यहां उस प्रावधान की ज़रूरत है जिसके तहत किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित किया जा सके. ऐसा संयुक्त राष्ट्र करता है. अमरीका, पाकिस्तान, चीन, इसराइल और यूरोपीय यूनियन में भी यह प्रावधान है. सबने आतंकवाद के ख़िलाफ़ ऐसा प्रावधान बना रखा है.”

इस बिल को लेकर जो सबसे ज्यादा सवाल उठाए जा रहे हैं, वो इसके गलत इस्तेमाल की आशंका के हैं. इस बिल के कानून बनने के बाद किसी भी व्यक्ति को आतंकी घोषित किया जा सकता है. आतंकी होने के नाम पर उसकी संपत्ति जब्त की जा सकती है. इस बिल ने NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को असीमित अधिकार दे दिए हैं.

ओवैसी ने यूएपीए के दुरुपयोग पर लोकसभा में कहा था, ”मैं इसके लिए कांग्रेस पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराता हूं क्योंकि उसी ने यह क़ानून बनाया था. मैं कांग्रेस से पूछना चाहता हूं कि इस क़ानून का पीड़ित कौन है?”

ओवैसी ने कहा कि किसी को भी आतंकवादी आप तभी कह सकते हैं जब कोर्ट उसे सबूतों के आधार पर दोषी पाती है. ओवैसी ने पूछा कि सरकार महसूस करती है कि कोई व्यक्ति आतंकवादी है तो उसे आतंकवादी घोषित कर देगी. उन्होंने कहा था कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है.

सवाल है कि क्या सच में ऐसा है? UAPA बिल के पास हो जाने के बाद क्या हो जाएगा? इसे जानने की कोशिश करते हैं.

क्याहैUAPAबिल2019?
देश में आतंकवाद व् नक्सलवाद की समस्या को देखते हुए, आतंकी संगठनों और आतंकवादियों को  सबक सिखाने के लिए UAPA बिल 2019 को मंजूरी दी गई है. सरकार के अनुसार, ये मोदी सरकार के आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को प्रदर्शित करने वाला बिल है. लोकसभा ने इस बिल को 24 जुलाई को पास कर दिया था. अब राज्यसभा ने भी इसे पास कर दिया है.

इस बिल का मकसद आतंकवाद की घटनाओं में कमी लाना, आतंकी घटनाओं की स्पीडी जांच करना और आतंकियों को जल्दी सजा दिलवाना है. दरअसल ये देश की एकता और अखंडता पर चोट करने वाले के खिलाफ सरकार को असीमित अधिकार देती है. लेकिन इसी असीमित अधिकार की वजह से विपक्ष को लगता है कि सरकार और उसकी मशीनरी इसका गलत इस्तेमाल कर सकती है.

UAPA बिल के प्रावधानों के मुताबिक सरकार को क्या अधिकार मिले हैं?

  • संशोधित बिल के बाद सरकार किसी भी तरह से आतंकी गतिविधियों में शामिल संगठन या व्यक्ति को आतंकी घोषित कर सकती है. सरकार सबूत नहीं होने की हालत में भी, सिर्फ शक के आधार पर ही किसी को आतंकी घोषित कर सकती है.
  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को इस बिल में असीमित अधिकार दिए गए हैं. बिल के कानून बनने के बाद इंस्पेक्टर रैंक या उससे बड़ी रैंक के किसी भी अधिकारी को किसी भी मामले की जांच की पूरी छूट मिल जाएगी. हालांकि जांच शुरू करने से पहले उन्हें डायरेक्टर जनरल से परमिशन लेनी होगी.
  • राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के महानिदेशक (DG) को ये अधिकार मिल जाएगा कि वो आतंकी गतिविधि में शामिल व्यक्ति की संपत्ति जब्त कर ले या उसे कुर्क कर सके. इसके पहले जिस राज्य में संपत्ति है, उसके डीजीपी से अनुमति लेनी पड़ती थी.
  • कानून बनने के बाद किसी आतंकी संगठन या आतंकवादी की निजी या आर्थिक जानकारी पश्चिमी देशों के साथ शेयर की जा सकती है.
  • ये बिल एनआईए को ये अधिकार देता है कि वो किसी भी राज्य में जाकर रेड कर सकता है. इसके लिए राज्य सरकार या उसकी पुलिस से अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं है.
  • बिल के कानून बनने के बाद एनआईए के डीएसपी, अस्टिटेंट कमिश्नर या इससे ऊंचे रैंक के अधिकारी मामले की जांच कर सकते हैं.

बिल को लेकर विपक्ष ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं. खासकर किसी भी राज्य की अनुमति के बिना रेड और कुर्की-जब्ती के गलत इस्तेमाल को लेकर चिंता जाहिर की गयी है. कांग्रेस के पी चिदंबरम और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं. हालांकि कुछ मामलों में सरकार ने रिव्यू का प्रावधान रखा है.

गलत इस्तेमाल को लेकर ये सब प्रावधान किए गए हैं-

-बिल में मिले अधिकारों के गलत इस्तेमाल को लेकर गृहमंत्रालय की ओर से कहा गया है कि अगर किसी व्यक्ति को आंतकी घोषित किया जाता है तो वो गृहसचिव के सामने अपील कर सकता है. गृह सचिव को 45 दिन के भीतर अपील पर फैसला लेना होगा.

-केंद्र सरकार इस एक्ट के मुताबिक एक रिव्यू कमिटी बना सकती है. जिसके सामने आतंकी घोषित संगठन या व्यक्ति अपील कर सकता है और वहां सुनवाई की गुजारिश कर सकता है.

-अगर कोई व्यक्ति गृह सचिव के फैसले से संतुष्ट नहीं हो तो वो कमिटी में अपील कर सकता है. कमिटी में हाईकोर्ट के सीटिंग या रिटायर्ड जज के साथ कम से कम केंद्र सरकार के दो गृहसचिव रैंक के रिटायर्ड अधिकारी होंगे.

-केंद्र सरकार का कहना है कि इस कानून का इस्तेमाल सावधानी से होगा. यासिन भटकल और मसूद अजहर जैसे आतंकियों से निपटने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जाएगा.

-सरकार का कहना है कि इस कानून के बाद आतंकवाद की ओर प्रेरित लोग नए ग्रुप बनाने से बचेंगे.

-बिल के प्रावधान आतंकियों पर लगाम लगाने के लिए यूएन के सिक्योरिटी काउंसिल के नियम कायदों की तरह हैं.

 

 

 

 

 

 

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