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बीट विशेष

टट्टी साफ करने वाली मां महान और समाज की टट्टी सर पर पैखाना ढोने वाला अछूत ! गज़ब का दोगलापन है

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एक दलित होने का दर्द क्या होता है क्या ये समाज समझ पाएगा? क्या हमने मंदिरों में अरदास लगाई थी कि इस जाति में पैदा करना? बहुत लोगों का तर्क है कि जातिवाद का कारण आरक्षण है, जातिआधारित भेदभाव लगभग 5000 साल से चल रहा है, जातिगत आरक्षण 70 साल से, लेकिन फिर भी लोग आरक्षण को इसका मुख्य कारण मानते हैं. मैंने आरक्षण का विरोध करने वाले आजतक एक भी व्यक्ति को नहीं देखा जो अपनी जातीय ताने-बाने या जातीय श्रेष्ठता को छोड़ने की बात करता हो. कुछ लोग कहते हैं कि सब तो ले ही रहे हो कुछ तो छोड़ दो? देश की 70% अर्थव्यवस्था का पैसा महज 1% के पास है और उसमें एक भी दलित नहीं है. सरकारी आंकड़ें देख लो 50% में से 20% भी आरक्षण ढंग से लागू नहीं हुआ.

कुछ लोग जातिआधारित भेदभाव इसलिए करते हैं कि दलित गंदगी साफ करते हैं. गंदा करने वाला श्रेष्ठ है. बच्चे की टट्टी साफ करने वाली मां महान और समाज की टट्टी सर पर धोने वाला शुद्र और अछूत? गज़ब का दोगलापन है.

एक दलित जब किराए का मकान लेने जाता है तब भेदभाव, शादी में खाने की अलग व्यवस्था, नौकरी में जातिआधारित शोषण, स्कूल में ज़मीन पर बिठाना. मुझे याद है मुंबई में मेरे क्लास का मॉनिटर मुझे हर रोज जातिसूचक नाम से बुलाता था ओबीसी होने के नाते भी मैं अछूता नहीं रहा. जब मीडिया में नौकरी के लिए उतरा तो बहुत से संपादक सीधा जात जानने के लिए सरनेम पूछते थे. दिल्ली में पहले दिन मेरे क्लास के एक लड़के ने कहा था कि तुम्हारी जाति के लोगों को हमारे यहां बहुत पीटते हैं. लोगों को उनका प्रतिद्वंद्वी हराता है और हमें पूरा समाज हराने के लिए लगा रहता है. हर दिन कोई न कोई एहसास दिलाता है कि मैं एक अछूत हूँ और शूद्र हूँ. ऐसा नहीं है सब करते हैं कुछ अच्छे लोग हैं मैं इस मामले में भाग्यशाली रहा. कुछ अच्छे लोग मिले जिन्होंने कभी एहसास नहीं होने दिया.

हां मैं एक दलित समाज में जन्मा हूँ. इसमें मेरा कोई दोष नहीं लेकिन मैं इस पहचान के साथ मारूंगा नहीं. बहुत लोगों को मेरी बात कड़वी लगती होगी, लेकिन आपका अतीत सुनहरा होगा, लेकिन मेरा और मेरा समाज का अतीत उस कोयले की खान की तरह अंधेरा रहा है जिसमें अपमान, उपेक्षा और अत्याचार रहा है. ये आग उसी की देन है. मैं यूँही धीरे-धीरे चलूंगा, चैन उतरेगी तो उतर कर चढ़ाऊंगा। न रुकूँगा न थामुंग। तुम्हारे हर वार का प्रतिकार करूँगा, मैं सबको पार करूँगा.

सांत्वना नहीं चाहिए अधिकार चाहिए

(प्रशांत की फेसबुक वाल से)

1 Comment

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  1. Sushil K. Rajoria

    June 27, 2018 at 2:05 pm

    Behtrin lekh Parshantji. Too good to say any thing more. Ye vidambana hi hai samaj ki manusya dogle pan mai jeeta hai. Nahi to kam to sabhi jaruri hai. Roj hi sharir ki safai na ho to apna swasthya kitna kharab lagta hai. Isi tarah desh ke swasthya ka kya oga andaja lagaya ja sakta hai. Lekin log pakhandi he aur bharat jati dambh ke karan dunia ka sabse pakhandi desh hai. Chahe log kitne bhi pakhandi ho hame apna kam karte rahna chahiye. Mai apki isi baat ko bal dunga jo apne ant me kahi: हां मैं एक दलित समाज में जन्मा हूँ. इसमें मेरा कोई दोष नहीं लेकिन मैं इस पहचान के साथ मारूंगा नहीं. बहुत लोगों को मेरी बात कड़वी लगती होगी, लेकिन आपका अतीत सुनहरा होगा, लेकिन मेरा और मेरा समाज का अतीत उस कोयले की खान की तरह अंधेरा रहा है जिसमें अपमान, उपेक्षा और अत्याचार रहा है. ये आग उसी की देन है. मैं यूँही धीरे-धीरे चलूंगा, चैन उतरेगी तो उतर कर चढ़ाऊंगा। न रुकूँगा न थामुंग। तुम्हारे हर वार का प्रतिकार करूँगा, मैं सबको पार करूँगा.

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बीट विशेष

जो ऊपर हैं वो मग़रूर हैं, जो नीचे हैं वो मजबूर हैं

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Pic Credit: Cartoonstock.com
 हमारी पस्ती का सिर्फ़ एक ही कारण है कि, “जो ऊपर हैं वो मग़रूर हैं, जो नीचे वो मजबूर! ऊपर के लोग अपने से नीचे के लोगों की राय लेना आपनी तौहीन समझते हैं! कोई व्यक्ति अपनी ख़ूबी दिखा ही नहीं सकता अगर आप उसकी अवहेलना ही करते रहेंगे!
उसूल और पाबन्दी, पाबन्दी और सख़्ती, सख्ती और ज़ुल्म के बीच की लाईन बड़ी महीन है जिसकी पहचान होना हुक्मरानों के लिए बहुत ज़रूरी है! एक अच्छे हुक्मरान के लिए यह ज़रूरी है कि उठाए गए सवालों की गहराई में जाएं, ना कि सवाल करने वालों को ही बदनाम करने की कोशिश में लग जाएं!
सीधे पहाड़ की चोटी पर उतरने से पहाड़ पर चढ़ने का तज़र्बा नहीं मिलता! ज़िन्दगी की सीख पहाड़ की चढ़ानो पर मिलती है चोटी पर नहीं! चढानों पर ही तज़ुर्बे मिलते हैं और ज़िन्दगी मँझती है! आप किसी भी सख्स को चोटी पर तो चढ़ा सकते हैं लेकिन अगर उसे चढ़ाई का तज़र्बा नहीं तो यह उसके और आपके मिशन, दोनों के लिए ख़तरनाक होगा!
कोई भी शख़्स अपनी ज़िम्मेवारी में तभी क़ामयाब हो सकता है, अगर वो विश्वासी तथा उत्तरदायी हो और अपने फ़ैसलों के लिए उसे सही हद तक आज़ादी हो! आज़ादी हासिल करने के लिए भी उसी हद तक शिक्षित हो! शिक्षा एक बहुत ही महत्वपूर्ण हथियार है, शिक्षा जितनी ज़्यादा होगा उतनी ही आज़ादी मिल पाना संभव होगा!
लोकतंत्र में आज़ादी पाने के लिए सच्चे रहनुमाओं की ज़रूरत है!और सच्चे रहनुमा वही हो सकते हैं जिनकी जानकारी मुक़म्मल हो! जानकारी तभी मुक़म्मल होगी जब आप शिक्षण तथा प्रशिक्षण को बढ़ावा देंगे! अपने काम को अपना फ़ख्र समझेंगे, जिस काम में यक़ीन हो वही करें वरना दूसरों के विश्वासघात का शिकार बनते रहेंगे!
लेकिन, हमारी सच्चाई यही है कि हम अपने प्रशिक्षित, ईमानदार तथा उपयोगी लोगों को हद दर्जे तक निचोड़ कर छोड़ देते हैं, जिससे वो नाकाम और निकम्मे लोगों से चिढ़ने लगते हैं! अलग-अलग हुक्मरानों से वफ़ा करते-करते हमने अपनी हैसियत खो दी है! मौजूदा हालात ऐसे हो गए हैं कि हमे अपने ही समाज से चिढ़ होने लगी है और हम तकलीफ़ में रहने लगे हैं, लेकिन फिरसे उठ खड़े होने को जी चाहता है जब बेंजामिन फ्रेंक्लिन की यह बात नज़र पे आती है!
“जिन बातों से तकलीफ़ होती है, उनसे ही तालीम भी मिलती है”!
लेखक:शाहनवाज़ भारतीय, शोधकर्ता, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली!
नोट:ऊपर लिखी गई बातों में अधिकांश बातें डॉ. ए. पी. जे अबुल कलाम की हैं जो आज के नेताओं को भी आईना दिखाती हैं अगर वो देखना चाहें तो!
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बीट विशेष

कॉमरेड ज्ञानेद्र खंतवाल के नेतृत्व में उत्तराखंड के सीमान्त जिले चमोली में सी पी एम् ने किया केरल आपदा पीड़ितों के लिए चन्दा

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केरल में आई भीषण आपदा ने केरल को तहस नहस कर दिया है. पूरा भारत केरल के लिए आपदा रहत कोष जुटाने में लगा हुआ है. इसी दौरान भारतीय कमुनिस्ट पार्टी माक्सवादी, भारत ज्ञान विज्ञानं समिति और तमाम सामाजिक संगठनो द्वारा भारत के तमाम कोनो से राहत कार्य के लिए चन्दा एकत्र कर मानवता के हित में अपना योगदान देने की कोशिश कर रहे हैं. इसी कड़ी में उतराखंड के सुदूर पिछड़े एवं सीमांत इलाके में स्थित चमोली जिले के घाट ब्लाक में भी सी पी आई एम् के कार्यकर्ताओं ने केरल राहत कोष के लिए चन्दा इकठ्ठा किया.

घाट में किये जा रहे चंदा कार्यक्रम का नेतृत्व ज्ञानेंद्र खंतवाल द्वारा किया गया. ज्ञानेंद्र खंतवाल से हुई बातचीत में उन्होंने कहा की केरल में आई आपदा कोई छोटी आपदा नहीं है इस आपदा के लिए पुरे देश को एक जुट होकर के सामने आना होगा. केरल प्रगतिशील राज्य है और भारत सरकार को भी चाहिए की केरल की खूबसूरती को एक बार फिर से वापस लाने में केंद्र सरकार को भी अहम् भूमिका निभानी चाहिए.

उन्होंने आगे कहा सन 2013 में आई केदारनाथ आपदा में केरल से आई भारत ज्ञान विज्ञान समिति की डाक्टरों की टीम ने कई महीनो तक दवाइयों के साथ केदारनाथ में ही  डेरा डाल कर रखा हुआ था और उन्होंने आपदा पीड़ितों के लिए मुफ्त चिकित्सीय सहायता प्रदान किया था.

जब केरल आपदा के वक्त हमारे काम आ सकता है तो हमारा भी यह फर्ज बनता है कि जब केरल आपदा से जूझ रहा है तो हमें केरल के साथ तन मन और धन के साथ जुटना चाहिए.

घाट में हुए चन्दा कार्यक्रम में कामरेड मदन मिश्रा, कमलेश गौड़, मोहन सिंह रावत, नरेंद्र रावत, कुंवर राम, कान्ति, प्रताप सिंह, विक्रम, सोहन लाल आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

(प्रेस रिलीज द्वारा प्राप्त )

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बीट विशेष

RSS संचालित स्कूल में मासूम बच्चों से पूछा जा रही उसकी जाति, पिता ने किया फेसबुक पोस्ट

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कागज़ के फूलों से पूछी जा रही उसकी खुशबू की जाति !

गुरूजी, आखिर क्यों पूछते हो बच्चो से उनकी जाति ?

मासूम बच्चो के कोमल मनमस्तिष्क में भरी जा रही जाति का जहर

आनंदराम ढांढनिया सरस्वती विद्या मंदिर भागलपुर में अनोखा कारनामा

भागलपुर के आनंदराम ढांढनिया सरस्वती विद्या मंदिर में छोटे छोटे बच्चो से उसकी जाति पूछी जा रही है . यह कारनामा और कोई नहीं खुद स्कूल के क्लास टीचर कर रहे है… जिसे स्कूल में बच्चे आचार्य जी कह कर सम्बोधित करते है, शनिवार को अंतिम पीरियड में क्लास में बच्चो से क्रमवार तरीके से उसकी जाति पूछी गयी …कई बच्चो ने ठीक से जबाब से दे दिया लेकिन जब पांचवी में पढ़ने वाली मेरी बिटिया तनिष्का सिंह से जब यह सवाल पूछा गया तो वह सही जबाब नहीं दे सकी ,,उसने अपना नाम बताया तनिष्का सिंह तो क्लास टीचर ने कहा भूमिहार हो ? मेरी बेटी ने कहा ये क्या होता है ,, मैं नहीं जानती , क्लास टीचर ने कहा ,,, स्कूल आईडी दिखाओ-जहा नाम लिखा था – तनिष्का सिंह गहलौत . क्लास टीचर ने कहा – बाबू साहब हो ,,,मेरी बिटिया ने कहा – नहीं जानते सर.. राजपूत हो … बिटिया ने कहा नहीं जानते सर,, मेरे पापा को pata होगा,? क्लास टीचर ने आईडी कार्ड पर मेरा नाम लिखा देखा, कहा – सोमनाथ आर्य,, जाति समझ में नहीं आया ,,, तो बोले क्या करते है पापा ? बिटिया बोली – जौर्नालिस्ट है? क्लास टीचर ने कहा सोमवार को जाति पता कर आना,…
बिटिया जब घर आयी तो बोली – पापा मैं कौन सा कास्ट हूँ .मैंने कहा क्यों ? उसने कहा क्लास टीचर ने पूछा है… मैंने सिलसिलेवार तरीके से पूरी जानकारी ली. फिर स्कूल फ़ोन लगाया ,,,मैंने सवाल किया – छोटे बच्चो से उनकी जाति क्यों पूछी जा रही है, जबाब मिला,पटना से एक फॉर्म आया है,उसके लिए जाति पूछना अनिवार्य है … मैं अपने बच्चो को उसकी जाति बता दू या स्कूल जाकर उसके क्लास टीचर से मिलू ? मार्गदर्शन करे ? …… बच्चों से उसकी जाति पूछने वाले क्लास टीचर का नाम है ,,गोपाल आचार्य जो गणित पढाते है.

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