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आसिफ़ा की हत्या और बलात्कार पर चुप्पी का नेता कौन है

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क्या आप अंग्रेज़ी में छपने वाली OPEN पत्रिका में राहुल पंडिता और ndtv.com पर नज़ीर मसूदी का लेख पढ़िएगा? मैं आपकी चुप्पी को समझता हूं, जानवर बन जाने के बाद आपका बोलना भी बेकार है। इससे पहले कि आप अक्षरों को भी हिन्दू मुसलमान की तरह पहचानने लगे, क्या उम्मीद की जा सकती है कि नीचे लिखे गए विवरण को आप पढ़ेंगे? कोशिश कीजिए। मैंने राहुल पंडिता और नज़ीर मसूदी की रिपोर्ट का सार आप हिन्दी वालों के लिए पेश करने की कोशिश की है।

2010 में मोहम्मद यूसुफ़ ने अपनी बहन की बेटी आसिफ़ा को गोद ले लिया था। बकरवाल घुमंतू समुदाय के यूसुफ़ ने जम्मू को अपना ठिकाना बना लिया था जहां पांच साल से इस समुदाय को लेकर डोगरा हिन्दुओं के मन में आबादी का भय खड़ा किया जा रहा था। रोहिंग्या मुसलमानों के यहां बसाए जाने से भी इसे हवा मिली कि आबादी का संतुलन बदल रहा है। आप जानते हैं कि आबादी का भय कौन खड़ा करता है। इनके भीतर ज़हर का फेन ऊपर आने लगा कि कहीं जम्मू में भी मुसलमान न भर जाएं। जैसे देश के भीतर मुसलमानों के लिए कोई देश ही नहीं है। राहुल पंडिता ने लिखा है कि हिन्दू और बकरवाला के बीच तनाव बढ़ने लगा। शक और नफ़रत ने आठ साल की बच्ची आसिफ़ा को अपना शिकार बना लिया। आप चार्जशीट पढ़िए तो आपके भीतर बैठी उस भीड़ का ख़ौफ़नाक़ चेहरा नज़र आने लगेगा।

चार्जशीट में लिखा है कि इस हत्या में मंदिर का पुजारी 60 साल का सांझी राम और पुलिस अफ़सर दीपक खजुरिया शामिल है। इलाक़े से बकरवाल को भगाने की प्लानिंग कर रहे सांझी राम की नज़र कई दिनों से इस बच्ची पर थी। आसिफ़ा अक्सर टट्टूओं को चराने ले जाती थी। सांझी राम ने यह प्लान दीपक खजुरिया, अपने बेटे और भतीजे से साझा किया। यह भतीजा 18 साल से कम है, इसलिए यहां भतीजा ही कहूंगा, नाम नहीं लूंगा। तीन महीने पहले ही भतीजे को एक लड़की के साथ ग़लत व्यवहार के लिए स्कूल से निकाला गया था।

पुलिस अफ़सर दीपक खजुरिया दवा की दुकान पर जाता है और बेहोशी की दवा ख़रीद लाता है। उसके बाद भतीजे से कहता है कि वह आसिफ़ा को अगवा कर लाएगा तो चोरी से इम्तहान पास करने में उसकी मदद कर देगा। भतीजा अपने दोस्त परवेश कुमार को बताता है। 9 जनवरी को भतीजा और परवेश जाते हैं और नशे के चार डोज़ ख़रीदते हैं। मैंने बार बार कहा है कि नफ़रत की यह राजनीति आपको या आपके बच्चे का इस्तमाल करेगी और हत्यारा बना देगी। देखिए कैसे दो बच्चों का इस्तमाल होता है।

10 जनवरी को भतीजा को सुनाई देता है कि आसिफ़ा किसी औरत से अपने टट्टुओं के बारे में पूछ रही है। वह आसिफ़ा को बताता है कि उसने जंगलों में घोड़ों को देखा है। परवेश और भतीजा उसके साथ हो लेते हैं। पुलिस के अनुसार आसिफ़ा को कुछ शक होता है और वह भागने लगती है। भतीजा उसे पकड़ लेता है और धक्का देकर ज़मीन पर गिरा देता है। उसे ज़बरन ड्रग दे देता है। आसिफ़ा बेहोश हो जाती है। भतीजा उसका बलात्कार करता है। उसके बाद परवेश भी बलात्कार करने की कोशिश करता है मगर नहीं कर पाता है।

आसिफ़ा को उठा कर एक छोटे मंदिर में ले जाया जाता है, जिसका पुजारी सांझी राम है। अगले दिन दीपक खजुरिया और राम का भतीजा उसे देखने आते हैं। खजुरिया उसके मुंह में बेहोशी का दो टेबलेट ठेल देता है। शाम को भतीजा सांझी राम के बेटे को फोन करता है. जो मेरठ में कृषि स्नातक की पढ़ाई पढ़ रहा था। उसे कहता है कि अपनी प्यास बुझाना चाहते हो तो जल्द आओ। अगली सुबह विशाल जम्मू पहुंच जाता है और दो घंटे बाद आसिफ़ा को तीन टेबलेट दिए जाते हैं। उसे अब तक कुछ भी खाने को नहीं दिया गया है।
अब सांझी राम एक और पुलिस वाला तिलक राम को विश्वास में लेता है। 12 जनवरी की दोपहर आसिफ़ा के पिता मोहम्मद यूनूस पुलिस में केस दर्ज करते हैं। पुलिस तलाश पर निकलती है, उस टीम में दीपक खजुरिया और तिलक राम दोनों हैं। इन्हें बचाने के लिए बीजेपी के दो मंत्री और पार्टी के नेता सीबीआई की जांच की मांग का ढोंग रचते है और वहां हिन्दू एकता मंच का निर्माण होता है जिसके साथ ये लोग खड़े होते हैं।

सांझी राम अपनी बहन के यहां जाता है और कहता है कि उसके बेटे ने किसी लड़की अगवा किया है। बचाने के लिए पुलिस को रिश्वत देनी है। बहन से डेढ़ लाख लेकर आता है और तिलक राम को देता है। इसके ज़रिए पांच लाख देने की बात होती है जिसमें सब इंस्पेक्टर आनंद दत्ता को भी हिस्सेदार बनाया जाता है। आनंद दत्ता भी एक आरोपी है।

13 जनवरी को लोहड़ी के दिन सांझी राम, उसका बेटा और भतीजा मंदिर जाते हैं और पूजा करते हैं। सांझी राम के जाने के बाद उसका बेटा आसिफा का बलात्कार करता है। फिर उसका छोटा भाई बलात्कार करता है। बलात्कार करने के बाद आसिफ़ा को तीन टेबलेट दिए जाते हैं। पुलिस ने बाकी टेबलेट बरामद कर लिए हैं।

लोहड़ी की शाम को सांझी राम सबको बताता है कि लड़की को मारने का वक्त आ गया है। उस रात आसिफ़ा को एक पुलिया के नीचे ले जाते हैं। तभी खजुरिया पहुंचता है और कहता है कि मारने से पहले एक और बार बलात्कार करना चाहता है। वह बलात्कार करता है। उसके बाद अपनी बायीं जांघ के नीचे आसिफ़ा का गर्दन दबाने की कोशिश करता है। नहीं कर पाता है। सांझी राम का भतीजा आता है और चुन्नी से उसकी गर्दन कस देता है। उसके पांव पीछे से मोड़ कर तोड़ देता है। आसिफ़ा मर गई है, यह पुख़्ता करने के लिए दो बार पत्थर से उसके सर पर मारता है।

लाश फिर से मंदिर में ले जाई जाती है। 15 जनवरी की सुबह जंगल में फेक दी जाती है। नज़ीर मसूदी ने लिखा है कि कोर्ट में वकीलों ने इतना हंगामा किया कि छह घंटे लग गए पुलिस को चार्जशीट दायर करने में। आसिफ़ा के ख़ून से सने कपड़े ग़ायब कर दिए जाते हैं। जिस डाक्टर ने पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट तैयार की, उसका तबादला हो जाता है। एस एस पी रमेश जल्ला ने बताया है कि वे हर हफ्ते हाई कोर्ट को स्टेटस रिपोर्ट दे रहे थे।

अब यहां से स्थानीय समाज अपनी मृत्यु का प्रमाण देता है। बाप यूसुफ़ अपनी ज़मीन में बेटी को दफ़नाना चाहता है मगर लोग दफ़नाने नहीं देते हैं। आसिफ़ा को अल्लाह ने आख़िरत के लिए दो ग़ज़ ज़मीन न दी और मंदिर में खड़े भगवान ने उसकी लाज नहीं बचाई। हम धर्म के नाम पर हैवान बने जा रहे हैं। यूसुफ़ 8 मील दूर गांव में आसिफ़ा की लाश को लेकर जाते हैं और दफ़न करते हैं। वहीं पर हमारी और आपकी अंतरात्मा भी दफ़न है।

क़ायदे से अभी तक जांच पर सवाल उठाने वाले बीजेपी के दो मंत्रियों को मंत्रिमंडल से निकाल देना चाहिए था। सीबीआई जांच की मांग का ढोंग खेला गया। यह खेल बीजेपी के उपाध्यक्ष अविनाश खन्ना ने भी खेला और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी। मगर समाज क्यों चुप है, आप आगे पढ़ेंगे तो पता चलेगा। आप चुप्पी का कारण प्रधानमंत्री से नहीं, ख़ुद से पूछिए। वैसे प्रधानमंत्री से क्यों नहीं पूछा जाए कि आप क्यों नहीं बोलते हैं। देश में तब भी हज़ारों बलात्कार होते थे मगर आपने निर्भया पर बोला था कि नहीं बोला था। तो आप आसिफ़ा पर क्यों नहीं बोल पा रहे हैं।वैसे भी प्रधानमंत्री क्या बोल देंगे? वे या तो उपवास करते हैं या बकवास करते हैं।

ये लोग आपको तिरंगे की चादर में लपेट कर हिन्दुत्व का मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण दे रहे थे, इसलिए नहीं कि आप सात्विक और आध्यात्मिक बन जाएं, इसलिए कि किसी की हत्या के वक्त हिन्दुत्व के नाम पर आप चुप रहना सीख लें। आपकी चुप्पी ने साबित कर दिया कि ये सफल हो चुके हैं। इस हिन्दुत्व से न आपको रोज़गार मिला, न मिलेगा, न अस्पताल मिला, न मिलेगा, न ही ईमानदार पुलिस मिलेगी, न मिली और न ही निर्भिक और बेहतर न्याय व्यवस्था मिली, न मिलेगी। बस एक भीड़ मिली जो हर हफ्ते देश के किसी कस्बे में हाथों में तलवार लिए दौड़ती नज़र आती है।

यही है विचारधारा जो आपको हर तरह से ठीक नज़र आए, इसके लिए सेना का इस्तमाल किया गया। पूर्व सैनिकों को टीवी पर बिठा कर पाकिस्तान को सामने लाया गया ताकि आप पाकिस्तान पाकिस्तान करते हुए अपने पड़ोस के मुसलमान से नफ़रत करने लगे। आप उन मुद्दों की तरफ लौट कर देखिए तो उन रास्तों पर आपकी संवेदनाओं के क़त्ल के निशान मिलेंगे। गौ रक्षा के नाम पर भीड़ ने हत्याएं की, आप चुप रहे। कहते रहे कि यह सब आपकी आस्था का सवाल है। गौ हत्या नहीं चलेगी। मानव हत्या चलेगी? मंदिर भी तो आपकी आस्था का सवाल है, तो क्या उसके भीतर बलात्कार चलेगा? आपका ईमान नहीं डोला क्योंकि आप हत्यारे बन चुके हैं।

अब आप उस भीड़ के बिना नहीं रह सकते। इसलिए आप इस भीड़ के बग़ैर सत्ता की कल्पना करने से डरते हैं। कश्मीरी पंडितों के नाम पर आपके मन में मुसलमानों के प्रति ज़हर भरा गया। रमेश कुमार जल्ला जाबांज़ और शानदार अफ़सर के नेतृत्व में आसिफ़ा की हत्या और बलात्कार के मामले में चार्जशीट बनी है, आपको रमेश कुमार जल्ला से भी नफ़रत हो गई। आसिफ़ा के परिवार को वक़ील नहीं मिला तो दीपिका आईं जो ख़ुद एक कश्मीरी पंडित हैं। जिस समाज ने नाइंसाफियां झेली हैं, उसे पता है नफ़रत के नाम पर हत्याओं के इस अंतहीन सिलसेला का दर्द। उसके नाम पर राजनीति करने वालों ने चार साल में एक बार भी कश्मीरी पंडितों का नाम नहीं लिया, बोले भी तो एक कश्मीरी पंडित की निष्ठा पर सवाल उठाने के लिए। कमाल की राजनीति है।

रायसीना हिल्स गूगल में डाल कर देखिए, वो आपकी कारों को वहां तक पहुंचा देगा,जहां आप 2012 में गए थे। उससे पहले आप ख़ुद को नफ़रत की इस राजनीति में सर्च कीजिए, आपकी लाश नज़र आएगी, कुछ लोग नज़र आएंगे जो कह रहे होंगे कि अभी तुम नहीं मरे हो क्योंकि सवाल करने वाले बंगाल पर नहीं बोले, केरल पर नहीं बोले। अधमरे से पड़े हुए तुम चुप रहो क्योंकि तुम्हारी चुप्पी एक आदमी के राज करने के शौक को पूरा करने के लिए ज़रूरी है। उसका राज ही तुम्हारा राज है।

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लोकसभा चुनाव 2019:- बेगूसराय में वामदल कितना मजबूत?

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हम सब यह जानते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव 2019 का बिगुल फूंका जा चुका है, जिसके लिए हर दल ने अलग-अलग सीटों पर अपनी दाबेदरी पेश करना शुरू कर दिया है! इसी क्रम में बेगूसराय से लोकसभा प्रत्याशी के लिए CPI ने अपनी दाबेदरी कन्हैया कुमार के नाम से पेश किया है! डॉ. कन्हैया कुमार JNU छात्रसंघ के भूतपूर्व अध्यक्ष और देश के सबसे युवा चर्चित चेहरा हैं! वहीं दूसरी ओर अन्य दल ने भी अपनी दाबेदारी पेश की है! अब सवाल उठ रहा है कि CPI की दाबेदारी कितनी मजबूत है?

सबसे पहले यह बताता चलूँ कि वर्तमान बेगूसराय लोकसभा सीट पूर्व के बेगूसराय और बलिया को मिला के बना है जिसका क्षेत्र पूरा बेगूसराय ज़िला है, जिसमे सात विधानसभा आता है! ऐतिहासिक रूप से बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जाना जाता है जहाँ वामपंथ ने हमेशा के अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज की है!

सातों विधानसभा सभा का अवलोकन जब करते हैं तो यह पाते हैं कि बेगूसराय विधानसभा सभा को कांग्रेस ने 10, भाजपा ने 5, राजद ने 0 तथा वामपंथ ने 3 बार जीता है! वहीं दूसरी ओर अगर उप विजेता को देखा जाय तो कांग्रेस 4, भाजपा 1, राजद 0 और वामदल 9 वार दूसरे नंबर पर रही हैं!

बखरी विधानसभा में कांग्रेस 2, भाजपा 1, राजद 2, तथा वामदलों ने 10 बार जीत हासिल की हैं और कांग्रेस 5, भाजपा 1, वामदलों ने 3 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

तेघरा को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1 तथा वामदलों ने 2 बार जीता है तथा कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 1, तथा वामदलों ने 2 बार द्वितीय स्थान प्राप्त किया है!

मटिहानी को कांग्रेस ने 2, भाजपा ने 0, राजद ने 0, तथा वामदलों ने 3 बार जीता है जबकि कांग्रेस को 5, भाजपा को 1, राजद को 0 तथा वामदलों को 3 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

साहेबपुर कमाल जब से बना है एक बार राजद जीती और एक बार हारी है! जबकि पहले के बलिया विधानसभा में राजद, जदयू तथा लोजपा का दबदबा रहा है! तनवीर हसन साहब ख़ुद अपने यहाँ से दो बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं!

चेरिया बरियारपुर को कांग्रेस ने 2 बार, भाजपा ने 0, राजद ने 1 और वामदलों ने 1 बार जीता है वही दूसरी ओर कांग्रेस को 2, भाजपा को 0, राजद को 2 तथा वामदलों को 1 बार पराजय का सामना करना पड़ा है!

वही अगर पूर्व के बरौनी विधानसभा की बात करें तो सन 1977 से 2005 तक लगातार 8 बार सीपीआई ने चुनाव जीता है! सब मिलकर अगर देखा जाय तो हर दल से ज़्यादा वामदलों ने विधानसभा चुनाव जीतें हैं!
अब रही लोकसभा चुनाव की बात तो पहले बेगूसराय और बलिया दो अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र रहा है जिसमें से बेगूसराय में 1967 में सीपीआई ने कांग्रेस को हराकर चुनाव जीता था एवं पिछले चुनाव 2014 में भी सीपीआई ने 1,92,639 वोट लाकर तीसरा स्थान प्राप्त किया था जबकि 1967 में 1, 80, 883 वोट लाकर सीपीआई ने चुनाव जीत लिया था! कहने का तात्यापर्य यह है कि सीपीआई का कैडर वोट अभी भी उसके साथ है क्योंकि 2009 के चुनाव में भी सीपीआई को 1,64,843 वोट आए थे!

बलिया लोकसभा जो पहले बेगूसराय से अलग था वहाँ सीपीआई तीन बार 1980, 1991 तथा 1996 में लोकसभा चुनाव जीत चुकी है! 1998 में भी जब राजद चुनाव जीती थी उस वक़्त भी 1,87,635 वोट पाकर सीपीआई 52,484 वोट से पिछड़कर दूसरे पायदान पर थी!

अभी तक के लोकसभा चुनाव को देखा जाय तो कुल 16 लोकसभा चुनाव में से सीपीआई ने 1962 से छः चुनाव लड़ी है जिसमें से 1962 हासिम अख़्तर (51, 163),1977 इंद्रदेव सिंह (72, 096), 1998 रमेन्द्र कुमार (विजयी 1,44,540), 2009 शत्रुघ्न प्रसाद सिंह (164843) एवं 2014 राजेंद्र प्रसाद सिंह (1,92,639) चुनाव लड़े हैं! वाकी 1962 से पहले सीपीआई ने चुनाव नहीं लड़ा है और बाद में कई बार गठबंधन के कारण दूसरे दल को समर्थन किया है! इस बार जब सीपीआई के पास भारत का सबसे चर्चित क्रांतिकारी चेहरा ख़ुद है तो फिर यह सवाल कहाँ से आता है कि वामदल का बेगूसराय में आधार नहीं है!

लोकसभा और विधानसभा दोनों को मिलाकर अवलोकन करने पर हम यह पाते हैं कि वामदल पूरे बेगूसराय के 7 विधानसभा क्षेत्रों में से मटिहानी एवं साहेबपुर कमाल को छोड़कर किसी भी विधानसभा में महागठबंधन के सारे घटकदल में से सबसे ज़्यादा मजबूत है! और अगर संभावित उम्मीदवारों को देखें तो कन्हैया कुमार से ज़्यादा लोकप्रिय उम्मीदवार कोई नहीं है! जहाँ तक क्षेत्र में लोगों के बीच मिलना-जुलना और मेहनत की बात करें तो कन्हैया कुमार 2014 के लोकसभा चुनाव से ही अपने क्षेत्र के लोगों के बीच काम कर रहे हैं अन्य किसी भी दल का कोई व्यक्ति उनके मुक़ाबके कहीं नहीं टिकता! जब भी बेगूसराय में किसी भी प्रकार का कोई भी सामाजिक वैमनस्यता फैलाने की कोशिश हुई वामपंथियों ने हर समाज के लोगों से कंधा से कंधा मिलाकर साम्प्रदायिक शक्तियों का डट कर मुक़ाबला किया है तब और नेतागण कहाँ थे!

वर्तमान सरकार में जनता पर हुए हर अत्याचार के विरुद्ध यहाँ से लेकर दिल्ली तक कन्हैया कुमार एवं उनका संगठन (AISF) और दल (CPI) ने हर मोर्चे पर आंदोलन कर साम्प्रदायिक शक्तियों को परास्त किया है, तो आज जब समाज को इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है तब यह कहना कि इनका कोई आधार नही यह कहाँ तक उचित है! हाँ यह सच है कि राजद में तनवीर हसन ने बेगूसराय से पहली बार 2014 में कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ा और 3,69,892 वोट पाए लेकिन उनकी भी हार ही हुई, जबकि 2009 में जदयू से मुनाजिर हसन मात्र 2,05,680 वोट लाकर जीत हासिल की थी! तनवीर जी कई बार चुनाव लड़ चुके हैं पर अभी तक एक बार भी जीत नहीं पाएं हैं, हां एक बार MLC बने हैं जिसमें भी बेगूसराय सीपीआई के दो विधायकों ने ही उनकी मदद की थी!

अगर हम बेगूसराय लोकसभा की बात करें तो यहाँ का समीकरण हर बार अलग ही होता है! वर्तमान में सारे समीकरण, मेहनत, युवा जोश, ईमानदारी तथा लोकप्रियता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि अगर सीपीआई/कन्हैया कुमार अकेले भी चुनाव लड़ेंगे तो उनकी जीत की संभावना को नकारा नहीं जा सकता!

जानत के विश्वास में भी कन्हैया कुमार सबसे ऊपर हैं! यह बात तो तय है कि कन्हैया कुमार जितनी प्रमुखता से अपने क्षेत्र के बारे में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पटल पर बात रख सकते हैं कोई अन्य उम्मीदवार नहीं रख सकता! एक और बात जो कन्हैया कुमार को दूसरों से अलग करती है वो है उनकी विचारधारा जो किसी अन्य संभावित उम्मीदवार के पास नहीं है!

एक बात तो तय है कि कन्हैया कुमार दल बदलू नहीं हैं और ना ही उन्हें यह चिंता है कि हर बात कहने से पहले यह सोचना है कि कहीं कोई आका नाराज़ ना हो जाय! दूसरी बात कि कन्हैया कुमार जब अपने क्षेत्र का मुद्दा रखेंगे तो पूरा देश सुनेगा क्योंकि उनकी लोकप्रियता सिर्फ़ बेगूसराय तक ही सीमित नहीं है! तीसरी बात वो बेगूसराय की भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ़ हैं और जानते हैं कि अगर युवाओं ने इस बार उनका साथ दिया तो बेगूसराय में व्यवसाय तथा लघुउद्योगों की अपार संभावनाएं हैं; बस धर्म, जाति, सम्प्रदाय इत्यादि से ऊपर उठकर एक बार पूरे समाज की भलाई के मद्देनजर सही दिशानिर्देशन में चलने की आवश्यकता है!

~शाहनवाज़ भारतीय

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देहरादून:- नमक सत्याग्रह की विरासत बचाने के लिए उत्तराखंड के युवा हुए एकजुट

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आज का दिन(12 मार्च) हिंदुस्तान के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण दिन है। आज से उन्नब्बे साल पहले 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी जी ने चिन्हित 78 आंदोलनकारियों के साथ साबरमती आश्रम से नमक आंदोलन के लिए डांडी मार्च प्रारम्भ किया था।इसी दिन महात्मा गांधी ने यह संकल्प भी लिया था की जब तक मुल्क को आजादी नहीं मिलेगी तब तक वह साबरमती आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। ऐसा ही हुआ।

इसके बाद गांधी जी साबरमती आश्रम नहीं जा पाए। सही मायने में यह दिन आज़ादी की लड़ाई का एक ऐसा महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ से ब्रितानिया साम्राज्यवाद की चूलें हिलनी शुरू हो गई थी। मैं देहरादून से हूँ। उत्तर भारत में मेरा जिला देहरादून एक मात्र ऐसा स्थान है जहाँ एक नदी के पानी से नमक बनाकर और उस नमक को बेचकर नमक क़ानून को तोडा गया था।

गांधी जी की इस डांडी यात्रा में देहरादून के रहने वाले वीर खडग बहादुर भी शामिल थे। उन्होंने गांधी जी से जिक्र किया था कि हमारे गावं के पास भी एक नदी बहती है जिसके कुछ हिस्से में नमकीन पानी पाया जाता है। तो फिर गांधी जी ने खड़गबहादुर को देहरादून जाकर इस नदी से नमक बनाकर नमक आंदोलन शरू करने की सलाह दी थी। गांधी जी की सलाह पर वीर खडग बहादुर ने शहर के तत्कालीन आंदोलनकारियों से मिलकर यहाँ नमक बनाकर नमक सत्याग्रह शुरू किया था। जिस जगह नमक बनाया गया था उसका नाम खारा खेत पड़ा।खारा का मतलब नमक है। इसी के बगल में नेम और नून नदी बहती है। जिसका पानी नमकीन है।

इस जगह का नाम है खराखेत। यह देहरादून से लगभग 22 किलोमीटर दूर पश्चिमी भाग में पड़ता है। इसका रास्ता प्रेमनगर से आगे नंदा की चौकी से उत्तर की और पौंधा गावं से होते हुए जसपाल राणा शूटिंग रेंज से होकर जाता है।

भारत ज्ञान विज्ञान समिति उत्तराखंड ने भारत ज्ञान विज्ञान युवा समिति के साथ मिलकर आज इसी जगह से अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क के द्वारा चलाये जा रहे “सबका देश अपना देश” अभियान की शुरआत की। आज के कार्यक्रम walk & talk का नाम था अपनी विरासत को जानो। इस कार्यक्रम में तीस के लगभग युवा व अन्य साथी शामिल हुए। एक घंटे स्मारक स्थल पर श्रमदान कर सफाई की गई। फिर इस जगह के और नमक आंदोलन पर चर्चा की। इस विषय पर सर्वोदय मंडल देहरादून के साथी बीजू नेगी जी ने बिस्तार से जानकारी दी। तत्पश्चात अपने अपने घरों से बनाकर लाये खाने को मिल बाँट कर सामूहिक भोज का आनंद लिया। सबका देश हमारा देश अभियान को जोर शोर से करने के संकल्प के साथ आज के कार्यक्रम का समापन हुआ। आज मुख्य रूप से गीता गैरोला, बीजू नेगी , अनूप बडोला , गजेंद्र वर्मा , उमा भट्ट , इंद्रेश नौटियाल , एस एस रावत,नितेश खंतवाल, कमलेश खंतवाल , सतीश धौलखंडी ,नेहा चंद अग्रिम सुन्द्रियाल, देवेंद्र रावल हिमांशु चौहान सहित एस एफ आई के नेतृत्वकारी साथी उपस्थित रहे।
(साभार:Vijay Bhatt )

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चैनलों पर युद्ध का मंच सजा है, नायक विश्व शांति पुरस्कार लेकर लौटा है

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प्रतीकात्मक चित्र

न्यूज़ चैनलों में युद्ध का मोर्चा सजा है। नायक को बख़्तरबंद किए जाने की तैयारी हो रही है। तभी ख़बर आती है कि नायक दक्षिण कोरिया में विश्व शांति पुरस्कार लेने निकल पड़े हैं। मनमोहन सिंह ने ऐसा किया होता तो भाजपा मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस हो रही होती कि जब हमारे जवान मारे जा रहे हैं तो हमारे प्रधानमंत्री शांति पुरस्कार ले रहे हैं। चैनल युद्ध का माहौल बनाकर कवियों से दरबार सजवा रहे हैं और प्रधानमंत्री हैं कि शांति पुरस्कार लेकर घर आ रहे हैं। कहां तो ज्योति बने ज्वाला की बात थी, मां कसम बदला लूंगा का उफ़ान था लेकिन अंत में कहानी राम-लखन की हो गई है। वन टू का फोर वाली।

मोदी को पता है। गोदी मीडिया उनके इस्तमाल के लिए है न कि वे गोदी मीडिया के इस्तमाल के लिए। एक चैनल ने तो अपने कार्यक्रम में यहां तक लिख दिया कि इलेक्शन ज़रूरी है या एक्शन। जो बात अफवाह से शुरू हुई थी वो अब गोदी मीडिया में आधिकारिक होती जा रही है। मोदी के लिए माहौल बनाने और उन्हें उस माहौल में धकेल देने वाले चैनल डर के मारे पूछ नहीं पा रहे हैं कि मोदी हैं कहां। वे रैलियां क्यों कर रहे हैं, झांसी क्यों जा रहे हैं, वहां से आकर दक्षिण कोरिया क्यों जा रहे हैं, दक्षिण कोरिया से आकर गोरखपुर क्यों जा रहे हैं? युद्ध की दुकान सजी है, ललकार है मगर युद्ध न करन के लिए फटकार नहीं है!

प्रधानमंत्री को पता है कि गोदी मीडिया के पोसुआ पत्रकारों की औकात। जो एंकर उनसे दो सवाल पूछने की हिम्मत न रखता हो, उसकी ललकार पर मोर्चे पर जाने से अच्छा है वे दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल चले गए। चैनलों में हिम्मत होती तो यही पूछ लेते कि यहां हम चिल्ला चिल्ला कर गले से गोला दागे जा रहे हैं और आप हैं कि शांति पुरस्कार ले रहे हैं। आप कहीं रवीश कुमार का प्राइम टाइम तो नहीं देखने लगे।

स्क्रोल वेबसाइट पर रोहन वेंकटरामाकृष्णन की रिपोर्ट सभी को पढ़नी चाहिए। पाठक और पत्रकार दोनों को। रोहन ने इस मसले पर सरकारी सूत्रों के हवाले से अलग अलग अखबारों में छपी सफाई की ख़बरों को लेकर चार्ट बनाया है। जिससे आप देख सकते हैं कि किस किस बात के अलग-अलग वर्ज़न है। कौन-कौन सी बात सभी रिपोर्ट में एक है।

यह तय है कि प्रधानमंत्री ने पुलवामा हमले के दो घंटे बाद रुद्रपुर की रैली को फोन से संबोधित किया था और उसमें पुलवामा हमले का कोई ज़िक्र नहीं किया था। अपनी सरकार की कई योजनाओं को गिनाया। इस बात पर मीडिया में छपी सभी रिपोर्ट में सहमति है। रोहन ने दूरदर्शन की क्लिपिंग का सहारा लेते हुए बताया है कि प्रधानमंत्री ने 5 बज कर 10 मिनट पर फोन से रैली को संबोधित किया था। इतना बड़ा होने पर प्रधानमंत्री ही रैली कर सकते थे। उस भाषण में मौसम के कारण न आ पाने का दुख तो है मगर पुलवामा में मारे गए जवानों के लिए दुख नहीं है। स्क्रोल ने लिखा है कि इस एक बात के अलावा सभी मीडिया में हर बात के अलग-अलग दावे हैं।

स्थानीय अख़बारों में छपी रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस ने आरोप लगाए हैं। टेलिग्राफ अखबार से उत्तराखंड के एक अधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया है और दिल्ली में कई पत्रकारों को सरकारी सूत्रों ने ब्रीफ किया है। उनकी ख़बरों का ब्यौरा है। चौथा इकोनोमिक्स टाइम्स में शुक्रवार को छपी एक खबर है। तो चार तरह के वर्ज़न हैं।

कांग्रेस का आरोप है कि हमला होने के बाद मोदी 6 बज कर 45 मिनट तक डिस्कवरी चैनल और अपने प्रचार के लिए शूटिंग करते रहे। मोटर-बोट पर सैर करते रहे। उत्तराखंड के अनाम अधिकारी ने कहा है कि मोदी ने हमले से पहले बोट की सवारी की। लेकिन हमले के घंटे भर बाद वे जंगल सफारी पर गए। अपने फोन से काले हिरण की तस्वीर ली। वहां से वे खिन्नौली गेस्ट हाउस गए जहां 4 बज कर 30 मिनट तक शूटिंग होती रही। हमले का समय 3:10 बताया जाता है। अज्ञात सरकारी सूत्रों ने बताया कि रूद्रपुर रैली रद्द कर दी। वहां नहीं गए और फोन से संबोधित किया। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, गृहमंत्री, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल से बात की। कुछ नहीं खाया। एक वरिष्ठ अधिकारी हवाले से खबर छपी है कि मोदी ने रुदपुर की रैली रद्द कर दी क्योंकि वे फोन पर जानकारी लेकर समीक्षा कर रहे थे। उसके बाद रैली को फोन से संबोधित किया।

स्क्रोल ने लिखा है कि अलग-अलग वर्ज़न हैं। कौन सा बिल्कुल सही है बताना मुश्किल है। सवाल का जवाब नहीं मिलता है कि प्रधानमंत्री हमले के बाद तक डिस्कवरी चैनल की शूटिंग करते रहे या नहीं। जानकारी मिलने के बाद भी शूटिंग की या हमले से पहले शूटिंग हो चुकी थी।

मुझे अच्छी तरह याद है। सरकारी सूत्रों ने कहा कि ख़राब मौसम के कारण प्रधानमंत्री तक सही समय पर सूचना नहीं पहुंची। यह बात न पचती है और न जंचती है। रैली करने लायक फोन का सिग्नल था तो उसी सिग्नल से उनतक बात पहुंच सकती है। समंदर के ऊपर उड़ रहे बीच आसामान में उनके जहाज़ पर सूचना पहुंच सकती है तो दिल्ली के पास रूद्रपुर में सूचना नहीं पहुंचेगी यह बात बच्चों जैसी लगती है।

प्रधानमंत्री का कार्यक्रम तय होता है। इसलिए उनके कार्यक्रम के इतने वर्ज़न नहीं होने चाहिए। लीपा-पोती की कोशिश हो रही है। दूसरा बीजेपी ने ही माहौल रचा है कि शोक का समय है। सबको अपना राष्ट्रवाद ज़ोर-ज़ोर से बोलकर ज़ाहिर करना होगा। तब इस संदर्भ में सवाल उठने लगेगा कि हमले की घटना के बाद तक शूटिंग कैसे हो सकती है। प्रधानमंत्री रैली कैसे कर सकते हैं। आगे के लिए आप स्क्रोल साइट पर रोहन की पूरी रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

गोदी मीडिया के लिए पीएम का शूटिंग करना कोई सवाल नहीं। अब उसने नितिन गडकरी का बयान थाम लिया है। वही पाकिस्तान को पान रोकने का बयान। उन्होंने भी रणनीति के तहत पुरानी खबर ट्वीट कर दी। 2016 के फैसले को ट्वीट किया तो यही बता देते कि कितना पानी रोका। लेकिन तथ्य से किसी को क्या मतलब। पाकिस्तान पर जल-प्रहार, पानी-पानी को तरसेगा पाकिस्तान जैसे मुखड़ों से चैनलों पर वीर-रस के गीत बजने लगे हैं। तथ्य यही है कि भारत पानी नहीं रोकेगा। अपने हिस्से का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने के लिए उसे कई डैम बनाने हैं। एक का निर्माण शुरू हुआ है। दो के बनने पर फैसला लेना है। जब बनेगा तभी पानी रोक पाएगा। तो पाकिस्तान पर जल-प्रहार नहीं हुआ है। भारत अपने हिस्से का ही पानी रोक रहा है न कि पाकिस्तान को पानी रोक रहा है।

चैनलों ने पाकिस्तान के नाम पर भारत के दर्शकों पर ही झूठ के गोले दाग रखे हैं। हमले में दर्शक घायल है। अच्छा किया प्रधानमंत्री ने विश्व शांति पुरस्कार जनता के नाम कर दिया। इस जनता में वो जनता भी है जो दिन रात पुलवामा के बाद राष्ट्रवाद की आड़ में सियासी माहौल बना रही है। शांति पुरस्कार लेकर जनता कंफ्यूज़ है। माहौल बनाने वाले कार्यकर्ताओं को रात में बुलवाया गया कि चलो, आओ और एय़रपोर्ट पर प्रधानमंत्री का स्वागत करो। वे शांति पुरस्कार जीत कर आ रहे हैं। एयरपोर्ट के रास्ते पोस्टर भी लगा दिए गए।

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24 फरवरी को गोरखपुर में प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना का उद्घाटन करने वाले हैं। उत्तराखंड सरकार ने सभी ज़िलों में आदेश जारी किया है कि ज़िला और ब्लाक स्तर पर किसानों को सभागार में बिठाकर लाइव टेलिकास्ट दिखाना है। जनप्रतिनिधि भी शामिल होंगे। इसके लिए ज़िला स्तर पर 25,000 और ब्लाक लेवल पर 10,000 खर्च की मंज़ूरी दी गई है। आप हिसाब लगाए कि अकेले उत्तराखंड में जनता का 10-12 लाख पैसा पानी में बह जाएगा। भारत में 640 ज़िले हैं और 5500 के करीब ब्लाक हैं। सिर्फ इसी पर 7 करोड़ से अधिक की राशि खर्च हो जाएगी। हम नहीं जानते कि गोरखपुर की सभा के लिए कितना पैसा ख़र्च किया गया है। उसी गोरखपुर के ओबीसी और अनुसूचित जाति के छात्र रोज़ मेसेज करते हैं कि उन्हें छात्रवृत्ति नहीं मिल रही है। ग़रीब छात्रों को पढ़ने में दिक्कतें आ रही हैं।

न्यूज़ चैनलों की देशभक्ति से सावधान रहिए। अपनी देशभक्ति पर भरोसा कीजिए। जो चैनल देश की सरकार से सवाल नहीं पूछ सकते वे पाकिस्तान से पूछ रहे हैं। सेना के अच्छे भले अधिकारी भी इन कार्यक्रमों में जाकर प्रोपेगैंडा का शिकार हो रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि सेना अपनी रणनीति और अपने समय से कार्रवाई का फैसला लेगी। सेना अपने जवानों से कहे कि न्यूज़ चैनल न देखें। वर्ना गोली चलाने की जगह हंसी आने लगेगी। चैनलों के जोकरों को देखकर मोर्चे पर नहीं निकलना चाहिए। जय हिन्द।

(यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है)

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